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सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

इस जहाँ की श्रेष्ठ प्रेम कविताएँ!!

प्रेम यहां वहां जहां तहां उकेर दिया जाता है। प्रेम करने वालों को कहां ध्यान रहता है कि वह अपनी इन प्रेम अभिव्यक्तियों को कहाँ लिखे। वह कवि या कवयित्री नहीं होते है जो अपनी अभिव्यक्ति के लिए उचित समय और उचित स्थान के साथ कागज-कलम-दवात ढूढता घूमें । वह जहां ठहरता है वहीं रम जाता है। उसकी कविता होती है महज अपने प्रेमी और प्रेमिका का नाम उकेरना। जहां जगह पाता है गोदने लगता है उसका नाम। और मान लेता है है कि उसने लिख दी इस संसार की सबसे श्रेष्ठ , खूबसूरत कविता।  इस जहाँ की शाश्वत कविता, नीचे देखिये,...










है कि नहीं!

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

किसी सैंटा का इंतजार नहीं है इन्हें!!

आज 25 दिसबंर को
दिल्ली के सबसे षानदार चर्च के सामने
घूम रहे है छोटे-छोटे ईसा मसीह
किसी सैंटा की खोज में नहीं
ग्राहको की खोज में....
...सैंटा की टोपी बेच रहे हैं वे
मखमली सुर्ख लाल गोल टोपी
बिलकुल उनके चेहरों की तरह
दीदी, भैया, आंटी-अंकल
सबसे इसरार कर रहे हैं
हाथ में पकड़ी हुई टोपियों को
दिखा रहे हैं-
हमारी आंखों से आखें मिला रहे हैं
ताकि हम जान सके कि क्यूं खरीदनी है हमें
वे टोपियां...!

000       000      000

पर वे नहीं जानते
इतनी सर्दी में
वे क्यूं बेच रहे हैं
सैंटा की टोपियां
कौन है सैंटा?
इन्होंने वह कहानी भी नहीं सुनी
जिसमें रात को चुपके से
उनके मोजों में छुपा जाता है कोई उपहार
उनके लिए सैंटा तो बस यही टोपियां हैं
जो रात को
भर सकेगा उनका पेट!




शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

जीवन में सपने!

बगैर 
सपनों की नींद नहीं होती, 
बगैर नींद के 
सपने नहीं होते। 
कोई कितना भी दावा करे, 
कि उसकी  नींद में
सपने नहीं होते। 
अगर नींद है तो 
सपने भी निहित है। 
..........................................
यह इसी तरह
सच है 
जैसे  
जीवन है,
तो सपने है,
सपने है 
तो जीवन है।। 

रविवार, 3 अगस्त 2014

थैंक्स दोस्त!!

एक दिन
उदासी
बिन बुलाए
मेहमान की तरह आ धमकती है।
एक मुस्कान के साथ
‘हैलो‘ बोल
बगल में बैठ जाती है
हम डरते हैं, आंख चुराते हैं
वह हमारा हाल-चाल पूछती है।

औपचारिकतावश
हम भी
चाय-पानी पूछ ही लेते है।
वह बेशर्म की तरह
घुल-मिल कर बात
करती जाती है...
करती ही जाती है...।

पता नहीं उसे
इतना कुछ कैसे
मालूम होता है हमारे बारे में
पर उसे मालूम होता है सब कुछ
हमारा तिनका तिनका
जर्रा जर्रा...
उसकी सौबत में
कुछ ही देर में
हमारी सांसें
जोर से चलने लगती है
सीने पर पत्थर पड़ने लगते है
दम फूलने के साथ
सांसें छूटती-सी मालूम पड़ती हैं।

तभी
मोबाइल बज उठता है
स्क्रीन पर नाम चमकता है ‘दोस्त’
अरे, कितने दिनों बाद याद किया कमबख्ता ने!
एक मद्धिम सी मुस्कुराहट के साथ
उससे शुरू हुई बातें
ठहाको में बदलने लगती है
इधर पहलू में बैठी उदासी
बोर होने लगती है।

अब
उदासी
चुपके से
बगैर दरवाजा खोले ही
दरवाजे के नीचे से निकलने की
कोशिश में है।
मुझे विदा करने उसे
दरवाजे तक नहीं जाना पड़ा।

चंद लम्हों बाद
वह दूर जाती दिखती है।
थैंक्स दोस्त!!

सॉरी दोस्त!
दोस्ती में
थैंक्स-सॉरी
नहीं होता।

शनिवार, 26 जुलाई 2014

एक 'बीमार' से मिलते हुए!!!

वह बहुत बीमार चल रही हैं
हालत काफी गंभीर हैं!
उन्होंने बताया था-
तुम बात कर लेना,
तुम्हें याद करती हैं।

शब्दों के चुनाव मे फंसी मैं
कैसे करूंगी अपनी भावनाओं को व्यक्त!!

मोबाइल पर उनका नंबर डायल करने से पहले
बहुत से शब्दों को  मन ही मन
रटकर मैंने कहा-हैलो!

एक खनकती सी आवाज कानों में  घुल गई
वे ऐसे चहकी मानो पिजड़े में कैद चिड़िया
किसी को देख कर चहकती है -

कैसी हो? पूछती है वे
प्रत्युत्तर में मैंने पूछा-
पहले आप बताइये कैसी हैं?

शब्दों का इशारा शायद समझ गई।
तुरंत ही बोल पड़ी-
पता है तुम्हें, मुझे यहां
डाक्टरों ने बांध् रखा है,
कुछ नहीं हुआ है मुझे।
वे ऐसे बोली गर....
एक बच्चा शिकायत कर रहा हो!

अब तक की गई बातों में मेरी उनसे
तीसरी बातचीत थी यह,
पर ....बन गई थी एक लंबी बातचीतनुमा 'मुलाकात।'
इस बातचीत में
उन्होंने दे दिया मुंबई आने का निमंत्रण,
हाथ का बना खााना खाने का 'लजीज' प्रस्ताव भी,
पता नहीं और क्या -क्या
उनका उत्साह देखकर मैं भूल गई
वह सारे शब्द जो एक बीमार का
हालचाल लेते समय कहे
और सुने जाते है।

मैं सुने जा रही थी उनकी हंसी
बस प्यारी हंसी
और मधुर आवाज।

क्या मैं बीमार महिला से बात कर रही थी?

रविवार, 13 जुलाई 2014

जिंदगी में कविता

जिंदगी के हर बिखरे हर्फ को सजाती हूँ
दरख्तों के बीच से आती धूप को सम्हालती हूँ
दरवाजें की ओट से रास्ता निहारती हूँ
आँखों में आये खारे पानी को छुपाती हूँ मैं !!



शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

इस वसंत में

प्रेम जानने के लिए
खरीद लाई
प्रेम विशेषांक
प्रेम के सभी महाविशेषांक
प्रेम में पकी कविताएं
प्रेम पर लिखी सभी कहानियों के
हर शब्द को
पढ़ा मैंने
गुना मैंने
चखा मैंने
----------------
फिर भी
पैदा नहीं  कर पाई
कोई प्रेम विज्ञान
-----------------
पर आज
एक बच्चे की
मासूम मुस्कान ने
फूलों से सिंचे रस जैसा
शहद  बना दिया
मेरे गाँव से एक बच्ची की  मनमोहक मुस्कान युक्त तस्वीर 
मेरे ओठों पर
बगैर किसी
मधुमास के।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

एक पूरा साल... 2013

कहने को आज बीत गया
एक पूरा साल... 2013
कामोवेश......
इस साल भी थे
बारह महीने
वही जनवरी, फरवरी
 ...नवंबर, दिसबंर
सात-सात दिन मिलाकर हफ्ते
और हफ्ते मिलकर महीना
कोई तीस दिन का,
कोई इक्तीस दिन का।
हर साल की तरह
इस साल भी थे तीन सौ पैसठ दिन
अंतर दिखा तो बस
कलैंडर में
पिछले वर्ष जब था सोमवार
उसी दिन इस वर्ष पड़ा मंगलवार।
-------------------------------------
और इस तरह 2012 का पुराना कलैंडर
देखते देखते
बीत गया
एक पूरा
नया साल- 2013


सोमवार, 23 सितंबर 2013

हम कितने धर्मिक है!

आईटीओ के पुल से
गुजरते हुए देखा मैंने
एक आदमी को।

हाथ में दो थैले
तैयार था पुल से नीचे
यमुना नदी में फेंकने को
उस ‘पवित्र कूड़े’ को
जिसे अपने घर में
अपनी धर्मिक मान्यताएं
निभाने के बाद
झाड़-पोछकर
पानी में विर्सजन हेतु
तत्पर था पूरी धर्मनिष्ठा से
फेकने के लिए इस
पुल से।

000

सर,र,र
छप्प...छपाक्
नदी में गिरती हैं थैलियां
एक मिनट के
अंतराल में थैलियां
यमुना के दूसरे किनारे
से जा टकराती हैं
मुझे पता नहीं है कि
अभी कितनी और दूर
बहेगा पालीथीन में कैद
यह ‘पवित्र कूड़ा।’

पर सोचती हूं कि
कितना अच्छा होता
अगर उस अमुक ने
आजाद कर दिया होता
इस पैकेजिंग की संस्कृति से
इस कूड़े को,
तो ‘पवित्र कूड़ा’
कैसे हिल-मिलकर
बह रहा होता यमुना में
बगैर किसी संघर्ष के
और विलीन हो जाता
यमुना के संघर्षशील जल में
जैसे सदियों से
यमुना में विलीन होती आ रही थी
हमारी सभ्यताओं की मलिनताएं।

000

हां, अब तक
आप सही सोच रहे होगे कि
दिल्ली में यमुना साफ-सुथरी
थोड़े ही बह रही है?
इसमें मिली हैं कई किस्म की गंदगियां
तो फर?

क्या हुआ जो डाल दिया
इतना सा
‘पवित्र कूड़ा’?

शायद
कुछ नहीं
पर थोड़ा थोड़ा करके ही तो
बहुत कुछ हुआ है!
इससे तो आप सहमत होंगे ही।

000

एक चिंता है मेरी
पर पता नहीं
कितनी जायज है?
अभी गणेश उत्सव बीता है
नव दुर्गा आने वाली है
इन सभी पवित्र मूर्तियों का
जल प्रवाह, जल विसर्जन
इसी यमुना में तो किया जाएगा!
और हां, ‘छठ’ भी तो है ?

सच में
हम कितने धर्मिक है!!!


यमुना के किनारे नावों का रंगीन नजारा (वृन्दावन, मथुरा )

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

एक शाश्वत युद्ध

इन दस महीनों मेँ
कभी भी मैंने
तुम्हारा वास्तविक नाम जानने की
कोशिश नहीं की
तुम कहाँ की रहने वाली हो
इसमे भी मेरी कोई दिलचस्पी नहीं बनी
तुम्हारे भाई बहन कितने है ?
यह भी जानने की इच्छा
कभी नहीं पनपी
मन मेँ अगर कोई इच्छा थी
तो, बस यही
कि इंसाफ हो
तुम्हें इंसाफ मिले,
भरपूर इंसाफ
उस अन्याय के खिलाफ
जिसके विरुद्ध तुम
छेड़ कर गई हो
एक शाश्वत युद्ध
इस युद्ध को जिलाए
रखना है हमें
तुम्हारे जाने के बाद
अलाव मे एक चिंगारी
दबाये रखना है
किसी दामनी, निर्भया
या ज्योति के लिए!!

(13 सितंबर को रेयरेस्ट आफ द रेयर केस पर फैसला आने के बाद...)

शनिवार, 7 सितंबर 2013

ओस की बूंद

‘रात’ कभी भी
एक क्षण को भी
दम नहीं मारती।
जबकि सभी
उसकी गोद में
अपनी थकान लेकर
समा जाते है
बेसुध बेखबर।
और 'रात'....
पूरी रात मुस्तैदी से पहरा
बिठाए रखती है
इस कायनात में
कि कहीं
किसी के सपने में
खलल न पड़ जाए!

0000
सारी रात
सभी को
मीठे सपने
बुनने देने का
परिणाम होता हैं
सुबह घास के
तिनकों पर
बिखरी...
निर्मल, ठंडी
ओस की बूंदें
जैसे कोई किसान
अभी अभी
पसीना बहाकर
लौटा हो
खेत से।
मेरे गाँव 'पतरसा ' मे एक धूधली  शाम का चित्र 

रविवार, 1 सितंबर 2013

छज्जे जितनी जगह

घर पर
अपने छज्जे पर
आती थोड़ी सी
गुनगुनी धूप,
बादल की छांव,
बारिस की फुहार
बचाए रखना
चाहती हूँ
उन धूधली, विसूरती
खाली शामों
के लिए
रूखे पलों मे जब
मेरी आँखों में
नमी नहीं
बची रह सकेगी
तब बारिस की
इन फुहारों की तरह
बरस जाएगी आँखें मेरी
लौट आएगी
जिंदगी की नमी
इस खुशी के अंकुरण
के लिए
काफी होगी
मेरे छज्जे पर आती
गुनगुनी धूप
जिसकी गर्माहट में
अंकुर बनेगा वृक्ष
खुशी का एक
छायादार वृक्ष
इसकी बादलों जैसी
पारदर्शी छांव में
इस महानगर में
अपने लिए
एक छज्जे जितनी
जगह की
कल्पना में
इक पल के लिए
ऊंघ जाऊगी।



रविवार, 25 अगस्त 2013

सबसे खतरनाक

‘सबसे खतरनाक होता है
घर से काम पर
और काम से लौटकर घर आना’
‘पाश ’ ने चेताया था।
दफ्तर और घर के बीच का यह फासला
कितना खतरनाक होता है
इसको एक स्त्री से बेहतर कौन जान सकता है।
इसलिए अब मैं 'पाश' के साथ
जाती हूं  दफ्तर
और लौटती भी हूं उन्हीं के साथ
सुरक्षित अपने घर,
क्योंकि वे कहते हैं कि
‘सबसे खतरनाक होता है-
मुर्दा शांति से भर जाना,
तड़प का न होना,
सब कुछ सहन कर जाना।’


(मुंबई बलात्कार कांड से परेशान मन ने जब अवतार सिंह संधू 'पाश' की 'सबसे खतरनाक' कविता को पढ़ा ॥ )

शनिवार, 20 जुलाई 2013

ये खूटियां

खूंटी
छोटी-बड़ी, मोटी-पतली
स्टील, लोहे और तो और
प्लास्टिक की भी
जैसा आप चाहे।
दादा-दादी और नाना-नानी के
जमाने वाली तो बिलकुल नहीं
खूब सजी-संवरी
विभिन्न आकारों, प्रकारों में भी
रंगों का भी कोई जवाब नहीं
खूब रंग-बिरंगी, तितलियों सरीखी
बिलकुल नजाकत के साथ फौलाद
अपनी पसंदानुसार
कहीं भी लगा दें
दीवालों पर, अलमारी में
किसी लुकने-छिपने वाली जगहों पर
जहां किसी और की नजर न पहुंच सके
कभी-कभी दरवाजों के पीछे भी
ठोक सकते हैं इन्हें
एक हथौड़ी के बल से।
कोई गिला नहीं
कोई नाराजगी नहीं
मूक, अविचल
बिलकुल एक औरत की तरह
सबकुछ सहती
सबकुछ ढोती
सजीव बनते घर में
लगी ये निर्जीव
खूटियां।

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

एकबारगी...

एक छोटे से पिजड़े में कैद
बेहद रंगीन बे-जुबान
दो चिडि़या
जो न तो चहकती है,
न हिलती, न डुलती है।
यहां तक कुछ खाने पीने को
भी नहीं मांगती।
कभी कभी डोलती हवा ही
चिडि़या समेत पिजड़े में
जान डालने में
सामर्थ होती है।
फिर  भी न जाने क्यों मेरा मन
उन्हें आजाद कर
'इंडिया गेट' पर असली को धोखा देती ..चहचहाती बे- जुबान चिड़िया 
आकाश में उड़ते देखने का होता है
एकबारगी।

सोमवार, 24 सितंबर 2012

सन्नाटे में है दिल्ली की एक रात


सन्नाटा
इस  शहर  के आधी रात का    
चुभ रहा है मुझे।
बगल की बिल्डिंग के मुंडेर पर बैठे
कबूतर ने अपने डैने खोलकर अगड़ाई ली।
कहीं दूर बारिस के बाद की आखिरी बूंद
‘टप्प’ से गिरी है।।
आज पास के हनुमान मंदिर के पास 
पीपल के पेड़ के दरम्यान 
गुजरती हवा भी सुनाई दी।।।
ठीक उसी तरह से जैसे
पंद्रह दिन पहले पड़ोस में पैदा हुए 
नवजात बच्चे के रोने की अवाज
सुनाई दी पहली बार।।
शायद उसे इस समय अपनी मां की जरूरत हो।
..........
कैसे बेसुध् सो रहा है यह  मेट्रो शहर ।
बहुत खल रहा है
मेट्रो जैसे  शहर का यह 
निशब्द सन्नाटा।
जहां आधी रात के बाद ही
पेज थ्री पार्टियां जवान होती है।
इस दौरान
बीपीओ'ज में युवा बना रहे होते है अपना भविष्य 
दीदी के कारण सरकार हिल चुकी है
इसीलिए दस जनपथ से लेकर रेसकोर्स तक
होना चाहिए था राजनितिक कोलाहल।।।
पर नहीं....
सब सन्नाटा है।
..........................
हाल में बने यमुना एक्सप्रेस वे पर कोई 
फरार्टा कार भी नहीं दौड़ रही है?
क्या कोई फेसबुक पर चैटिंग भी नहीं कर रहा होगा?
क्या हो गया है इस 24x7 वाले  शहर को।
उफ़ ...
इस  शहर के लायक नहीं है यह 
हांफता, मरता सन्नाटा।।।
...........................
हम्म... मम 
अच्छा है...
सुबह होने में अब कुछ देर ही बाकी है।




बुधवार, 19 सितंबर 2012

प्रेम का टी-प्वांइट


पहले सीध रास्ता ही था
इधर उधर नहीं मुड़ना था
मंजिल तो सामने ही दिख रही थी।
इसलिए कोई जद्दोजहद नहीं थी।
किसी को ओवरटेक भी नहीं करना था
था ही सीध, सरल, समतल रास्ता।
साथ में ठंडी हवा, शीतल छाया भी,
कोई मोड़, घुमाव भी नहीं दिख रहा था।
जिससे पहले ही सावधन हो जाया जाए।

जैसे जैसे आगे बढ़ते गए, रास्ता सीधा ही दिखता रहा।
मंजिल पहुंच के दायरे में दिख रही थी
अचानक...
यह टी प्वांइट कैसा!
यहां तो इतने लोग खडे़ है।
भला कब से?
आगे क्यों नहीं बढ़े?
एक से पूछा भई, अब वहां किस रास्ते से जाना पड़ेगा?
कोई उत्तर नहीं मिला।
कांधे पर हाथ रखकर झकझोरते हुए पूछा।
फिर भी कोई उत्तर नहीं।

लगता है इसी बात का उत्तर जानने के इंतजार में
वे वर्षों से बुत बन गए।
0000
पीछे मुड़कर अपना सीध रास्ता देखना चाहा-
आश्चर्य,
रास्ते की जगह झाड़-झंगाड़ का
एक आदिम जंगल उग गया था वहां..
... तत्काल।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

अंतर : भूख का


हम ‘भूख’ में है,
जैसे कोई युवा होता है प्यार में।
इसमें कोई छायावादी बिंब नहीं है हमारा,
बता सके कि-
हम भी भूखे है।

इस भूख के पीछे,
पीढि़यों का अ-लिखा इतिहास है,
जो पढ़ाया नहीं जाता है कहीं।
इसलिए शोद्यार्थियों ने
कभी कोई थीसिस भी नहीं लिखी।

दूसरी तरफ-
वे लोग उल्टियां कर रहे है,
हमारी भूख से बड़ी है उनकी भूख

इसलिए आज हम उनकी उदरपूर्ति के लिए
अपने -आपको
समर्पित करते हैं पूरी तरह से।

आओ, निगल लो हमें।
ताकि...
तुम्हारे भरे पूरे पेट में बैठकर ही
तुम्हारी उल्टियों को नियंत्रित कर सके।

...............................
यही है-
सत्ता की भूख और हमारी भूख का
बुनियादी अंतर

( खंडवा में पिछले 17 दिनों तक किसानों द्वारा किये गए जल सत्याग्रह के नाम )