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बुधवार, 1 जून 2016

शादी सात जन्मों का बंधन है!

‘विवाह एक पवित्र संस्कार है।’ ‘षादी सात जन्मों का बंधन है।’ ‘जोड़ियां ऊपर से बन कर आती हैं।’ ‘पति-पत्नी का रिष्ता एक पवित्र बंधन है’...आदि, इत्यादि। ये कुछ ऐसी बातें हैं जो हमारे अंदर सदियों से पैंबस्त की गई हैं। और समाज इसी बने बनाएं मूल्यों पर चल रहा है। जब कोई बात इस मूल्य रूपी ढांचे को तोड़ता नजर आता है तो हम बड़े आराम से षुर्तुगमुर्गी रवैया अख्तियार कर लेते हैं और तत्काल उस समस्या या बुराई से ही इंकार कर देते हैं। यह हमारे समाज के दोहरे रवैये को दर्षाता है। जोकि हमारे लिए कहीं अधिक घातक है।
ऐसा ही कुछ रवैया हम ‘मैरिटल रेप’ या वैवाहिक बलात्कार को लेकर दिखा रहे हैं। संयुक्त राश्ट्र की संस्था यूनीसेफ कहती है कि भारत में 15-19 साल की उम्रवाली 34 फीसदी विवाहित लड़कियां को अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा झेलनी पड़ती है। 77 फीसदी पत्नियां कम से कम एक बार अपने पति या साथी के द्वारा जबरदस्ती यौन संबंध बनाने को मजबूर की जाती हैं। इसलिए यूनीसेफ ने सलाह दी थी कि भारत में मैरिटल रेप को क्रिमिनल आफेंस में षामिल कर लेना चाहिए। लेकिन दो साल पहले दी गई इस सलाह को हमारे यहां दूसरी तरह की बहस का मुद्दा बना दिया गया। यहां तक कहा जा रहा है कि इस तरह का कोई भी कानून हमारी वैवाहिक संस्था के लिए घातक होगा और फलस्वरूप सदियों से चली आ रही पारिवारिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी। जो कि बहुत ही अतिपूर्ण नजरिया है।

हमारे समाज मे सेक्स इतना टैबू है कि इसको लेकर कोई बात नहीं जा सकती है चाहे वह एक सामाजिक बुराई का ही रूप क्यों न ले लें। अगर हम इस बात को ही मानने के लिए तैयार नहीं है कि बलात्कार की ज्यादातर घटनाएं घर की चाहरदीवारी में होती है और रेप की इन घटनाओं में से 09-15 फीसदी वैवाहिक बलात्कार के मामले होते हैं। तो आगे की चीजों को हम किस प्रकार तबज्जो देगें? हाल ही में इस मामले में इंदिरा जयसिंह द्वारा दाखिल की गई रिपोर्ट में मैरिटल रेप के अपराधीकरण की सिफारिश की है। इतना ही नहीं निर्भया केस के बाद बनी जस्टिस वर्मा आयोग द्वारा मैरिटल रेप को अपराधों की श्रेणी में शामिल किए जाने की सिफारिश की जा चुकी है। बावजूद इसके हम या हमारी सरकार इस मामले को ‘पवित्र बंधन’ से अधिक मानने को तैयार नहीं दिख रही है। जबकि अमेरिका में 1993 में ही मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में षामिल कर लिया गया था।
मैरिटल रेप को अपराध न समझने को लेकर इतना ऊहापोह सरकार क्यों दिखा रही है। एक महिला के साथ जब रेप होता है तो उसका प्रभाव उम्र भर उस महिला के साथ रहता हैं। वह जिंदगी भर उस हादसे को नहीं भूल सकती। फिर घर के अंदर बेडरूम में वह यह सब झेलती है तो उसका असर उस पर इतना कम करके क्यों आका जा रहा है? केवल इसलिए कि वह अपराध कोई और नहीं बल्कि उसका पति परमेष्वर कर रहा है? यह और कुछ नहीं बल्कि हमारी स्त्रियों के प्रति संवेदनहीनता को ही दिखाता है। यह सब उसी समाज में सही ठहराया जा सकता है जहां स्त्रियों को दोयम दर्जे का प्राणी समझा जाता है। स्त्रियों के प्रति अगर हमारी संवेदनषीलता जरा भी है तो इस मुद्दे पर सोचने के लिए हम मजबूर हो जाएंगे।
मैरिटल रेप मुद्दे पर जब पुरुशों की राय ली जाती है तो उनका वही घिसा-पिटा जवाब होता है कि ऐसे तो हर घर का पति जेल में ही होगा या फिर कानून का मिस-यूज खूब किया जाएगा। कुछ पतियों का यह भी मानना है कि षादी की ही किसलिए जाती है? कहने का अर्थ है कि पति रूपी पुरुष यह बात मानने के लिए कतई तैयार ही नहीं है कि षादी जैसी  पवित्र संस्था में ‘रेप’ जैसा भी कुछ होता है। यह बिलकुल वैसा ही है जब घरेलू हिंसा को लेकर कानून बनाया गया था तब भी लोगों के तर्क इसी तरह के थे कि यह कानून परिवार को तोड़ने का काम करेगा। भला पति यदि अपनी पत्नी को मारता-पीटता या बदजुबानी करता है तो इसमें किसी बाहरी व्यक्ति को क्यूं हस्ताक्षेप करना चाहिए? यह हमारा अपना घरेलू मामला है। पर अंततः जब सरकार ने अपनी संवेदनषीलता दिखाई और घरेलू हिंसा अधिनियम-2005 बनाया तब हकीकत सबके सामने आ पाई।
कुछ समय में ही मैरिटल रेप एक बहस का मुद्दा बन गया है और बड़े रूढ़िवादी इसके अपराधीकरण किये जाने को विवाह संस्था के लिए खतरा बता रहे है। साथ ही साथ लॉ कमीशन भी इस मामले में अल्पज्ञता दिखा रहा है। विधि आयोग की 172वीं रिपोर्ट ने ‘वैवाहिक रिश्ते के साथ अत्यधिक हस्तक्षेप’ बताकर इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इन सबके बीच यह प्रष्न उठता है कि षादी नामक संस्था का भार क्या सिर्फ नारी को ही उठाना पड़ता है? यदि वह अपने बारे में एक प्राणी मात्र होने के कारण सोचती है तो उसे अपराध बोध का भय क्यों लगा रहता है? जिसके कारण उसे मानसिक और षारीरिक रूप से इतना संघर्ष करना पड़ता है जिसका परिणाम अंततः उसे अपनी जिंदगी दे कर चुकाना पड़ जाता है। इससे तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में भी ‘शादी की पवित्रता’ और गरीबी, अषिक्षा के नाम पर पतियों द्वारा किया जाने वाला बलात्कार परिवार संस्था को बनाए रखने के लिए ‘वैध’ ही बना रहेगा!

( 'मेरी सजनी' के जून अंक में प्रकाशित )