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गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

किसी सैंटा का इंतजार नहीं है इन्हें!!

आज 25 दिसबंर को
दिल्ली के सबसे षानदार चर्च के सामने
घूम रहे है छोटे-छोटे ईसा मसीह
किसी सैंटा की खोज में नहीं
ग्राहको की खोज में....
...सैंटा की टोपी बेच रहे हैं वे
मखमली सुर्ख लाल गोल टोपी
बिलकुल उनके चेहरों की तरह
दीदी, भैया, आंटी-अंकल
सबसे इसरार कर रहे हैं
हाथ में पकड़ी हुई टोपियों को
दिखा रहे हैं-
हमारी आंखों से आखें मिला रहे हैं
ताकि हम जान सके कि क्यूं खरीदनी है हमें
वे टोपियां...!

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पर वे नहीं जानते
इतनी सर्दी में
वे क्यूं बेच रहे हैं
सैंटा की टोपियां
कौन है सैंटा?
इन्होंने वह कहानी भी नहीं सुनी
जिसमें रात को चुपके से
उनके मोजों में छुपा जाता है कोई उपहार
उनके लिए सैंटा तो बस यही टोपियां हैं
जो रात को
भर सकेगा उनका पेट!




शनिवार, 6 सितंबर 2014

कार्टून की दुनिया और बच्चे

एक कॉमिक्स पात्र 'नागराज' का मॉडल रूप  
कंप्यूटर युग में बच्चों से किताबें पढने की उम्मीद कोई नहीं करता है। सभी यह शिकायत करते हुए मिल जाते है कि बच्चे किताबें नहीं पढ़ते हैं। बच्चों में किताबें पढ़ने की रूचि नहीं हैं पर मुझे लगता है कि हम लोग ही बच्चों को किताबों तक नहीं पहुंचने देते है। इस बार दिल्ली पुस्तक मेला में राजा पाॅकेट बुक और डायमंड काॅमिक्स के स्टाॅल लगे थे जिसमें बच्चों की उमड़ी भीड़ देखकर नहीं कहा जा सकता कि कार्टून चैनल आ जाने के बाद बच्चे कॉमिक्स पढ़ना नहीं चाहते है, वह भी दिल्ली जैसे महानगर के बच्चे। ‘काॅमिक्स मंहगी है’ कह कर कई माता-पिता बच्चों को दूसरी चीजें खरीदवाने को उत्सुक थे। जबकि डायमंड वाले पचास प्रतिशत छूट पर काॅमिक्स बेच रहे थे। मुझे याद है कि मेरे मम्मी-पापा कभी काॅमिक्स जैसी मनोरंजक किताबें खरीदने के पक्ष में नहीं होते थे, उन्हें फिजूलखर्ची लगती थी क्योंकि एक बार पढ़ लेने के बाद वह बेकार हो जाती थी। पर किराये पर लाकर पढ़ सकते थे वो भी छुट्टियो के दिनों में। कामोवेश हम सभी के बचपन की यही कहानी हो सकती है। उस समय काॅमिक्स और बाल साहित्य की पत्रिकाएं पढ़कर ही हमारे अंदर पढ़ने की आदत विकसित हुई, इस बात से एकदम इंकार नहीं किया जा सकता है। पुस्तक मेला में यह देखकर अच्छा लगा कि काॅमिक्स जैसी चित्रकथाओं में बच्चों की रूचि बची हुयी है, बस अगर रूचि पैदा करनी है तो वह बड़ों में।