प्रत्येक शनिवार
हमारा शनिचर उतारने के लिए
मिल जायेगे, हर चौराहे और
रेड लाइट पर
अबोध, बुझे से, गंदे -फटे कपड़े में
बहुत से बचपन।
एक लोटे में
एक लोहे की मूर्ति ,
और थोड़े से कडुवे तेल के साथ
घूमते यह नन्हें
शनिचर हरता !
दीदी, भैया, आंटी कह कर
प्रगट हो जाते है एक देवता की तरह
और मारे डर के, एक -दो रुपये में
इस तत्काल प्रगट शनि से
पीछा छुडाते हम, एक चौराहे से
दुसरे चौराहे चले जाते।
पर हर चौराहे पर डटे
हे नन्हें शनिचर हरता!
तुम्हारा शनिचर कौन हरेगा?
कब हरेगा?
तुम्हारे लिए हर चौराहे
और रेड लाइट पर
कौन खड़ा होगा?
स्वयं शनि देवता
या खुद तुम!
पर कब???
7 comments:
तुम्हारा शनिचर कौन हरेगा?
वाकई इन नन्हें का शनिचर तो इन्हें छोड़ता ही नहीं और ये ----
samvedansheel rachna
संवेदनशील और विचारणीय विषय - सच्ची और अच्छी सोच - हार्दिक शुभकामनाएं
आपने बहुत ही आवस्यक विषय पर ,कितने ही ढंगों से लिखा गया जिस पर , एकदम नवीन विचार , अविस्मरनीय ,
चेतना का प्रसार किया है, यह लिखकर.
प्रसंशनीय है आपका लेखन ......
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aditya
भावपूर्ण अभिव्यक्ति..."तुम्हारा शनिचर कौन हरेगा?"... एक कड़वा प्रश्न...दिल को छू लेने वाली पंक्तियाँ... शुभकामनायें...
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