शनिवार, 26 जुलाई 2014

एक 'बीमार' से मिलते हुए!!!

वह बहुत बीमार चल रही हैं
हालत काफी गंभीर हैं!
उन्होंने बताया था-
तुम बात कर लेना,
तुम्हें याद करती हैं।

शब्दों के चुनाव मे फंसी मैं
कैसे करूंगी अपनी भावनाओं को व्यक्त!!

मोबाइल पर उनका नंबर डायल करने से पहले
बहुत से शब्दों को  मन ही मन
रटकर मैंने कहा-हैलो!

एक खनकती सी आवाज कानों में  घुल गई
वे ऐसे चहकी मानो पिजड़े में कैद चिड़िया
किसी को देख कर चहकती है -

कैसी हो? पूछती है वे
प्रत्युत्तर में मैंने पूछा-
पहले आप बताइये कैसी हैं?

शब्दों का इशारा शायद समझ गई।
तुरंत ही बोल पड़ी-
पता है तुम्हें, मुझे यहां
डाक्टरों ने बांध् रखा है,
कुछ नहीं हुआ है मुझे।
वे ऐसे बोली गर....
एक बच्चा शिकायत कर रहा हो!

अब तक की गई बातों में मेरी उनसे
तीसरी बातचीत थी यह,
पर ....बन गई थी एक लंबी बातचीतनुमा 'मुलाकात।'
इस बातचीत में
उन्होंने दे दिया मुंबई आने का निमंत्रण,
हाथ का बना खााना खाने का 'लजीज' प्रस्ताव भी,
पता नहीं और क्या -क्या
उनका उत्साह देखकर मैं भूल गई
वह सारे शब्द जो एक बीमार का
हालचाल लेते समय कहे
और सुने जाते है।

मैं सुने जा रही थी उनकी हंसी
बस प्यारी हंसी
और मधुर आवाज।

क्या मैं बीमार महिला से बात कर रही थी?

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

दुुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं!

उनकी  गजलें और हमारे जज्बात आपस में बातें करते हैं। इतनी नजदीकियां  शायद हम किसी से ख्वाबों में सोचा करते हैं। उनकी मखमली आवाज के दरमियां जब अल्फाज मौसिकी का दामन पकड़ती है, तब हम खुदाओं की जन्नतों से बड़ी जन्नत की सैर करते हैं। हम बात कर रहे है महरूम पर हमारे दिलों मे जिंदा मेहदी हसन साहब की।
फोटो गूगल के सहयोग से 
बुलबुल ने गुल से, गुल ने बहारों से कह दिया, एक चौदहवीं के चांद ने तारों से कह दिया, दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं, एक दिलरुबा है दिल में तो हूरों से कम नहीं।’ उनके गले से निकले यह शब्द हर प्यार करने वाले की आवाज बन जाते हैं। प्यार की दुनियां शायद यही हुआ करती है-रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरी हस्ती का समां हो गये...। किसी से अपनी मन की बात कहनी हो तो बड़ी मुश्किल होती है... उफ! कैसे?...बात करनी मुझे, मुष्किल कभी ऐसे तो न थे-...। मिलना है तो बिछुड़ना भी कहीं न कही है- अब के हम बिछडे़, तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें। महबूब से इल्तजा करने मेँ भी उनका जवाब नही...एक बार चले आओ, फिर आकर चले जाना, सूरत तो दिखा जाओ, तुझे मेरे गीतों का संगीत बुलाता है...। उनके  गीत-संगीत की तासीर से कोई अंजान नहीं। प्रेमियों की तड़प् की बात करें तो ...रंजिश  ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ जा। या फिर... हमको गम नहीं था, गमे आशिकी से पहले...। प्यार की इंतहां भी देख सकते है... मैं रोज कहता हूं कि भूल जाऊ तुझे, रोज यह बात भूल जाता हूं...। फिर भी कहता हूं कि मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो, मुझे तुम कभी भी भुला न सकोगे...।
'और भी गम है' की तर्ज पर कहे तो मेहदी साहब की गजलों में दुनियावी सच्चाई को उसी खूबी से कहते रहे और हम सुनते हैं-शिकवा न कर गिला न कर, ये दुनिया है प्यारे, यहां गम के मारे तड़पते रहे, यहां तेरे अशकों की कीमत नहीं है... रहम करना दुनिया की आदत नहीं है। किसी ने नहीं देखा, यहां खून के आंसू ढलकते रहे। यहां का दस्तूर  है खामोश रहना, जो गुजरी है वह किसी से न कहना...
शिकवा न कर गिला न कर...।
उनकी गजलों ने जैसे लोगों के अंदर का खालीपन पहचान कर बड़ी खूबी से उस खालीपन को भर दिया- न किसी की आंख का नूर हूं, न किसी के दिल का करार हूं। जो किसी की काम न आ सके, मैं वो एक मुस्ते-गुब्बार हूं...। कहते कहते एक बड़ी बात कह जाते हैं- तन्हा तन्हा मत सोचाकर, मर जावेगा...मर जावेगा मत सोचाकर...। चलो हम नहीं सोचते है हसन साहब! जीने के लिए आप को तो सुन सकते है न!!

रविवार, 13 जुलाई 2014

जिंदगी में कविता

जिंदगी के हर बिखरे हर्फ को सजाती हूँ
दरख्तों के बीच से आती धूप को सम्हालती हूँ
दरवाजें की ओट से रास्ता निहारती हूँ
आँखों में आये खारे पानी को छुपाती हूँ मैं !!



गुरुवार, 3 जुलाई 2014

सामाजिक संघर्ष के 'करोड़पति'

'किसी से भीख मत मांगो, सरकार से भी नहीं मांगो। नौकरी क्यों करना चाहते हो, अपना काम करो। अपने शहर में तुम्हें दिक्कत आ सकती है क्योंकि सब तुम्हें जानते हैं। दूसरे एरिया में काम करो। वहां तुम्हारी जाति कोई नहीं जानता।’ यह बातें सविताबेन कोलसावाला या कोयलावाली के नाम से गुजरात में मशहूर सविताबेन देवजीभाई परमार ने कही। घर-घर कोयला बेचने से शुरूआत करने वाली सविताबेन आज कोयला नहीं बेचती है, उनकी कंपनी स्टर्लिग सेरेमिक प्राइवेट लिमिटेड अहमदाबाद के पास घरों के फर्श पर लगने वाली टाइल्स बनाती है। इस कंपनी की सलाना टर्न ओवर 50 करोड़ रू तक है। सविताबेन के पति अहमदाबाद म्युनिसिपल टांसपोर्ट सर्विस में कंडक्टर की नौकरी से इतना नहीं कमा पाते थे कि उनके संयुक्त परिवार का भरण पोषण हो सके। इसलिए सविताबेन ने परिवार की मदद के वास्ते कुछ करने की सोची। ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी इसलिए नौकरी नहीं मिल सकी। तब उन्होंने खुद का काम करने की सोची। उनके माता-पिता कोयला बेचने का धंधा करते थे इसलिए उन्होंने काले कोयले से ही अपनी किस्मत चमकाने की सोची। सविताबेन कहती है कि उन्हें दोहरी मुश्किल का सामना करना पड़ा। वे महिला थी और दलित भी। दलित होने के कारण व्यापारी उनसे कारोबार नहीं करते थे। सविता बेन के बारे में कोयला व्यापारियों की राय थी कि ये दलित महिला है, कल को माल लेकर भाग गई तो हम क्या करेंगे? जीवन का यही कटु अनुभव करोड़ों का कारोबार करने वाली सबिताबेन अपने दलित साथियों को सीख देती है कि कारोबार करे, पर अपने शहर में नहीं जहां आप को लोग जानते है।
सविताबेन की यह कहानी मिलिंद खांडेकर द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘दलित करोड़पति, 15 प्रेरणादायक कहानियां’ में बड़े विस्तार से दी गई है। जब इसके शीर्षक ‘दलित करोड़पति’ पर निगाह गई तो प्रश्न उठा कि ‘दलित करोड़पति’ इसका शीर्षक लेखक ने क्यों रखा। एकबारगी लगा कि पाठकों का ध्यान खींचने के लिए किया होगा। पर जैसे जैसे किताब पढ़ती गई और दलित उद्यमियों की कहानी से दो-चार होती गई तब समझ में आया कि उन उद्यमियों का संघर्ष  केवल सिफर से शिखर तक नहीं जैसा हम टाटा, बिड़ला या अंबानियों के बारे सुनते और पढ़ते आये है बल्कि इससे भी कहीं ज्यादा उनका सामाजिक संघर्ष  था। जिसको इन उद्यमियों ने पग-पग पर झेला है। इसके लिए हमें लेखक मिलिंद खांडेकर का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने अपने समाज से ऐसे हुनरमंद साहसिक लोगों का परिचय हमसे कराया।
लेखक  ने रोड़ से करोड़ तक के सफर की दलित कहानी इकोनाॅमी के हर सेक्टर से बताई है। कल्पना सरोज ने बंद पड़ी मुंबई की कमानी ट्यूब्स को मुनाफे में ला दिया। वहीं अषोक खाड़े की कंपनी दास आॅफशोर बाॅम्बे हाई में तेल निकालने वाले कुएं के प्लेटफार्म बनाती है। तो आगरा के हरी किशन पिप्पल अस्पताल चलाते है, वहीं देवकीनंदन सोन का आगरा में ताज महल के पास होटल है। भावनगर के देवजीभाई मकवाना फलामेंट यार्न बनाते हैं। लुधियाना  के मलकित चंद टी-सर्ट बनाते है। आगरा के हर्ष भास्कर के कोटा ट्यूटोरियल्स में पढ़कर पिछले दस साल में कुछ सौ बच्चे आईआईटी में पहुंच गए हैं तो जापान में अतुल पासवान की इंडो सकूरा साॅफ्टवेर बना रही है, जबकि साॅफ्टवेयर के क्षेत्रा पर हमेशा ब्राह्मणों का कब्जा रहा है।
बिजनेस को दलित के नजरिये से देखने के बारे में लेखक कहते है कि बिजनेस की कोई जाति नहीं होती, लेकिन आप दलित है तो मुकाबला सिर्फ बाजार में ही नहीं होता, आपको समाज के भेदभाव का सामना भी करना पड़ता है। दलित कारोबारियों को जोड़ने वाली संस्था दलित चेंबर आॅफ काॅमर्स का अनुमान है कि देश में दलित बिजनेसमैन सरकार को 1700 करोड़ रू टैक्स चुकाते हैं। इनका कुल टर्न ओवर 20 हजार रू है। ये पांच लाख लोगों को रोजगार देते हैं। दलित बिजनेसमैन कहते है कि ये धरणा गलत है कि हम सिर्फ सरकार से मांगते ही हैं, हम करोड़ टैक्स चुका रहे हैं। हम केवल नौकरी मांग नहीं रहे, अब हम नौकरी दे भी रहे हैं।
1975 में आगरा के हरी किशन ने बैंक से पंद्रह हजार का कर्ज लेकर अपनी मेहनत ने केवल अपनी जिंदगी बदली बल्कि हजारों और की बदल दी। आज उनके पीपुल्स ग्रुप का आगरा में अस्पताल, जूते एक्सपोर्ट करने वाली फैक्टरी, हांेडा की डीलरशिप और एक पब्लिकेशन हाउस है। सालाना कारोबार करीब 90 करोड़ रुपये  का है। जब हरी किशन से लेखक ने यह सवाल किया कि जाति को लेकर आपको कभी कोई कठिनाई आई तो उनका कहना था कि हां, आई थी, अस्पताल का मैनेजमेंट संभाला तो डाॅक्टरों ने काम करने में आनाकानी की। फिर रेलवे में मेरे अस्पताल के खिलाफ झूठी शिकायत की गई। अस्पताल को पैनल से हटा दिया गया।इसमें कथित उची जाति के अधिकारी और आगरा के एक दूसरे अस्पताल की साजिश थी।
समाज में सम्मान पाने के लिए अतुल पासवान डाॅक्टर बनना चाहते थे, पर मेढक न काट पाने के कारण वे डाक्टर नहीं बन सके। पर आज अतुल इंडो-सकूरा साॅफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड के प्रेसीडेंट और सीईओ हैं।  जापान में टोक्यो के पास चीबा और भारत में बेंगलुरू में इसके आॅपिफस है। ये कंपनी साॅफ्टवेयर बनाती है। करोड़ों का टर्नओवर है। 2015 तक इंडो सकूरा जापान की 10 बड़ आईटी कंपनियों में पहुंचाने का लक्ष्य है। जाति के कारण अतुल पासवान को अपना बिजनेस खड़ा करने में जापान में तो कोई परेशानी नहीं हुई पर हाल में वे एक घटना का जिक्र करते है कि हम एक बड़ी कंपनी की वेंडर लिस्ट में हैं। पर वहां से काम नहीं मिल रहा था। इसका कारण मुझे समझ में नहीं आया। तब मेरे मित्रा ने मुझे बताया कि तुम्हें जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। पर जाति के कारण बचपन में कई अनुभव है। कथित बड़ी जाति के कुछ बच्चे स्कूल के दिनों में ऐसी फीलिंग रखते थे, आज वे सब गांव में रह गए है।
  कुछ अलग करने की चाहत रखने वाले जेएस फुलिया नौकरी करके ही संतुश्ट नहीं थे। इसलिए उन्हेंाने 2004 में अपना बिजनेस करने की ठानी। जिसका परिणाम है कि आज दिल्ली में उनकी सिग्नेट फंट एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड नाम से उनकी कंपनी है। उनकी अपनी कंपनी, जो दुनिया के किसी भी कोने में हवाई जहाज से, पानी के जहाज या सड़क के रास्ते से सामान मंगा सकती है। उनका ज्यादा कारोबार भारत की कंपनयिों के लिए सामान मंगवाने या इंपोर्ट करने का है। फुलिया अपने बारे में एक दिलचस्प किस्सा बयां करते हैं। वे कहते है कि बिजनेस में भी वो दिक्कत आती रही जो जाति को लेकर नौकरी में आती थी। 2006 में दिल्ली के नेहरू प्लेस में एक कंपनी से उनको दस लाख रूपए लेने थे। कंपनी मालिक आनाकानी कर रहा था। सिग्नेटप्रेफट इस कंपनी का काम पूरा कर चुका था फिर भी तीन लाख रू काट लिया, बाकी पैसे भी किस्तों में दिए। मैं जब कंपनी के मालिक से मिलने गया तो उसका पहला सवाल था, ‘तुम्हारी कास्ट कौन-सी है?’ मैंने जवाब दिया ‘चौधरी।’ उसने कहा कि चौधरी तो कोई जाति नहीं होती। फुलिया समझ गए कि इस तरह तो पैसे नहीं निकलने वाले, तो उन्होंने थोड़ी चालाकी से काम लिया। फुलिया ने उसी व्यक्ति से फिर संपर्क किया और काम मांगा और कहा कि जो हो चुका है उसे भूल जाओ, नया काम दो। उनकी चाल कामयाब रही और काम मिल गया। कंपनी का कार्गो कोलकाता पोर्ट पर पहुंच गया। माल सिग्नेटप्रेफट के बिना पोर्ट से बाहर आ नहीं सकता था। फुलिया ने शर्त रख दी कि बाकाया के तीन लाख दे जाओ और माल ले जाओ। कंपनी के मालिक ने पुलिस की  धौंस दी। पर फुलिया नही दबे और उक्त कंपनी से अपना बकाया ले कर ही माने। फुलिया कहते है कि अगर मैं पैसे नहीं वसूल पाता तो हौसला टूट जाता। संविधान में सबको बराबरी का दर्जा मिला है,समाज से भेदभाव को समाप्त करने में वक्त लगेगा। हिंदू धर्म की पारंपरिक वर्ण व्यवस्था में दलितों को पढ़ने-लिखने नहीं दिया जाता था। पढ़ने लिखने का अधिकार ब्राह्मणों को था। आजाद भारत में सबको बराबरी का अधिकार मिला। नतीजा सबके सामने है।
ऐसी बहुत सी कथा-व्यथा इस किताब में लेखक ने बताई है। जिन्हें पढ़ाकर लेखक हमें अपने समाज को आइना दिखाना चाहता है। इस किताब की भूमिका में मिलिंद खंाडेकर लिखते है कि दलित बिजनेसमैन की कामयाबी जनरल कैटेगरी या कथित उची जाति के एक बड़े तबके की धारणा को तोड़ती है कि रिजर्वेशन उनका हक छीन रहा है और सरकार की मदद से दलित आगे बढ़ रहे हैं। इन 15 करोड़पतियों में से मुष्किल से तीन-चार को किसी एडमीशन या नौकरी में रिजर्वेशन का फायदा हुआ। यह किताब अपने संपूर्ण रूप में कई वाजिब सवाल करती है जिनका उत्तर हम सभी को तलाशना है।

(उक्त लेख का एडिट भाग साहित्यिक पत्रिका 'हंस' के जून- 2014 अंक में प्रकाशित)

मंगलवार, 24 जून 2014

मैं उसे खोजता हूं जो आदमी है!!


पता नहीं क्यों एक जनवादी कवि के बारे में लिखने से पहले देश की राजनीति और लोकतंत्र के बारे में लिखना जरूरी लग रहा हैं। हाल ही में चुनाव संपंन हुये और भारी बहुमत से नरेंद्र मोदी की सरकार बन गई। विकास का वादा लेकर विकास करने के लिए जनता ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी को अपना सब कुछ सौंप दिया। मोदी सरकार के पास पूरे पांच वर्ष है अपने आप को साबित करने के लिए। पर इन सबके बीच एक प्रष्न उठता है कि जब पफला व्यक्ति ने अपना वोट मोदी को दिया होगा तो उसके दिमाग में विकास का कौन सा कतरा अपना दिमाग के कोने में संजो रहा होगा? उसके दिमाग में विकास का कौन सा रूप आकार ले रहा होगा? जिस देश  की अधिसंख्य जनता आजादी के इतने सालों बाद भी अपनी मूल सुविधाओं को विकास का मापदंड मान रही हो और इसी खुशी में वह मोदी को जिता अपनी आपेक्षाओं को पूरा करना चाहती हो, ऐसे समय में भी जनवादी प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं प्रासंगिक हो तो कवि की महत्ता बढ़ जाती है।
अपने घर-आँगन में बाबू जी 
‘कहे केदार खरी-खरी’ संग्रह से 'देश की छाती दरकते देखता हूँ!' शीर्षक से एक लम्बी कविता लिखी है। यह पूरी कविता तत्कालिक राजनीतिक एवं सामाजिक परिवर्तन के दोहरापन को रेखांकित करती है। जिसकी कुछ पंक्तियां इस तरह से है- देश की छाती दरकते देखता हूँ!/कौंसिलों में कठपुतलियों को भटकते/ राजनीतिक चाल चलते/रेत के कानून के रस्से बनाते देखता हूँ!/ वायुयानों की उड़ानों की तरह तकरीर करते/ झूठ का लम्बा बड़ा इतिहास गढ़ते/ गोखुरों से सिंधु भरते/ देश-द्रोही रावणों को राम भजते देखता हूँ!!
आज विाचारधरा और पुराने संस्कारों में परिवर्तन के कारण सारी राजनीति का यही हाल होता नजर आ रहा है। जनहित के स्थान पर स्वहित ही एकमात्र उद्देश्य  बन जाता है। राजनीति का कारपोरेट से गठबंधन  का जो नया तंत्र लोकतंत्र में सामने आया है, केदारनाथ ऐसी पूंजी का विरोध् करते रहे- थैलीशाहों की यह संस्कृति/ महामृत्यु है! कुत्ता बिल्ली से बढ़कर है/ मानवता को खा जाती है/ बेचारी धरती  रोती हैंै। स्पष्ट है कि केदार की कविता मानवता विरोधी पूंजीपतियों की संस्कृति का विरोध् करने वाली कविता है। इस संस्कृति की हरकतें बिल्ली-कुत्तों से भी आगे है। केदारनाथ व्यवसाय से वकील थे। इस कारण इनकी कविताओं की संरचना में एक सहज तर्क-प्रणाली रहती है। विशेष बात यह है कि उनके तर्क के सारे उपकरण लोक जीवन के सामान्य बोध् पर निर्भर करते हैं।
प्रगतिशील कविता की सबसे प्रखर धरा के कवि केदारनाथ अग्रवाल माने जाते है। निराला की काव्य परंपरा की सबसे सशक्त कड़ी हैं केदारनाथ अग्रवाल और उनके बाद के सबसे बड़े महाप्राण कवि भी। केदारनाथ अग्रवाल उत्तर प्रदेश के बांदा जिले कमासिन गांव से संबंध् रखते है। उनकी कर्मभूमि हमेशा बांदा रही। बांदा की कचहरी में अपनी जीविका के चलते उन्होंने बांदा और केन को अपने मन और कर्म से जिया। वकालत में उनका मन कभी नहीं लगा, इसे मात्रा जीविका का साधन बनाया। हां, जीविका के इस साधन  ने उन्हें लोगों के इतना नजदीक ला दिया कि वे उनकी समस्याओं से दो चार होते रहे और अपनी कविता में उतारते रहे।
अपने गांव कमासिन, वहां के लोग, उनका ठेठ देहातीपन, खेत-खलिहान सभी के बारे में उन्होंने खूब लिखा। बांदा में आने के बाद आमजनों की समस्याओं, उनके हित के प्रति अपने लगाव को अपनी लेखनी में उतारते रहें। केदारनाथ की सामाजिक चेतना के बारे में डाॅ. राम विलास शर्मा ने लिखा है कि तार सप्तक के अनेक कवियों के पास कम्युनिष्ट  विचार-बोध् तो था, लेकिन जुझारू किसान या मजदूर का भाव-बोध् नहीं था। इसके अभाव में उनके पैर उखड़ गये ओर केदार अपने पैर जमाएं रहे।’ उन्होंने अपने कविताओं के माध्यम से व्यक्ति की चेतना जगाने का काम किया। अपने वैचारिक एवं आम आदमी के पक्ष में किये गये सृजन को लेखकीय दायित्व की तरह लिया। वे लिखते है- मैं लड़ाई लड़ रहा हुं/ मोर्चे पर/ लेखनी की षक्ति से/ मैं कलेजा फाड़ता हूं/ मिल-मालिकों को/ अर्थ पैशाचकों को/ भूमि को हड़पे हुए/ धरणी धरों को/ मैं प्रलय से/ साम्यवादी आक्रमण से मारता हूं।
विचारमग्न बाबू जी 
केदारनाथ की कविता का उद्देष्य हमेशा से अपने पाठक की सही और यर्थाथपरक सोच को स्थापित करना था। जिससे पाठक मानवता विरोधी सभ्यता और संस्कृति का विरोध् आसानी से कर सके। देश को आजादी मिली लेकिन आजादी के नये माहौल में व्यक्तियों को उनका हक-हुकूक नहीं मिला। यह सब केदारनाथ उस समय देख और समझ रहे थे। शायद इसीलिए इन सबके प्रति वे अधिक सतर्क थे औार अपना विरोध् दर्षाते थे। आज भी यही स्थिति कामोवेश बनी हुयी है। म्ंात्राी बनते ही नेताओं के सामंती स्वभाव पर अच्छा व्यंग्य करते हुए उन्होंने ‘मंत्राी-मास्टर संवाद’ कविता में लिखा-रेल सफर मंे चलता हूं तो होती है बाधा / एक बार की यात्रा में ही हो जाता हूं आध/ इसलिए तो वायुयान की प्रिय है मुझे सवारी/ धरती  में चलने-फिरने से होती है बीमारी। अपने वकालत के पेशे  में उन्होंने बड़ी नजदीक से सत्य को झूठ में बदलते देखा है-सच ने/ जीभ नहीं पायी है/ वह तो कैसे/ असली बात कहे तो कैसे/ झूठ मरे तो कैसे।
यद्यपि केदारनाथ प्रकृति प्रेमी कवि थे। उन्होंने प्रकृति और प्रेम के बारे खूब लिखा है। पर अपने समय से वे समझौता नहीं कर सके। उनकी कविताएं समय से दो-दो हाथ करती रही। वे लिखते है- हिन्दी की कविता न रस की प्यासी है, न अलंकार की इच्छुक और न संगीत की, न तुकांत पदावली की भूखी है, भगवान अब उसके लिए व्यर्थ है, अब वह किसान और मजदूर की वाणी चाहती है।
कुल मिलाकर केदारनाथ की कविताओं की विशेषता उनकी प्रासंगिता ही है। प्रासंगिता इसलिए है कि ये मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी है, उनकी ही बात करती हैं। उनकी पक्षधरता करती हैं। यही उनकी रचना धुरी  है। इसलिए वे लिखते भी है- मैं उसे/ खोजता हूं/जो आदमी है/और अब भी आदमी है/ तबाह होकर भी आदमी है/ चरित्र पर खड़ा/ देवदार की तरह बड़ा। केदार की यह चिंता वाकई बड़ी और सामायिक है।

रविवार, 18 मई 2014

च’ से चरखा

नाम मोहित बताया उसने। शरमाते लजाते उसके चेहरे पर मेरे सवालों से बचने की जल्दबाजी दिख रही थी।। मैंने पूछा कि कहां से सीखा? कोई जवाब न मिला। पर मेरा दूसरा प्रश्न  तैयार था। ‘कहां से आए हो?’ मैंने पूछा।  ‘गांध्ी हिन्दुस्तानी से।’ अपना समान समेटते हुये उसने बताया। और अपने बड़े दो सहोदरों के साथ हो लिया। मेरी दिलचस्पी दो घंटे तक चले एक कार्यक्रम के दैारान कम हो
गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, राजघाट 
ने लगी जब वह छोटा बच्चा मंच पर अपने चरखा कातने का समान जमाने लगा। पांच वर्श की छोटी से अवस्था में चरखा कातने के काम को वह कुषलता से अंजाम दे रहा था। वह किसी प्रशिक्षित कारीगर से कम नहीं था। पर अभी उसमें एक कुशल कारीगरी की कमी थी इसलिए उसका ताना-बाना पल दर पल पर टूट जाता। वह बड़े नफासत से ताने को लेकर बगैर गांठ पड़े कातने लगता। पर कच्ची उमर का असर कच्चे सूत पर तारी था, ताना पल-पल टूट जाता। पर सीखने वाली इस उमर में मोहित हर टूटन से सीख रहा था। जो मुझे साफ दिखाई दे रहा था।
म्ुाझे अच्छे से याद है। बचपन में हमारे घर पर एक लोहे की तकली हुआ करती थी। उसमें सूत काता जाता रहा होगा। ‘रहा होगा’ इसलिए क्यांेकि मेरे बचपन का समय घर पर सूत कातने वाला समय नहीं था और  कभी मैने किसी को तकली पर सूत कातते भी नहीं देखा। घर पर वह कहां से और क्यों लाई गई इसका भी स्मरण नहीं है। हो सकता है बड़े-बुर्जुगों के समय खरीद कर लाई गयी हो और उससे सूत भी काता जाता रहा हो। ऐसा मेंरा अनुमान है। सो उपेक्षित पड़ी उस तकली पर बचपन की उत्सुकता सूत कातना सीखना चाहती थी। इस काम में पिताजी ने सहयोग दिया और मेरे अभ्यास का दौर भी चलने लगा। मेरे खाली समय के खेल में वह तकली भी शामिल हो गई। काफी समय तक वह तकली मेरे पास रही। पर न मैं तकली की हो सकी न तकली मेरी। अप्रयोज्य वस्तु जिस अर्थ में कबाड़ होती है तकली हमारे घर में कबाड़ ही थी। और एक दिन कब वह चुपके से कबाड़ में चली गई। मुझे क्या किसी को याद नहीं। वास्तव में हम में से किसी को उसकी जरूररत नहीं थी। बढि़या से बढि़या सूत बाजार में पैसे देकर मिल जाता था। तो फिर उस हुनर को सीखने का तो सवाल ही नहीं था।
पर उस मोहित को देखकर लगा कि चरखा उसका होकर रहेगा। पर रोबोट युग का यह बच्चा चरखा कातना क्यों सीख रहा था। क्या उसके पास खेलने या सीखने के दूसरी चीजें नहीं थी। या पिफर किसी अनुपलब्ध् विकल्प के कारण वह चरखा कातना सीख रहा था। यह सब मैं उससे पूछना चाहती थी। मोहनदास करमचंद गांध्ी के आजादी की लड़ाई का शस्त्र चरखा ही था। उन्होंने चरखे में स्वालंबन को देखा, बुना और जिया। चरखे की इसी प्रासंगिकता को वह नन्हा बच्चा सिखा रहा है। नही ंतो आज का समय इतना निर्दयी है कि हमारी वर्णमाला की किताब से च’ से ‘चरखा’ पढ़ाने की भी प्रासंगिता नहीं बची है। अपनी नर्सरी की किताब की वह बाल कविता ‘तकली रानी, तकली रानी! नाच रही कैसी मनमानी!!! अब किसी को भी याद नहीं आती। ये मोहित का चरखा कैसी चुनौती दे रहा है, मुझे और आने वाले समय को कि देखना एक दिन मै चांद में बैठी बुड्ढी़ दादी के सन जैसे बालों की तरह सफेद और चमकीला सूत कातकर दिखा दूंगा।

('अंतिम जन' के अप्रैल अंक मे प्रकाशित लेख का एक अंश )

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

शहर कविता विहीन नहीं हुआ

केन नदी और कवि  केदारनाथ अग्रवाल, बांदा शहर की दो बड़ी पहचान है। आज  केदारनाथ जी का जन्मदिवस है । केदार जी की जन्म शताब्दी के दौरान जब बांदा जाना हुआ तब मुझे केदार जी के घर जाने का अवसर मिला । जिसकी कुछ तस्वीरें यहाँ  दे रही हु। इस समय कवि की कुटिया जीर्ण-शीर्ण अवस्था मे है। फिलहाल इसे केदारनाथ शोध पीठ न्यास  घोषित कर दिया गया है, इसके सचिव नरेंद्र पुंडरीक जी है। वे ही इस कवि कुटिया की देखभाल करते है। कुछ साहित्यिक गतिविधियों के कारण कभी- कभी इसके दरवाजे खोले जाते है...... वरना अधिकांश समय यह बंद ही रहता है ...फिर भी हम बांदा वासियों के लिए इसका बचा हुआ अस्तित्व मायने रखता है....कि शहर कविता विहीन नहीं हुआ है ....



कवि केदारनाथ अग्रवाल का निवास स्थान 


इस घर को अब केदारनाथ शोध पीठ के कामकाज के लिए प्रयोग मे लाया जा रहा है 

घर का एक मात्र कमरा जो सही सलामत बचा हुआ है 

केदारनाथ शोध पीठ के सचिव नरेंद्र पुंडरीक जी  
कवि कुटिया का आँगन, फिलहाल बीरान 

बस इतना ही शेष है, घर का बहुत सा हिस्सा ढह गया है 

एक ही कमरे मे सब कुछ सहेजने की कोशिश