रविवार, 17 जनवरी 2016

अब इतना पढ़ गई हो तो...!

 न जाने कब सफर उबाऊ बन जाए, उससे पहले  कोई पुस्तक या पत्रिका हाथ में ले लेनी चाहिए। इसलिए सफर के दौरान मैं पढने के लिए कुछ न कुछ जरूर रखती हुँ ताकि जब अपने आसपास देखते ऊब जाऊ तो पढ सकु।  इसलिए मैंने अपनी आख्ने पत्रिका में गड़ा ली। तभी सामने की सीट पर बैठी महिला के पास एक व्यक्ति आकर बैठ गया। बातें षुरू हो गई। बातों से लग रहा था कि पहले से वे लोग परिचित है और आज अचानक सालों के बाद रेल के इस डिब्बे में मिल गये हेै। इस बीच उसके परिवार जो घटा  उसके बारे में वह बडे विस्तार से बता रही थी या दूसरे षब्दों में कहे तो गर्व के साथ । बातों से पता चल रहा था कि उस महिला के तीन बेटे हैं। एक दिल्ली में जिसके घर से वह वापस अपने घर जा रही थी, अच्छी कंपनी में काम करता था। दूसरा नासा में वैज्ञानिक बता रही थी। और तीसरा आईएएस की तैयारी इलाहाबाद में कर रहा था। उस महिला के अनुसार बेटे बहुत ही होनहार, पढाकू और षिक्षित है। बताने के अनुसार वास्तविकता भी यही लग रही थी। लड़की के बारे में पूछने पर बताया कि षहर में ही पढाई पूरी करने के बाद शादी कर दी। यह बताते हुये उसने गहरी सांस ली।
काफी देर बातें करने के बाद वह व्यक्ति वहां से चला गया। इधर - उधर  देखने के बाद उसकी नजर मुझ पर गई। महिला की बातें खतम होने के बाद अब मैं अपनी पत्रिका पर ध्यान लगाने की कोषिष कर रही थी। इसी दौरान जैसे ही मैंने उसकी तरफ देखा एक मुस्कान के साथ पूछ बैठी- कहां जा रही हो? मैंने कहा- घर। घर कहां?-उसने पूछा। मैंने बता दिया। बहुत ही खुष होकर बोली अच्छा! मैं भी वहीं जा रही हूं। वहीं की रहने वाली हूं। फिर पूछा कि मैं दिल्ली में क्या करती हूं? मैंने बता दिया कि जाॅब करती हूं। कहां तक पढ़ी हूं? मैंने यह भी बता दिया। तो वह बोली-हां! अब इतना पढ़ गई हो तो...। उन्होंने वाक्य पूरा नहीं किया। पर उनके सवाल बंद नहीं हुये, फिर पूछा- षादी हुयी कि नहीं। मैंने कहा कि नहीं। तो उसने कहा कि हां, नौकरी करने लगी हो तो...। फिर उन्होंने वाक्य अध्ूरा छोड़ दिया। इतनी बातों के बाद मैंने अपना ध्यान फिर से पत्रिका में लगा लिया। पर इस महिला का विरोधभाश पूरे रास्ते कचोटता रहा। थोड़ी देर पहले जो अपने बेटों की पढ़ाई और उनकी नौकरी के गुणगान कर गर्व महसूस कर रही थी वही मेरी पढ़ाई और नौकरी पर खुश होने की बाजाय कटाक्षपूर्ण टिप्पणी करके चुप हो गई। इस मामले में मेरा लड़की होना कहीं न कहीं उन्हें चुभ रहा था।
भारत में लैंगिक भेदभाव हर घर में किसी न किसी रूप में मिल जाता है। चाहे कोई कितना भी प्रगतिशील होने का दावा करे पर सच्चाई यही है कि लड़कियों को दोयम दर्जे का नागरिक ही मानकर उनको उसी नजर से देखते है। नही ंतो कोई कारण नहीं था कि एक संपंन घर के तीनों बेटे अच्छी पढ़ाई करके अपने उज्जवल भविश्य का निर्माण कर रहे हों वहीं उस घर की बेटी को मात्र इसलिए पढ़ा-लिखा दिया हो कि उसकी शादी सही जगह हो सके। इसी मानसिकता से ग्रसित लोग लड़कियों की सार्वजनिक उन्नति से प्रसन्न नहीं होते। उनकी सफलता उनके लिए कोई मायने नहीं रखती है। इसलिए उक्त महिला ने मेरे बारे में  ऐसी टिप्पणी की। यह बहुत ही छोटी मगर गौर करने वाली बात है कि माता-पिता बड़े गर्व से यह कहते हुये मिल जाते है कि हमने अपनी लड़कियों को लड़कों की तरह पाला है। गोया कि लड़कियों को लड़कियों की तरह पाला ही नहीं जा सकता। यह गर्व वाली बात ''लड़कियों को लड़कों'' की तरह,  उसी मानसिकता की ओर इशारा करती है कि जिन सुविधा और अधिकारो के अध्किारी लड़के मात्र है वह हमने अपनी लड़कियों को उपलब्ध करा कर उनका जीवन सुफल कर दिया।
एक अहसान के साथ उन्हें यह पल-पल बताया जाता रहता है कि देखो, हमने तुममे और तुम्हारे भाइयों में कभी कोई फर्क नहीं किया। जैसे फर्क करना माता-पिता का हक होता है? लड़कियों को कमतर आंकने वाली मानसिकता के कारण ही उस महिला ने ऐसा आचरण किया। जिसके प्रति वह बिलकुल अंजान थी। आखिर ऐसी मानसिकता बदलते-बदलते ही बदलेगी।

1 टिप्पणी:

Ashok Khurana ने कहा…

हकीकत तो यही है जो आपने लिखा है।:- *थमते थमते थमेंगे आँसू।रोना है कुछ हंसी नहीं है।।*(मीर)