विवादित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन का ‘स्वागत से निर्वासन’ तक का सफर भारतीय राजनीति के कई चेहरों को उघाड़ता है। अब जब दो दशक बाद उनकी कोलकाता वापसी हो गई है, तब सवाल है कि वे अपने घर बांग्लादेश कब लौटेगीं?
‘मैं
एक शहर में ही नहीं, बल्कि अपने जीवन के खोए हुए अध्याय में
लौटी हूं। ...19 वर्षों से मैं कोलकाता से यह कहना चाहती थी।
मैंने कुछ गलत नहीं किया फिर भी मुझे दंडित किया गया, शहर से
निकाल दिया गया। मैं बस इतना कहना चाहती हूं- कोलकाता, मैं
वापस आ गई हूं। इतिहास याद रखेगा कि किसने दरवाजा बंद किया और किसने खोल दिया...।’
‘08
अगस्त, 1994 को बांग्लादेश सरकार ने मुझे देश निकाला दिया
था। अब तक बहुत सी सरकारें बदल चुकी हैं, पर मैं 32 साल से आज तक निवार्सित हूं। मैंने अपने देश को अपने ह्दय में बसाया हुआ
है। यूरोप ने मुझे नागरिकता और सुरक्षा दी हुई है, जिसके लिए
मैं आभारी हूं।’
‘मेरा
देश कोई मैप नहीं है, यह लोगों का प्यार है...मैं सपना देखती
हूं कि एक दिन परिस्थितियां बदलेगीं। ...धर्म और राज्य को अलग अलग होना चाहिए।
कानून और धर्म को भी अलग अलग होना चाहिए।'
उपर्युक्त वक्तव्य निर्वासित और विवादित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने एक अगस्त को कोलकाता के रविन्द्र सदन में धार्मिक कट्टरता के खिलाफ आयोजित एक साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेते हुए बोले थे। कोलकाता को अपना ‘दूसरा घर’ कहने वाली निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन का स्वागत वहां के प्रबुद्ध वर्ग के साथ-साथ सरकार ने भी दिल खोलकर किया। तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी को वैचारिक और राजनीतिक रूप से काफी प्रतीकात्मक माना जा रहा है। इस कार्यक्रम के मंच पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने उनका स्वागत किया। इस मंच पर राज्य के वित्त मंत्री स्वप्न दासगुप्त और शहरी विकास मंत्री अग्निमित्रा पाॅल की भी उपस्थिति रही। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि नसरीन का लौटना दिखाता है कि पश्चिम बंगाल में न केवल सरकार का चेहरा बदला है, बल्कि सिस्टम भी बदल गया है। किसी को भी बंगाल आने का अधिकार है। और किसी को भी बंगाल में बोलने का अधिकार भी है। मैं तस्लीमा नसरीन का बंगाल में स्वागत करता हूं। जब भी वे चाहे बंगाल आ सकतीहैं।
अपने इस
संक्षिप्त प्रवास में लेखिका कोलकाता के कई स्थानों में गईं और प्रबुद्ध
कोलकातावासियों से मुखातिब भी हुईं। यहां उन्होंने साफ किया कि वह किसी राजनीतिक
दल की बात करने नहीं आई हैं। वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता की
बात करने आई हैं। इस दौरान अपने एक प्रेस कांफ्रेंस में यूनीफार्म सिविल कोड यानी
यूसीसी की वकालत भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लिए की। बांग्लादेश में हिंदूओं और हिंदू महिलाओं
पर होने वाले अत्याचारों को मौजूदा बांग्लादेश सरकार के संदर्भ में उन्होंने
रेखांकित किया। बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन, पूर्व
प्रधानमंत्री शेख हसीना का देश छोड़ना और हिंदू इसाई अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे
अत्याचारों पर खुलकर अपने विचार रखे। मदरसों को खत्म करने के पक्ष में तस्लीमा ने
कहा कि मैंने बांग्लादेश में देखा है कि कैसे मदरसों में जिहादी तैयार किए जाते
हैं। मदरसे गैर-मुसलमानों के प्रति नफरत सिखाते हैं। इन मदरसों में लड़कियों के साथ
बलात्कार की खबरें हैं। मैं मदरसों को खत्म कर धर्मनिरपेक्ष स्कूल स्थापित करने की
वकालत करती हूं।
कोलकाता
वापसी के इस दौरान उन्होंने वह सब कुछ कहा जिसके लिए वे जानी जाती हैं और
कट्टरपंथी उन्हें नापसंद करते हैं और उन्हें जान से मार देने की धमकी देते हैं।
इन्हीं हिंसक धमकियों के कारण न केवल उन्हें 1994 को अपना देश बांग्लादेश छोड़ना पड़ा, बल्कि अपने देश जैसा देस कोलकाता भी 2007 को छोड़ना
पड़ा। इसे आयरनी ही कहा जाएगा कि 2007 में नसरीन को लेफ्ट
फं्रट सरकार के शासनकाल में कोलकाता छोड़ना पड़ा और उसके बाद आई तृणमूल सरकार ने
उन्हें राजनीतिक दबाव के चलते वापस नहीं आने दिया। ये दोनों सरकारें सेक्युलर और
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करती हैं। भारत जैसी सहिष्णु धरती पर तसलीमा
नसरीन के साथ हुआ यह व्यवहार यहां की राजनीति की कई परतों को उघारने में सक्षम है।
बांग्लादेश में लेखिका की ‘लज्जा’ सहित पांच किताबें प्रतिबंधित है और पश्चिमी बंगाल में एक हुई थी-द्विखंडितो। दोनों देशों ने किताबों को प्रतिबंधित करने का एक ही कारण ‘धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना’ बताया। समय-समय पर लेखिका ने इस्लाम और मुस्लिम महिलाओं से संबंधित कानूनों में सुधार के प्रश्न को साहस से उठाया। तसलीमा ने कुरान में पूर्ण सुधार की बात कही। यही कहने पर उलेमा ने मौत का फतवा जारी कर दिया। और इसे नाम दिया गया ‘धार्मिक भावानाओं को ठेस पहुंचाना।’ पश्चिमी बंगाल में ‘द्विखंडितो’ को लेकर जो विवाद होता है, उसे नार्मल करने के लिए लेखिका किताब के तीन पेज वापस ले लेती हैं। तब भी कट्टरपंथियों का रोष कम नहीं होता। बुद्धदेव भट्टाचार्या की तत्कालिक वामपंथी सरकार 25 बुद्धिजीवियों की ‘राय-सुमारी’ के बाद इस किताब पर प्रतिबंध लगा देती है। जिस जगह लेखिका की ‘लज्जा’ जैसी किताब का जोरदार स्वागत होता है, वहीं कुछ साल बाद उनकी ही किताब पर प्रतिबंध।
तसलीमा नसरीन अपनी
आत्मकथा-7 ‘निर्वासन’ में लिखती हैं कि
कट्टरपंथियों के हाथ का खिलौना बनी भारतीय राजनीति ‘तुम
जबान दो कि तुम भारत में नहीं रहोगी, तभी तुम्हें भारत में
रहने का वीजा देंगे’ की शर्त रख देती है। अपनी चिंगारियों से
भरी रचनाओं की वजह से तसलीमा नसरीन को स्वदेश और दूसरे मुस्लिम देशों में
मौलवादियों के हमलों का सामना करना पड़ता है, परन्तु दुनिया
के एक धर्मनिरपेक्ष बहु-संस्कृतिवादी, एक बड़े लोकतांत्रिक
देश भारत में उनके लिए इस अनुभव का स्वाद निश्चित ही बहुत दुखदायी होता है।
तसलीमा
नसरीन ने अपने उपन्यास ‘लज्जा’ में बांग्लादेश में हिंदुओं की दुर्दशा का
बेबाक चित्रण किया है। तसलीमा मानवतावादी रही हैं, केवल
आत्म-प्रचार चाहने वाली ‘मानवाधिकारवादी’ नहीं। उन्होंने अपने विचारों और सत्यनिष्ठा के लिए कष्ट सहा और आज भी उसका
परिणाम भुगत रही हैं। कोई उनसे चाहे कितनी घृणा करे, उनका
चाहे जितना बहिष्कार किया जाये पर उनका कहना है कि ‘मैं इसी
तरह की हूं और यही रास्ता चुना है मैंने।’ अपने इसी रास्ते
और अपने निर्वासन को बहुत ही विस्तार और दुख के साथ उनकी किताब ‘निर्वासन’ में पढ़ा जा सकता है- ‘अपने देश बांग्लादेश में, मेरे अपने पश्चिम बंगाल
में, मैं एक निषिद्ध नाम हूं, एक विधि
बहिष्कृत औरत, एक वर्जित किताब। कोई मेरा नाम नहीं उच्चार
सकता, मुझे छू या पढ़ सकता है। अगर वे ऐसा करते हैं तो उनकी
जुबानें सड़ जाएगी, हाथ गंदे हो जाएंगे, गहरी घृणा से भर जाएंगे।’ उनके अपने देश बांग्लादेश
न सही, कोलकाता तक उनकी वापसी शायद ‘निर्वासन’
के इस दर्द से उबरने में उनके लिए मरहम का काम करे।

