बुधवार, 21 जनवरी 2026

छोरों के इंतजार में पैदा होती 'म्हारी छोरियां'

 

हरियाणा में जन्म लिंग अनुपात में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह एक उत्साहजनक खबर है। ऐतिहासिक रूप से हरियाणा में लैंगिक असंतुलन की गहरी जड़ें मौजूद रही हैं। इन जड़ों की जड़ता में जो परिवर्तन हुआ है, वह वास्तव में तमाम सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों का नतीजा है। 

हरियाणा के जींद जिले से आई एक खबर ने सोशल मीडिया में बहस छेड़ दी। 37 साल की एक महिला ने अपने 11वें बच्चे को जन्म दिया है। इस खबर में खास बात यह थी कि उनके पहले 10 बेटियां हैं, अब यह 11वां बच्चा बेटा हुआ है। यानी एक बेटे की चाहत ने 19 साल की शादीशुदा जिंदगी में 11 बच्चों को जन्म देना पड़ा, क्योंकि एक अदद बेटे की आस थी। महिला की डिलीवरी ओजस हाॅस्पिटल एंड मैटरनटी होम में हुई, डाॅक्टरों के अनुसार यह एक हाई रिस्क केस था। महिला के पति मजदूरी करते हैं और वे अपनी बेटियों के अच्छे से पालन-पोषण और शिक्षा दिलाने की बात भी कह रहे हैं। तो इस खबर को वायरल होना ही था। लेकिन इस एक खबर का वायरल होना यह मानना नहीं है कि यह हमारे समाज का मात्र एक ही मामला है और बहुत से हो सकते हैं जिन्हें वायरल होने का मौका नहीं मिल सका। 

 इस खबर में खास बात यह थी कि उनके पहले 10 बेटियां हैं, अब यह 11वां बच्चा बेटा हुआ है। यानी एक बेटे की चाहत ने 19 साल की शादीशुदा जिंदगी में 11 बच्चों को जन्म देना पड़ा, क्योंकि एक  अदद बेटे की आस थी।

यह मामला एक परिवार की कहानी न होकर समाज की कहानी है, जिसके अनगिनत पहलू हैं। जिसमें इस परिवार की आर्थिक स्थिति, दंपति की शिक्षा और जागरूकता, पत्नी का निर्णय लेने की क्षमता में दखल, और वह छोटा सा सामाजिक दायरा जिसमें यह परिवार रहता है, यह वे परिस्थितियां हैं, जिसके खोह में ऐसी ही खबर पैदा होना लाजिमी हैं। अब इन दस बेटियों के भविष्य के बारे आकलन किया जा सकता है जिनका जन्म ही एक अदद ‘बेटे’ की चाहत पर आधारित था। वास्तव में यह एक बहुत ही भावुक विषय है। इन सबके बरक्स इसी हरियाणा से एक अच्छी और उत्साहवर्द्धक खबर भी ठीक इसी दौरान आती है।

हरियाणा, जो लंबे समय से लिंग असंतुलन की समस्या से जूझता रहा है, ने 2025 में जन्म लिंग अनुपात (एसआरबी) में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है। राज्य का एसआरबी 923 लड़कियां प्रति 1,000 लड़कों तक पहुंच गया है, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ऊंचा है। यह सुधार 2024 के 910 से 13 अंकों की वृद्धि दर्शाता है, और यह आकलन कुल 5,19,691 जन्मों (2,70,281 लड़के और 2,49,410 लड़कियां) पर आधारित है। राष्ट्रीय औसत 933 के काफी करीब पहुंचते हुए यह आंकड़ा न केवल सरकारी प्रयासों की सफलता को रेखांकित करता है, बल्कि गैरसरकारी संस्थाओं के प्रयासों को भी दर्शाता है। जो भी यह हरियाणा के सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। 

राष्ट्रीय औसत 933 के काफी करीब पहुंचते हुए यह आंकड़ा न केवल सरकारी प्रयासों की सफलता को रेखांकित करता है, बल्कि गैरसरकारी संस्थाओं के प्रयासों को भी दर्शाता है। जो भी यह हरियाणा के सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। 

ऐतिहासिक रूप से हरियाणा में लिंग अनुपात की समस्या की गहरी जड़ें मौजूद रही हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य का एसआरबी मात्र 834 था, जो राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे था और यह कन्या भ्रूण हत्या की व्यापक समस्या को दिखाता था। 2014 में यह 871 था, जो 2015 में 876, 2016 में 900, 2017 में 914 और 2018 में स्थिर रहा। 2019 में यह 923 तक पहुंचा, लेकिन कोविड-19 महामारी और अन्य कारकों से 2020 में 922, 2021 में 914, 2022 में 917, 2023 में 916 और 2024 में 910 तक लगातार गिरता गया। यह गिरावट दशक भर की प्रगति को चुनौती दे रही थी, तमाम प्रयासों को धता बतला रही थी। लेकिन 2025 में पुनरुत्थान ने राज्य को फिर से ट्रैक पर ला दिया। यह सुधार 2015 से शुरू हुए प्रयासों का परिणाम है, जिसमें अनुमानित 65,000 से अधिक लड़कियों को ‘बचाया’ गया है (अर्थात, हस्तक्षेपों से महिला जन्मों को सुनिश्चित किया गया)। लड़कियां बचाने की यह यात्रा बतलाती है कि लिंग असमानता न केवल सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों से जुड़ा हुआ मामला है, बल्कि अवैध चिकित्सा ताकतों से भी प्रभावित रहा है।

सरकारी प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभावी रहा, जबकि शहरी क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। जहां तथाकथित विकास की बयार बह रही है और चिकित्सीय सुविधाएं तुलनात्मक रूप से उपलब्ध हैं। इसे एनएफएचएस के विभिन्न सर्वे के द्वारा समझा जा सकता है।

इन हालिया आंकड़ों में जिलेवार असमानता स्पष्ट है, जो उत्तर-दक्षिण विभाजन दर्शाती है। उत्तरी जिले जैसे पंचकुला (971), फतेहाबाद (961), पानीपत (951), करनाल (944) और यमुनानगर (943) राज्य औसत से ऊपर हैं। अन्य ऊंचे जिले सिरसा (937), नूंह (935), कुरुक्षेत्र (927), अंबाला (926), हिसार (926), भिवानी (926) और कैथल (924) जिले राष्ट्रीय औसत से नीचे जा रहे हैं। इसके विपरीत, दक्षिणी जिले जैसे रेवाड़ी (882, सबसे कम), सोनीपत (894), रोहतक (898), गुरुग्राम (901) और फरीदाबाद (916) पिछड़ रहे हैं। ये शहरी-औद्योगिक और सीमावर्ती क्षेत्र हैं, जहां गुप्त क्लीनिक, पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनें और अवैध एमटीपी किट आसानी से उपलब्ध हैं। यह अंतर दर्शाता है कि सरकारी प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभावी रहा, जबकि शहरी क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। जहां तथाकथित विकास की बयार बह रही है और चिकित्सीय सुविधाएं तुलनात्मक रूप से उपलब्ध हैं। इसे एनएफएचएस के विभिन्न सर्वे के द्वारा समझा जा सकता है।

एनएफएचएस-5 सर्वे जिसे केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2019-21 में किया था। यह पूरे भारत में जनसंख्या, स्वास्थ्य और पोषण के बारे में जानकारी देता है, जिसमें लिंग अनुपात भी शामिल है। इसके अनुसार कुल लिंग अनुपात 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाएं हैं। यह एनएफएचएस-4 (2015-16) की तुलना में एक थोड़ा सा बदलाव है, जिसमें 1,000 पुरुषों पर 991 महिलाएं थीं। जन्म के समय लिंग अनुपात 1000 पुरुषों पर 929 महिलाएं हैं। यह अभी भी प्राकृतिक अनुपात (लगभग 950-970) से कम है। यह तथ्य दिखाता है कि जन्म से पहले लिंग चयन अभी भी एक समस्या है, खासकर हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में। एनएफएचएस-5 में एनएफएचएस-4 के 919 से थोड़ा सुधार हुआ है। बाल लिंग अनुपात (0-6 वर्ष की आयु) 1000 पुरुषों पर 929 महिलाएं। यह एनएफएचएस-4 के 919 से बढ़ा है, जिसका मतलब है कि महिला शिशु मृत्यु दर और लिंग-चयनात्मक गर्भपात को कम करने में थोड़ी प्रगति हुई है।

बेहतर लिंग अनुपात से महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ेगा, जो लंबे समय में अपराध दर (जैसे दुल्हन तस्करी) को कम भी कर सकता है। आर्थिक रूप से, संतुलित जनसंख्या कार्यबल को विविध बनाएगी, उत्पादकता बढ़ाएगी।

देखा जाए तो 923 का यह आंकड़ा हरियाणा की सामाजिक संरचना को मजबूत करेगा। बेहतर लिंग अनुपात से महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ेगा, जो लंबे समय में अपराध दर (जैसे दुल्हन तस्करी) को कम भी कर सकता है। आर्थिक रूप से, संतुलित जनसंख्या कार्यबल को विविध बनाएगी, उत्पादकता बढ़ाएगी। 923 का आंकड़ा हरियाणा के लिए एक मील का पत्थर है, जो दर्शाता है कि सख्त नीतियां और सामाजिक बदलाव लिंग असमानता को दूर कर सकते हैं। जब बेटों के इंतजार में बेटियां पैदा होने वाली परिस्थितियां नहीं बनी रहेगी।

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बैंड बाजा बारात और सोशल मीडिया


 

हमारे हाथों में मोबाइल एक ऐसी डिवाइस है, जिसमें अधिकांश गतिविधियों की लाॅगबुक दर्ज रहती है, चाहे या अनचाहे। यही कारण है कि यहां होने वाली गतिविधियां शादी जैसे नाजुक रिश्तों पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रही हैं। अगर जल्द नहीं संभलें, तो सोशल मीडिया में बिखरा यह स्यापा हमारे कई रिश्तों को खा जाएगा।

 

2025 को ‘लवयापा’ नाम से एक मूवी आई थी, जिसकी कहानी जेन-जी के रिलेशनशिप पर आधारित थी। कहानी में शादी के लिये नायक नायिका के पिता के सामने उपस्थित होता है और नायिका के साथ शादी की इच्छा व्यक्त करता है। पिता राजी होता है पर एक शर्त के बाद। शर्त होती है कि एक दिन के लिये नायक और नायिका अपना-अपना मोबाइल एक दूसरे को दे देंगे, प्रयोग करने के लिये। और यही से प्यार-स्यार की जगह लब का स्यापा शुरू हो जाता है। जहां दोनों नायक-नायिका प्यार की दुहाई देकर शादी करने वाले थे, वहीं एक दूसरे के मोबाइल हाथ में आने के बाद उनकी ऐसी सच्चाई सामने आती है, जिससे दोनों अब तक अंजान थे। एक दूसरे के सामने आती इन सच्चाइयों के कारण उनके बीच टकरार, दरार और फाइट शुरू हो जाती है। उनका विश्वास चुक जाता है, फलतः रिश्ता टूट जाता है। चूंकि यह फिल्म है, तो बड़े-बुजुर्ग बीच में आकर संबंधों के बीच में पड़ी दरार को भरने का काम करते हैं। दोनों को रियल लाइफ के सबक सिखाते हैं, फलतः ‘लवयापा’ की हैप्पी एंडिग हो जाती हैं, पर क्या रियल लाइफ में ऐसा संभव है।

शायद नहीं। तभी तो एक चौकाने वाली रिपोर्ट एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने हाल ही में प्रसारित की है। स्थानीय रिसर्च के बाद आई इस खबर में बताया गया है कि इंदौर जैसे बड़े शहर में 40 दिनों में ही 150 शादियां रद्द हो गईं। वजह कई थीं, पर सबसे बड़ी वजह बनी सोशल मीडिया पोस्ट। भावी दुल्हा और दुल्हनों की पुरानी सोशल मीडिया से जुड़ी गतिविधियां सामने आने से जो अविश्वास की धारा पैदा हुआ, वह अंततः शादी रद्द होने के मुकाम को पहुंच गई। रिपोर्ट के अनुसार 62 फीसदी शादियां टूटने की वजह सीधे तौर पर सोशल मीडिया से उपजी गतिविधियां थीं। इन गतिविधियों को लेकर दोनों पार्टि’ज में जो कहा-सुनी हुई, उसने झगड़े का रूप ले लिया, आखिर रिश्ता खतम करना पड़ा। पहले जहां शादी टूटने की वजह कोई गंभीर पारिवारिक, सामाजिक मामला होता था, जिसके सामने आने के बाद शादियां कैंसिल कर दी जाती थी, पर आज 60 से 70 फीसदी मामलों में सोशल मीडिया में किये गये पोस्ट, कमेंट्स, इमोजी, लाइक्स या फिर फ्रेंड लिस्ट में वह क्यों है, को लेकर मन-मुटाव यहां तक पहुंच रहा है कि शादी ही रद्द हो रही हैं। यह देखकर समझा जा सकता है कि सोशल मीडिया की पहुंच हमारे जीवन में अब कहां तक हो चुकी है। परिणाम है रिश्तों का बिखर जाना, क्योंकि यह रियल लाइफ है फिल्म नहीं।

पहले जहां शादी टूटने की वजह कोई गंभीर पारिवारिक, सामाजिक मामला होता था, जिसके सामने आने के बाद शादियां कैंसिल कर दी जाती थी, पर आज 60 से 70 फीसदी मामलों में सोशल मीडिया में किये गये पोस्ट, कमेंट्स, इमोजी, लाइक्स या फिर फ्रेंड लिस्ट में वह क्यों है?

शादी जैसे रिश्तों के बीच सोशल मीडिया का यूं फिल्मी खलनायक के रूप में उभरने का मतलब है कि हम डिजिटल जिंदगी को लेकर इतने सीरियस नहीं हुये हैं, जितना हमें होना चाहिए था। हमें लगता है कि सोशल मीडिया में हम कुछ भी करके निकल जाएंगे, किसी को या हमें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। ऐसा सोचना भी आज सोशल मीडिया के महत्व को कम करके आंकना है। आज जब भी कोई कंपनी अपने लिये एक अच्छे इम्प्लाई को ढूंढ़ती है, तो कम से कम उसका लिंक्डइन प्रोफाइल जरूर चेक करती है। यह प्रैक्टिस उनके लिये एक अच्छा उम्मीदवार ढूंढ़ने में काफी मददगार होता है। आज एक रिक्रूटर के लिये अपने इम्प्लाई की सोशल मीडिया स्क्रीनिंग जरूरी हो गई है, भले ही यह वैध न हो। 2023 के रिज्मेबिल्डर सर्वे के अनुसार 73 फीसदी हायरिंग में मैनेजरों ने उम्मीदवारों की सोशल मीडिया प्रजेंस के नंबर दिये और उनकी उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया। जबकि 85 फीसदी ने माना कि उन्होंने अपने उम्मीदवारों की उम्मीदवारी रद्द कर दी, जब उन्हें उनकी ऑनलाइन प्रोफाइल में कुछ गलत दिखा। तो समझा जा सकता है कि हमारी सोशल मीडिया संबंधी गतिविधियां कहां तक पहुंच रखती हैं। तो फिर शादी-विवाह जैसे मामले इनसे दूर कैसे रह सकते हैं।

2023 के रिज्मेबिल्डर सर्वे के अनुसार 73 फीसदी हायरिंग में मैनेजरों ने उम्मीदवारों की सोशल मीडिया प्रजेंस के नंबर दिये और उनकी उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया। जबकि 85 फीसदी ने माना कि उन्होंने अपने उम्मीदवारों की उम्मीदवारी रद्द कर दी, जब उन्हें उनकी ऑनलाइन प्रोफाइल में कुछ गलत दिखा।

सोशल मीडिया संबंधी यह मामले शादी से पहले ही पता चलने के बाद शादी रद्द होने का कारण बन रहे हैं। पर लगभग दो दशकों से आपसी रिश्ते खराब करने का एक कारण सोशल मीडिया दर्ज हो रहा है, ऐसा कई रिसर्च हमें बता रही है। कपल्स हों, या फे्रंड्स सोशल मीडिया का अधिक उपयोग उनके आपसी रिश्तों में दूरियां पैदा कर देता है। ‘कंप्यूटर इन ह्यूमन विहैवियर में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि शादीशुदा जिंदगी की गुणवत्ता और सोशल मीडिया दोनों का संबंध रहा है। जो लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते हैं, वे रेगुलर सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों की तुलना में अपनी शादी में 11 फीसदी अधिक खुश रहते हैं। इसी रिपोर्ट में बहुत ही विस्तार से बताया गया है कि पहली बार पति-पत्नियों के बीच सोशल मीडिया कैसे घुस गया और रिश्ते खराब करने लगा। इस संबंध में पहली रिपोर्ट 2009 में आई थी, जब यूके की डिवोर्स आॅनलाइन कंपनी के एक एग्जीक्यूटिव, मार्क कीनन ने पाया कि कंपनी की 5000 सबसे नये तलाक के आवेदनों में से 989 में ‘फेसबुक’ शब्द आया था। इसी तरह, अमेरिकन एकेडमी ऑफ मैट्रिमोनियल लॉयर्स (एएएमएल) के 2010 के एक सर्वे में पाया गया कि पांच में से चार वकीलों ने बताया कि फेसबुक से मिले ‘सबूतों’ के आधार पर तलाक के मामलों की संख्या बढ़ रही है। इसके अलावा, सोशल नेटवर्क साइट पर धोखा देने का पता लगाने में मदद के लिए वेबसाइट्स भी बनाई गई हैं। उदाहरण के लिए FacebookCheating.com इसके द्वारा अपने पार्टनर के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर का पता लगाया जा सकता था।

इसकी वजह है इंटरनेट और सबसे बड़ी ताका-झांकी की जगह ‘सोशल मीडिया’ यानी हमारी फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, टिकटाॅक, टिंडर या एक्स प्रोफाइल। अगर जेन-जी की बात की जाये, तो जितनी वे आपस में बाते नहीं करते उतना वे ‘टेक्स्ट’ करते हैं।


यह सब तब हो रहा था, जब फेसबुक जैसी एक ही सोशल मीडिया साइट हमारे जीवन में आ गई थी। और इस पर मौजूद हम इस बात के लिए हम एसोर थे कि यहां कुछ भी किया जा सकता है, हमें कौन ‘जज’ करेगा। लेकिन हम ‘जज’ किये जा रहे थे। इसका असर भी पड़ने लगा था। यह रिपोर्ट हमारे देश समाज की न हो, पर आज हमारी भी वहीं स्थिति हो गई है। जब सोशल मीडिया का संसार काफी फैल चुका है। यह इंदौर की इस छोटी सी रिपोर्ट से समझा जा सकता है। हमारे हाथों में मोबाइल एक ऐसी डिवाइस है, जिसमें हमारे द्वारा की गई अधिकांश गतिविधियों की एक लाॅगबुक तैयार होती है, हम चाहें या न चाहें। इसकी वजह है इंटरनेट और सबसे बड़ी ताका-झांकी की जगह ‘सोशल मीडिया’ यानी हमारी फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, टिकटाॅक, टिंडर या एक्स प्रोफाइल। अगर जेन-जी की बात की जाये, तो जितनी वे आपस में बाते नहीं करते उतना वे ‘टेक्स्ट’ करते हैं। उनका सोना, जागना, खाना, पीना सभी कुछ सोशल मीडिया ही निर्धारित कर रहा है। यहां होने वाले मेल-मिलाप, बातचीत चाहे उनकी भाषा डिजिटल ही क्यों न हो, यह सब हमारा भविष्य तय कर रहे हैं। सोशल मीडिया के बहाने कोई भी थोड़े प्रयासों से हमारे बारे में बहुत कुछ जान सकता है। भले ही यहां की गईं गतिविधियां का सीधा मतलब वह न हो, जो दूसरा कोई समझ रहा है। लेकिन इसकी जबावदेही हमारी ही बनती है, और सभी उठने वाले सवालों के जवाब हमें ही देने होते हैं। नहीं तो ‘लवयापा’ की तरह ‘अच्छी खासी लाइफ को बिगबाॅस बना दिया है इस फोन ने’ की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए निजी जीवन में रिश्तों को लेकर हमारे किरदार पर कोई उंगली न उठा दे, इसके लिये ईमानदारी बनाये रखनी पड़ेगी यहां भी, और वहां भी।