हरियाणा में जन्म लिंग अनुपात में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह एक उत्साहजनक खबर है। ऐतिहासिक रूप से हरियाणा में लैंगिक असंतुलन की गहरी जड़ें मौजूद रही हैं। इन जड़ों की जड़ता में जो परिवर्तन हुआ है, वह वास्तव में तमाम सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों का नतीजा है।
हरियाणा के जींद जिले से आई एक खबर ने सोशल मीडिया में बहस छेड़ दी। 37 साल की एक महिला ने अपने 11वें बच्चे को जन्म दिया है। इस खबर में खास बात यह थी कि उनके पहले 10 बेटियां हैं, अब यह 11वां बच्चा बेटा हुआ है। यानी एक बेटे की चाहत ने 19 साल की शादीशुदा जिंदगी में 11 बच्चों को जन्म देना पड़ा, क्योंकि एक अदद बेटे की आस थी। महिला की डिलीवरी ओजस हाॅस्पिटल एंड मैटरनटी होम में हुई, डाॅक्टरों के अनुसार यह एक हाई रिस्क केस था। महिला के पति मजदूरी करते हैं और वे अपनी बेटियों के अच्छे से पालन-पोषण और शिक्षा दिलाने की बात भी कह रहे हैं। तो इस खबर को वायरल होना ही था। लेकिन इस एक खबर का वायरल होना यह मानना नहीं है कि यह हमारे समाज का मात्र एक ही मामला है और बहुत से हो सकते हैं जिन्हें वायरल होने का मौका नहीं मिल सका।
इस खबर में खास बात यह थी कि उनके पहले 10 बेटियां हैं, अब यह 11वां बच्चा बेटा हुआ है। यानी एक बेटे की चाहत ने 19 साल की शादीशुदा जिंदगी में 11 बच्चों को जन्म देना पड़ा, क्योंकि एक अदद बेटे की आस थी।
यह मामला एक परिवार की कहानी न होकर समाज की कहानी है, जिसके अनगिनत पहलू हैं। जिसमें इस परिवार की आर्थिक स्थिति, दंपति की शिक्षा और जागरूकता, पत्नी का निर्णय लेने की क्षमता में दखल, और वह छोटा सा सामाजिक दायरा जिसमें यह परिवार रहता है, यह वे परिस्थितियां हैं, जिसके खोह में ऐसी ही खबर पैदा होना लाजिमी हैं। अब इन दस बेटियों के भविष्य के बारे आकलन किया जा सकता है जिनका जन्म ही एक अदद ‘बेटे’ की चाहत पर आधारित था। वास्तव में यह एक बहुत ही भावुक विषय है। इन सबके बरक्स इसी हरियाणा से एक अच्छी और उत्साहवर्द्धक खबर भी ठीक इसी दौरान आती है।
हरियाणा, जो लंबे समय से लिंग असंतुलन की समस्या से जूझता रहा है, ने 2025 में जन्म लिंग अनुपात (एसआरबी) में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है। राज्य का एसआरबी 923 लड़कियां प्रति 1,000 लड़कों तक पहुंच गया है, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ऊंचा है। यह सुधार 2024 के 910 से 13 अंकों की वृद्धि दर्शाता है, और यह आकलन कुल 5,19,691 जन्मों (2,70,281 लड़के और 2,49,410 लड़कियां) पर आधारित है। राष्ट्रीय औसत 933 के काफी करीब पहुंचते हुए यह आंकड़ा न केवल सरकारी प्रयासों की सफलता को रेखांकित करता है, बल्कि गैरसरकारी संस्थाओं के प्रयासों को भी दर्शाता है। जो भी यह हरियाणा के सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
राष्ट्रीय औसत 933 के काफी करीब पहुंचते हुए यह आंकड़ा न केवल सरकारी प्रयासों की सफलता को रेखांकित करता है, बल्कि गैरसरकारी संस्थाओं के प्रयासों को भी दर्शाता है। जो भी यह हरियाणा के सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
ऐतिहासिक रूप से हरियाणा में लिंग अनुपात की समस्या की गहरी जड़ें मौजूद रही हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य का एसआरबी मात्र 834 था, जो राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे था और यह कन्या भ्रूण हत्या की व्यापक समस्या को दिखाता था। 2014 में यह 871 था, जो 2015 में 876, 2016 में 900, 2017 में 914 और 2018 में स्थिर रहा। 2019 में यह 923 तक पहुंचा, लेकिन कोविड-19 महामारी और अन्य कारकों से 2020 में 922, 2021 में 914, 2022 में 917, 2023 में 916 और 2024 में 910 तक लगातार गिरता गया। यह गिरावट दशक भर की प्रगति को चुनौती दे रही थी, तमाम प्रयासों को धता बतला रही थी। लेकिन 2025 में पुनरुत्थान ने राज्य को फिर से ट्रैक पर ला दिया। यह सुधार 2015 से शुरू हुए प्रयासों का परिणाम है, जिसमें अनुमानित 65,000 से अधिक लड़कियों को ‘बचाया’ गया है (अर्थात, हस्तक्षेपों से महिला जन्मों को सुनिश्चित किया गया)। लड़कियां बचाने की यह यात्रा बतलाती है कि लिंग असमानता न केवल सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों से जुड़ा हुआ मामला है, बल्कि अवैध चिकित्सा ताकतों से भी प्रभावित रहा है।
सरकारी प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभावी रहा, जबकि शहरी क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। जहां तथाकथित विकास की बयार बह रही है और चिकित्सीय सुविधाएं तुलनात्मक रूप से उपलब्ध हैं। इसे एनएफएचएस के विभिन्न सर्वे के द्वारा समझा जा सकता है।
इन हालिया आंकड़ों में जिलेवार असमानता स्पष्ट है, जो उत्तर-दक्षिण विभाजन दर्शाती है। उत्तरी जिले जैसे पंचकुला (971), फतेहाबाद (961), पानीपत (951), करनाल (944) और यमुनानगर (943) राज्य औसत से ऊपर हैं। अन्य ऊंचे जिले सिरसा (937), नूंह (935), कुरुक्षेत्र (927), अंबाला (926), हिसार (926), भिवानी (926) और कैथल (924) जिले राष्ट्रीय औसत से नीचे जा रहे हैं। इसके विपरीत, दक्षिणी जिले जैसे रेवाड़ी (882, सबसे कम), सोनीपत (894), रोहतक (898), गुरुग्राम (901) और फरीदाबाद (916) पिछड़ रहे हैं। ये शहरी-औद्योगिक और सीमावर्ती क्षेत्र हैं, जहां गुप्त क्लीनिक, पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनें और अवैध एमटीपी किट आसानी से उपलब्ध हैं। यह अंतर दर्शाता है कि सरकारी प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभावी रहा, जबकि शहरी क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। जहां तथाकथित विकास की बयार बह रही है और चिकित्सीय सुविधाएं तुलनात्मक रूप से उपलब्ध हैं। इसे एनएफएचएस के विभिन्न सर्वे के द्वारा समझा जा सकता है।
एनएफएचएस-5 सर्वे जिसे केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2019-21 में किया था। यह पूरे भारत में जनसंख्या, स्वास्थ्य और पोषण के बारे में जानकारी देता है, जिसमें लिंग अनुपात भी शामिल है। इसके अनुसार कुल लिंग अनुपात 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाएं हैं। यह एनएफएचएस-4 (2015-16) की तुलना में एक थोड़ा सा बदलाव है, जिसमें 1,000 पुरुषों पर 991 महिलाएं थीं। जन्म के समय लिंग अनुपात 1000 पुरुषों पर 929 महिलाएं हैं। यह अभी भी प्राकृतिक अनुपात (लगभग 950-970) से कम है। यह तथ्य दिखाता है कि जन्म से पहले लिंग चयन अभी भी एक समस्या है, खासकर हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में। एनएफएचएस-5 में एनएफएचएस-4 के 919 से थोड़ा सुधार हुआ है। बाल लिंग अनुपात (0-6 वर्ष की आयु) 1000 पुरुषों पर 929 महिलाएं। यह एनएफएचएस-4 के 919 से बढ़ा है, जिसका मतलब है कि महिला शिशु मृत्यु दर और लिंग-चयनात्मक गर्भपात को कम करने में थोड़ी प्रगति हुई है।
बेहतर लिंग अनुपात से महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ेगा, जो लंबे समय में अपराध दर (जैसे दुल्हन तस्करी) को कम भी कर सकता है। आर्थिक रूप से, संतुलित जनसंख्या कार्यबल को विविध बनाएगी, उत्पादकता बढ़ाएगी।
देखा जाए तो 923 का यह आंकड़ा हरियाणा की सामाजिक संरचना को मजबूत करेगा। बेहतर लिंग अनुपात से महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ेगा, जो लंबे समय में अपराध दर (जैसे दुल्हन तस्करी) को कम भी कर सकता है। आर्थिक रूप से, संतुलित जनसंख्या कार्यबल को विविध बनाएगी, उत्पादकता बढ़ाएगी। 923 का आंकड़ा हरियाणा के लिए एक मील का पत्थर है, जो दर्शाता है कि सख्त नीतियां और सामाजिक बदलाव लिंग असमानता को दूर कर सकते हैं। जब बेटों के इंतजार में बेटियां पैदा होने वाली परिस्थितियां नहीं बनी रहेगी।

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