रविवार, 1 सितंबर 2013

छज्जे जितनी जगह

घर पर
अपने छज्जे पर
आती थोड़ी सी
गुनगुनी धूप,
बादल की छांव,
बारिस की फुहार
बचाए रखना
चाहती हूँ
उन धूधली, विसूरती
खाली शामों
के लिए
रूखे पलों मे जब
मेरी आँखों में
नमी नहीं
बची रह सकेगी
तब बारिस की
इन फुहारों की तरह
बरस जाएगी आँखें मेरी
लौट आएगी
जिंदगी की नमी
इस खुशी के अंकुरण
के लिए
काफी होगी
मेरे छज्जे पर आती
गुनगुनी धूप
जिसकी गर्माहट में
अंकुर बनेगा वृक्ष
खुशी का एक
छायादार वृक्ष
इसकी बादलों जैसी
पारदर्शी छांव में
इस महानगर में
अपने लिए
एक छज्जे जितनी
जगह की
कल्पना में
इक पल के लिए
ऊंघ जाऊगी।



6 टिप्‍पणियां:

Majaal ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता ! बधाई स्वीकार करें !

हिंदी
फोरम एग्रीगेटर पर करिए अपने ब्लॉग का मुफ्त प्रचार !


अजय कुमार झा ने कहा…

आपकी कमाल की पोस्ट का एक छोटा सा कतरा हमने सहेज़ लिया ब्लॉग बुलेटिन के इस पन्ने को सज़ाने और दोस्तों तक आपकी पोस्ट को पहुंचाने के लिए , आइए मिलिए अपनी और अपनों की पोस्टों से , आज के बुलेटिन पर

प्रतिभा कुशवाहा ने कहा…

आप दोनों का बहुत बहुत शुक्रिया

Ghazala Amrin ने कहा…

Madam,

You are an amazing Poetess...

Keep it up!

प्रतिभा कुशवाहा ने कहा…

thanx..Ghazala

मदन मोहन सक्सेना ने कहा…

बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति.हार्दिक बधाई और शुभकामनायें!
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

http://madan-saxena.blogspot.in/
http://mmsaxena.blogspot.in/
http://madanmohansaxena.blogspot.in/
http://mmsaxena69.blogspot.in/