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रविवार, 1 सितंबर 2013

छज्जे जितनी जगह

घर पर
अपने छज्जे पर
आती थोड़ी सी
गुनगुनी धूप,
बादल की छांव,
बारिस की फुहार
बचाए रखना
चाहती हूँ
उन धूधली, विसूरती
खाली शामों
के लिए
रूखे पलों मे जब
मेरी आँखों में
नमी नहीं
बची रह सकेगी
तब बारिस की
इन फुहारों की तरह
बरस जाएगी आँखें मेरी
लौट आएगी
जिंदगी की नमी
इस खुशी के अंकुरण
के लिए
काफी होगी
मेरे छज्जे पर आती
गुनगुनी धूप
जिसकी गर्माहट में
अंकुर बनेगा वृक्ष
खुशी का एक
छायादार वृक्ष
इसकी बादलों जैसी
पारदर्शी छांव में
इस महानगर में
अपने लिए
एक छज्जे जितनी
जगह की
कल्पना में
इक पल के लिए
ऊंघ जाऊगी।