सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

March, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हर दिन महिला दिवस

हमें राजनीतिक और सामाजिक रूप से किसी दिवस मनाने की आवष्यकता तब पड़ती है जब हमें पता होता है कि अमुक बात या मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींचना है। इसलिए देष में महिला दिवस के माध्यम से उनके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पिछड़ेपन और उनसे जुड़ी समस्याओं के बारे चर्चा करते हैं। पर इन तथाकथित दिवसों पर सवाल तब उठता है जब ‘दिवस’ महज औपचारिकता निर्वाह का साधन बन जाता है किसी परिवर्तन की कोई दस्तक इतने समय बाद भी दिखलाई नहीं पड़ती है। इसकी वजह है हमारा मानस जो आज भी अपनी बहू-बेटियों और पत्नी-मां के प्रति बदला नहीं है। यह बात मैं दोनों स्त्री और पुरूशें के संदर्भ में कह रही हंू। महिला दिवस मनाना ऐसा लगता है जैसे किसी एक दिन हम कन्या भोज कराकर पुण्य कमा लेते है और अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते है। तो अगर हम वास्तव में महिला दिवस से कुछ हासिल करना चाहते है तो मेरी अपने समाज से गुजारिष है  िकवे कृपया महिलाओं को देवी और बहुत हद तक ‘सजावटी वस्तु’ का दर्जा देने से बचे। उन्हें अपनी संपत्ति तो कतई न समझे। उन्हें साधारण इंसान जानकर उनके लिए इस बात को सुनिष्चित करे किवे सामाजिक और राजनीतिक तौर पर स्वतं…