गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

किसी सैंटा का इंतजार नहीं है इन्हें!!

आज 25 दिसबंर को
दिल्ली के सबसे षानदार चर्च के सामने
घूम रहे है छोटे-छोटे ईसा मसीह
किसी सैंटा की खोज में नहीं
ग्राहको की खोज में....
...सैंटा की टोपी बेच रहे हैं वे
मखमली सुर्ख लाल गोल टोपी
बिलकुल उनके चेहरों की तरह
दीदी, भैया, आंटी-अंकल
सबसे इसरार कर रहे हैं
हाथ में पकड़ी हुई टोपियों को
दिखा रहे हैं-
हमारी आंखों से आखें मिला रहे हैं
ताकि हम जान सके कि क्यूं खरीदनी है हमें
वे टोपियां...!

000       000      000

पर वे नहीं जानते
इतनी सर्दी में
वे क्यूं बेच रहे हैं
सैंटा की टोपियां
कौन है सैंटा?
इन्होंने वह कहानी भी नहीं सुनी
जिसमें रात को चुपके से
उनके मोजों में छुपा जाता है कोई उपहार
उनके लिए सैंटा तो बस यही टोपियां हैं
जो रात को
भर सकेगा उनका पेट!




शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

स्त्री का कोई देश नहीं होता!!

‘अपने देश बंग्लादेश  में, मेरे अपने पश्चिम बंगाल में, मैं एक निषिद्ध नाम हूं, एक विधि बहिष्कृत औरत, एक वर्जित किताब!’ इस एक वाक्य में लेखिका ने अपना दर्द बयां कर दिया है। एक स्वीकृत हार से उपजी हताशा  की बेकायली में उनके अंर्तमन से भारत देष के बारे में यह जो शब्द निकलते हैं वह एक सहिष्णु देश की धरती के कई परतो को उघारने का मद्दा रखता है। जब वह कहती है कि दुःस्वप्न में भी मुझे ऐसा कभी भी नहीं लगा था कि भारत में भी मुझे बांग्लादेष के जैसा ही भुगतना होगा। ‘बांग्लादेष के जैसा’ क्या यह साधारण वाक्य है? किस आषा से वह भारत में आईं, क्या सोच-समझकर उन्होंने इस देश पर विश्वास किया था? और इसे अपना निवास बनाया, ‘घर’ बनाने के सपने बुने। किस कारण? क्या गलती थी तसलीमा नसरीन की? कि उन्होंने सच बोला और लिखा। कट्टरपंथियों के आगे नहीं झुकी। जिसका परिणाम हुआ दंडस्वरूप ‘निर्वासन।’
इस भारत वर्ष ने, यहां की सभ्यता ने, इस इक्कीसवीं शताब्दी ने, एक लेखक को ग्रहण किया था, और क्षण भर मेें ही उसे वर्जित कर दिया, इस देष के बचकाने धर्म और निष्ठुर राजीनति ने। इस कारण से वे हमारे लोकतंत्र पर ही सवाल उठा देती है- मैं जानती हूं लोगों ने मुझे निर्वासन का दंड नहीं दिया है। यदि लोगों की राय ली जाती, तो अधिकांष लोग ही चाहते कि मैं बंगाल में ही रहूं, पर क्या लोगों की राय पर लोकतंत्र चलता है। लोकतंत्र चलाते शासक लोग, अपनी सुविधा के हिसाब से।
तसलीमा नसरीन की आत्मकथा ‘निर्वासन’ एक सच बोलने वाली स्त्री का दिल दहला देने वाला दस्तावेज है जिसमें वह अपने घर बंग्लादेश, फिर कोलकाता में षरणागत और बाद में मौलवादियों के दबाव के चलते कोलकाता समेत भारत से ही जबरन निवार्सित कर दिए जाने का दुखद वर्णन है। इस दौरान लेखिका ने अपने मन-दर्पण के दर्द, घुटन और संघर्ष को शब्दों के मार्फत चित्रित कर हमारे समक्ष रखा हंै। अपनी अभिव्यक्ति के प्रति स्वतंत्रता हासिल करने के मार्ग में उनसे  धर्म, राजनीति और साहित्य की दुनिया से जुड़े लोग टकराते है। लेखिका एक चेहरे में कई चेहरों को देखकर चकित रह जाती है। इस किताब में लेखिका ने ऐसे चेहरों से नकाब खीच लिया है। और पाठक यह सब देखकर किंकरबिमूढ है। सच के विरोध में धर्म, राजनीति और साहित्य की दुनिया की गजब की लामबंदी और जुगलबंदी के लिए ‘निर्वासन’ को जरूर पढ़ना चाहिए। यह किताब आपके कई भ्रमों को तहस-नहस करने का दम रखती है।
़किताब में उस समय की चर्चा है जब पष्चिम बंगाल सरकार ‘द्विखंडितो’ पर प्रतिबंध लगा देती है। इस किताब में ऐसे कई लेखकों के चेहरों से नकाब उतरती है जिनके लिखने और व्यवहार करने का अलग-अलग मापदंड होते है। सैयद षम्सुल हक, हुमायंू आजाद, नीमा हक, आजिजुल हक, षीर्षेंन्दु मुखोपाध्याय सभी के सुर बदल जाते है,  सुबोध सरकार ने तो द्विखंडितो को ‘सेक्स बम’ की संज्ञा दे देते है। जो कभी तारीफ करते थे-असद चैधरी, गौतम घोष भी। ‘लेखक किताब बैन कर रहे है, लेखक ही लेखक के विरूद्ध मामला कर रहे है।’ किताब विरोध के इस पूरे अभियान के संचालक सुप्रसिद्ध बंगाली लेखक सुनील गंगोपाध्याय से लेखिका प्रष्न करती है कि उनको लेकर ऐसी कोई बात नहीं लिखी गयी है किताब में, तो वे क्यों इतना नाराज है। ‘षायद इस डर से कि कहीं अपनी अगली किताबों में जिक्र न कर दूं।’ कामोवेष कई नारीवादी लेखिकाओं का भी दो-मुहा रवैया सामने आता है। सलमान रूष्दी के बारे में एक खुलासा काफी रोचक है। लेखिका से संबंधित विवाद के कारण उनकी प्रसिद्धि को भुनाने वाले प्रकाषक के भी एक दो प्रसंग है।
बांग्लादेष में लेखिका की लज्जा सहित पांच किताबें प्रतिबंधित है और भारत में एक हुई थी-द्विखंडितो। पर गौर करने लायक यह बात है कि दोनों देषों ने किताबों को प्रतिबंधित करने का का ही कारण ‘धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना’ बताया। लेखिका ने इस्लाम में सुधार के प्रश्न साहस से उठाया था। न केवल इस्लाम में स्त्रियों और गैर-मुस्लिमों की स्थिति, बल्कि मत-स्वतंत्रता और खुले विमर्श की कमी का प्रश्न भी। तसलीमा ने कुरान में पूर्ण सुधार की बात कही। यही कहने पर उलेमा ने मौत का फतवा जारी कर दिया। और इसे नाम दिया गया ‘धार्मिक भावानाओं को ठेस पहुंचाना।’ देष में लेखिका द्विखंडितो से अपने तीन पेज वापस ले लेती है। तब भी कट्टरपंथियों का रोष कम नहीं होता है। वजह ‘सच कहने के जुर्म में मुझे कितनी और सजा देगे धर्मवादी और धर्म का व्यवहार कर वोट चाहने वाले राजनेता?’ कट्टरपंथ्यिों के हाथ का खिलौना बनी भारतीय राजनीति ‘तुम जबान दो कि तुम भारत में नहीं रहोगी, तभी तुम्हें भारत में रहने का वीजा देंगे’ षर्त रख देती है। अपनी चिंगारियों से भरी रचनाओं की वजह से तसलीमा नसरीन को स्वदेष एवं दूसरे मुस्लिम देषों में मौलवादियों के हमलों का सामना करना पडत़ा है, परन्तु दुनिया के एक धर्मनिरपेक्ष बहु-संस्कृतिवादी, एक बड़े लोकतांत्रिक देष भारत में उनके लिए इस अनुभव का स्वाद निष्चित ही बहुत तरहों से अलग था।
व्यक्ति को अगर तोड़ना हो तो उसे तन्हाई की सजा सुना देा। अंग्रेजी राज के समय भारतीयों के लिए कालापानी की सजा एक ऐसी ही सजा थी। तसलीमा को भी तोड़ने के लिए नजरबंद कर दिया गया, किसी से मिलने नहीं दिया जाता था। किससे मिलना है, क्यूं मिलना है? ‘खिड़की की दराजों से बादल और धूप’ देख कर ‘मनुष्य विहीन’ जीवन गुजारना पड़ेगा। ‘मिथ्या बोलने से तुम्हें निर्वासन से मुक्ति मिलेगी, तुम्हें देष मिलेगा, बहुत से दोस्त मिलेंगे, हाथ-पैरों की जंजीरें खोल दी जाएगी, तुम रोषनी और आकाष देख सकोगी।’ हैदराबाद में एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान लेखिका पर हमला होता है। इसी क्षण से सुरक्षा के नाम पर ‘चार महीने गृहबंदी कलकत्ता में। तीन महीने से दिल्ली में।’ दिल्ली में-तीन महीनों से मुझे अज्ञातवास में रखा गया है। मेरी इच्छा के मुताबिक, मुझे कहीं, किसी के साथ मिलने नहीं दिया गया। क्या कारण है इसका? एक ही कारण है इसका? ...मुझे समझाना कि हम तुम्हें नहीं चाहते हैं। इंसान समाज के बिना कैसे जिन्दा रह सकता है।....कैसे जिन्दा रह सकता है आजादी के बगैर, कितने दिन! एक न एक दिन तो मै परेषान हो ही जाउंगी।...एक न एक दिन बोलंूगी ही अब और नहीं सह पा रही हूं। ‘सरकारी हिफाजत में कैसा रहा जा सकता है? जितने दिन वैसे हिफाजत में रहने का अनुभव न हो, समझा नहीं जा सकता है। सरकार जब किसी को सीमा पार कराने के उद्देष्य से हिफाजत में रखती है, तो वह हिफाजत बहुत भयंकर होती है।’ यूरोप में बारह बरस बिताने के बाद भी उसे अपना देष नहीं मान पायी। भारत में एक साल भी नहीं काटना पड़ा, इसे अपना देष मानने के लिए। ‘मैं अपना फैसला सुना देती हूं कि मैं भारत छोड़ूंगी।’
तसलीमा ने अपने उपन्यास ‘लज्जा’ में बंगलादेश में हिन्दुओं की दुर्दशा का बेबाक चित्रण किया है। इसी पाप के लिए भारत का हिन्दू सेक्यूलर-वामपंथी उन्हें क्षमा नहीं कर सका! वह आतंकवादी मुहम्मद अफजल, कसाब और इशरत जहाँ के पक्ष में खड़ा हो सकता है, किंतु तसलीमा नसरीन के पक्ष में हरगिज नहीं। क्योंकि तसलीमा ने हमारे उदारवादियों के शुतुरमुर्गी पाखंड को उघाड़ कर रख दिया, इसीलिए वे उस से रुष्ट हैं। क्योंकि उत्पीडि़त हिन्दुओं के लिए बोलना सो-काल्ड सेक्यूलर-वामपंथी-उदारवादियों में निषिद्ध है। तसलीमा मानवतावादी रही हैं, केवल आत्म-प्रचार चाहने वाली ‘मानवाधिकारवादी’ नहीं। उन्होंने अपने विचारों और सत्यनिष्ठा के लिए कष्ट सहा और आज भी उस का परिणाम भुगत रही हैं। कोई उनसे चाहे कितनी घृणा करे, उनका चाहे जितना बहिष्कार किया जाये पर उनका कहना है कि ‘मैं इसी तरह हूं और यही रास्ता चुना है मैंने।’

किताब-निर्वासन/लेखिका-तसलीमा नसरीन/प्रकाषन-वाणी प्रकाषन/पृष्ठ संख्या-256/मूल्य-200










शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

जीवन में सपने!

बगैर 
सपनों की नींद नहीं होती, 
बगैर नींद के 
सपने नहीं होते। 
कोई कितना भी दावा करे, 
कि उसकी  नींद में
सपने नहीं होते। 
अगर नींद है तो 
सपने भी निहित है। 
..........................................
यह इसी तरह
सच है 
जैसे  
जीवन है,
तो सपने है,
सपने है 
तो जीवन है।। 

शनिवार, 13 सितंबर 2014

श्राद्ध से अधिक श्रद्धा की जरूरत

हाल ही में मेरी एक परिचिता अपने लिए कुछ नये कपड़े खरीद कर ले आयी। शाम को जब उसके पति ने कपड़े देखे तो उसकी डांट लगा दी। कारण था कि पितृपक्ष आरम्भ हो चुके है अतः खरीदारी नहीं करनी चाहिए। अब चूकिं कपड़े खरीदकर आ चुके थे और जरूरी भी था इसलिए इस समस्या का हल निकाला गया कि रस्मीतौर पर किसी दूसरे व्यक्ति कपड़े पहनाकर पुराना मानकर हम इस्तेमाल करे। इससे पितृपक्ष  दोष  नहीं लगेगा। तो इस तरह उक्त  ‘कठोर नियम’ का हल बड़ी चतुराई से सरलीकरण कर दिया गया। जब मैंने यह पूरा वाकया सुना तो अनायास ओठो पर मुस्कान तैर गई। लगा कि अगर उनके पुरखों ने किंचित यह सब  देख लिया तो उन पर क्या बीतेगी यह तो किसी गया के पंडे से जाकर पूछना पड़ेगा।
शास्त्रो के अनुसार पितरों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन जीव माने जाते है-कौआ, श्वान और गाय। मान्यता है कि अपने भोजन को तीन हिस्सो में बाटकर इन तीनों को भोजन दान किया जाए। यह हमारे पितरों का प्रतिनिधित्व करते है। भौतिक विलासता से दूर रहकर सात्विक दिनचर्या का पालन करना आवश्यक है। इन  दिनों सभीे समाचार पत्रों के धर्मिक पृश्ठ पर किसी न
किसी रूप में पाठकों को पितृपक्ष में अचार-व्यवहार के बारे में बाताया जा रहा है। इन कर्मकाण्डों के बीच फंसे व्यक्ति खासकर युवा असहज महसूस करते है। पर उन्हें यह सब मानने और पालन करने के लिए बाध्य किया जाता  है।
दूसरी तरफ इन अनुष्ठान के इतर जब हम अपने आसपास अपने बुजुर्गो की उपेक्षा होते देखते है। तो लगता है कि इस श्राद्ध  का क्या अर्थ है जब हमें अपने बुजुर्गो के प्रति श्रद्धा ही नहीं है। जबकि देश मे बूढे माता-पिता की जिम्मेदारी अधिक पुख्ता बनाने की कोशिश की जा रही है। बिहार में तो बकायदा कानून बना कर बेटों से माता -पिता की देखभाल कराने के प्रावधान बना दिये गए हैं  जिसके अनुसार जो भी व्यक्त्ति अपने असहाय माता-पिता के  भरण-पोषन  की जिम्मेदारी नहीं उठाएगा उसे जेल की सजा मिल सकती है। भारतीय संस्कृति की श्राद्ध परम्परा से आज हम ‘सजा के प्रावधान’ तक पहुंच चुके है। हम मर चुके पूर्वजों की चिंता करते तो दिख जातेे है पर जो जिंदा है उनकी चिंता गैरजरूरी समझते है। हम अपने इस धार्मिक अनुष्ठान का मर्म नहीं समझते। लकीर के फकीर होकर सब कुछ  मानते चले जाते है। यहीं हमारी समस्या है।
वास्तव में अपने बुर्जुगों का सम्मान हम इस सीमा तक करे कि उनकी मृत्यु के बाद भी हम उनके योगदान के लिए अभार व्यक्त करे। इस बात को न समझकर कर्मकाण्डों को पूरा करके अपनी इतिश्री समझ लेते है। जबकि श्राद्ध से अधिक उन्हें हमारी श्रद्धा की जरूरत है।

शनिवार, 6 सितंबर 2014

कार्टून की दुनिया और बच्चे

एक कॉमिक्स पात्र 'नागराज' का मॉडल रूप  
कंप्यूटर युग में बच्चों से किताबें पढने की उम्मीद कोई नहीं करता है। सभी यह शिकायत करते हुए मिल जाते है कि बच्चे किताबें नहीं पढ़ते हैं। बच्चों में किताबें पढ़ने की रूचि नहीं हैं पर मुझे लगता है कि हम लोग ही बच्चों को किताबों तक नहीं पहुंचने देते है। इस बार दिल्ली पुस्तक मेला में राजा पाॅकेट बुक और डायमंड काॅमिक्स के स्टाॅल लगे थे जिसमें बच्चों की उमड़ी भीड़ देखकर नहीं कहा जा सकता कि कार्टून चैनल आ जाने के बाद बच्चे कॉमिक्स पढ़ना नहीं चाहते है, वह भी दिल्ली जैसे महानगर के बच्चे। ‘काॅमिक्स मंहगी है’ कह कर कई माता-पिता बच्चों को दूसरी चीजें खरीदवाने को उत्सुक थे। जबकि डायमंड वाले पचास प्रतिशत छूट पर काॅमिक्स बेच रहे थे। मुझे याद है कि मेरे मम्मी-पापा कभी काॅमिक्स जैसी मनोरंजक किताबें खरीदने के पक्ष में नहीं होते थे, उन्हें फिजूलखर्ची लगती थी क्योंकि एक बार पढ़ लेने के बाद वह बेकार हो जाती थी। पर किराये पर लाकर पढ़ सकते थे वो भी छुट्टियो के दिनों में। कामोवेश हम सभी के बचपन की यही कहानी हो सकती है। उस समय काॅमिक्स और बाल साहित्य की पत्रिकाएं पढ़कर ही हमारे अंदर पढ़ने की आदत विकसित हुई, इस बात से एकदम इंकार नहीं किया जा सकता है। पुस्तक मेला में यह देखकर अच्छा लगा कि काॅमिक्स जैसी चित्रकथाओं में बच्चों की रूचि बची हुयी है, बस अगर रूचि पैदा करनी है तो वह बड़ों में।








रविवार, 31 अगस्त 2014

सपनों की उड़ान


पिजड़े के अंदर 
कैद थी एक बुलबुल!

उसकी हर फड़फड़ाहट के साथ
उसकी हर बेचैनी के साथ
उसकी हर बेताबी के साथ
उसकी हर कोशिश के बाद
टूट कर रह जाते थे 
उसके मजबूत पर
पिजड़े के अंदर।

पिजड़े के अंदर 
कैद थी एक बुलबुल!

पर 
पिजड़े के अंदर! 
नहीं कैद थी बुलबुल की 
उड़ने की आकांक्षा,
उड़ने के सपने,
उड़ने की तत्परता
उड़ने की कोशिशें ।


टूटें हुए परो के रूप में 
पिजड़े के अंदर से 
उसके उड़ान के सपने
उड़ रहें थे हवा के साथ
दूर बहुत दूर तक।

कैद थी एक बुलबुल
पिजड़े के अंदर।
कबूतर पालने वाले कबूतर के पर क़तर देते है ताकि वे उड़ न सके। ऐसा ही एक कबूतर हमारी छत पर आया। 

रविवार, 3 अगस्त 2014

थैंक्स दोस्त!!

एक दिन
उदासी
बिन बुलाए
मेहमान की तरह आ धमकती है।
एक मुस्कान के साथ
‘हैलो‘ बोल
बगल में बैठ जाती है
हम डरते हैं, आंख चुराते हैं
वह हमारा हाल-चाल पूछती है।

औपचारिकतावश
हम भी
चाय-पानी पूछ ही लेते है।
वह बेशर्म की तरह
घुल-मिल कर बात
करती जाती है...
करती ही जाती है...।

पता नहीं उसे
इतना कुछ कैसे
मालूम होता है हमारे बारे में
पर उसे मालूम होता है सब कुछ
हमारा तिनका तिनका
जर्रा जर्रा...
उसकी सौबत में
कुछ ही देर में
हमारी सांसें
जोर से चलने लगती है
सीने पर पत्थर पड़ने लगते है
दम फूलने के साथ
सांसें छूटती-सी मालूम पड़ती हैं।

तभी
मोबाइल बज उठता है
स्क्रीन पर नाम चमकता है ‘दोस्त’
अरे, कितने दिनों बाद याद किया कमबख्ता ने!
एक मद्धिम सी मुस्कुराहट के साथ
उससे शुरू हुई बातें
ठहाको में बदलने लगती है
इधर पहलू में बैठी उदासी
बोर होने लगती है।

अब
उदासी
चुपके से
बगैर दरवाजा खोले ही
दरवाजे के नीचे से निकलने की
कोशिश में है।
मुझे विदा करने उसे
दरवाजे तक नहीं जाना पड़ा।

चंद लम्हों बाद
वह दूर जाती दिखती है।
थैंक्स दोस्त!!

सॉरी दोस्त!
दोस्ती में
थैंक्स-सॉरी
नहीं होता।