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सोमवार, 13 नवंबर 2017

#मी टू : टूट रही चुप्पी

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी को यूं भी कहें कि आवाज उठेगी तो दूर तक जाएगी’, तो इसके अर्थ में कोई अंतर नहीं आएगा। मौजूं सिर्फ यही है कि आवाज उठनी चाहिए। शुरूआत हुई, तो परिणाम भी निकलेगा। इधर, हैशटैग मी टू के साथ जो अभियान महिलाओं ने चलाया है, उससे समस्या का अंत हो या न हो, पर चुप्पी पर लगा ताला तो हट ही गया। अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए फिल्म हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने सोशल मीडिया को माध्यम बनाया और लोगों से हैशटैग मी टू के सा महिलाओं से अपील की कि वे भी अपने साथ हुए यौन दुर्व्यहारों पर अपनी चुप्पी तोड़ें। कुछ देर बाद देखते ही देखते दुनिया भर की महिलाओं और पुरुषों ने अपनी प्रतिक्रिया में हैशटैग मी टू के साथ अपनी आपबीती बताई। इस हैशटैग के साथ इस तरह की घटनाएं बयां करने वाले कोई साधारण लोग नहीं थे, बहुत संख्या में जाने माने लोग भी शामिल थे, जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी न कभी यौन उत्पीड़न सहा था। हैशटैग मी टू के साथ एक ही दिन में 12 मिलियन लोगों ने अपने अनुभवों को शेयर किया। खुद अभिनेत्री की पोस्ट पर ही हजारों लोगों ने उत्तर दिया, अपने अनुभव साझा किए।
हॉलीवुड के मशहूर प्रोड्यूसर हार्वे विंस्टीन पर अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने जो यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए, उसके परिप्रेक्ष्य में न्यूयार्क टाइम्स ने बताया कि इस महीने विंस्टीन ने कोर्ट के बाहर आठ महिलाओं के साथ अपने विरूद्ध लगाए गए यौन शोषण के आरोपों पर समझौता किया है। इसी दौरान एशिया अर्जेंटो, लुसिया एवांस, लिसे एंटोनी और रोज मैकगॉउन ने हॉलीवुड के इस शहंशाह पर रेप के आरोप लगाए। हाई-प्रोफाइल हॉलीवुड अभिनेत्रियों जिनमें एंजोलिना जॉली, केट बिंस्लेट, ग्वेनेथ पाल्ट्रो ने भी विंस्टीन के खिलाफ उत्पीड़न के आरोप लगाए। अभिनेत्री एलिसा के चुप्पी तोड़ने के साथ एक ही व्यक्ति के खिलाफ इतनी महिलाओं, कहा जाए तो समृद्ध महिलाओं ने अपनी चुप्पी तोड़ी। अगर अभिनेत्री एलिसा भी चुप रहती तो…? तो कुछ नहीं होता। एक ऐसे व्यक्ति के बारे में, हम इतने घिनोने पक्ष को नहीं जान पाते। यही होता है और यही होता आ रहा है। क्योंकि महिलाएं किसी न किसी दबाव वश अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न की बातें घर तक में नहीं कह पाती हैं। या घर में उन्हें इज्जत का वास्ता देकर चुप करा दिया जाता है। वास्तविकता तो यह कि उनके साथ ऐसी घटनाएं घर पर, बेहद सुरक्षित लोगों के घेरे के बीच ही होती हैं। इस बात को हाईवे फिल्म में बहुत ही संवेदनशील तरीके से दिखाया गया था।
हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा के इस अभियान की गूंज दुनिया भर में हो चुकी है। मी टू हैशटैग के साथ भारत में भी इस तरह के अभियान को सोशल मीडिया पर जमकर प्रतिक्रिया मिली। सोशल मीडिया का उपयोग करने वाली काफी महिलाओं ने हैशटैग मी टू के साथ अपने साथ होने वाली घटनाओं पर खुलकर लिखा। चर्चित कॉमेडियन मल्लिका दुआ ने भी बचपन में अपने साथ हुई यौन शोषण की घटना का खुलासा किया है। कुछ पुरुषों ने भी इसके समर्थन में प्रतिक्रिया दी। इस समस्या का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि हैशटैग मी टू के साथ मिलने वाली प्रतिक्रियाओं में चौबीस घंटों में ट्वीटर पर पांच लाख ट्वीट्स और फेसबुक पर बारह मिलियन पोस्ट लिखे गए।
दिल्ली के निर्भया कांड के बाद जिस मुखरता से यौन हिंसा के विरोध में अवाजें उठी थी, उससे लग रहा था कि ऐसी घटनाओं में कुछ कमी आएगी, लेकिन ऐसा नहीं है। देश में तो बिलकुल नहीं है। आंकड़े दूसरी ही कहानी कहते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार देश में 2010 में 22,000 बलात्कार के केस दर्ज हुए, वहीं 2014 में बढ़कर 36,000 हो गए यानी पूरे 30 प्रतिशत की बढ़त्तरी हुई। एनसीआरबी ने ही 2016 में बताया कि बलात्कार के 95.5 केस में पीड़िता रेपिस्ट को जानती थी। ताजा आंकड़ों में 2016 में ही 4,437 बलात्कार के केस दर्ज हुए थे। इसी से समझा जा सकता है कि महिलाओं के प्रति यौन उत्पीड़न, शरीरिक हमले, विदेश में लड़कियां भेजना, पति और संबंधियों द्वारा हिंसा, अपहरण के बाद बलात्कार और हत्या के सभी प्रकार के मामले मिलाकर कितने होंगे? इस हैशटैग के बीच ही में थाम्पसन रिटर्नस फांउडेशन ने अपने एक पोल में बताया कि दिल्ली यौन हिंसा के मामले में सबसे असुरक्षित जगह है। दिल्ली में महिलाएं रेप, यौन उत्पीड़न और यौन हमलों के प्रति हमेंशा सशंकित रहती हैं। दिल्ली को पहले भी रेप राजधानी कहा गया है। यह सर्वे संसार की 19 बड़े शहरों में जून और जुलाई 2017 के दौरान किया गया। यह आंकड़े निर्भया केस के पांच वर्ष होने की वर्षी से कुछ समय पहले ही आए हैं। यह आश्चर्य की बात है कि कराची और टोक्यो दिल्ली से बेहतर जगहें हैं।
2013 में मशहूर सितार वादक पं. रविशंकर की बेटी अनुष्का ने जब इस बात का खुलासा किया कि बचपन में उसके एक करीबी जानकार व्यक्ति ने उनका यौन शोषण किया तो इस पर विश्वास किया जाना मुश्किल हो रहा था। अब हैशटैग मी टू के बहाने जब इतनी घटनाएं सामने आई हैं, तब इस पर हम विश्वास करें या न करें, पर इस समस्या की गहराई तक जाना होगा। अपने आसपास के चेहरों का पहचानना होगा, जो इस तरह की हरकतों को अंजाम देकर हमारे बीच अच्छे मुखौटों के बीच छुपे बैठे हुए हैं। इनके चेहरों से अगर हिम्मत करके मुखौटे ही हटा दिए जाए, तो समस्या का काफी बड़ा समाधान निकल सकता है, इसके लिए बस चुप्पी ही तोड़नी होगी। कुछ हैशटैग मी टू का मार्ग अपनाना होगा। घर पर बताना होगा, सबको बताना होगा। कुछ दिन पहले फेसबुक पर महिलाओं ने अपनी डीपी काली रखकर यौन हिंसा के खिलाफ अपना विरोध दर्ज किया था। सोशल मीडिया पर उनकी काली डीपी इस बात का संकेत दे रही थी कि महिलाएं केवल सोशल मीडिया में ही न दिखे, तो यह जगह कितनी बदरंगीन हो जाएगी। फिर पूरे संसार से ही महिलाएं गायब हो जाए तो। क्या ऐसी स्थिति आ सकती है?

(लेख युगवार्ता वर्षिकी में प्रकाशित है। आंशिक रूप से यहां प्रस्तुत है।)

रविवार, 27 अगस्त 2017

हमारी है हर तीसरी बालिका वधु

सालों-साल चला बालिका वधु टीवी सीरियल दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। इस सीरियल ने बाल विवाह के प्रति लोगों का काफी ध्यान खींचा था। हाल ही सोनी चैनल पर पहरेदार पिया की नाम से एक सीरियल चल रहा है। इसकी थीम बाल विवाह तो नहीं कही जा सकती, पर उसमें बाल विवाह जरूर दिखाया गया है। राजस्थान के अमीर रजवाडे घराने के 10 साल के बेटे की शादी किन्ही परिस्थतियों के चलते एक अठारह साल की युवती से कराई जाती है और वह अपने पति की पहरेदार बन जाती है। इस सीरियल पर आरोप लग रहे हैं कि यह बाल विवाह और पुरुष सत्ता जैसी चीजों को बढ़ावा दे रहा है। विरोधस्वरूप इस सीरियल के खिलाफ ऑनलाइन पीटिशन दायर की गई है, जिस पर अब तक पचास हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी सहमति दी है। इस पूरे मामले को सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने संज्ञान में लेते हुए इसे प्रसारण सामग्री शिकायत परिषद यानी बीसीसीसी के पास भेज दिया है। बीसीसीसी ने सोनी से सीरियल का समय बदलने के लिए भी कहा है। साथ ही यह भी हिदायत दी है कि इस सीरियल के साथ एक चेतावनी यह भी चलाई जाए कि यह सीरियल बाल विवाह हो बढ़ावा नहीं दे रहा है।
टीवी पर चलने वाले अधिकांश सीरियल जिनमें पारिवारिक और सामाजिक होने का टैग लगा होता है, आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करते हैं और यह हर घर के ड्राइंगरूम में रखे टीवी में चलते हैं। काफी देखे भी जाते हैं। यहीं कारण है कि पिटिशन दायर होने पर सोनी टीवी अपनी सफाई में कहते हैँ कि हम कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखा रहे हैं। हम पारंपरिक लोग हैं, और अपनी सीमाएं जानते हैं। क्या ग्रामीण, क्या शहरी और क्या मैट्रो सिटी से संबंध रखने वाले लोग, सभी बाल विवाह की इस प्रथा को किसी न किसी स्तर पर पचाते हुए दिखते हैं। चाहे वह मनोरंजन के नाम पर हो या फिर उनके आसपास किसी मजबूरीवश होने वाले बाल विवाह। देश में कुछ हजार और लाख लोग ही लोग इस तरह के मामलों में सक्रीय होते दिख रहे हैं। यही बदलाव हमें चेंज डॉट आर्ग नाम बेवसाइट पर दिखता महसूस हो रहा है। लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि विश्व में होने वाले बाल विवाह में प्रत्येक तीसरी बाल बधु हमारे देश की होती हैं। यह हाल में हुए अध्ययन में दिखाया गया।
हाल ही जारी एक्शन एड इंडिया संस्थान की रिपोर्ट एलिमिनेटिंग चाइल्ड मैरिज इन इंडिया: प्रोग्रेस एंड प्रॉस्पेक्ट्समें बताया गया है कि भारत में दुनिया की करीब 33 प्रतिशत बाल वधुएं हैं और करीब 10.3 करोड़ भारतीयों की शादी अठारह साल से पहले हो जाती हैरिपोर्ट में 2011 की जनगणना आंकड़ों को आधार बनाकर विश्लेषण करने के बाद कहा गया कि देश में हो रहे 10.3 करोड़ बाल विवाहों की संख्या फिलीपीन्स (10 करोड़) और जर्मनी (8 करोड़) की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। इन आंकड़ों के मूल्यांकन से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक विकसित देश की जनसंख्या से अधिक हमारे यहां बाल विवाह संपन्न करा दिए जाते हैँ। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सब सामाजिक सहमति से ही होते हैँ। हमारी सामाजिक सहमति को देखते हुए ही इस तरह के सीरियल अपनी लोकप्रियता की मिसाल कायम कर लेते हैं, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। इसी तरह की बात भारत वार्षिक सेंसस 2011 भी कहता है कि 12 मिलियन लोगों की शादी उनकी 10 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले हो जाती है। दुर्भाग्य यह है कि इनमें से 65 प्रतिशत लड़कियां होती हैं।
अभी भी बाल विवाह का समर्थन करने वाले इस बात की ताकीद करते हैं कि बचपन में शादी करने से कुछ भी गलत नहीं होता है क्योंकि हम गौना (शादी के कुछ सालों बाद लड़की को ससुराल भेजने का रिवाज) बाद में करते हैं। इसलिए कम उम्र में शादी होने से होने वाले नुकसान, जो गिनाए जाते हैं, नहीं होते हैं। एक्शन एड इंडिया की रिपोर्ट की माने तो 18 साल से कम उम्र होने वाली 10.3 करोड़ भारतीयों में से करीब 8.52 करोड़ की संख्या लड़कियों की होती है। इसी तरह इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य तो खराब होता ही है, आने वाली हमारी भावी पीढ़ी पर भी पड़ता है। उनकी आने वाली संतानें न केवल कुपोषण का शिकार होती हैं बल्कि वे अपना और अपने परिवार का जीवन स्तर उठाने में नाकामयाब रहती हैं। शिशु एवं मातृ मुत्यु दर में इजाफा के मूल में बाल विवाह एक बड़ा कारण है। इसी रिपोर्ट की माने तो बालिकाओं के बाल विवाह रोकने से तकरीबन 27 हजार नवजातों, 55 हजार शिशुओं की मौत और 1,60,000 बच्चों को मौत से बचाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के लेखक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एसिस्टेंस प्रोफेसर डॉ. श्रीनिवास गोली कहते हैं कि बाल विवाह केवल मानवाधिकार और लिंग आधारित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनांनकीय के स्वास्थ, शिक्षा, और आर्थिक उन्नति के मामले के गंभीर परिणाम हैं। महिलाएं हमारी आधी आबादी हैं और यदि हम बाल विवाह से नहीं लड़ पा रहे हैं, तो यह हमारी आर्थिक व्यवस्था को अस्वस्थ और अकुशल मैन पॉवर उपलब्ध कराएगी जो हमारी आर्थिक ग्रोथ, जिसकी दोगुना करने की आशा व्यक्त की जाती है, इसे कम कर देगी।प्रश्न उठता है कि इतनी जागरुकता अभियान जो सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर चलाए जा रहे हैं, के बावजूद बाल विवाह रुक क्यों नहीं रहा है। इसके मूल में ऐसे कौन से कारण होते हैं, जो सभी तरह के नुकसान को देखते हुए भी मां-बाप बाल विवाह करने से नहीं चूकते हैं। देश में अधिकांश घरों में लड़कियों को बोझ माना जाता है और इस बोझ को उतारने की प्रक्रिया उनकी कम उम्र में शादी के रूप में देखी जाती है। इसमें गरीबी भी एक प्रमुख कारण होता है, जहां लड़की को उसके ससुराल भेजने की जल्दी दिखाई जाती है। समाज में दहेज का लेन-देन भी लड़की जल्दी शादी कर देने का कारण माना जा सकता है। जल्दी शादी करने से लड़के वाले दहेज ज्यादा नहीं मांगते हैं। हमारे समाज का ढांचा इस तरह का है कि लड़कियां दूसरे घर की धरोहर मानी जाती है। उन्हें घर तक सीमित रखते हुए जल्दी से जल्दी ससुराल भेजना मानकर चला जाता है, इसलिए लड़कियों की शादी कर दूसरे घर भेजने में ही इतिश्री समझी जाती है। कुछ समाजों में पितृसत्ता और सामंतवाद इतना हावी रहता है कि वे बेटियों और बहुओं को अपने अनुसार कंट्रोल करना चाहते हैं, इसलिए कम उम्र में ही उन्हें घर-गृहस्थी के चक्कर में डालकर मां-बाप एक चिंता से मुक्ति पा लेना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त समाज में लड़कियों के लिए असुरक्षा का भाव और माहोल भी उनकी जल्दी शादी के लिए मां-बाप को इस ओर प्रेरित करता है।
अब यह भी प्रश्न उठता है कि बाल विवाह जो इतने प्रयासों से थम नहीं रहा है, तो कैसे इसके हानिकारक प्रभावों को दूर किया जा सकता है। वास्तव में बच्चों का बचपन छीनकर उन्हें घर गृहस्थी के भार से लादने वाले माता-पिता गरीबी और अशिक्षा के दुष्चक्र में फंसे होते हैं। इसलिए लड़कियों के भार को दूसरे घर भेजने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। लड़कियों को भार न समझा जाए, इसके लिए बच्चियों के पैदा होने और बड़े होने के साथ होने वाली शिक्षा की व्यवस्था को सरकार को समझना चाहिए। ऐसी योजनाओं को बढावा भी देना चाहिए। एक्शन एड इंडिया संस्थान की रिपोर्ट जारी करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता अभिनेत्री शबाना आजमी की कही इस बात से समझा जा सकता है कि पितृसत्ता बाल विवाह की जड़ में है और बाल विवाह रोकने के लिए पितृसत्ता से पूरी तरह से निपटना होगा लड़कियों को शिक्षित करना और उनमें भरोसा पैदा करना होगा ताकि वे बाल विवाह का विरोध करें और अपने जीवन के बारे में खुद फैसला करें