गुरुवार, 8 नवंबर 2018

क्या महिलाओं का कोई धर्म नहीं?

sabarimala ayyappa temple
देश की सबसे बड़ी अदालत ने प्रतिबंधित उम्र ग्रुप की महिलाओं को असमानाता, महिलाओं की गरिमा के खिलाफ को आधार बनाकर सबरीमाला में दर्शन की अनुमति प्रदान कर दी, तो स्वयं महिलाएं ही आंदोलन में उतर आईं। सड़क पर उतरीं इन महिलाओं ने न केवल मंदिर में प्रवेश लेने को उत्सुक महिलाओं की समझाइस की, बल्कि येनकेन प्रकारेण उन्हें रोकने की कोशिश में सफल भी रहीं। वे ऐसा करती भी क्यों न, आखिर महिलाओं ने ही इस परंपरा को लिखित-अलिखित रूप से अपनी बेटियों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया हैं। और इनका इरादा भी इसे आगे ले जाने का है। बगैर इस बात को जाने-समझे कि देश के अनगिनत समुदायों में मासिक धर्म पूजने और उत्सव मनाने कारण है, अपवित्रता का नहीं।

सदियां बीतने के साथ महिलाओं की उर्वरक शक्ति अपवित्रता, छुआछूत में कब बदल जाती है, कि इसे लेकर महिलाओं के अंदर शर्म, झिझक, डर जैसे तत्व प्रवेश कर गए। इस बात को सबरीमाला में प्रवेश को लेकर महिलाओं का विरोध स्वयं बताता है। सबरीमाला जैसा पवित्र स्थान ही क्यों, इस अपवित्रता के चलते घर में स्थित पूजा घर, व्रत-त्योहारों में महिलाएं प्रतिबंधित या सीमित हो जाती हैं। कामोबेश अधिकतर धर्मां में इस अवस्था में पवित्र स्थानों पर जाने की मनाही होती है। ऐसा नहीं है कि यह अपवित्रता ही महिलाओं को तमाम धार्मिक कार्य करने से रोकती है। वास्तव में ऐसी अनगिनत परंपराएं हैं जिन्हें आधार बनाकर धर्म के अधिकांश कार्यों से उन्हें वंचित कर दिया जाता है।

कहते हैं कि सबरीमाला वाले भगवान अयप्पा ब्रम्हचारी हैं, इसलिए 10 से 50 वर्ष की उम्र वाली महिलाओं को उनसे दूर रहना चाहिए। केरल के ही पद्मनाथ स्वामी मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। विश्व के सबसे धनी इस मंदिर के बारे में यह माना जाता है कि महिलाओं के इस हिस्से में प्रवेश से मंदिर के खजाने को बुरी नजर लग जाएगी। अहमदाबाद स्थित शनि शिंगनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के प्रतिबंध के संबंध में कहा जाता था कि मूर्ति के सामने आने पर हानिकारक तरंगें निकलती हैं, अत: महिलाओं को यहां प्रवेश नहीं करना चाहिए। इसी तरह कोल्हापुर स्थित 1400 साल पुराने महालक्ष्मी मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी। जिसे आंदोलन के बाद समाप्त किया गया। यही समस्या नासिक के त्रंयबकेश्वर मंदिर में भी है। इस मंदिर में शिव लिंग की पूजा का अधिकार महिलाओं को नहीं है। इसकी वजह गर्भगृह में निकलने वाला विकिरण बताया जाता हैं, जो महिलाओं के लिए नुकसानदेह हैं। नासिक के कपालेश्वर मंदिर में निचली जाति की महिलाओं का गर्भगृह में प्रवेश पर प्रतिबंध था। देश के तमाम मंदिरों और पवित्र स्थलों में अलग-अलग कारणों से पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध महिलाओं पर लगा हुआ है। इस क्रम में पुणे के म्हस्कोबा मंदिर, असम का पटबौसी सत्र मंदिर, बीड का मारूती मंदिर, पुष्कर का कार्तिकेय मंदिर, रनकपुर के जैन मंदिर या देश की राजधानी दिल्ली में स्थिति निजामुद्दीन औलिया जैसी अन्य दरगाहों में महिलाओं का किसी न किसी रूप में प्रवेश निषिद्ध है।

सबरीमाला मंदिर विवादकिसी भी धर्म में पैगम्बर महिला नहीं हैं। गौतम बुद्ध ने बहुत विचार-विमर्श के बाद मठों में महिलाओं को प्रवेश दिया था। मंदिर में पुजारी महिला नहीं दिखती हैं। (अपवादस्वरूप किन्हीं देवस्थानों में हैं। जैसे मनकामेश्वर मंदिर, लखनऊ की महंत दिव्यागिरि हैं।) किसी भी मंदिर का समस्त कामकाज पुरुष पुजारियों के हवाले रहता है। चाहे वह देवीस्थान ही क्यों न हो। कई मस्जिदों में महिलाएं नमाज पढ़ने नहीं जा सकती। देश में निजामुद्दीन औलिया, अजमेर शरीफ और श्रीनगर के हजरतबल की दरगाह के मकबरों तक महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है। रोमन कैथोलिक महिलाएं पादरी नहीं बन सकतीं। पारसी महिलाएं गैर धर्म में विवाह के बाद अपने सभी धार्मिक अधिकारों से वंचित कर दी जाती हैं, जबकि पुरुषों अधिकार उसी तरह से जायज होते हैं। (पारसी समुदाय की गुलरुख के. गुप्ता ने इस संदर्भ में एक लंबी लड़ाई लड़कर हाल ही में जीती है।) पारसी पुरुष के शादी करने वाली महिला भी फायर टेम्पल में प्रवेश नहीं कर सकती है, जबकि पुरुष कर सकता है। इस बात को हाल ही में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने बयां किया, जिन्होंने एक पारसी समुदाय के व्यक्ति जुबिन ईरानी से विवाह किया है।

इन सब उदाहरणों से समझा जा सकता है कि इन सभी बड़े और चर्चित देवस्थानों पर प्रतिबंधों का अपना एक इतिहास है, जो बगैर किसी तर्कशास्त्र के बदस्तूर जारी है। जिसे कुछ मुट्ठीभर लोग आस्था के नाम पर संचालित कर रहे हैं। किसी भी पवित्र स्थान में लगे ये प्रतिबंध को किसी न किसी अनहोनी से जोड़कर लोगों को डराया जाता है। हाल ही केरल में जब बाढ़ ने तबाही मचाई, तब इसे भगवान अयप्पा के क्रोध से जोड़ दिया गया। प्रश्न है कि किसी न किसी बहाने से इन तमाम तरह के पवित्र स्थानों पर महिलाओं के प्रवेश को इतना प्रतिबंधित क्यों किया गया है? क्या महिलाएं कम धार्मिक हैं या वे धर्म के अनुष्ठानों और व्याख्यानों को समझने में असमर्थ हैं? क्या उनमें श्रद्धा कम है? या इन सबसे अलग कोई कारण है, जिससे आस्था में उनकी बेदखली जारी है। कहीं धर्म पुरुष सत्तात्मक तो नहीं है जो किसी न किसी बहाने आधी आबादी को इससे दूर रखना चाहता है, जिससे धर्म पर उसकी सत्ता कायम रहे।

3 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन भाई दूज, श्री चित्रगुप्त पूजा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Kusum Kothari ने कहा…

वाह सटीक प्रश्न ऊठाता आलेख।

प्रतिभा कुशवाहा ने कहा…

धन्यवाद कुसुम जी और हर्षवर्द्धन जी