शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

लैंगिक असमानता में भारत की स्थिति

हिमाचल में पर्यटकों के बीच रोज़ी- रोटी की तलाश में 


 





किसी भी देश-समाज में लैंगिक समानता-असमानता एक प्रमुख मुद्दा आज तक बना हुआ है। और हो भी क्यों ना? स्त्री-पुरूष समानता की चाहे जितनी भी बातें-सातें की जाएं, पर जमीनी स्तर पर कोई सुधार नजर नहीं आ पा रहा है। पुरूष और महिलाओं में आर्थिक-सामाजिक स्तर पर गैर-बराबरी समाज और देश के विकास में बाधक होती है। इसे समय-समय पर विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से प्रकाश में लाया जाता है। तमाम प्रकार के संगठन इस दिशा में दिशा-निर्देशों का काम करते हैं, फिर भी गैर-बराबरी का गैप बढ़ जाता है, कम होता कम ही न
जर आता है। कोरोना संकट के बाद तो इसमें और भी इजाफा देखने को मिला है। कोरोना से जो भी आर्थिक संकट आया
, वह अंतिम तौर पर महिलाओं की सेहत और आर्थिक असमानता के तौर पर नजर आने लगा है।

 

हाल ही में वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम ने ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2022 जारी की है। इस इंडेक्स के अनुसार 146 देशों की सूची में भारत का स्थान 135वां है। यह लिस्ट चार-पांच मुद्दों पर स्कोरिंग के आधार पर हर साल जारी की जाती है। पिछले साल जारी इस लिस्ट में भारत का स्थान 156 देशों में से 140वां था। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि स्कोरिंग के मामले में भारत की रैंक में कुछ सुधार आया है। जेंडर गैप इंडेक्स 2022 में स्कोरिंग के लिए महिलाओं से संबंधित चार मुद्दों की पड़ताल की जाती है, जिससे यह विश्लेषण करने में आसानी होती है कि महिलाओं और बच्चियों की विकास में भागीदारी कैसी रही। यही बात उनके विकास के संबंध में कही जा सकती है कि महिलाएं विकास के साथ चल पर रही हैं कि नहीं। जांच करने के ये चार मुद्दे हैं-1. आर्थिक भागीदारी और अवसर, 2. शिक्षा प्राप्ति, 3. स्वास्थ्य और उत्तरजीविता, 4. राजनीतिक सशक्तिकरण।

आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा प्राप्ति, स्वास्थ्य और उत्तरजीविता, राजनीतिक सशक्तिकरण, इन चारों में भारत को क्रमशः 143वीं, 107वीं, 146वीं, 48वीं रैंक मिली है जिसे फाइनल मिलाकर ही देश को 135वीं रैंक प्राप्त हुई है। अगर इनमें से स्वास्थ्य और उत्तरजीविता की बात करें, तो देश को सबसे निचला स्थान मिला है। 146 देशों की सूची में 146वां स्थान। यह अत्यन्त सोचनीय और विचारणीय है। यदि इसी सूची में आर्थिक भागीदारी और शिक्षा प्राप्ति की बात करंे, तो भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। स्वास्थ और शिक्षा से ही किसी व्यक्ति का संपूर्ण विकास संभव है, यदि यह दोनों ही अच्छे नहीं है तो उसका भविष्य अंधकारमय हो जाता है, अगर कोई चमत्कार न हो तो?

अगर यहां महिलाओं की संदर्भ में यह बात कहीं जा रही है तो इसके खतरनाक मायने हो सकते हैं। एक महिला के स्वस्थ जीवन का प्रभाव भविष्य में पैदा होने वाली संतानों पर पड़ता है। अगर एक मां कमजोर और अस्वस्थ होगी तो निश्चित ही बच्चें भी कमजोर और अस्वस्थ होंगे। इस साल आई नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2019-21 की माने तो देश की 15 से 49 वर्ष की 57 फीसदी महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हैं यानी उनके शरीर में लाल रक्त कणिकाओं की कमी है, जो शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को बनाए रखती हैं। हीमोग्लोबिन के माध्यम से आक्सीजन हर अंग तक पहुंचता हैं। यह महिलाओं में आयरन की कमी को दर्शाता है। और यह आयरन अच्छे पोषणयुक्त आहार से मिलता है, जो एक भरे-पूरे घरों की महिलाओं को भी कामोवेश नहीं मिल पा रहा है। ऐसा क्योंकर है?

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 में यह एनीमिक महिलाओं का 57 फीसदी आंकड़ा गैर-गर्भवती महिलाओं का है यानी गर्भवती महिलाओं के मामलों में यह मामला अधिक गंभीर हो सकता था। पर गर्भावस्था में महिलाओं के प्रति परिवार अधिक संवेदनशील होने के कारण महिलाओं की देखभाल ठीक से हो जाती है, इसलिए वे एनीमिक होने से थोड़ी बहुत बची रहती हैं इसलिए उनका आंकड़ा इसी सर्वे में 52 फीसदी है, जिसे किसी भी मायने में अच्छा तो नहीं कहा जा सकता है। महिलाओं में एनीमिया शहरी इलाकों में 54 फीसदी और ग्रामीण इलाकों में 58.7 फीसदी है। महिलाओं में खून की कमी एक ऐसा पैमाना है तो हमें बताता है कि हमारी बच्चियां और महिलाएं किस हद तक कुपोषित हैं।

आखिर महिलाएं खुद के स्वास्थ पर ध्यान क्यों नहीं दे पाती हैं? इसका प्रमुख कारण तो यही है कि समाज में उनका स्थान दूसरे दर्जे पर आता है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की बारी किसी भी चीज में पुरूषों के बाद ही आती है। यह बात महिलाएं बखूबी समझती है, बल्कि उनकी सोच भी इसी बात से संचालित होती है कि वे खुद को प्राथमिकता क्या, महत्व तक देना भूल जाती हैं। आर्थिक रूप से संबल न हो पाने के कारण वे अपने स्वास्थ को कोई खास तबज्जो देने की स्थिति में नहीं रहती हैं। अगर आर्थिक संबल की बात करें तो आज देश में श्रमशक्ति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 29 फीसदी है, जोकि 2004 में 35 फीसदी था। यह बहुत ही गौर किया जाने वाला तथ्य है कि महिलाओं का घरेलू स्तर पर किया जाने वाला श्रम पूरी तरह से अवैतनिक है। खेती से जुड़ी महिलाएं खेत से जुड़े 40 फीसदी कामों को निपटाती हैं, पर अगर उनके हिस्से खेती की जमीन की बात करें, तो केवल 09 फीसदी खेती ही उनके नाम पर है। 60 फीसदी महिलाओं के नाम पर कोई भी मूल्यवान संपत्तियां नहीं हैं। कुल मिलाकर देश की जीडीपी में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 17 फीसदी है। क्या यह उचित है और यह कैसे है? क्या अर्थ तंत्र का संचालन सिर्फ पुरूषों के हाथों में है? आईएमएफ का अनुमान है कि अगर श्रमशक्ति के मामले में महिलाओं के साथ भेदभाव न किया जाए, तो देश की जीडीपी में 27 फीसदी का इजाफा किया जा सकता है। लेकिन सवाल वही है कि यह सब कैसे हो सकता है?

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2022 की माने तो विश्व में लैंगिक समानता की स्थिति अभी हमसे बहुत दूर है। यह ग्लोबल जेंडर खाई इतनी गहरी है कि इसे पाटने में 132 साल लग सकते हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया यानी यहां हमारा देश भी है, इस गैप को पाटने में लगभग दो शताब्दी यानी 197 साल का वक्त लग सकता है। और कोविड के बाद जो स्थितियां पैदा हुई हैं, उसका बुरा परिणाम महिला शक्ति पर पड़ा ही है...। इसलिए यह गैप पाटने का इंतजार लंबा भी हो सकता है...।

शुक्रवार, 3 जून 2022

36 साल तक पुरुष बनकर पाली अपनी बेटी

 

कितना सरल हो जाता है मर्द बनकर जीना। एस. पेटीअम्मल ने यही सोचकर अपने बाल काटकर लुंगी-शर्ट पहनकर पुरूष बन गईं। आखिर उन्हें एक मां होने के नाते अपनी बेटी का भविष्य सुरक्षित करना था। प्रश्न महज यह है कि एस. पेटीअम्मल को पुरूष पहचान क्यों धारण करनी पड़ी?

 

 

हेडिंग से इस बात का अंदाजा न लगाये कि यह किसी महिला के लिंग परिवर्तन का साइंटिफिक मामला है या यह भी न सोचे कि एक बेटी को बड़ा करने के लिए महिला होकर पिता की भूमिका अदा करने वाला कोई भावनात्मक मामला ही है। बल्कि यह मामला समाज में अपनी स्त्री होने की पहचान छुपा कर खुद के साथ-साथ अपनी बेटी की भविष्य सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने का मामला है। यह कहानी है 57 साल की एस. पेटीअम्मल की।

यह कहानी (या व्यथा कहें तो ज्यादा ठीक लगेगा।) आई है तमिलनाडु के कुट्टुनायकनपट्टी गांव से। जहां एस. पेटीअम्मल अपनी बेटी शनमुगसंदरी के साथ रहती हैं मुथु बनकर। मुथु यानी पुरूष बनकर। एस. पेटीअम्मल 36 वर्षों से अपनी स्त्री पहचान छुपाये हुए मुथु बनकर अपनी बेटी की परवरिश कर रही हैं। आज उनकी बेटी की शादी हो चुकी है और वह सुखपूर्वक अपना जीवन बिता रही हैं। उनके परिवार के नजदीकी लोगों के अतिरिक्त किसी को पता नहीं था कि मुथु ही एस. पेटीअम्मल हो सकती हैं। प्रश्न है कि आखिर एस. पेटीअम्मल को पुरूष वेश क्यों धारण करना पड़ा? ऐसी क्या आवश्यकता पड़ी कि घर के बाहर एस. पेटीअम्मल को मुथु बनकर निकलना पड़ा? कारण साफ है स्त्री बनकर जीवन जीने में उन्हें परेशानी आ रही थी। परेशानी क्यों आ रही थी? जवाब है कि उनके पति की मृत्यु हो चुकी थी और वे बिल्कुल अकेली थीं। उन्हें अपनी बेटी का पालन-पोषण करने के लिए घर के बाहर जाकर रूपये-पैसे कमाने थे जिससे उनकी बेटी का भविष्य बन सके।

अब रूपये-पैसे तो स्त्री होकर भी कमाये जा सकते हैं, इसके लिए क्योंकर पुरूष रूप धारण करना पड़ा? यही सवाल ही विडंबना है। जब एस. पेटीअम्मल के पति की मृत्यु हुई तो उनकी शादी को कुछ ही महीने हुए थे और वे गर्भवती थीं। बेटी के पैदा होने के बाद खुद और उसके भरण-पोषण के लिए जब वे घर से बाहर निकलीं, तो उन्होंने कमाई के लिए हर तरह के छोटे-मोटे काम करने शुरू किये। भवन निर्माण में ईंट-पत्थर ढोने से लेकर होटल-चाय की दुकानों में भी सब तरह का काम किया। एस. पेटीअम्मल कहती हैं- ‘मैं जहां भी जाती वहां पुरूषों का वर्चस्व था। कई जगह दुर्यव्यहार और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता। यहां तक महीनों यौन उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ा। दुखी होकर एक दिन मैं तिरूचेंदूर मुरूगन मंदिर गई और पुरूष बनने का फैसला कर लिया। मैंने अपने लंबे काले बाल काट डाले, अपनी धोती की जगह शर्ट और लुंगी पहनकर मुथु बन गई। उस गांव को छोड़कर अपनी नई पहचान को साथ लेकर दूसरी जगह बेटी के साथ आ गई और नया जीवन शुरू कर दिया। क्या इस नई पहचान के साथ एस. पेटीअम्मल का जीवन आसान हुआ?

पुरूष पहचान के साथ एस. पेटीअम्मल का जीवन थोड़ा आसान हो गया था, यह इसी बात से समझ में आता है कि उन्होंने 36 वर्ष तक इस दोहरे जीवन को जिया। न केवल जिया बल्कि शिद्दत के साथ जिया कि उनकी पूरी पर्सनाल्टी ही बदल गईं। वे कहती हंै कि इस पहचान ने मेरी बेटी के लिए एक सुरक्षित जीवन सुनिश्चित किया, इसलिए मैं मरते दम तक मुथु ही रहूंगी। उनका आधार कार्ड, राशन कार्ड और उनका वोटर आईडी पुरूष पहचान के साथ मुथु नाम पर ही है। अब जाकर उन्होंने इस रहस्य से पर्दा उठाया है, तो दुनिया उन्हें शाब्बासी दे रही है कि बेटी के पालन-पोषण के लिए एक मां क्या नहीं कर सकती है। पर दुनिया के मन में यह सवाल नहीं आ रहा है कि एक अकेली मां (सिंगल मदर) का जीवन यह समाज इतना कष्टकारी और दुरूह क्यों बना देता है कि एक तरफ खाई और दूसरी कुंआ ही नजर आए। एस. पेटीअम्मल के साहस और संघर्ष के लिए तालियां बजाने से पहले हमें एक नजर इस बात पर डालनी चाहिए कि समाज में अकेली स्त्री का जीवन इतनी मुश्किलों से भरा क्यों बना हुआ है? क्यों एक स्त्री मर्द बनकर ही इस मर्दवादी समाज में जीने के लिए मजबूर होती है?

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

सोशल मीडिया पर बुली होतीं महिलाएं


सोशल मीडिया पर महिलाएं अपनी उपस्थिति और अभिव्यक्ति से कई तरह के लोगों की आंखों की किरकिरी बन रही हैं। यही कारण है कि उन्हें ऑनलाइन धमकाना उतना ही न्यू नार्मल हो गया है जितना उनकी दमदार उपस्थिति उन्हें दर्ज कर रही है।

 

सोशल मीडिया में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार कोई नई बात नहीं रह गई है। इसी में एक कड़ी और जुड़ गई है- बुल्ली बाई। बुल्ली बाई से पहले भी सुल्ली बाई भी आया था। सांगठनिक रूप से महिलाओं को उनकी बात कहने के बदले बकायदा अभियान चला कर ट्रोल किया जाता है। फकत संदेश इतना है कि वे अपना मुंह और दिमाग बंद कर मूक दर्शक बनी रहें, इसी में उनकी भलाई है। ...बोला नहीं कि उन्हें बदनाम करके उनका शीलहरण करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगे। भले ही वह मौका मौखिक या वर्चुअल ही क्यों न हो। जब बुल्ली बाई ऐप के संचालकों पर कार्रवाई हो रही थी, तभी सोशल मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम पर एक खास चैनल को सोशल मीडिया पर सामने लाया गया, जहां महिलाओं की तस्वीर साझा करके उन्हें अपशब्द कहे जा रहे हैं। जिस पर तुरंत कार्रवाई करते हुए आईटी मंत्री अश्विन वैष्णव ने चैनल को तत्काल बंद करा दिया। यानी यह सिलसिला अनवरत जारी है...।

आश्चर्य की बात है कि जिन महिलाओं को सोशल मीडिया में टार्गेट किया जाता है या किया जा रहा है वे कोई साधारण महिलाएं नहीं हैं। इनमें से कुछ पत्रकार, कुछ सिनेमा में काम करने वाली, कुछ सोशल वर्कर, कुछ लेखिका, डाॅक्टर, इंजीनियर, छात्राएं यानी विभिन्न तरह के व्यवसायों से संबंध रखने वाली हैं। इन महिलाओं को छोड़ दिया जाए तो इस बात का आश्चर्य होता है कि कुछ साल पहले लोकप्रिय विदेश मंत्री स्व. सुषमा स्वराज और महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी को भी इस तरह के लोगों ने अपने उद्देश्य के लिए निशाना बनाया था। जिसकी चहुंओर घोर निंदा हुई थी। इन दोनों केंद्रीय मंत्रियों का अपराध बस इतना था कि उन्होंने जो कार्य किया था वह दुर्व्यवहार करने वाले इन सोशल मीडिया हैंडल्स को पसंद नहीं आया। जून, 2018 को केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज को दस दिनों तक लोगों के अपशब्दों का शिकार होना पड़ा, जब उन्होंने दो अलग मजहब वाले दंपति को पासपोर्ट दिलाने में मदद कर दी थी, जो विवादों में आ गया था। मामला इतना बढ़ गया था कि खुद केंद्रीय मंत्री के पति स्वराज कौशल को सोशल मीडिया पर उतरना पड़ा।

सवाल उठता है कि यदि केंद्रीय मंत्री के साथ सोशल मीडिया पर ऐसी घटना हो सकता है, तो फिर दूसरी महिलाओं की क्या बिसात। सोशल मीडिया पर इस तरह के दुर्व्यवहार का शिकार होने वाली सुषमा स्वराज ही पहली केंद्रीय मंत्री नहीं थीं, बल्कि इसी तरह केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को भी 2016 को हैशटैग आयएमट्रोल्डहेल्प सर्विस लांच करने के दौरान बहुत कुछ सुनना पड़ा। इस हैशटैग के जरिए मेनका गांधी ने महिलाओं से अपील की थी कि वे उन्हें ट्वीट और ई-मेल के जरिए इस माध्यम पर उनके साथ हुए दुर्व्यवहार और छेड़छाड़ के बारे में शिकायत करें। उनकी इसी पहल पर उन्हें जमकर ट्रोल किया गया। आखिरकार उन्हें इस हैशटैग के बारे में सफाई देनी पड़ी। उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर लिखने की आजादी पर रोकटोक नहीं होगी, मंत्रालय तभी कार्रवाई करेगा जब बदतमीजी, प्रताड़ना या घृणित काम की शिकायत आएगी। इसी तरह ब्रिटेन में भी महिला सांसदों को सोशल मीडिया पर सुषमा स्वराज और मेनका गांधी की तरह कई तरह के दुर्व्यवहार का सामना आये दिन करना होता है। वहां पर सबसे ज्यादा ट्रोलिंग का शिकार अश्वेत सांसद डाएन एबाॅट हुईं। इसका कारण है कि उनके विचार कुछ खास लोगों को ज्यादा पसंद नहीं आते हैं। ऐसा नहीं है कि सत्तासीन महिलाओं को देश में ही ऐसे अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा है, अमेरिका जैसे खुले विचारों वाले देश में आॅनलाइन महिलाओं को गाली-गलौच, बदसलूकी का व्यवहार झेलना पड़ता है। वहां की रिसर्च बताती है कि 40 फीसदी नागरिक ऐसी वाहियात ट्रोलिंग का शिकार हर साल बनते हैं।

ये दोनों मामले बताते हैं कि सोशल मीडिया की ताकत का किस तरह महिलाओं के मानसिक शोषण का जरिया बनाया जा रहा है। बुल्ली बाई ऐप उसी की एक और कड़ी मात्र है। जहां मौखिक ही सही महिलाओं की नीलामी की जा रही थी। अशोभनीय टिप्पणियों के जरिए यौन हिंसा की जा रही थी। इस समय देश-विदेश में सोशल मीडिया पर महिलाओं की संख्या काफी बढ गई है। वे खुलकर हर मामले में अपने विचार शेयर करती हैं। यह बात कुछ स्त्री विरोधी मानसिकता या वर्ग के लोगों को बर्दास्त नहीं होती है और सांगठित रूप से ऐसी महिलाओं को सबक सिखाने के लिए उन पर टूट पड़ते हैं। इसके लिए किसी भी हद से गुजर जाते हैं। अक्टूबर, 2020 में एक वैश्विक सर्वे स्टेट आॅफ द वल्र्डस गल्र्स रिपोर्टमें आया कि किस तरह बड़े विकसित देशों में महिलाएं बड़े पैमाने में आॅनलाइन (फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्वीटर, वाट्सअप, टिकटाॅक) हिंसा का शिकार बनती हैं। बाइस देशों (भारत, ब्राजील, नाइजीरिया, स्पेन, आस्ट्रलिया, जापान, थाइलैंण्ड और यूएस) में हुए इस सर्वे में 14,000 महिलाओं जिनकी उम्र 15-25 थी शामिल की गईं थीं। रिपोर्ट में पाया गया कि यूरोप में 63 फीसदी, लैटिन अमेरिका में 60 फीसदी, एशिया पैसिफिक रीजन में 58 फीसदी, अफ्रीका में 54 फीसदी और दक्षिण अमेरिका में 52 फीसदी महिलाओं ने सोशल मीडिया पर हैरेसमेंट की रिपोर्ट की। उन पर रेसिस्ट कमेंट किए गए, उनका आॅनलाइन पीछा किया गया, उन्हें यौन हिंसा की धमकी दी गई आदि इत्यादि। इस प्लेटफार्म पर उन्हें 47 फीसदी तक शारीरिक और यौन हिंसा की धमकी मिली जबकि 59 फीसदी महिलाओं को गाली-गलौच और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया।

इस सर्वे में सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि इन महिलाएं में ऐसे महिलाओं की संख्या अच्छी खासी थी जो हैरेस करने वाले पर्सन को जानती थीं यानी रियल जिंदगी में वह सख्स उनसे ताल्लुक रखता था। 11 फीसदी महिलाओं ने स्वीकार किया कि उन्हें आॅनलाइन हैरेस करने वाला पूर्व या वर्तमान का उनका पार्टनर भी था, जबकि 21 फीसदी ने स्वीकार किया ऐसे लोग उनके दोस्त भी थे, 23 फीसदी ने स्वीकार किया उन्हें वे स्कूल के दिनों से जानती थीं। अब इसे क्या कहा जाए। इस सबके परिणाम स्वरूप क्या होगा, यह भी इसी सर्वे रिपोर्ट में सामने आया। 42 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें मानसिक और इमोशनल तनाव हुआ और लगभग इतनी ही महिलाओं ने कहा कि उनका आत्मसम्मान और आत्मविश्वास इस तरह के हैरेसमेंट से खो गया था। इस कारण से लगभग 19 फीसदी महिलाओं ने सोशल मीडिया को छोड़ दिया या आना-जाना कम कर दिया। और 12 फीसदी महिलाओं ने माना कि उन्होंने यहां अपनी अभिव्यक्ति के तरीके को बदल दिया। यानी जरूरी मामलों पर उन्होंने चुप्पी अख्तियार कर ली। आखिर यही तो चाहते हैं ऐसे लोग? यही पर आकर उनका उद्देश्य पूरा हो जाता है।

आखिर इसका इलाज क्या है? यहां सत्ताधारी से लेकर साधारण काॅलेज गोइंग लड़की तक लाचार हो जाती है। पहली समस्या यह है कि इस तरह की हरकत करने वाले लोग गुमनाम या फर्जी नामों से अपना एकांउट आॅपरेट करते हैं, यदि ऐसे अकाउंट्स पर लगाम लगाई जाए, तो सोशल मीडिया को काफी साफ-सुथरा किया जा सकता है। केंद्रीय मंत्री के मामले में जब एक्शन लिया गया, तब तक ऐसे फर्जी अकाउंट्स डिलीट करके जा चुके थे। इनका कोई पुख्ता सबूत नहीं होने के कारण ही ऐसे लोग इतना साहस करते हैं। अकाउंट्स यदि वेरिफाइड होने लगे तो आधी समस्या खुद ही समाप्त हो जाएगी। 2013 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केएन गोविंदाचार्य की याचिका पर आदेश दिया था कि सोशल मीडिया अकाउंट का बेरीफिकेशन के साथ देश में शिकायत अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए, इससे इस समस्या पर लगाम लगाई जा सकती है। इसी तरह मद्रास हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा था कि री-ट्वीट के लिए भी जवावदेही तय की जानी चाहिए। एक्सपर्ट कहते हैं कि वास्तव में अभी तक देश में इस तरह की ट्रोलिंग से निपटने के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। फिर यदि सरकार चाहे तो मौजूदा आईटी एक्ट के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को बाध्य कर सकती है कि वे ट्रोल्स पर कार्रवाई करें। कहीं न कहीं मसला हीला-हवाली और उपेक्षा का बनता है। क्या हम बहु-बेटियों की सोशल मीडिया पर उपस्थिति और अभिव्यक्त को जरूरी नहीं समझते? इच्छा शक्ति से बहुत कुछ हो सकता है। 


रविवार, 8 अगस्त 2021

महिलाओं के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए पुलिस?

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने पिछले दिनों आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से महिला पीड़ितों के प्रति एक अलग रूख रखा जाता है। इसलिए महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से संबंधित सभी मामलों में पुलिस को लैंगिक दृष्टिकोण से संवेदनशील होकर कार्य करने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों से अधिक कारगर ढंग से निपटने के लिए पुलिस अधिकारियों में आवश्यक कौशल और रवैया विकसित करने के लिए यह जरूरी है कि सभी राज्यों के पुलिस संगठन सभी स्तरों पर पुलिसकर्मियों को संवेदनशील बनाने के लिए उपयुक्त पहल करें।

दरअसल यह कार्यक्रम और उपर्युक्त वक्तव्य राष्ट्रीय महिला आयोग और पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो की एक संयुक्त और बहुत ही आवश्यक पहल को लेकर था, जिसमें आयोग और ब्यूरो दोनों की सद्इच्छा है कि देश की पुलिस को महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा और अपराधों को अधिक संवेदनशीलता और बगैर किसी पूर्वाग्रह-पक्षपात के अपने कर्तव्यों को प्रभावी ढंग निभाने के लिए प्रशिक्षित करना है। इसी उद्देश्य के साथ राष्ट्रीय महिला आयोग ने लैंगिक समानता से जुड़े मुद्दों पर पुलिस अधिकारियों को संवेदनशील बनाने (विशेष रूप से लैंगिक आधार पर होने वाले अपराधों के मामलों में) के लिए देशभर में एक प्रशिक्षण शुरू करने का निर्णय लिया है।

हमारे देश की पुलिस का चेहरा कम संवेदनशील और अधिक असंवेदनशीलता का है। उसका पूरा ढांचा अंगेजों के जमाने से जैसा रचा और ढाला गया वैसा ही चला आ रहा है। सुधार की कितनी जरूरत है इसे समय-समय पर कई समितियों और आयोगों की सिफारिशें (धर्मवीर आयोग, पद्नाभैया समिति, सोली सोराबजी समिति आदि) के माध्यम से रखा गया है। तो यह सुधार क्यों नहीं हुए? इसके कई राजनीतिक पेंच और मजबूरियां हैं। खैर, बात यह है कि जो हो सकता है, वह किया जा रहा है। महिला आयोग ने यह बहुत ही महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यह सर्वविदित तथ्य है कि महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा और अपराधिक घटनाएं (बलात्कार, छेड़खानी, मारपीट, घरेलू हिंसा, दहेज हत्या, अपहरण, वेश्यावृत्ति के लिए बेचना, मानव तस्करी आदि) दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की क्राइम इन इंडिया-2019 की रिपोर्ट की माने तो लगभग 4.05 लाख (4,05,861) आपराधिक केस दर्ज किये गये थे। यह साल 2018 के मुकाबले 7.3 फीसदी ज्यादा हैं। प्रति एक लाख महिलाओं पर होने वाले अपराधों की दर में भी बढोत्तरी हुई, जहां साल 2018 में 58.8 प्रतिशत थी, वहीं 2019 में बढ़कर 62.4 प्रतिशत पर पहुंच गई है। महिलाओं के प्रति होने वाले इन सभी अपराधों में से 31 प्रतिशत भाग पति या उसके संबंधियों द्वारा की गई क्रूरताओंका है। कुल रजिस्टर केस में से 08 प्रतिशत बलात्कार के केस हैं। गणना के हिसाब से औसतन 87 बलात्कार के केस 2019 में रोज दर्ज कराएं गए। यह कहानी तो दर्ज किए गए महिलाओं के प्रति किए गए अपराधों की है। क्या हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि इन आंकड़ों से महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की सही तस्वीर पेश होती है। वजह है, हमारा समाज, हमारी पुलिस और कानून व्यवस्था। जिसका भी वास्ता इन सब चीजों से पड़ता है, वह अच्छी तरह से समझ जाता है कि यह व्यवस्था किसके लिए है और काम करती है। ऐसे में महिलाओं और बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों की विसात ही क्या।

इसकी सही तस्वीर और तस्तीक भी हम कर लेते हैं। जो पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो हर साल दर्ज अपराधों को एकसूत्र करता है, वह इन सभी दर्ज केसों पर क्या एक्शन लेता है, यह ज्यादा जरूरी है क्योंकि पुलिसिया कार्यवाही पर ही हमारी अदालतें काम करती हैं। हमारे देश में आॅल इंडिया चार्जशीट रेट (आईपीसी के अंतगर्त) 2019 में 67.2 प्रतिशत था, तो 2018 में 68.1 प्रतिशत था। जबकि इसी दौरान अपराध निस्तारण दर थोड़ा बढ़कर 50 से 50.4 तक रही। यह जानना जरूरी है कि आरोप पत्र की दर ही वह संख्या होती है, जो यह दर्शाती है कि पुलिस ने कितने दर्ज अपराधों का निस्तारण किया। किसी मामले में दोष सिद्धि इसी चार्जशीट पर निर्भर करती है। दोषसिद्धि दर कोर्ट द्वारा अपराध निस्तारण के आधार पर बनती है। इसी रोशनी पर जानते हैं कि महिलाओं के प्रति होने वाले दर्ज अपराधों के साथ क्या होता है?

2019 में बलात्कार के केस में चार्जशीट दर 81.5 प्रतिशत है, जबकि इसकी दोषसिद्धि दर 27.8 रही। केरल में जहां चार्जशीट दर राज्यों में सबसे अधिक 93.2 थी, वहीं दोषसिद्धि दर 13.4 प्रतिशत थी, जो कि राष्ट्रीय औसत 23.7 से भी काफी कम है। ऐसे ही 2019 में देश भर में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के लिए लगभग 44.75 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया, इनमें से 5.05 लाख चार्जशीट दाखिल की गईं, इसमें से 46,164 दोषी ठहराया गया, 13,896 आरोपमुक्त हुए और 1.61 लाख बरी हुए। अब इन आंकड़ों को देखने से ही पता चलता है कि चार्जशीट से दोषी ठहराये जाने के बीच कितना अंतर है? यह अंतर क्यों और कैसे है? खैर, इसके कई कारण हो सकते हैं और है भी। लेकिन प्राथमिक तौर पर पहली जिम्मेदारी पुलिस की ही होती है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है क्योंकि अपराध होने पर सबसे पहले पुलिस ही जांच करती है, इसलिए छोटी से छोटी बात मायने रखती है। क्या दोषसिद्धि तक पहुंचने में इन्हीं छोटी सी छोटी चीजों का हाथ तो नहीं होता है?

पुलिस सुधार के एजेंडे में हमेशा जांच-पूछताछ के तौर-तरीके, जांच विभाग को विधि व्यवस्था विभाग से अलग करने, पुलिस विभाग में महिलाओं की 33 फीसदी भागीदारी के अलावा पुलिस की निरंकुशता की जांच के लिए विभाग बनाने पर जोर दिया गया है। यह सब इसलिए कि पुलिस का चेहरा मानवीय और लोकतांत्रिक बने, जिससे वह अधिक संवेदनशीलता से काम कर सके। एक अच्छी पुलिस आम नागरिकों को न केवल सुरक्षा उपलब्ध कराती है, बल्कि उसके साथ हुई हिंसा या अपराध में न्याय दिलाने में सहायक भी होती है। इसलिए न्याय दिलाने की व्यवस्था में पुलिस जैसे महत्वपूर्ण और सबसे जरूरी अंग पर काफी विश्लेषण किया गया है। इंडियन जुडिशल रिपोर्ट-2019 में पुलिस की संख्या बल, पुलिस में विभिन्न धर्मों, जातियों, महिलाओं का प्रतिनिधित्व पर एक विस्तृत अध्ययन किया गया है। इंडियन जुडिशल रिपोर्ट-2019 की माने तो महिलाओं और बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों में बढोत्तरी और न्याय न मिल पाने की एक बहुत बड़ी वजह महिलाओं का पुलिस संख्या बल में न केवल कम होना है, बल्कि ऑफीसर रैंक में भी उचित प्रतिनिधित्व में न होना भी है। यानी इस रिपोर्ट के अनुसार हम पुलिस में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देकर भी उसे मानवीय चेहरा दे सकते हैं, तो देर किस बात की है? हमें यह भी जानना होगा।

शनिवार, 24 जुलाई 2021

कितना होगा महिला सशक्तिकरण


हालिया मंत्रिपरिषद विस्तार में सात महिलाओं को स्थान मिलने की खबर काफी चर्चा बटोर रही हैं। इन सात महिलाओं के शामिल होने के बाद अब
78 सदस्यीय मंत्रिपरिषद में महिलाओं की संख्या कुल जमा 11 हो गई है। इस तरह अब तक की गठित सरकारों में सर्वाधिक महिलाओं को इस मंत्रिपरिषद में प्रतिनिधित्व मिल गया है। मई, 2019 में जब एनडीए सरकार का गठन हुआ था, तब छह महिला नेत्रियों को मंत्रिपरिषद में जगह मिली थी। नवनियुक्त महिला मंत्रियों में दर्शना जरदोश, प्रतिमा भौमिक, शोभा कारंदलजे, भारती पवार, मीनाक्षी लेखी, अनुप्रिया पटेल और अन्नपूर्णा देवी हैं। इनमें अनुप्रिया पटेल ही ऐसी सांसद हैं, जो दूसरी बार मंत्री बनी है, जबकि शेष सभी पहली बार मंत्रिपरिषद में स्थान पाई हैं। इन सात महिला नेत्रियों के अलावा इस समय केंद्रीय मंत्रिपरिषद में निर्मला सीतारमण, स्मृति ईरानी और साध्वी निरंजन ज्योति और रेणुका सिंह सरूता पहले से ही मौजूद हैं। कुल मिलाकर मंत्रिपरिषद में महिला प्रतिनिधित्व और इस मंत्रिपरिषद विस्तार को लेकर फिर बहस छिड़ गई कि यह विस्तार माकूल है। क्या इतना प्रतिनिधित्व पर्याप्त है? या मात्र महिला वोटरों को आकर्षित करने के लिए ही महिला विस्तार दे किया गया है?

 

17वीं लोकसभा का चुनाव परिणाम इस मायनों में अनूठे थे कि इन चुनावों में महिला उम्मीदवारों ने भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिखाया था। इस बार 16वीं लोकसभा के मुकाबले इनकी संख्या बढ़कर 78 हो गई थी। सर्वाधिक महिला सांसद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से चुनकर आई थीं। इनकी संख्या उस समय 41 थी, जो इनके चुने गए कुल सांसदों यानी 303 में से 14 फीसदी को कवर करता था। 2019 की लोकसभा चुनाव के लिए 2014 के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी ने ज्यादा महिलाओं को टिकट बांटे थे, जो कुल बांटे गए टिकटों में से मात्र 12 फीसदी ही थे। फिर भी कमाल की बात यह रही कि दिए गए इन 55 टिकटों पर लड़ी महिलाओं का प्रदर्शन 74 फीसदी रहा यानी कुल 41 महिला उम्मीदवारों ने अपनी जीत दर्ज की। इसके बावजूद मंत्रिपरिषद में 06 महिला नेत्रियों को जगह दी गई। इनमें से तीन निर्मला सीतारमण, स्मृति ईरानी और हरसिमरत कौर बादल को कैबिनेट में जगह दी गई थी।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व वाली सरकार में महिला मंत्रियों की संख्या 11 थी, हालांकि यूपीए के दोनों कार्यकालों में अधिकतम 10 महिला सांसदों को ही मंत्री बनाया गया था। जबकि 2014 के कार्यकाल में भी 06 महिलाएं मंत्री पद तक पहुंची थी और इस 2019 के कार्यकाल में भी सिर्फ छह महिलाओं को मंत्री बनाया गया जबकि सर्वाधिक 78 महिलाएं चुनकर संसद तक पहुंची थीं। इस विरोधाभास का क्या कारण हो सकता है। अच्छे प्रदर्शन के बाद भी उचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने पर सम्यक विकास की कल्पना कैसे की जा सकती है। इस मंत्रिपरिषद विस्तार के बाद केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने खुशी जाहिर करते हुए टृविटर के माध्यम से कहा कि भारत के इतिहास में सबसे कम उम्र की महिला मंत्रियों का महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व है... एक नए आत्मनिर्भर भारत की आकांक्षाएं।लेकिन सोचने वाली बात की एक आत्मनिर्भर भारत के लिए सत्ता में महिला भागीदारी की कितनी जरूरत है, इसे समझने में अभी कितना वक्त लगेगा?

प्हली बात तो यह है कि संसद में महिला प्रतिनिधित्व काफी कम है। इसीलिए महिला आरक्षण की बात की जाती है, जो सभी दलों की आपसी मौन सहमति से किसी ठंडे बस्ते में अब तक पड़ा हुआ है। इसके बरक्स राजनीतिक दलों को भी महिलाओं के वोट में अधिक दिलचस्पी रहती है पर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व देने में कोई रुचि नहीं होती। इसलिए संसद तक की महिलाओं की दौड़ बहुत ही चिंताजनक है। 2019 तक वैश्विक स्तर पर महिला सांसदों का औसत 24.3 फीसदी है। हमारे पड़ोसी बांग्लादेश संसद में महिला प्रतिनिधित्व 21 फीसदी है। यहां तक रवाण्डा जैसे देश में यह प्रतिनिधित्व आधे से अधिक यानी 61 फीसदी है। विकसित देश यूके और अमेरिका में महिला सांसद क्रमशः 32 और 24 फीसदी है। अगर इन सांसदों को अहम जिम्मेदारी यानी मंत्रिमंडल और मंत्रिपरिषद में स्थान देने की बात की जाए तो भी हमारे मुकाबले कई देश आगे हैं। जून, 2018 को जब स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज अपने मंत्रिमंडल के 17 में से 11 अहम पदों के लिए महिलाओं को चुना, तो यह नया रिकाॅर्ड बन गया, जिसकी उन दिनों काफी चर्चा हुई थी। यह महिला प्रतिनिधित्व 61 फीसदी होता है।

2017 संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया भर की सरकारों पर एक अध्ययन किया था। इस अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया कि उस दौरान किसी भी देश के मंत्रिमंडल में 52.9 फीसदी से ज्यादा महिलाएं नहीं थीं। सिर्फ छह देश ऐसे थे जहां मंत्रिमंडल में पचास फीसदी या उससे अधिक महिलाएं स्थान पा रही थीं। गौर करने वाली बात यह कि तेरह ऐसे देश भी थे जिनके मंत्रिमंडल में कोई महिला ही नहीं थी। महिलाएं अपनी योग्यता से संसद तक पहुंचने में अपनी जगह बना भी लेती है, तो उन्हें मंत्रिमंडल और मंत्रिपरिषद में स्थान मिलना इतना सहज नहीं होता है। हां, महिला वोटरों को आकर्षित करने के लिए महिला प्रतिनिधित्व का जो दबाव पड़ता है, उससे कहीं अच्छा होता कि महिला शक्ति का उपयोग बेहतर तरीके से आगे बढ़कर किया जाए। महिलाओं की योग्यता में कोई शक नहीं है, जहां इस मंत्रिपरिषद बदलाव में 12 मंत्रियों से इस्तीफे लिए गए उसमें से केवल एक महिला मंत्री थी।  

रविवार, 11 जुलाई 2021

महिला वैज्ञानिक की काम पर फिर वापसी

 

पिछले दिनों एक ऐसी बुकलेट से रूबरू हुई जिसमें सौ महिलाओं की कहानियां दी गई हैं। ये इन महिलाओं की कहानियों से अधिक इस समाज की समस्या को इंगित करती हुई संबोधित है। ये सभी महिलाएं विज्ञान-टेक्नाॅलजी में रची-बसी उच्च शिक्षित महिलाएं हैं जिन्हें शादी और परिवार की जिम्मेदारियों के चलते अपना फलता-फूलता कैरियर
पर विराम लगाना पड़ा। कुछ सालों बाद जब उन्हें लगा कि बाहर निकलकर अपनी योग्यता के अनुसार कुछ काम मिल जाए, तो उन्हें निराशा ही हाथ लगी। ऐसे में किरण ने इनकी जिस तरह से मदद की उसकी सराहना की जानी लाजिमी है। इस तरह की पहल से और दूसरी स्ट्रीम में काम कर रही महिलाओं के हौसले बुलंद होने की उम्मीद भी बन गई है। किरण जैसी दूसरी तरह की पहल होनी चाहिए जिससे महिलाएं एक कैरियर विराम के बाद अपना कैरियर फिर से शुरू कर सके और देश के ऐसे वेल एजुकेटेड रिसोर्स बरबाद होने से बच जाए। शायद सरकार इस ओर सोच रही है पर उसे जल्द-जल्द से अपना दायरा बड़ा भी करना होगा।

इस बुकलेट में दी गई कहानियों को हंड्रेड सक्सेज स्टोरी आॅफ वूमेन साइंसटिस्ट स्कीम शीर्षक से विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग यानी डीएसटी ने एकत्र किया है। डीएसटी का नॉलेज इंवॉल्वमेंट इन रिसर्च एडवांसमेंट थ्रू नर्चरिंग (किरन) प्रभाग है जिसने बीच में अपना करियर छोड़ देने वाली महिला वैज्ञानिकों का सहयोग किया। महिला वैज्ञानिक योजना के तहत इन महिलाओं को विज्ञान की तरफ लौटने में सहायता की। पुस्तिका में 100 महिला वैज्ञानिक योजना प्रशिक्षुओं के बारे में बताया गया है। इसमें इन महिलाओं की जिंदगी की दास्तान है कि कैसे उन्होंने अपने जीवन की बाधाओं को पार कर कामयाबी हासिल की। महिला वैज्ञानिकों का सफर दिखाने के अलावा, किताब में उनकी शैक्षिक योग्यता, विशेषज्ञता, वर्तमान रोजगार की स्थिति, अनुभव और बौद्धिक सम्पदा अधिकार में तकनीकी योग्यता के बारे में बताया गया है, जिसे इन महिला वैज्ञानिकों ने प्रशिक्षण पूरा करने के बाद हासिल किया है।

किताब में दी गई महिला वैज्ञानिकों के बारे में जानना अधिक रोचक है। किस तरह यह प्रशिक्षण महिलाओं के जीवन में परिवर्तन ला रहा है। केमिकल साइंस से पीएचडी डाॅ. अंजली जेटली ने इस प्रशिक्षण को प्राप्त कर खुद की अपनी फर्म खोल ली। अंजली ने अपनी परिवारिक  जिम्मेदारियों के चलते कैरियर में विराम ले लिया था। उन्होंने अपनी मैचमेट के साथ ही प्रशिक्षण पूरा होने के बाद फर्म खोल ली। उन्हें अपना खुद का व्यवसाय करने का जो उत्साह था वह उन्हें इस मुकाम तक लेकर आया। इसी तरह की कहानी डॉअंजली सिंह की है। उन्होंने केमेस्ट्री से पीएचडी करने के बाद अपना कैरियर बनाने की सोची, लेकिन एक बच्ची की मां बन जाने के बाद वे इस ओर अधिक नहीं सोच सकीं। डब्ल्यूओएस की ट्रेनिंग के बाद वे आज गुरूग्राम में एक प्रसिद्ध लाॅ फर्म में कंस्ल्टेंट के तौर काम कर रही हैं। लाइफ  साइंस से एमएससी अर्चना डोभाल ने भी इस ट्रेंनिंग को पूरा करने के बाद एक इंट्रेप्रिनेयोर बनकर उभरी हैं। उन्होंने अपनी एक आइपी फर्म खोल ली है। अपनी फर्म के जरिये वे सलाह देने के साथ-साथ विद्यार्थियों के लिए वर्कशाप और ट्रेनिंग भी देती हैं।

इस बुकलेट में अर्चना राघवेंद्र की कहानी काफी साहसिक और मार्मिक है। अर्चना इलेक्ट्रानिक्स से एमटेक हैं। शादी के बाद ने अपना अध्यापन का कैरियर छोड़कर पति के साथ कनाडा में बस गईं। सब कुछ अच्छा बीतने के साथ जब दुखों का पहाड़ उन पर टूटा तो वे वापस अपने देश लौटीं। अपने दो छोटे बच्चों, पति और सास-ससुर की देखभाल के लिए उन्हें फिर से आर्थिक रूप से मजबूत होना था। तब इस प्रशिक्षण ने उनकी मदद की। इस प्रशिक्षण के दौरान उन्हें जो स्टाइपेन मिला उन्हें उससे भी मदद मिली। ऐसी बहुत सी महिलाओं के बारे में इस किताब में दिया गया है।

कामोवेश देश में हर दूसरे घर की महिलाओं की कहानी ऐसी मिल जायेगी। कैरियर में ब्रेक किसी के लिए भी बीच रास्ते से पीछे लौटना होता है। चाहे यह परिवार की जिम्मेदारियों के चलते हो या किसी दुर्घटनावश। इसका सबसे ज्यादा भुक्तभोगी महिलाएं ही बनती हैं। सीएमआइइ की माने तो यह समस्या पूरे देश में है। वास्तव में यह समस्या मिड ऐज कैरियर में आती है। परिवारिक दबावों और सैलरी में अंतर के कारण 2.4 मिलियन महिलाओं ने 2017 में अपनी नौकरी छोड़ दी थी। कई भारतीय और अंतरराष्ट्रीय शोध और रिसर्च इस बात पर जोर देते है कि जीडीपी में बढोतरी के लिए महिलाओं को अधिक से अधिक रोजगार देना होगा। वल्र्ड बैंक ने एनएसएसओ के सहयोग से देश में एक सर्वे के दौरान पाया कि 2004-2012 के दौरान 20 मिलियन महिलाओ ने अपनी नौकरी छोड़ दी जिनमें से 65 से 75 फीसदी महिलाएं वापस अपनी नौकरी पर कभी नहीं लौटी। आखिर क्यों, क्योंकि उन्हें वह माहौल नहीं मिला जिनकी वे हकदार थीं। आखिरकार विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के किरण प्रभाग ने यह कदम उठाया है, तो यह महिलाओं के लिए आशा की किरण बन गई है।

शनिवार, 5 जून 2021

क्या महिलाएं अब बनेगीं कर्नल, ब्रिगेडियर और जनरल

 

हमारी सामाजिक व्यवस्था पुरुषों ने पुरुषों के लिए बनाई है, यहां समानता की बात झूठी है। सेना ने मेडिकल के लिए जो नियम बनाये हैं, वो महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करते हैं। महिलाओं को बराबर अवसर दिए बिना रास्ता नहीं निकल सकता। 25 मार्च को यह कड़ी टिप्पणी सुप्रीम अदालत की तब आई, जब गत वर्ष सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के लिए कहने के बावजूद भेदभावपूर्ण मापदंड के तहत कुछ महिला अधिकारियों को अयोग्य ठहरा दिया गया। 16 साल की लड़ाई लड़ने के बाद मिले अधिकारों को यूं भेदभावपूर्ण मापदंड की भेट न चढ़ने देने के लिए महिलाएं फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं और सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के साथ अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव करने के लिए सेना की आलोचना की। जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस एम.आर. शाह की पीठ ने कहा कि हमें सिक्के के दूसरे पहलू को भी देखना चाहिए। हम मानते हैं कि फौज में महत्वपूर्ण ओहदा हासिल करने के लिए शारीरिक रूप से दक्ष होना जरूरी है। ...सेना की नौकरी में तमाम तरह के टेस्ट होते हैं, तमाम तरह के उतार-चढ़ाव आते हैं और जब समाज महिलाओं पर बच्चे की देखभाल और घरेलू कामों की जिम्मेदारियां डालता है, तो यह और चुनौतीपूर्ण हो जाता है। फलतः सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए दो महीने के भीतर स्थायी कमीशन देने का निर्देश दिया है।

क्या है शाॅर्ट सर्विस कमीशन

सेना में महिलाओं की सेवा देने का इतिहास आजादी से पहले का है। 1888 में जब अंग्रेज शासकों ने इंडियन मिलिट्री नर्सिंग सर्विस की शुरूआत की तब इसमें महिलाओं को रखा गया। इस सेवा में महिलाओं ने खुद को साबित भी किया। जंग के मैदान में इन महिला नर्सों को भी सेवा के लिए भेजा जाता था, जो किसी जंग से कम नहीं था। आजादी के बाद सेना में महिलाओं केा कुछ यूनिट्स में प्रवेश दिया गया था, पर शाॅर्ट सर्विस कमीशन के तहत। शाॅर्ट सर्विस कमीशन के तहत महिलाएं केवल 10 से 14 साल तक सेना में काम कर सकती थीं, इसके बाद वे सेवानिवृत्त हो जाती थीं। हां, एक नवंबर, 1958 को आर्मी मेडिकल काॅप्र्स में महिलाओं को स्थाई कमीशन दिया गया, जो पहली बार था। इसके बाद लीगल और एजूकेशन काॅप्र्स ने भी महिलाओं को स्थाई कमीशन दिया। कुल मिलाकर उन्हें गैर फौजी और गैर लड़ाकू किस्म के काम दिए गए वे भी शाॅर्ट सर्विस कमीशन के तहत। सेना में स्थाई कमीशन न मिलने के कारण महिलाएं जब सर्विस छोड़ती तो उन्हें पेंशन, ग्रेच्युटी, मेडिकल इंश्योरेंस और रिटायरमेंट के बाद की सुविधाएं नहीं मिलती, फलतः उन्हें भविष्य के लिए फिर से संघर्ष करना पड़ता। वहीं पुरूषों को पांच या दस साल की नौकरी के बाद स्थायी कमीशन दे दिया जाता था। इस तरह यह शाॅर्ट सर्विस कमीशन महिलाओं को सेना में जाने और एक कॅरियर के तौर पर इसे अपनाने के मामले में हतोत्साहित कर रहा था। इसलिए इसके तहत काम कर रही महिलाओं स्थायी कमीशन दिए जाने की मांग शुरू कर दी।

 

क्या था फैसला

स्थायी कमीशन को लेकर पहली याचिका साल 2003 में डाली गई थी। इसके बाद इंडियन नेवी की ग्यारह महिला अधिकारियों ने स्थायी कमीशन के लिए साल 2008 में फिर से दिल्ली हाई कोर्ट में केस दायर किया। दिल्ली हाई कोर्ट ने महिला अधिकारियों के हक में 2010 में फैसला सुनाया। 21 मार्च, 2010 को कोर्ट ने कहा कि आजादी के 63 साल बाद भी महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार हो रहा है, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। साथ ही रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना को यह आदेश दिया कि महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन दिया जाए। लेकिन सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई। हालांकि इस फैसले को इंडियन नेवी और एयर फोर्स ने मान लिया था पर आर्मी इस बात को मानने को तैयार नहीं हुई। तब आता है फरवरी 2020 का वह दिन जब सुप्रीम कोर्ट ने भी महिला अधिकारियों के पक्ष में ही फैसला सुना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने शार्ट सर्विस कमीशन की सभी महिलाओं को स्थायी कमीशन के लिए योग्य बताया, जो आमी की प्रत्येक सेवा पर लागू होगा। जो महिलाएं सेना में 14 वर्ष का समय पूरा कर चुकी हैं, व ेअब 20 साल तक सेना में रह सकती हैं और तमाम सुविधाओं की हकदार भी होंगी। कुल मिलाकर सेना में काम कर रहीं सभी महिलाएं पुरूषों की तरह पेंशन और दूसरी सेवाओं की हकदार होगीं। साथ ही कमांडिंग पोजीशन तक भी महिलाओं की पहुंच होगी। 17 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में भारतीय सेना की सभी 10 शाखाओं में शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने की बात कही थी। ये शाखाएं हैं- आर्मी एयर डिफेंस (एएडी), सिग्नल्स, इंजीनियर्स, आर्मी एविएशन, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (ईएमई), आर्मी सर्विस कॉर्प्स (एएससी), आर्मी ऑर्डिनेंस कॉर्प्स (एओसी) और इंटेलीजेंस कॉर्प्स।

 

कितनी है सेना में महिलाएं

फरवरी, 2021 में संसद में रक्षा राज्यमंत्री श्रीपद नाइक ने एक सवाल के जवाब में सेना में महिलाओं की उपस्थिति के बारे में बताया था। तीनों सेनाओं में महिला आॅफीसर के रूप में 9,118 महिलाएं अपनी सेवाएं दे रही हैं। इंडियन आर्मी में 12,18,036 पुरूषों की तुलना में 6,807 महिलाएं सेवारत हैं जो प्रतिशत के तौर पर 0.56 बैठता है। इसी तरह इंडियन एयर फोर्स में 1,46,727 पुरूषों की तुलना में 1,607 महिलाएं सेवारत हैं जो प्रतिशत के तौर पर 1.08 बैठता है। वहीं इंडियन नेवी में कुल पुरूषों की तुलना में उनकी संख्या 6.5 प्रतिशत तक है। सबसे ज्यादा महिला आॅफीसर्स इंडियन नेवी में सेवारत हैं, जो इस समय संख्या की दृष्टि से 704 हैं। वास्तव में ये आंकड़े उत्साहवर्द्धक नहीं हैं। सेना में महिलाओं की भागीदारी काफी कम है। जबकि अमेरिका में महिलाओं की संख्या पुरूषों की तुलना में 20 फीसदी और ब्रिटेन में 09 फीसदी है। बाकी के देशों में भी महिला भागीदारी भारत से अच्छी है। निःसंदेह इस फैसले के बाद महिलाओं के बीच सेना ज्वाइन करने को लेकर उत्साह आ जायेगा। सरकार भी सेना में महिलाओं की भागीदारी के प्रति प्रतिबद्ध है।

इस फैसले से युवा लड़कियां अधिक प्रोत्साहित होगीं। वे सेना को भी अपने भविष्य के एक कॅरियर के तौर पर देख सकेगीं। सेना में अब महिलाओं के पास पूरे 54 साल की उम्र तक राष्ट्र सेवा करने का मौका होगा। महिला अधिकारियों को पदोन्नति के सभी रास्ते खुल गए हैं। अब तक वे शार्ट सर्विस कमीशन में ले. कर्नल से आगे नहीं जा पाती थीं। इसके लिए आवश्यक एडवांस लर्निंग कोर्सेज में भी जा सकेगी। जिसके बाद और अच्छा करने के तमाम अवसर खुल जाएंगे। साथ ही पदोन्नति के भी रास्ते खुलेंगे। कुल मिलाकर हम भविष्य में महिला कर्नल, ब्रिगेडियर और जनरल जल्द ही देखेंगे।