मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

कर्ज लो, और ऐश करो

 

यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।। 
भारतीय भौतिकवादी चार्वाक दर्शन का यह सूत्र वाक्य माना जाता है। इसका अर्थ है कि जब तक जियो सुख से जियो, चाहे उधार लेकर ही क्यों न घी पीना पड़े, क्योंकि एक बार शरीर जलकर भस्म (राख) हो गया, तो पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिए जीवन का आनंद लेना चाहिए।यही प्राचीन भारतीय भौतिकवादी दर्शन चार्वाक आज कुछ लोगों का जीने का भी सूत्र बन गया है। कल हो न होकी तर्ज पर, जो कुछ है इसी पलहै, इसलिये जीने के लिये जो कुछभी किया जा सकता है करडालो।

ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्को चरितार्थ करती एक खबर 13 जनवरी को गौतमबुद्धनगर जिले से आई है। इस खबर में था कि नये साल 2026 का स्वागत करने के लिए युवाओं ने डिजिटल वॉलेट से लेकर निजी और राष्ट्रीयकृत बैंकों से 14 करोड़ रुपये से ज्यादा कर्ज लेकर खर्च कर डाले। 25 दिसंबर से एक जनवरी 2026 तक क्रेडिट कार्ड, नो-कॉस्ट ईएमआई और बाय नाउ पे लेटर (बीएनपीएल) के माध्यम से यह कर्ज लिए गए। इस खबर के अनुसार एक सप्ताह में 23,858 युवाओं ने यह कर्जे लिए। यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि इन आंकड़ों में कुछ निजी बैकों की इस अवधि में लिए गए लोन का डिटेल नहीं मिल सकी है। अगर इन्हें भी शामिल किया गया होता, तो यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा हो सकता था। इस प्रकार इन युवाओं ने यह कर्ज के पैसे नये साल के स्वागत में होटलों, बार की नाइट पार्टियों, क्लब एंट्री पास, ऑनलाइन केक आर्डर और नाइट आउट पार्टी में खर्च किए। ये कर्जे लोगों ने फोन पे, यूपीआई सहित कई ऑनलाइन प्लेटफाॅर्म से छह महीने से लेकर एक साल तक के लिए उधार लिए हैं।

इसी तरह त्योहारों के मौसम नवंबर, 2025 में पैसा बाजार का एक दिलचस्प सर्वे आया था। सर्वे में बताया गया कि इस बार त्योहारों विशेषतः दीपावली को देखते हुए पर्सनल लोन लेने वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। यह सर्वे 10,200 से अधिक लोगों पर किए गए थे। इनमें से 41 फीसदी लोगों ने पहली बार पर्सनल लोन लिया था। यानी त्योहारों में खरीददारी करने और घर की साज-सज्जा के लिये ये लोन लिये गए, जिसमें भी 41 फीसदी लोगों ने पहली बार लोन लेकर अपने स्टेटस को बनाए रखने के लिये कर्ज लिया। सबसे खास बात यह कि 46 फीसदी लोगों ने कहा कि वे अगली बार भी इस आसानी से मिलते कर्जे का लाभ उठाना चाहेंगे।

पैसा बाजार की एक रिपोर्ट के अनुसार कर्ज लेने वाले लोगों की औसत उम्र में कमी आई है। जहां पहले कर्ज लेने वालों की औसत आयु 47 साल होती थीवहीं अब 25 से 28 साल की उम्र में ही लोग कर्ज लेना शुरू कर देते हैं।

त्योहारों के दौरान पर्सनल लोन लेने का सबसे बड़ा कारण घर की मरम्मत और फर्निशिंग रहा, जिसका कुल हिस्सा 18 फीसदी तक था। इसके बाद 15 फीसदी लोगों ने घर की वेलनेस को बढ़ाने के लिये इलेक्ट्रॉनिक सामान और उपहोरों के लिए कर्ज लिया। वहीं 12 फीसदी ने सोना-गहनों के लिए और 10 फीसदी ने पुराने कर्ज चुकाने या फैशन शॉपिंग के लिए ये सभी कर्जे लिए। अगर लोन लेने की एमाउंट की बात की जाये, तो लगभग 60 फीसदी लोगों ने 5 लाख रुपये से कम का लोन लिया, जबकि 42 फीसदी ने 5 साल से कम की अवधि चुकाने के लिये चुनी। लोन लेने का यह पैटर्न दिखाता है कि लोग अब उधारी लेकर त्योहारों का आनंद लेने से नहीं चूक रहे हैं।

मई, 2025 में पैसा बाजार की एक रिपोर्ट के अनुसार कर्ज लेने वाले लोगों की औसत उम्र में कमी आई है। जहां पहले कर्ज लेने वालों की औसत आयु 47 साल होती थी, वहीं अब 25 से 28 साल की उम्र में ही लोग कर्ज लेना शुरू कर देते हैं। जाहिर है कि अब कहीं ज्यादा युवा लोग कर्ज ले रहे हैं। जहां 1960 दशक के जन्में लोगों के कर्ज लेने का कारण होम या निजी वाहन लोन होता था, वहीं 1990 दशक की पीढ़ी व्यक्तिगत ऋण या उपभोक्ता सामानों के लिये कर्जे ले रही है। वास्तव में इन सब के बीच सामाजिक और आर्थिक रूप से कई परिवर्तन होने से भारतीय उपभोक्ता काफी बदल गया है।

कभी भारतीय समाज में कर्जा लेना अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। बचत को महत्व देना और जितनी चादरउतना पैर फैलाना कहावतें समझाई जाती रही हैं। लेकिन अब वह मूल्य नहीं रहे। इसके अंदर में सामाजिक रूप से कई तरह की चीजें काम कर रही हैं। 

युवा पीढ़ी का यूं कर्जे लेकर खुशियां खरीदने के मामले देखकर इतना तो समझ आ रहा है कि कर्ज लेना अब कोई टैबूवाली बात नहीं रह गई है। कभी भारतीय समाज में कर्जा लेना अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। बचत को महत्व देना और जितनी चादर, उतना पैर फैलाना कहावतें समझाई जाती रही हैं। लेकिन अब वह मूल्य नहीं रहे। (यहां यह नहीं समझा जाना चाहिए, कि वे बातें सही थी, या अब गलत है।) इसके अंदर में सामाजिक रूप से कई तरह की चीजें काम कर रही हैं। जिनको समझना जरूरी है, तभी पता चल सकता है कि मिलेनियम पीढ़ी और बाद की जेनजी कैसे कर्ज लेकर घीपीने की मानसिकता के कब्जे में आ गये हैं, जिसे हमारी परंपरा में तो अच्छा नहीं कहा गया है।

पीडब्ल्यूसी इंडिया और फिनटेक फर्म परफियोज की एक फरवरी, 2025 की स्टडी से पता चला है कि भारतीय अपनी इनकम का एक-तिहाई हिस्सा लोन चुकाने पर खर्च करते हैं। यह स्टडी 30 लाख टेकसैवी भारतीय उपभेाक्ताओं की उपभोग संबंधी कार्यों पर आधारित है। हाउ इंडिया स्पेंड्सः ए डीप डाइव इनटू कंज्यूमर स्पेंडिंग बिहेवियरनाम की इस स्टडी में अलग-अलग शहरों के लोगों की मंथली सैलरी 20,000 से 1,00,000 के बीच थी, और वे टियर-थ्री शहरों से लेकर मेट्रोपॉलिटन शहरों तक के थे। स्टडी में पता चला कि अपर-मिड-लेवल कमाने वाले लोग अपनी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा लोन ईएमआई चुकाने में खर्च करते हैं, जबकि एंट्री-लेवल कमाने वाले लोग दोस्तों, परिवार या लोकल कर्ज देने वालों जैसे इनफॉर्मल सोर्स से ज्यादा बार लोन लेते हैं।

स्टडी में पता चला कि अपर-मिड-लेवल कमाने वाले लोग अपनी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा लोन ईएमआई चुकाने में खर्च करते हैंजबकि एंट्री-लेवल कमाने वाले लोग दोस्तोंपरिवार या लोकल कर्ज देने वालों जैसे इनफॉर्मल सोर्स से ज्यादा बार लोन लेते हैं।

रिपोर्ट ने खर्चों को तीन मुख्य ग्रुप में बांटा है- जरूरी खर्चे (39 फीसदी), जरूरतें (32 फीसदी), और अपनी मर्जी के खर्चे (29 फीसदी)। जरूरी खर्चों में लोन चुकाना और इंश्योरेंस प्रीमियम शामिल हैं, जबकि जरूरतों में घर के खर्चे जैसे यूटिलिटी बिल, फ्यूल, दवाएं और किराने का सामान शामिल हैं। वहीं, अपनी मर्जी के खर्चों में एंटरटेनमेंट, बाहर खाना, ऑनलाइन गेमिंग और दूसरी गैर-जरूरी चीजों से जुड़े खर्चे शामिल हैं। स्टडी में देखा गया कि इनकम लेवल बढ़ने के साथ खर्च करने की आदतें बदल जाती हैं। एंट्री-लेवल कमाने वालों से ज्यादा इनकम वाले ग्रुप में जाने पर अपनी मर्जी के खर्चे 22 फीसदी से बढ़कर 33 फीसदी हो जाते हैं।

इस स्टडी में यह भी देखा गया कि देश में 2019 और 2024 के बीच हर साल सैलरी में 9.1 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है। 2023-24 में, भारत की प्रति व्यक्ति डिस्पोजेबल इनकम 2.14 लाख रुपये तक पहुंच गई, जो 13.3 फीसदी बढ़ी। इसी समय, देश की कुल बचत 2023-24 में 30 फीसदी कम हो गई। रिपोर्ट में कहा गया है, बचत में यह गिरावट बढ़ते खर्च के मामले में कंज्यूमर खर्च के पैटर्न में बदलाव का संकेत देती है, जिसमें ज्यादा खर्च जरूरी और गैर-जरूरी दोनों चीजों पर किया जा रहा है। तेजी से उपभोक्ता बनता युवा वर्ग अब बचत के बारे में नहीं सोच रहा है।

भारतीय परिवार अपनी लाइफस्टाइल को फंड करने के लिए तेजी से लोन ले रहे हैंऔर बचत की पारंपरिक संस्कृति से दूर जा रहे हैं। मेरे माता-पिता की पीढ़ी कर्ज लेना पसंद नहीं करती थीकम से कम घूमने और फोन के लिये तो कतई नहीं। 

इस साल नवबंर में त्योहारी बढ़ते कर्जो को देखकर कॉइनस्विच के को-फाउंडर आशीष सिंघल ने अपनी एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि भारतीय परिवार अपनी लाइफस्टाइल को फंड करने के लिए तेजी से लोन ले रहे हैं, और बचत की पारंपरिक संस्कृति से दूर जा रहे हैं। मेरे माता-पिता की पीढ़ी कर्ज लेना पसंद नहीं करती थी, कम से कम घूमने और फोन के लिये तो कतई नहीं। आंकड़ों का हवाला देते हुये उन्होंने कहा था कि भारत में अब हर व्यक्ति पर औसत घरेलू कर्ज 4.8 लाख रुपये हो गया है, जो सिर्फ दो साल पहले 3.9 लाख रुपये था। यह इनकम के साथ नहीं बढ़ रहा है। यह इनकम से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है।इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस बढ़ोतरी के पीछे किस तरह का कर्ज है। इस कर्ज का आधे से ज्यादा हिस्सा घर खरीदने या बिजनेस शुरू करने के लिए नहीं है। यह पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड और ऑटो लोन हैं। हम बनाने के लिए नहीं, बल्कि खर्च करने के लिए कर्ज ले रहे हैं।शायद यही हमारी सामुहिक चिंता का विषय है।

बुधवार, 21 जनवरी 2026

छोरों के इंतजार में पैदा होती 'म्हारी छोरियां'

 

हरियाणा में जन्म लिंग अनुपात में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह एक उत्साहजनक खबर है। ऐतिहासिक रूप से हरियाणा में लैंगिक असंतुलन की गहरी जड़ें मौजूद रही हैं। इन जड़ों की जड़ता में जो परिवर्तन हुआ है, वह वास्तव में तमाम सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों का नतीजा है। 

हरियाणा के जींद जिले से आई एक खबर ने सोशल मीडिया में बहस छेड़ दी। 37 साल की एक महिला ने अपने 11वें बच्चे को जन्म दिया है। इस खबर में खास बात यह थी कि उनके पहले 10 बेटियां हैं, अब यह 11वां बच्चा बेटा हुआ है। यानी एक बेटे की चाहत ने 19 साल की शादीशुदा जिंदगी में 11 बच्चों को जन्म देना पड़ा, क्योंकि एक अदद बेटे की आस थी। महिला की डिलीवरी ओजस हाॅस्पिटल एंड मैटरनटी होम में हुई, डाॅक्टरों के अनुसार यह एक हाई रिस्क केस था। महिला के पति मजदूरी करते हैं और वे अपनी बेटियों के अच्छे से पालन-पोषण और शिक्षा दिलाने की बात भी कह रहे हैं। तो इस खबर को वायरल होना ही था। लेकिन इस एक खबर का वायरल होना यह मानना नहीं है कि यह हमारे समाज का मात्र एक ही मामला है और बहुत से हो सकते हैं जिन्हें वायरल होने का मौका नहीं मिल सका। 

 इस खबर में खास बात यह थी कि उनके पहले 10 बेटियां हैं, अब यह 11वां बच्चा बेटा हुआ है। यानी एक बेटे की चाहत ने 19 साल की शादीशुदा जिंदगी में 11 बच्चों को जन्म देना पड़ा, क्योंकि एक  अदद बेटे की आस थी।

यह मामला एक परिवार की कहानी न होकर समाज की कहानी है, जिसके अनगिनत पहलू हैं। जिसमें इस परिवार की आर्थिक स्थिति, दंपति की शिक्षा और जागरूकता, पत्नी का निर्णय लेने की क्षमता में दखल, और वह छोटा सा सामाजिक दायरा जिसमें यह परिवार रहता है, यह वे परिस्थितियां हैं, जिसके खोह में ऐसी ही खबर पैदा होना लाजिमी हैं। अब इन दस बेटियों के भविष्य के बारे आकलन किया जा सकता है जिनका जन्म ही एक अदद ‘बेटे’ की चाहत पर आधारित था। वास्तव में यह एक बहुत ही भावुक विषय है। इन सबके बरक्स इसी हरियाणा से एक अच्छी और उत्साहवर्द्धक खबर भी ठीक इसी दौरान आती है।

हरियाणा, जो लंबे समय से लिंग असंतुलन की समस्या से जूझता रहा है, ने 2025 में जन्म लिंग अनुपात (एसआरबी) में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है। राज्य का एसआरबी 923 लड़कियां प्रति 1,000 लड़कों तक पहुंच गया है, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ऊंचा है। यह सुधार 2024 के 910 से 13 अंकों की वृद्धि दर्शाता है, और यह आकलन कुल 5,19,691 जन्मों (2,70,281 लड़के और 2,49,410 लड़कियां) पर आधारित है। राष्ट्रीय औसत 933 के काफी करीब पहुंचते हुए यह आंकड़ा न केवल सरकारी प्रयासों की सफलता को रेखांकित करता है, बल्कि गैरसरकारी संस्थाओं के प्रयासों को भी दर्शाता है। जो भी यह हरियाणा के सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। 

राष्ट्रीय औसत 933 के काफी करीब पहुंचते हुए यह आंकड़ा न केवल सरकारी प्रयासों की सफलता को रेखांकित करता है, बल्कि गैरसरकारी संस्थाओं के प्रयासों को भी दर्शाता है। जो भी यह हरियाणा के सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। 

ऐतिहासिक रूप से हरियाणा में लिंग अनुपात की समस्या की गहरी जड़ें मौजूद रही हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य का एसआरबी मात्र 834 था, जो राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे था और यह कन्या भ्रूण हत्या की व्यापक समस्या को दिखाता था। 2014 में यह 871 था, जो 2015 में 876, 2016 में 900, 2017 में 914 और 2018 में स्थिर रहा। 2019 में यह 923 तक पहुंचा, लेकिन कोविड-19 महामारी और अन्य कारकों से 2020 में 922, 2021 में 914, 2022 में 917, 2023 में 916 और 2024 में 910 तक लगातार गिरता गया। यह गिरावट दशक भर की प्रगति को चुनौती दे रही थी, तमाम प्रयासों को धता बतला रही थी। लेकिन 2025 में पुनरुत्थान ने राज्य को फिर से ट्रैक पर ला दिया। यह सुधार 2015 से शुरू हुए प्रयासों का परिणाम है, जिसमें अनुमानित 65,000 से अधिक लड़कियों को ‘बचाया’ गया है (अर्थात, हस्तक्षेपों से महिला जन्मों को सुनिश्चित किया गया)। लड़कियां बचाने की यह यात्रा बतलाती है कि लिंग असमानता न केवल सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों से जुड़ा हुआ मामला है, बल्कि अवैध चिकित्सा ताकतों से भी प्रभावित रहा है।

सरकारी प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभावी रहा, जबकि शहरी क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। जहां तथाकथित विकास की बयार बह रही है और चिकित्सीय सुविधाएं तुलनात्मक रूप से उपलब्ध हैं। इसे एनएफएचएस के विभिन्न सर्वे के द्वारा समझा जा सकता है।

इन हालिया आंकड़ों में जिलेवार असमानता स्पष्ट है, जो उत्तर-दक्षिण विभाजन दर्शाती है। उत्तरी जिले जैसे पंचकुला (971), फतेहाबाद (961), पानीपत (951), करनाल (944) और यमुनानगर (943) राज्य औसत से ऊपर हैं। अन्य ऊंचे जिले सिरसा (937), नूंह (935), कुरुक्षेत्र (927), अंबाला (926), हिसार (926), भिवानी (926) और कैथल (924) जिले राष्ट्रीय औसत से नीचे जा रहे हैं। इसके विपरीत, दक्षिणी जिले जैसे रेवाड़ी (882, सबसे कम), सोनीपत (894), रोहतक (898), गुरुग्राम (901) और फरीदाबाद (916) पिछड़ रहे हैं। ये शहरी-औद्योगिक और सीमावर्ती क्षेत्र हैं, जहां गुप्त क्लीनिक, पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनें और अवैध एमटीपी किट आसानी से उपलब्ध हैं। यह अंतर दर्शाता है कि सरकारी प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभावी रहा, जबकि शहरी क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। जहां तथाकथित विकास की बयार बह रही है और चिकित्सीय सुविधाएं तुलनात्मक रूप से उपलब्ध हैं। इसे एनएफएचएस के विभिन्न सर्वे के द्वारा समझा जा सकता है।

एनएफएचएस-5 सर्वे जिसे केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2019-21 में किया था। यह पूरे भारत में जनसंख्या, स्वास्थ्य और पोषण के बारे में जानकारी देता है, जिसमें लिंग अनुपात भी शामिल है। इसके अनुसार कुल लिंग अनुपात 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाएं हैं। यह एनएफएचएस-4 (2015-16) की तुलना में एक थोड़ा सा बदलाव है, जिसमें 1,000 पुरुषों पर 991 महिलाएं थीं। जन्म के समय लिंग अनुपात 1000 पुरुषों पर 929 महिलाएं हैं। यह अभी भी प्राकृतिक अनुपात (लगभग 950-970) से कम है। यह तथ्य दिखाता है कि जन्म से पहले लिंग चयन अभी भी एक समस्या है, खासकर हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में। एनएफएचएस-5 में एनएफएचएस-4 के 919 से थोड़ा सुधार हुआ है। बाल लिंग अनुपात (0-6 वर्ष की आयु) 1000 पुरुषों पर 929 महिलाएं। यह एनएफएचएस-4 के 919 से बढ़ा है, जिसका मतलब है कि महिला शिशु मृत्यु दर और लिंग-चयनात्मक गर्भपात को कम करने में थोड़ी प्रगति हुई है।

बेहतर लिंग अनुपात से महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ेगा, जो लंबे समय में अपराध दर (जैसे दुल्हन तस्करी) को कम भी कर सकता है। आर्थिक रूप से, संतुलित जनसंख्या कार्यबल को विविध बनाएगी, उत्पादकता बढ़ाएगी।

देखा जाए तो 923 का यह आंकड़ा हरियाणा की सामाजिक संरचना को मजबूत करेगा। बेहतर लिंग अनुपात से महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ेगा, जो लंबे समय में अपराध दर (जैसे दुल्हन तस्करी) को कम भी कर सकता है। आर्थिक रूप से, संतुलित जनसंख्या कार्यबल को विविध बनाएगी, उत्पादकता बढ़ाएगी। 923 का आंकड़ा हरियाणा के लिए एक मील का पत्थर है, जो दर्शाता है कि सख्त नीतियां और सामाजिक बदलाव लिंग असमानता को दूर कर सकते हैं। जब बेटों के इंतजार में बेटियां पैदा होने वाली परिस्थितियां नहीं बनी रहेगी।

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बैंड बाजा बारात और सोशल मीडिया


 

हमारे हाथों में मोबाइल एक ऐसी डिवाइस है, जिसमें अधिकांश गतिविधियों की लाॅगबुक दर्ज रहती है, चाहे या अनचाहे। यही कारण है कि यहां होने वाली गतिविधियां शादी जैसे नाजुक रिश्तों पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रही हैं। अगर जल्द नहीं संभलें, तो सोशल मीडिया में बिखरा यह स्यापा हमारे कई रिश्तों को खा जाएगा।

 

2025 को लवयापानाम से एक मूवी आई थी, जिसकी कहानी जेन-जी के रिलेशनशिप पर आधारित थी। कहानी में शादी के लिये नायक नायिका के पिता के सामने उपस्थित होता है और नायिका के साथ शादी की इच्छा व्यक्त करता है। पिता राजी होता है पर एक शर्त के बाद। शर्त होती है कि एक दिन के लिये नायक और नायिका अपना-अपना मोबाइल एक दूसरे को दे देंगे, प्रयोग करने के लिये। और यही से प्यार-स्यार की जगह लब का स्यापा शुरू हो जाता है। जहां दोनों नायक-नायिका प्यार की दुहाई देकर शादी करने वाले थे, वहीं एक दूसरे के मोबाइल हाथ में आने के बाद उनकी ऐसी सच्चाई सामने आती है, जिससे दोनों अब तक अंजान थे। एक दूसरे के सामने आती इन सच्चाइयों के कारण उनके बीच टकरार, दरार और फाइट शुरू हो जाती है। उनका विश्वास चुक जाता है, फलतः रिश्ता टूट जाता है। चूंकि यह फिल्म है, तो बड़े-बुजुर्ग बीच में आकर संबंधों के बीच में पड़ी दरार को भरने का काम करते हैं। दोनों को रियल लाइफ के सबक सिखाते हैं, फलतः लवयापाकी हैप्पी एंडिग हो जाती हैं, पर क्या रियल लाइफ में ऐसा संभव है।

शायद नहीं। तभी तो एक चौकाने वाली रिपोर्ट एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने हाल ही में प्रसारित की है। स्थानीय रिसर्च के बाद आई इस खबर में बताया गया है कि इंदौर जैसे बड़े शहर में 40 दिनों में ही 150 शादियां रद्द हो गईं। वजह कई थीं, पर सबसे बड़ी वजह बनी सोशल मीडिया पोस्ट। भावी दुल्हा और दुल्हनों की पुरानी सोशल मीडिया से जुड़ी गतिविधियां सामने आने से जो अविश्वास की धारा पैदा हुआ, वह अंततः शादी रद्द होने के मुकाम को पहुंच गई। रिपोर्ट के अनुसार 62 फीसदी शादियां टूटने की वजह सीधे तौर पर सोशल मीडिया से उपजी गतिविधियां थीं। इन गतिविधियों को लेकर दोनों पार्टिज में जो कहा-सुनी हुई, उसने झगड़े का रूप ले लिया, आखिर रिश्ता खतम करना पड़ा। पहले जहां शादी टूटने की वजह कोई गंभीर पारिवारिक, सामाजिक मामला होता था, जिसके सामने आने के बाद शादियां कैंसिल कर दी जाती थी, पर आज 60 से 70 फीसदी मामलों में सोशल मीडिया में किये गये पोस्ट, कमेंट्स, इमोजी, लाइक्स या फिर फ्रेंड लिस्ट में वह क्यों है, को लेकर मन-मुटाव यहां तक पहुंच रहा है कि शादी ही रद्द हो रही हैं। यह देखकर समझा जा सकता है कि सोशल मीडिया की पहुंच हमारे जीवन में अब कहां तक हो चुकी है। परिणाम है रिश्तों का बिखर जाना, क्योंकि यह रियल लाइफ है फिल्म नहीं।

पहले जहां शादी टूटने की वजह कोई गंभीर पारिवारिकसामाजिक मामला होता थाजिसके सामने आने के बाद शादियां कैंसिल कर दी जाती थीपर आज 60 से 70 फीसदी मामलों में सोशल मीडिया में किये गये पोस्टकमेंट्सइमोजीलाइक्स या फिर फ्रेंड लिस्ट में वह क्यों है?

शादी जैसे रिश्तों के बीच सोशल मीडिया का यूं फिल्मी खलनायक के रूप में उभरने का मतलब है कि हम डिजिटल जिंदगी को लेकर इतने सीरियस नहीं हुये हैं, जितना हमें होना चाहिए था। हमें लगता है कि सोशल मीडिया में हम कुछ भी करके निकल जाएंगे, किसी को या हमें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। ऐसा सोचना भी आज सोशल मीडिया के महत्व को कम करके आंकना है। आज जब भी कोई कंपनी अपने लिये एक अच्छे इम्प्लाई को ढूंढ़ती है, तो कम से कम उसका लिंक्डइन प्रोफाइल जरूर चेक करती है। यह प्रैक्टिस उनके लिये एक अच्छा उम्मीदवार ढूंढ़ने में काफी मददगार होता है। आज एक रिक्रूटर के लिये अपने इम्प्लाई की सोशल मीडिया स्क्रीनिंग जरूरी हो गई है, भले ही यह वैध न हो। 2023 के रिज्मेबिल्डर सर्वे के अनुसार 73 फीसदी हायरिंग में मैनेजरों ने उम्मीदवारों की सोशल मीडिया प्रजेंस के नंबर दिये और उनकी उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया। जबकि 85 फीसदी ने माना कि उन्होंने अपने उम्मीदवारों की उम्मीदवारी रद्द कर दी, जब उन्हें उनकी ऑनलाइन प्रोफाइल में कुछ गलत दिखा। तो समझा जा सकता है कि हमारी सोशल मीडिया संबंधी गतिविधियां कहां तक पहुंच रखती हैं। तो फिर शादी-विवाह जैसे मामले इनसे दूर कैसे रह सकते हैं।

2023 के रिज्मेबिल्डर सर्वे के अनुसार 73 फीसदी हायरिंग में मैनेजरों ने उम्मीदवारों की सोशल मीडिया प्रजेंस के नंबर दिये और उनकी उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया। जबकि 85 फीसदी ने माना कि उन्होंने अपने उम्मीदवारों की उम्मीदवारी रद्द कर दीजब उन्हें उनकी ऑनलाइन प्रोफाइल में कुछ गलत दिखा।

सोशल मीडिया संबंधी यह मामले शादी से पहले ही पता चलने के बाद शादी रद्द होने का कारण बन रहे हैं। पर लगभग दो दशकों से आपसी रिश्ते खराब करने का एक कारण सोशल मीडिया दर्ज हो रहा है, ऐसा कई रिसर्च हमें बता रही है। कपल्स हों, या फे्रंड्स सोशल मीडिया का अधिक उपयोग उनके आपसी रिश्तों में दूरियां पैदा कर देता है। कंप्यूटर इन ह्यूमन विहैवियर में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि शादीशुदा जिंदगी की गुणवत्ता और सोशल मीडिया दोनों का संबंध रहा है। जो लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते हैं, वे रेगुलर सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों की तुलना में अपनी शादी में 11 फीसदी अधिक खुश रहते हैं। इसी रिपोर्ट में बहुत ही विस्तार से बताया गया है कि पहली बार पति-पत्नियों के बीच सोशल मीडिया कैसे घुस गया और रिश्ते खराब करने लगा। इस संबंध में पहली रिपोर्ट 2009 में आई थी, जब यूके की डिवोर्स आॅनलाइन कंपनी के एक एग्जीक्यूटिव, मार्क कीनन ने पाया कि कंपनी की 5000 सबसे नये तलाक के आवेदनों में से 989 में फेसबुकशब्द आया था। इसी तरह, अमेरिकन एकेडमी ऑफ मैट्रिमोनियल लॉयर्स (एएएमएल) के 2010 के एक सर्वे में पाया गया कि पांच में से चार वकीलों ने बताया कि फेसबुक से मिले सबूतोंके आधार पर तलाक के मामलों की संख्या बढ़ रही है। इसके अलावा, सोशल नेटवर्क साइट पर धोखा देने का पता लगाने में मदद के लिए वेबसाइट्स भी बनाई गई हैं। उदाहरण के लिए FacebookCheating.com इसके द्वारा अपने पार्टनर के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर का पता लगाया जा सकता था।

इसकी वजह है इंटरनेट और सबसे बड़ी ताका-झांकी की जगह सोशल मीडिया’ यानी हमारी फेसबुकइंस्टाग्रामलिंक्डइनटिकटाॅकटिंडर या एक्स प्रोफाइल। अगर जेन-जी की बात की जायेतो जितनी वे आपस में बाते नहीं करते उतना वे टेक्स्ट’ करते हैं।


यह सब तब हो रहा था, जब फेसबुक जैसी एक ही सोशल मीडिया साइट हमारे जीवन में आ गई थी। और इस पर मौजूद हम इस बात के लिए हम एसोर थे कि यहां कुछ भी किया जा सकता है, हमें कौन जजकरेगा। लेकिन हम जजकिये जा रहे थे। इसका असर भी पड़ने लगा था। यह रिपोर्ट हमारे देश समाज की न हो, पर आज हमारी भी वहीं स्थिति हो गई है। जब सोशल मीडिया का संसार काफी फैल चुका है। यह इंदौर की इस छोटी सी रिपोर्ट से समझा जा सकता है। हमारे हाथों में मोबाइल एक ऐसी डिवाइस है, जिसमें हमारे द्वारा की गई अधिकांश गतिविधियों की एक लाॅगबुक तैयार होती है, हम चाहें या न चाहें। इसकी वजह है इंटरनेट और सबसे बड़ी ताका-झांकी की जगह सोशल मीडियायानी हमारी फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, टिकटाॅक, टिंडर या एक्स प्रोफाइल। अगर जेन-जी की बात की जाये, तो जितनी वे आपस में बाते नहीं करते उतना वे टेक्स्टकरते हैं। उनका सोना, जागना, खाना, पीना सभी कुछ सोशल मीडिया ही निर्धारित कर रहा है। यहां होने वाले मेल-मिलाप, बातचीत चाहे उनकी भाषा डिजिटल ही क्यों न हो, यह सब हमारा भविष्य तय कर रहे हैं। सोशल मीडिया के बहाने कोई भी थोड़े प्रयासों से हमारे बारे में बहुत कुछ जान सकता है। भले ही यहां की गईं गतिविधियां का सीधा मतलब वह न हो, जो दूसरा कोई समझ रहा है। लेकिन इसकी जबावदेही हमारी ही बनती है, और सभी उठने वाले सवालों के जवाब हमें ही देने होते हैं। नहीं तो लवयापाकी तरह अच्छी खासी लाइफ को बिगबाॅस बना दिया है इस फोन नेकी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए निजी जीवन में रिश्तों को लेकर हमारे किरदार पर कोई उंगली न उठा दे, इसके लिये ईमानदारी बनाये रखनी पड़ेगी यहां भी, और वहां भी।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

आई एम जाॅर्जियाः 'मैं यहां तक कैसे पहुंची'


इटली की प्रधानमंत्री जाॅर्जिया मेलोनी की लिखी हुई आत्मकथा इस समय देश में भी चर्चा का विषय बन गई है। मूल रूप से इटली में ख्याति पा चुकी किताब के भारतीय संस्करण की प्रस्तावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखी है, जो भारत-इटली द्विपक्षीय संबंधों में जुड़ने वाली एक और कड़ी बन रही है।


देश में इटली की प्रधानमंत्री जाॅर्जिया मेलोनी चर्चा में हैं। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी जिंदगी के बारे एक किताब लिखी है यानी आत्मकथा। इसका भारतीय संस्करण रूपा पब्लिकेशन से आया है। और इस किताब की प्रस्तावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखी है। किताब का नाम है- ‘आई एम जाॅर्जिया-माय रूट्स, माय प्रिंसिपल्स।’ यह किताब जल्द ही देश भर में उपलब्ध हो जायेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस किताब की प्रस्तावना में बताया है कि किताब ‘उनके मन की बात है।’ साथ ही कहा है कि मेलोनी का जीवन राजनीति या सत्ता की खोज से अधिक साहस, विश्वास और लोकसेवा के संकल्प का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने उनकी इस यात्रा को भारतीय परंपरा के ‘नारी शक्ति’ के विचार से जोड़ा है, जिसे भारतीय परंपरा में हजारों वर्षों से पूजा जाता रहा है। इसे एक व्यक्तिगत और आत्ममंथन से भरी हुई यात्रा कहा है। उन्होंने लिखा है कि मुझे विश्वास है कि एक जबरदस्त नेता और देशभक्त की कहानी के रूप में इसे खूब सराहा जाएगा। मेलोनी ने मोदी की प्रस्तावना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे ‘बहुत सम्मानित’ महसूस कर रही हैं।’

वास्तव में इस किताब में लिखी गई प्रस्तावना केवल प्रस्तावना नहीं है, बल्कि भारत और इटली के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों की लड़ी की एक कड़ी है। 2022 में इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने वाली जाॅर्जिया मेलोनी ने मार्च 2023 में भारत की राजकीय यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान, दोनों देशों के बीच संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुंचा दिया गया था। तभी से दोनों नेताओं ने घनिष्ठ संपर्क बनाए रखा है, जिसमें आपसी हित के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए टेलीफोनिक बातचीत भी शामिल है। दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत तालमेल कई मुलाकातों के दौरान दिखा। जैसे कि 2023 के अंत में सीओपी28 सम्मेलन में मेलोनी ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ ली गई सेल्फी सोशल मीडिया में पेास्ट की जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने रीपोस्ट करते हुए लिखा, ‘मित्रों से मिलना हमेशा आनंददायक होता है।’ 

ब्रदर आॅफ इटली की नेता जॉर्जिया मेलोनी इटली की राजनीति में दक्षिणपंथी धड़े से संबंध रखती हैं। मेलोनी के इटली की सत्ता तक पहुंचने ने करीब आठ दशकों के राजनीतिक इतिहास को बदलकर रख दिया। 1945 से 2022 तक विभिन्न तरह के गठबंधनों में अब तक वामपंथी या सेंट्रल वाम सरकारों ने इटली को नेतृत्व किया था। इसी जीत के साथ जॉर्जिया मेलोनी यूरोप के साथ-साथ अन्य देशों में भी चर्चा का विषय बन गई हैं। इस चर्चा में लाने में उनके विचार बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। वे बड़ी बेबाक और निडर हैं। खुलकर अपने विचार रखने के कारण ही वे इटलीवासियों का दिल जीतती आईं हैं। वे वेनिटो मुसोलिनी की बपचन से फैन रही हैं। युवा नेता के तौर पर वे इसके लिए सड़कों पर भी उतरती थीं। 

बहुत ही छोटी उम्र में उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर दी थी। उनके पिता फ्रांसिस्को बेशक वामपंथी विचारधारा वाले थे, लेकिन वे अपनी मां की छत्र-छाया में पली-बढ़ीं। उनके माता-पिता उनके पैदा होने से पहले ही अलग हो गए थे। होश संभालते ही वे राजनीति की पथरीली सड़क पर निकल पड़ी। उनके ऊपर उनकी मां का प्रभाव बहुत पड़ा। बहुत ही संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में उनका और उनकी बहन एरियाना का पालन-पोषण हो सका। इस संघर्ष और दुनिया की वास्तविकता का उनके जीवन में गहरा प्रभाव है। अपने विचारों के प्रति दृढ संकल्प रहने के प्रति इसी भावना ने उनका साथ दिया है। इसी के बलबूते वेे आम इटलीवासियों से जुड़ सकीं। 

इटली की राजधानी रोम वह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जगह है, जहां वे जन्मीं थीं। इसका प्रभाव उन्हें खुद को इतालवी मानने पर गर्व का अनुभव कराता है। इस आत्मकथा को लिखे जाने को लेकर उनका कहना है कि ‘मैंने बहुत से लोगों को खुद के बारे में और मेरे विचारों के बारे में बात करते सुना है, लेकिन मुझे लगता है कि वे यह नहीं जानते वे मुझे कैसे चित्रित कर रहे हैं। इसलिए मैंने यह फैसला किया कि मैं अपने बारे में खुद ही बताऊँ कि मैं क्या हूं, मैं किसमें विश्वास करती हूं, और मैं यहां कैसे पहुंची।’ 


बुधवार, 20 अगस्त 2025

शतरंज के खेल में महिला ‘अंडरडाॅग खिलाड़ी’यों की जीत


शतरंज में प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता है। लेकिन शतरंज के महान खिलाड़ी गैरी कास्परोव यह नहीं मान सके। उन्होंने ‘महिला शतरंज’ को असली शतरंज नहीं माना। उनके लिये ‘असली शतरंज’ और ‘महिला शतरंज’ में अंतर बना रहा। दिव्या देशमुख पहली भारतीय फिडे महिला चेस वर्ल्ड  कप चैंपियन बनने के साथ ग्रैंडमास्टर बनकर छा गई हैं। दिमाग के इस खेल में ‘अंडरडाॅग खिलाड़ी’ मानी जाने वाली महिलाओं का अब तक का यह सफर कैसा रहा, आइए जानते हैं...


अट्ठाइस जुलाई को शतरंज खिलाड़ी दिव्या देशमुख ने इतिहास रच दिया। जार्जिया के बतूमी में आयोजित फिडे महिला वर्ल्ड कप 2025 में खिताबी जीत के साथ भारतीय शतरंज के इतिहास में वे पहली महिला खिलाड़ी बन गई हैं, जिन्होंने यह खिताब अपने नाम किया। इस रोमांचकारी क्षण के लिये हम इस जीत से पहले ही आश्वस्त हो गये थे, क्योंकि फाइनल में दोनों खिलाड़ी भारतीय ही थीं। 19 वर्षीय दिव्या की जीत ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया, क्योंकि उनके मुकाबले में दिग्गज खिलाड़ी ग्रांडमास्टर 38 वर्षीय कोरेरू हम्पी थीं। इस जीत ने दिव्या को गै्रंड मास्टर का खिताब और 42 लाख की राशि का हकदार बना दिया है। साथ ही वे बेहद प्रतिष्ठित कैंडिडेट्स टूर्नामेंट के लिये क्वालीफाई कर गई हैं।

इस टूर्नामेंट को कई उपलब्धियों के लिये याद किया जायेगा। इसमें पहली बार देश  की नामीगिरामी चार भारतीय महिला खिलाड़ियों कोनेरू हम्पी, हरिका द्रोणवल्ली, आर. वैशाली और दिव्या देशमुख ने क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई थी। यह हमारे लिये एक ऐतिहासिक उपलब्धि रही। सबसे बड़ी बात कि इस टूर्नामेंट ने चीन की दिग्गज खिलाड़ियों को हराते हुये फाइनल में दोनों भारतीय महिला खिलाड़ी आमने-सामने आ गईं। इस ‘चाइनीज वाॅल’ को तोड़ने में कोनेरू हंपी और दिव्या ने अपनी मुख्य भूमिका निभाई। महिला वर्ग में टॉप 100 में सबसे उपर चीन की खिलाड़ी हैं। चीन की 14 महिला खिलाड़ियों के बाद भारत की 9 महिला खिलाड़ी इस टॉप 100 में शामिल हैं। लेकिन इस फिडे वल्र्ड कप में कोनेरू और दिव्या ने इसी चीनी दिवार को तोड़ा और चीनी चुनौतियों खत्म करते हुये खिताब को देश की झोली में डाल दिया। 

सभी देशवासी दिव्या की यह उपलब्धि खूब चियर कर रहे हैं। शासन-प्रशासन भी आज उनकी इस कामयाबी में अपना हिस्सा ढूंढ़ रहा है। लेकिन यह दिव्या और कोनेरू ही बता पाएगीं कि वे यहां तक कैसे पहुंचीं। भारतीय महिला शतरंज खिलाड़ियों का सफर अन्य खेलों की तरह ही संघर्ष से भरा रहा है। यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि आज भी इसकी स्थिति विश्व स्तर से लेकर देश स्तर तक कमोवेश पुरूष खेलों की तुलना में कमतर ही है। चाहे वह खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाएं हों या टूर्नामेंट जीत पर मिलने वाली धनराशि का सवाल हो, महिलाओं की योग्यताएं कमतर ही रखी गई हैं। शतरंज वैसे तो दिमाग का खेल माना जाता है, मगर शारीरिक रूप से कमतर मानने के साथ-साथ उन्हें दिमागी रूप से भी कमतर मानकर भेदभाव किया जाता है। विश्व से देश स्तर की महिला शतरंज खिलाड़ियों के अनुभव बहुत कुछ ऐसी ही कहानी कहते हैं।  

देश में महिला शतरंज खिलाड़ी की पहली दस्तक 1933 में ही मिल गई थी। जब मिस फातिमा ने ब्रिटिस चेस फेडरेशन के सहयोग से होने वाली ब्रिटिश महिला शतरंज चैंपियनशिप में न केवल भाग लिया, बल्कि जीता भी। मिस फातिमा से दिव्या देशमुख तक का यह सफर अभी तक चल रहा है। दिव्या देशमुख को मिलाकर अब तक देश में कुल चार महिला ग्रैंडमास्टर बन गईं हैं। कोनेरू हम्पी देश की पहली महिला ग्रैंडमास्टर बनीं, उनके बाद द्रोणावल्ली हरिका बनीं, तीसरी ग्रैंडमास्टर आर. वैशाली हैं और अब दिव्या देशमुख। कोनेरू हम्पी देश की एक उत्कृष्ट शतरंज खिलाड़ी हैं। वे विश्व की सबसे कम उम्र की ग्रैंडमास्टर बन गई थीं मात्र 15 वर्ष की उम्र में। उन्होंने सर्वोच्च रेटिंग प्राप्त महिला शतरंज खिलाड़ी जुडिट पोल्गार का रिकार्ड तोड़ दिया था, जब वे गैंडमास्टर बनीं, तब वे पोल्गार से तीन महीने छोटी थीं।

 वे कहती हैं कि लड़कियां को ‘अंडरडाॅग खिलाड़ी’ माना जाता है। वे सामान्य रूप से लड़कों और लड़कियों दोनों वर्गों में खेलती थीं। उन्होंने 1999 और 2000 में क्रमशः 12 और 13 साल की उम्र में एशियाई अंडर-12 और राष्ट्रीय अंडर-14 खिताब जीते, दोनों ही लड़कों के वर्ग में। उन्होंने अंडर 10, 12, 14 और 20 विश्व चैंपियनशिप में शीर्ष पुरस्कार जीते। जिस तेजी से वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही थीं, वह सबके लिये सामान्य नहीं था। दिमाग के इस खेल में उनकी उत्कृष्टता कुछ लोगों को बर्दास्त नहीं हो रही थी। 2002 में ग्रैंडमास्टर बनने के बाद हम्पी का स्वतः चयन पुरुष राष्ट्रीय-ए टूर्नामेंट के लिये हुआ, जो कुछ पुरूष साथियों को स्वीकार नहीं हुआ। इसलिये खुद को और योग्य साबित करने के लिये उन्होंने क्वालीफायर टूर्नामेंट के पुरुष ड्राॅ में प्रवेश किया और दूसरे स्थान पर रहीं। सवाल है कि अगर शतरंज दिमाग का खेल है, तो भी महिलाएं बराबरी पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकतीं।

अब तक की सबसे सफल और सर्वोच्च रेटिंग वाली महिला खिलाड़ियों में से एक, जुडिट पोल्गर हैं, जिन्होंने अपने समय के कई दिग्गज पुरुष खिलाड़ियों को हराया। वे पुरुष प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिये काफी चर्चित रहती थीं। गैरी कास्पारोव, अनातोली कार्पोव, व्लादिमीर क्रैमनिक और विश्वनाथ आनंद उनसे हार चुके हैं। शतरंज में गैरी कास्पारोव अब तक के सबसे महान खिलाड़ी माने जाते हैं, जुडिट ने 2002 में एक क्लासिकल गेम में हराकर इतिहास रच दिया था। जुडिट पोल्गार न केवल महिला शतरंज में बल्कि संपूर्ण शतरंज इतिहास में अद्वितीय स्थान रखती हैं। उन्होंने यह साबित किया कि शतरंज में प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता है। लेकिन गैरी कास्परोव यह नहीं मान सके। उन्होंने ‘महिला शतरंज’ को असली शतरंज नहीं माना। उनके लिये ‘असली शतरंज’ और ‘महिला शतरंज’ में अंतर था।

शतरंज के सभी स्तरों पर लैंगिक पूर्वाग्रह की समस्याएं व्याप्त हैं। यह विश्व स्तर पर है- प्रारंभ से लेकर मध्यवर्ती और पेशेवर खिलाड़ियों तक जारी है। उच्चतम स्तर पर महिला शतरंज खिलाड़ियों की संख्या पुरुष समकक्षों की तुलना में काफी कम है। 1,600 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय शतरंज ग्रैंडमास्टर्स में से केवल 37 महिलाएं हैं, यह संपूर्ण का लगभग दो फीसदी होता है। महिला शतरंज टूर्नामेंट की पुरस्कार राशि पुरुषों के टूर्नामेंटों की तुलना में काफी कम होती है। महिला विश्व शतरंज चैंपियनशिप, जो महिलाओं की सबसे बड़ी शतरंज प्रतियोगिता है, इसकी धनराशि विश्व शतरंज चैंपियनशिप की धनराशि से 10 फीसदी कम है।

हाल के वर्षों में, शतरंज में लैंगिक असमानता के बारे में चर्चाएं हो रही है। वेतन में अंतर, नेतृत्वकारी पदों पर महिलाओं की कम संख्या, खेल में लैंगिक भेदभाव और उत्पीड़न की समस्याओं को खिलाड़ियों और खेल संगठनों दोनों ने उजागर किया है और उनका समाधान भी किया है। शतरंज में लैंगिक विविधता और समावेशन को बढ़ावा देने के प्रयास जारी हैं, इस उम्मीद के साथ कि महिलाएं इस खेल में आगे बढ़ती रहेंगी और उनके योगदान को मान्यता और सम्मान मिलेगा।


शनिवार, 19 जुलाई 2025

क्या हो सकते हैं भविष्य में दो दो दलाईलामा

 

तिब्बतियों के सबसे बड़े आध्यात्मिक नेता ने अपने उत्तराधिकार के सवाल पर जो बातें स्पष्ट की हैं , उससे दलाईलामा के चुनाव पर चीन  के साथ गतिरोध कायम रहेगा, यह स्पष्ट हो गया है। ऐसे में क्या यह संभव है कि हम भविष्य में दो दो दलाईलामा देखे।

अगला दलाईलामा कब, कौन और कहां  से होगा, ये सभी सवाल अब भविष्य के गर्भ में चले गये हैं। अपने 90वें जन्म दिवस के अवसर पर 06 जुलाई को 14वें दलाईलामा ने मैकलाॅडगंज, धर्मशाला में अपने उद्बोधन में बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया है। तिब्बतियों के सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरू दलाईलामा ने कहा कि उनकी मृत्यु के बाद उनका उत्तराधिकारी होगा। अपने जन्मदिन के अवसर पर दिये गये अपने संदेश में दलाईलामा ने कहा कि पिछले चैदह सालों में तिब्बती परंपराओं से जुड़े नेताओं और लोगों ने उन्हें पत्र लिखकर सूचित किया है कि दलाईलामा की संस्था को जारी रहना चाहिये। साथ ही तिब्बत में रहने वाले तिब्बती लोगों ने भी यही अपील की है। दलाईलामा ने कहा कि इन सभी अनुरोधों के मद्देनजर वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि दलाईलामा की संस्था जारी रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगले दलाईलामा को मान्यता देने के लिये गोदेन फोडरंग ट्रस्ट जिम्मेवार होगा। उन्हेांने स्पष्टतः कहा कि गोदेन फोडरंग ट्रस्ट ही अगले दलाईलामा के पुनर्जन्म को मान्यता देने का एक मात्र अधिकारी है और किसी अन्य को इस मसले में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

दलाईलामा के इस उद्बोधन से कई बातें स्पष्ट हो गई हैं। पहली, उनका उत्तराधिकारी होगा। दूसरी, तिब्बती बौद्ध परंपरा के अनुसार पुनर्जन्म की अवतार परंपरा का पालन किया जायेगा। और तीसरा, ‘किसी अन्य’ (उनका इशारा चीन की तरफ था) को इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होगा। उन्होंने तिब्बती बौद्ध अवतार परंपरा के पालन के लिये अंतिम निर्णय गोदेन फोडरंग ट्रस्ट को सौंप दिया है, जो उनकी भारत में चल रही निर्वासित सरकार का एक अंग है। इस ट्रस्ट की स्थापना 2011 में धर्मशाला में दलाईलामा के कार्यालय से जोड़कर की गई है। इसके प्रमुख दलाईलामा हैं और इसके अन्य सदस्यों में उनके कुछ सहयोगी शामिल हैं। इसका प्रबंधन समधोंग रिनपोछे करते हैं। ‘गोदेन फोडरंग’ मूल रूप से ल्हासा, तिब्बत के ड्रेपुंग मठ में दलाईलामा का आध्यात्मिक निवास था। पोटाला पैलेस के निर्माण के बाद दलाईलामा इस आवासीय परिसर से दूर चले गये थे। यह ट्रस्ट दलाईलामा की परंपरा का संरक्षण करता है, उनके आध्यात्मिक एवं मानवतावादी कार्यों का समर्थन करता है। यही भविष्य के दलाईलामा की पहचान की आधिकारिक प्रक्रिया का संचालन करेगा।

जब अध्यात्मिक गुरू दलाईलामा ने अपने उत्तराधिकार की जिम्मेदारी गोदेन फोडरंग ट्रस्ट को सौंप दी है और साथ ही ‘किसी अन्य’ को हस्तक्षेप न करने के लिये कहा है, तो जाहिर है कि उनकी मृत्यु के बाद अगले दलाईलामा की खोज पारंपरिक तिब्बती बौद्ध रीति-रिवाजों के अनुसार होगी-जैसे धर्मगुरुओं के परामर्श, संकेतों की खोज, झील दर्शन, पूर्व दलाईलामा की वस्तुओं की पहचान आदि के द्वारा। तिब्बतियों के दलाईलामा जीवित बुद्ध हैं। सभी दलाईलामाओं को करुणा के बोधिसत्व ‘अवलोकितेश्वर’ का अवतार माना जाता है। बौद्धों के लिए, अंतिम लक्ष्य ‘निर्वाण’ है यानी जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति। फिर यह पुर्नजन्म का क्या मतलब है। दरअसल, महायान संप्रदाय के अंतर्गत आने वाले पूर्वी एशियाई और तिब्बती बौद्ध मानते हैं कि बोधिसत्व इस सर्वोच्च बोध तक पहुंच चुके हैं। इसके अलावा, महायानी बौद्धों का मानना है कि बोधिसत्व पुनर्जन्म लेना चुनते हैं, ताकि वे संसार के दुख और पीड़ा को अनुभव कर सकें, ताकि अन्य प्राणियों को ज्ञान प्राप्ति में सहायता कर सकें। ‘तुल्कू’ प्रणाली तिब्बती बौद्ध धर्म का मूल आधार है, जो पुनर्जन्म को केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, करुणा और मार्गदर्शन का साधन मानती है।

इसके विरूद्ध चीनी कम्युनिस्ट सरकार जो वर्तमान दलाईलामा को ‘अलगाववादी’ मानते है, और तिब्बती बौद्ध दलाईलामा का चुनाव करना अपना अधिकार भी मानते है। इसलिये यह मामला चीनी सरकार के लिये राजनीतिक अधिक और धार्मिक कम है। चीन का मानना है कि दलाईलामा का चुनाव केवल 18वीं सदी की किंग राजवंश द्वारा शुरू की गई ‘गोल्डन अर्न’ (स्वर्ण कलश) प्रणाली से होना चाहिए। इसमें संभावित पुनर्जन्मीं बच्चों के नाम एक कलश में रखे जाते हैं और लॉटरी निकाल कर चुना जाता है। यह प्रणाली ऐतिहासिक रूप से उपयोग की गई थी, लेकिन अनिवार्य नहीं थी और अक्सर तिब्बती लामा इसे अस्वीकार करते थे। यह पूरी तरह से तिब्बती धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है। जब मौजूदा 14वें दलाईलामा का निधन होगा, चीन तिब्बत के भीतर अपने अनुकूल एक बालक को चुनकर उसे दलाईलामा घोषित करेगा। ऐसा माना जाता है कि यह चीन के लिए एक ‘प्रोपेगेंडा लामा’ होगा, जिसका उपयोग वह तिब्बती असंतोष को नियंत्रित करने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘धार्मिक स्वतंत्रता दिखावे’ के लिए कर सकेगा।

इस दौरान चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि ‘दलाईलामा के पुनर्जन्म को धार्मिक परंपराओं, चीनी कानूनों के साथ-साथ धार्मिक रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक परंपराओं (जैसे स्वर्ण कलश) प्रणाली का पालन करना होगा, इसे चीन की केंद्रीय सरकार की मंजूरी लेनी होगी।’ 1959 में वर्तमान दलाईलामा को चीनी कम्युनिस्ट सरकार माओत्से तुंग के बढ़ते दबाव और तिब्बत पर कब्जे के बाद भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। इसलिये तभी से वर्तमान दलाईलामा धर्मशाला से अपनी निर्वासित सरकार चला रहे हैं और तिब्बत को स्वायत्ता दिलाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं। अगला संघर्ष इन सबसे अलग दलाईलामा चुनाव परंपरा को बनाये रखना और तिब्बती लोगों को एकजुट रखना होगा। यह संघर्ष दलाईलामा से अधिक तिब्बती लोगों के लिये परीक्षा की घड़ी है।


क्या है दलाईलामा चुनने की तिब्बती परंपरा

बौद्ध धर्म में ‘अनात्म’ का सिद्धांत है, यानी स्थायी, अपरिवर्तनीय आत्मा (आत्म) का अस्तित्व नहीं है। फिर भी, कर्म और चित्त की धारा पुनर्जन्म का आधार बनती है। इसको ऐसे समझा जा सकता है- जैसे एक दीपक की लौ बुझती है और दूसरी लौ उससे जलाई जाती है। वह अगली लौ पूर्व की निरंतरता है, लेकिन वही नहीं है। महायान बौद्ध मान्यता के अनुसार पुनर्जन्म का संबंध मृत्यु के बाद चित्त की ऊर्जा अगले शरीर में प्रवेश करती है। यह ऊर्जा पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार नया जन्म ग्रहण करती है। महायान परंपरा में बोधिसत्व पुनर्जन्म लेते हैं, ताकि वे दूसरों को मुक्त कर सकें। दलाईलामा, पंचेन लामा, आदि ऐसे ही तुल्कू (पुनर्जन्मी लामा) माने जाते हैं। ‘तुल्क’ ऐसा व्यक्ति जो जानबूझकर करुणा के साथ पुनर्जन्म लेता है, ताकि दूसरों की मुक्ति में सहायता कर सके। बोधिसत्व यह प्रतिज्ञा लेते हैं कि वे निर्वाण में विलीन होने से पहले सभी प्राणियों की मुक्ति के लिए बार-बार जन्म लेंगे। यह पुनर्जन्म कर्मवश नहीं, बल्कि करुणा और संकल्पवश होता है।

पिछले तुल्कू (लामा) की मृत्यु के बाद, उनके पुनर्जन्म की तलाश में कई प्रक्रिया अपनाई जाती हैं। जिसमें वरिष्ठ लामा स्वप्न, ध्यान, और विशेष झील (जैसे लामो लात्सो) में आए दर्शन को आधार बनाते हैं। उम्मीदवार बच्चे की पहचान के लिये विशिष्ट लक्षणों जैसे बच्चे का व्यवहार, उसका बोलना, कुछ विशेष बातें याद होना, देखा जाता है। ऐसे बच्चे की परीक्षा के लिये उसे पूर्व लामा की वस्तुएं (जैसे माला, चश्मा, किताब) और कुछ नकली वस्तुएं मिलाकर दी जाती हैं। यदि वह सही वस्तुएं पहचान ले, तो यह पुनर्जन्म का प्रमाण माना जाता है। ऐसे चुने हुये बच्चे को ल्हासा (निर्वासन की स्थिति में धर्मशाला) लाकर उसे दलाईलामा के अनुरूप लालन-पालन किया जाता है। यहीं पर चुने हुये बच्चे को बौद्ध दर्शन, तिब्बती भाषा-संस्कृति और तर्कशास्त्र का प्रशिक्षण दिया जाता है। बच्चे के युवा होने तक यह सभी शिक्षाएं पूर्ण की जाती हैं और इसके बाद उनकी परीक्षा भी ली जाती है।


मंगलवार, 1 जुलाई 2025

तीन पहर की कवि-पीड़ा

इमरजेंसी के दौरान जब बीमार जयप्रकाश नारायण जी को जेल में बंद न रखकर दिल्ली मेडिकल इंस्टिट्यूट में रखा गया, तब कवि, गांधीवादी साहित्यकार भवानी प्रसाद मिश्र जयप्रकाश नारायण से मिलने गये। देखते ही उन्होंने कवि से पूछा- ‘कलम चल रही है।’ कवि ने कहा-‘त्रिकाल संध्या करता हूं। एक कविता सुबह, एक शाम, एक दोपहर।’ इमरजेंसी के दौरान भवानी प्रसाद मिश्र ने 18-19 सौ कविताएं रची थी। देश में इस दौर में जैसे भी घटनाक्रम चल रहे थे, यह कविताएं उन्हीं के बारे में कवि की अभिव्यक्ति थी। इस दौरान उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता ‘चार कौए उर्फ चार हौए’ ने सरकार को हैरान और परेशान किया, वहीं आंदोलनकारियों को हौसला दिया। 

इमरजेंसी के दौर में जब साधारण सी बातें बगैर सेंसर के छप नहीं पा रही थीं, तब ‘चार कौए उर्फ चार हौए’ जैसी कविता लोगों तक पहुंची कैसे। दरअसल, यही कहानी काफी दिलचस्प है। भवानी प्रसाद मिश्र ने अपनी आपातकाली कविताओं की किताब ‘त्रिकाल संध्या’ छपने के दौरान इसका खुलासा किया था। यह कविता सबसे पहले साप्ताहिक हिन्दुस्तान में बच्चों के पृष्ठ पर छपने के लिये भवानी प्रसाद जी ने भेजी थी। कविता के स्वीकृति होने के बाद कवि ने बच्चों के विभाग की संपादिका को एक पत्र लिखकर इस कविता के ‘असली मर्म’ के बारे में लिखकर भेज दिया, ताकि उन पर अंजाने में कोई संकट न आ जाए। हश्र वही हुआ, जो होना चाहिए था। कविता नहीं छापी गई। लेकिन कविता की ‘सुगंध’ सुगबुगाहट कई जगह पहुंच गई। इसके बाद यह कविता अंडरग्राउण्ड पत्रों में छापी गई, क्योंकि सरकार के विरोध उस समय प्रतिनिधि अखबारों में कुछ खास नहीं छप पा रहा था। वहीं से यह ऐसी चर्चित हुई, कि हर आजादी पसंद आंदोलनकारियों के जुबान पर आ गई।

इमरजेंसी के दौरान तो यह कविता लोकप्रिय रही ही, इमरजेंसी के बाद भी यह कविता जगह-जगह पढ़ी जाती रही। भवानी प्रसाद जी कहते हैं कि ‘आपातकाल उठने पर तो सब बहादुर हो गए। टेलीविजन ने मुझसे यह कविता पढ़वाई- आपातकाल में तो मैंने रेडियो और टेलीविजन पर जाना बंद कर दिया था।’ टेलीविजन प्रसारण के बाद ही इस कविता की लोकप्रियता की वजह से भवानीप्रसाद जी की इमरजेंसी की कविताएं संग्रह के रूप में ‘त्रिकाल संध्या’ नाम से आज हम सब जानते हैं। इस व्यंग्यात्मक कविता के विषय में खुद भवानी प्रसाद जी कहते हैं कि ‘इसमें जो चार कौए उर्फ चार हौए हैं, उनमें तब मैंने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, कांग्रेस अध्यक्ष और श्री संजय को गिना था।’

‘त्रिकाल संध्या’ में कुल 96 कविताएं हैं। जिसमें इमरजेंसी के दौरान लिखी गई यानी 26 जून, 1975 से लेकर 1 अगस्त, 1975 तक की रचनाओं का समावेश किया गया है। इसमें राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को दृष्टिगत रखते हुये विभिन्न विषयों का समावेश किया गया है। वैसे तो भवानी प्रसाद को गांधीवादी कवि कहा जाता है। वे न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि गांधीवादी चिंतन से पूरा सरोकार भी रखते थे। इसी के चलते उन्होंने ‘गांधी पंचशती’ की रचना भी की। लेकिन इमरजेंसी ने उन्हें इतना उद्द्वेलित किया, कि ‘त्रिकाल संध्या’ की रचनाओं का स्वरूप इन सबके विपरीत तीखा और मारक बन पड़ा हैं, जो समय -परिस्थिति के अनुकूल भी हैं। 

इमरजेंसी लोकतंत्र पर हमला थी, फासीवाद व अधिनायकवादी राजनीति का बीजारोपण था। ऐसे काल में जब चारों ओर भय का वातावरण हो, खौफ, आतंक और डर व्याप्त हो, ऐसे में एक हिंन्दी साहित्य का कवि अपनी कलम की पक्षधरता जिस ओर रखता है, उसे आज याद किया जाना चाहिए। इसलिए भवानी प्रसाद की कविताओं का यह संग्रह ‘त्रिकाल संध्या’ पर बात की जानी चाहिए, क्योंकि इसकी उम्र भी आपातकाल जितनी हो चुकी है, और आज भी उतना ही प्रासंगिक भी है। वह इसलिए भी, क्योंकि इसमें सच्चाई है।

देश में इमरजेंसी के दौरान कलमप्रेमियों को जिस तरह से डरा-धमका कर चुप करा दिया गया था, वजह वही इमरजेंसी का अनकहा सेंसरशिप। चोरी-छिपे अंडरग्राउंड पत्रों और परचों में कुछ बहुत छप रहा था। बड़े अखबारों और पत्रिकाओं की बहुत हिम्मत नहीं थी कि वे बगैर किसी सेंसर के कुछ भी छापकर संकट मोल ले सके। भावानी प्रसाद मिश्र लिखते हैं- ‘किस किस महारथी का नाम लूं। साधारण साधारण कविताएं नहीं छापी, यांे तो मांग-मांगकर छापते थे। तो कविताएं ‘भूमिगत’ पत्रकों में छपने लगीं-नाम देने पर मेरा आग्रह रहता था। और उजागर छपीं अहमदाबाद के गुजराती पत्र ‘भूमिपुत्र’ में। इस पत्र ने इन कविताओं और अपने संपादकीय आदि के कारण कष्ट भी भरपूर भोगा। हमारे हिंदी पत्र तब भी मलाई खाते रहे और अब भी खाने में होड़ लगा रखी है।’

इमरजेंसी में जयप्रकाश नारायण सरीखे नेताओं को बंदी बना दिया गया और उनकी खबर न मिल पाने से कवि सहित जनता काफी संशय में थी। उनकी किसी भी प्रकार की खबर न अखबारों से मिल पा रही है और न उनसे मिलकर जाने वालों से कुछ पता लग पा रहा है। जयप्रकाश नारायण को लेकर भवानी प्रसाद जी के मन में जैसे विचार आ-जा रहे थे, उन सबके बारे में ‘तुम भीतर बंद हो और हम बाहर’ कविता में काफी विस्तार से लिखा है। ‘त्रिकाल संध्या’ संग्रह में यह कविता भी लगभग 350 लाइनों में दर्ज है। यह कविता 25 जुलाई को लिखनी शुरू हुई और पूरी हुई 28 जुलाई, 1975 तक। अब तक इमरजेंसी का एक महीना पूरा हो चुका था। 

यहां इस कविता का जिक्र जरूरी है, क्योंकि इस लंबी एक कविता के माध्यम से आसानी से एक महीने में ही देश के इमरजेंसी के हालात को समझा जा सकता है। बहुत ही बारीकी से डायरीनुमा अंदाज में बातें दर्ज हुई हैं। दिन-ब-दिन क्या घट रहा था, कैसे हो रहा था, इसे एक मात्र कविता के माध्यम से जाना जा सकता है, कि अभिव्यक्ति का गला कैसे पकड़ा गया था। यहां कविता के कुछ अंश इस प्रकार हैं- तुम बंद हो हम बाहर हैं, तुम हमारी बात घुमा रहे हो मन में, और हम सोचते हैं, क्या जाने कैसे हो तुम भीतर.... अखबार तो तुम्हारा नाम तक, नहीं छापते, तुम्हारी खबरें कैसे छापेंगे, फिर आदमी एक जगह, चार से ज्यादा इकट्ठा नहीं किए जा सकते....भीष्मों ने चुप्पी साध ली है, द्रोणों ने सिर झुका लिया है, कृपाचार्य बीमार हैं, और भी दो चार हैं, जिन्होंने कोशिश की थी, कहने की, मगर वे जहां जिस आसन पर बैठे हैं, वहां बैठे रहने की जरूरत, उन्हें हर सत्य से बड़ी लग रही है, छिन जाएगी सच कहने से वह गादी....वैसे नयी बात नहीं थी, संघर्षों में पक्ष कई बार बदल लेते हैं लोग, मगर यहां उससे कुछ अधिक हुआ, एक शब्द का सहारा, तुम्हें बंद कर रखने का तर्क बन गया....आज नहीं तो कल सारी दुनिया के लोग, उन्हें उनके सही रूप में देखेंगे, वे उन्हें किन्हीं सिद्धांतों की नहीं, उनकी काली करतूतों की धूप में देखेंगे... और खबरें क्या कहंे, खबरें तो आती नहीं हैं अफवाहें आती हैं, .....देश अफवाहों के बीच जी रहा है....पुराने शाह थे सुल्तान थे, अब राष्ट्रपति हैं प्रधानमंत्री हैं, धर्म को रखकर ताक पर घंटा झालर बजा दो... तमगों की तरह लटकाए फिरती है वह, अनीति क्रूरता और अत्याचार को, विचार को थमा देती है नारे, फिरते हैं बेचारे विचार, सड़कों पर मारे मारे नारों को धरे ओंठ पर।