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रविवार, 18 दिसंबर 2016

हम सब का चैन!

आधी रात के बाद!
वह बूढ़ा चौकीदार
डंडा टेकता हुआ
ठक ठक ठक ठक
सीटी बजाता हुआ,
रात की रखवाली करता है
चोरों से,
कि वे चुरा न ले जाए
रात की कालिमा
रात की नीरवता,
उसकी ख़ामोशी
और हम सब का चैन!!

मंगलवार, 11 मार्च 2014

सावन में आना और खूब बरसना!

रात के ग्यारह बज चुके है, रात अपनी रवानी में होनी चाहिए, लेकिन नहीं सारी नीरवता गरजते-बरसते बादल खत्म कर रहे हैं। ठंडी हवा के साथ पानी खिड़की-दरवाजों से होकर कमरे के अंदर आने की कोशिश में.... सिरहन पैदा करने वाली ठंडी हवा कमरे से कहीं अधिक मेरे मन के अंदर प्रवेश कर रही है! मार्च के इस महीने हम सुहानी रातों के अभ्यस्त रहे हैं। पर चुनाव का मौसम देखकर यह बादल आमजन की तरह विद्रोही होता जा रहा है। शायद अपना गुस्सा दिखाने का यह बेबस तरीका ही बादल को पसंद आया हो।
ऐसा नहीं है कि मौसम का यह बदलाव दिल्ली में ही हो, पूरे देश  में ही ऐसी ही बयार बह रही है। यह बयार कहीं न कहीं विक्षोभ का दवाब पैदा करके जहां तहां अपनी मन-मानी कर रही है। और परिणाम.... बेमौसम आंधी, ओला और बरसात..... सब एक साथ..... तुम चलो हम आते है कि तर्ज के साथ।
दिल्ली मे बैठ कर न जाने क्यूँ लगता है कि मौसम की यह साजिश दिल्ली से रची जा रही है। दिल्ली मे रह रहे लोगो मे यह भ्रांति आ जाती है कि सब कुछ दिल्ली से ही संचालित है। हो सकता है इसी कारण मुझे लग रहा हो। हो सकता है खामखयाली हो !!
 दिल्ली सत्ता का केंद्र है और वर्षों से है, किसी को कोई आपत्ति भी नहीं है। पर मौसम का केंद्र
अपनी धुन मे भींगता बचपन 
दिल्ली नहीं होनी चाहिए। जिस आशंका मे मैं घिरती जा रही हूँ।  मेरी चिंता बस सत्ता को अपने ढ़ग से चलाने और नियंत्रित करने वालों से है। आखिर इस होड़ में नुकसान हमारा और आपका होना निश्चित होगा। इसलिए नही चाहती कि इस व्रष्टि का केंद्र दिल्ली बने।


अमूमन मुझे बरसात बहुत अच्छी लगती है, इतनी अच्छी कि हमेषा बारिस में भीगने का कारण ढूढती रहती हूं। सबसे अनोखी लगती है जनवरी महीने में होने वाली बारिस किसानी भाषा में कहे तो 'महावट'। जिसके बारे में पापा हमेशा  कहा करते थे कि यह बारिस नहीं, बूंद के रूप में  अनाज बरस रहा है। इसलिए मैं इसे अनोखी बरसात मानती आई हूं। बचपन में हमेशा  जनवरी-फरवरी की आंधी-पानी के बाद पेड़ में लगे बेर गिर जाया करते थे और हम बारिस थमने का इंतजार करके तुरंत पेड़ के पास पहुंच कर कीचड़ की परवाह  किये, बेर बटोरने में लग जाते थे, बगैर किसी मेहनत के  अपनी फ्राक भर कर घर आ जाया करते थे। पर इस बार!!!
 मुझे महसूश हो रहा है कि इस बार केवल बेर नहीं गिर रहे होगे बल्कि खेतों में कहीं न कहीं किसानों के अरमान, आशा, मेहनत भींग और सूख रही होगी। जिसको समेटने की हिम्मत किसी के हाथों में नहीं होगी। इसलिए बादलों से मेरी गुजारिश  है कि किसी का गुस्सा किसी पर मत निकालों!!! बस  बहुत हो गया.... फागुन में रंग बरसने दो....सावन में आना और खूब बरसना!!!



शनिवार, 7 सितंबर 2013

ओस की बूंद

‘रात’ कभी भी
एक क्षण को भी
दम नहीं मारती।
जबकि सभी
उसकी गोद में
अपनी थकान लेकर
समा जाते है
बेसुध बेखबर।
और 'रात'....
पूरी रात मुस्तैदी से पहरा
बिठाए रखती है
इस कायनात में
कि कहीं
किसी के सपने में
खलल न पड़ जाए!

0000
सारी रात
सभी को
मीठे सपने
बुनने देने का
परिणाम होता हैं
सुबह घास के
तिनकों पर
बिखरी...
निर्मल, ठंडी
ओस की बूंदें
जैसे कोई किसान
अभी अभी
पसीना बहाकर
लौटा हो
खेत से।
मेरे गाँव 'पतरसा ' मे एक धूधली  शाम का चित्र