मंगलवार, 11 मार्च 2014

सावन में आना और खूब बरसना!

रात के ग्यारह बज चुके है, रात अपनी रवानी में होनी चाहिए, लेकिन नहीं सारी नीरवता गरजते-बरसते बादल खत्म कर रहे हैं। ठंडी हवा के साथ पानी खिड़की-दरवाजों से होकर कमरे के अंदर आने की कोशिश में.... सिरहन पैदा करने वाली ठंडी हवा कमरे से कहीं अधिक मेरे मन के अंदर प्रवेश कर रही है! मार्च के इस महीने हम सुहानी रातों के अभ्यस्त रहे हैं। पर चुनाव का मौसम देखकर यह बादल आमजन की तरह विद्रोही होता जा रहा है। शायद अपना गुस्सा दिखाने का यह बेबस तरीका ही बादल को पसंद आया हो।
ऐसा नहीं है कि मौसम का यह बदलाव दिल्ली में ही हो, पूरे देश  में ही ऐसी ही बयार बह रही है। यह बयार कहीं न कहीं विक्षोभ का दवाब पैदा करके जहां तहां अपनी मन-मानी कर रही है। और परिणाम.... बेमौसम आंधी, ओला और बरसात..... सब एक साथ..... तुम चलो हम आते है कि तर्ज के साथ।
दिल्ली मे बैठ कर न जाने क्यूँ लगता है कि मौसम की यह साजिश दिल्ली से रची जा रही है। दिल्ली मे रह रहे लोगो मे यह भ्रांति आ जाती है कि सब कुछ दिल्ली से ही संचालित है। हो सकता है इसी कारण मुझे लग रहा हो। हो सकता है खामखयाली हो !!
 दिल्ली सत्ता का केंद्र है और वर्षों से है, किसी को कोई आपत्ति भी नहीं है। पर मौसम का केंद्र
अपनी धुन मे भींगता बचपन 
दिल्ली नहीं होनी चाहिए। जिस आशंका मे मैं घिरती जा रही हूँ।  मेरी चिंता बस सत्ता को अपने ढ़ग से चलाने और नियंत्रित करने वालों से है। आखिर इस होड़ में नुकसान हमारा और आपका होना निश्चित होगा। इसलिए नही चाहती कि इस व्रष्टि का केंद्र दिल्ली बने।


अमूमन मुझे बरसात बहुत अच्छी लगती है, इतनी अच्छी कि हमेषा बारिस में भीगने का कारण ढूढती रहती हूं। सबसे अनोखी लगती है जनवरी महीने में होने वाली बारिस किसानी भाषा में कहे तो 'महावट'। जिसके बारे में पापा हमेशा  कहा करते थे कि यह बारिस नहीं, बूंद के रूप में  अनाज बरस रहा है। इसलिए मैं इसे अनोखी बरसात मानती आई हूं। बचपन में हमेशा  जनवरी-फरवरी की आंधी-पानी के बाद पेड़ में लगे बेर गिर जाया करते थे और हम बारिस थमने का इंतजार करके तुरंत पेड़ के पास पहुंच कर कीचड़ की परवाह  किये, बेर बटोरने में लग जाते थे, बगैर किसी मेहनत के  अपनी फ्राक भर कर घर आ जाया करते थे। पर इस बार!!!
 मुझे महसूश हो रहा है कि इस बार केवल बेर नहीं गिर रहे होगे बल्कि खेतों में कहीं न कहीं किसानों के अरमान, आशा, मेहनत भींग और सूख रही होगी। जिसको समेटने की हिम्मत किसी के हाथों में नहीं होगी। इसलिए बादलों से मेरी गुजारिश  है कि किसी का गुस्सा किसी पर मत निकालों!!! बस  बहुत हो गया.... फागुन में रंग बरसने दो....सावन में आना और खूब बरसना!!!



रविवार, 23 फ़रवरी 2014

एक दबाव ग्रुप के रूप में उभरें महिलाएं

पिछले दिनों वार्षिक ब्लॉग मीट-2014 यानि "Annual Bloggers Meet, 2014" में जाना हुआ, जहां एक बहुत ही अनोखा और उत्सावर्द्धक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। अनोखा इसलिए था कि इस बार हम ‘ब्लॉग मीट’ में हम ब्लॉग या किसी वैकल्पिक मीडिया के बारे में चर्चा करने के लिए इकटठे नहीं हुए थे जैसे कि अमूमन हम ब्लॉगर अक्सर इकट्ठा होकर रायशुमारी करते रहते थे, बल्कि इस ब्लॉग मीट में हम ऐसी समस्याओं या मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एकजुट हुए थे जो देष की आजादी से लेकर अभी तक हमें परेषान किये हुए हैं। हम सभी ब्लॉगर मित्रों को प्रमुख रूप से चार विषय चर्चा करने के लिए दिये गये। ये चार विषय थे- पहला, सांप्रदायिक सौहार्द कैसे बनाए, युवा शक्ति दोहन और उत्थान, महिला की सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी, सरकार के कामकाज में पारदर्षिता। आपसी चर्चा के बाद अपने अपने विचार भी देने को कहा गया, जो इस बात को आगे बढाये कि इन सभी समस्याओं से हम कैसे उबर सकते हैं। या फिर हम इन मुद्दों से निपटने के लिए क्या निवारक उपाय अपना सकते है। वैसे यह विशिष्ट कार्यक्रम "A Billion Ideas" की तरफ से आयोजित था।
मैंने इन सभी मुद्दों में से चर्चा के लिए ‘महिलाओं की सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी’ को चुना। यह भागीदारी घर, समाज और देश के नागरिक के तौर पर महिलाओं को किस सीमा तक मिली हुई है और वह इसका उपयोग किस हद तक कर रही हैं? यदि नहीं कर पा रही हैं तो क्या कारण हैं? ऐसी बाध्यताओं को कैसे दूर किया जा सकता है। ऐसे कई सवालों पर अपने सभी ब्लॉग मित्रों से हम सबने चर्चा की। चर्चा काफी सार्थक और उपयोगी रही। हम सभी ने अपने आसपास, घर-पड़ोस, देष-विदेष की महिलाओं की स्थिति को अपनी बातचीत में षामिल भी किया। जिसके बाद काफी ऐसी चीजें सामने आई जिन पर हम अधिक सोचते भी नहीं थे। सर्वाधिक हमारा खुद का घर, जहां महिलाएं हमारे साथ पत्नी, बेटी या बहन के रूप में हमसे दिन-रात टकराती रहती है। उनकी आजादी, अधिकार और सरोकार के बारे में हम कितना सोचते है? या कितना दे पाते हैं? यह प्रश्न  सबसे ज्यादा मथ गया हम सभी को! इसलिए हम सभी इस बात पर सहमत हुए कि षुरूआत हमें अपने घरों से करनी पड़ेगी क्योंकि हमारे समाज में लैंगिंग असमानता हमारे घरों से निकल कर सभी जगहों में फैलती है। इसलिए पहले घर में सुधार हो। तब बात बनें!
महिलाओं की समाज में भागीदारी सुनिष्चित करने के संदर्भ में मैं दो बातों पर अधिक जोर देना चाहूंगी- पहली कि महिलाओं को एक प्रतीकात्मक स्थिति से बचाना होगा, दूसरा उनकी राजनीतिक भागीदारी।
   महिलाओं को एक प्रतीकात्मक रूप दे देने के कारण वह महज षो पीस बन कर रह जाती है। इसलिए हमारे खासतौर पर हिंदू समाज मंे महिला या तो देवी होती है या सबसे निकृश्ट प्राणी। जिसे पैदा करने से पहले कई बार सोचा जाता है इसलिए उन्हें कोख में ही मौत की नींद सुला दिया जाता है। महिलाओं को जब पुरुषों की तरह का एक प्राणी मात्र मान लिया जाय और किसी प्रतीक के तौर पर उन्हें प्रस्तुत न किया जाए तब ही मां-बाप से लेकर समाज उनके बारे में सोचेगा। तो पहले हमें इस बात को भली-भांति समझ लेना है।
दूसरा महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी। इस समय संसद में महिला आरक्षण को लेकर काफी राजनीति चल रही हैं।  देर-सबेर महिलाओं को संसद में आरक्षण मिल भी जाएगा। पर प्रष्न यह है कि इसके बाद भी क्या महिलाओं की समाज और राजनीति में भागीदारी सुनि
वार्षिक ब्लॉग मीट-2014
ष्चित हो जाएगी? क्या वे निर्णय लेने में सहभागी होगी? षायद नहीं? असल में राजनीतिक सहभागिता दो तरह से होती है- सहयोग व असहयोग। महिला आरक्षण के बाद हम राजनीति में सहभागी तो जाएगें, हम वहीं राजनीति करेंगे जो स्थापनाएं अभी तक पुरूषों ने राजनीतिक क्षेत्र में खड़ी की हैं। भारत में महिलाएं भी एक लोकतांत्रिक देश की तरह रह रही हैं, उनके लिए भी संवैधानिक अधिकार संविधान ने दिए है। फिर भी आज तक वे अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए कहीं नजर नहीं आती हैं? वोट भी वे अपने परिवार या पति के कहने पर दे आतीं हैं। यह राजनीतिक सहभागिता नहीं है। किसी भी तरह की जानकारी और सूचना हासिल करना, राजनीतिक कार्यो में पारदर्षिता की मांग, सामाजिक मुद्दों पर बहस व संगोष्ठि करना, विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना, प्रतिनिधियों और जनता के बीच संवाद कायम करना आदि कार्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा होते है, इन सभी में महिलाओं को बढ़-चढ़ कर योगदान करना चाहिए। घर में बैठकर इंतजार नहीं करना चाहिए। जिससे समाज में आधी आबादी का एक दवाब समूह तैयार हो सके। जिसके पास यह क्षमता हो कि वह अपने हित में सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी परिवर्तन कर सके। ऐसे ग्रुप सामाजिक और राजनीतिक दोनों रूपों में बेहतर काम कर सकते हैं।
आज भी हमारे यहां एक महिला और बाल कल्याण मंत्रालय होता है। महिलाओं को हम हमेशा उनके बच्चों से जोड़कर देखने के हम आदी हो गये है। वजह है महिलाओं को पुरुषों के बराबर समान नागरिक नहीं समझा जाता। जबकि हमारे पास संवैधानिक अधिकार है। उनके घरेलू श्रम को आज भी मान्यता प्रदान नहीं की जा रही हैं। समग्र राष्ट्रीय आय में उसका क्या योगदान है, यह पता किया जाना जरूरी है। कहने का अर्थ है कि महिलाओं को डिसीजन मेंकिंग के काबिल बनाने से पहले उन्हें आधी आबादी के रूप में मान्यता देनी होगी। जिस दिन यह हो जाएगा, वे अपने डिसीजन खुद लेंगी और दूसरों के बारे में भी।


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

इस वसंत में

प्रेम जानने के लिए
खरीद लाई
प्रेम विशेषांक
प्रेम के सभी महाविशेषांक
प्रेम में पकी कविताएं
प्रेम पर लिखी सभी कहानियों के
हर शब्द को
पढ़ा मैंने
गुना मैंने
चखा मैंने
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फिर भी
पैदा नहीं  कर पाई
कोई प्रेम विज्ञान
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पर आज
एक बच्चे की
मासूम मुस्कान ने
फूलों से सिंचे रस जैसा
शहद  बना दिया
मेरे गाँव से एक बच्ची की  मनमोहक मुस्कान युक्त तस्वीर 
मेरे ओठों पर
बगैर किसी
मधुमास के।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

एक पूरा साल... 2013

कहने को आज बीत गया
एक पूरा साल... 2013
कामोवेश......
इस साल भी थे
बारह महीने
वही जनवरी, फरवरी
 ...नवंबर, दिसबंर
सात-सात दिन मिलाकर हफ्ते
और हफ्ते मिलकर महीना
कोई तीस दिन का,
कोई इक्तीस दिन का।
हर साल की तरह
इस साल भी थे तीन सौ पैसठ दिन
अंतर दिखा तो बस
कलैंडर में
पिछले वर्ष जब था सोमवार
उसी दिन इस वर्ष पड़ा मंगलवार।
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और इस तरह 2012 का पुराना कलैंडर
देखते देखते
बीत गया
एक पूरा
नया साल- 2013


सोमवार, 23 सितंबर 2013

हम कितने धर्मिक है!

आईटीओ के पुल से
गुजरते हुए देखा मैंने
एक आदमी को।

हाथ में दो थैले
तैयार था पुल से नीचे
यमुना नदी में फेंकने को
उस ‘पवित्र कूड़े’ को
जिसे अपने घर में
अपनी धर्मिक मान्यताएं
निभाने के बाद
झाड़-पोछकर
पानी में विर्सजन हेतु
तत्पर था पूरी धर्मनिष्ठा से
फेकने के लिए इस
पुल से।

000

सर,र,र
छप्प...छपाक्
नदी में गिरती हैं थैलियां
एक मिनट के
अंतराल में थैलियां
यमुना के दूसरे किनारे
से जा टकराती हैं
मुझे पता नहीं है कि
अभी कितनी और दूर
बहेगा पालीथीन में कैद
यह ‘पवित्र कूड़ा।’

पर सोचती हूं कि
कितना अच्छा होता
अगर उस अमुक ने
आजाद कर दिया होता
इस पैकेजिंग की संस्कृति से
इस कूड़े को,
तो ‘पवित्र कूड़ा’
कैसे हिल-मिलकर
बह रहा होता यमुना में
बगैर किसी संघर्ष के
और विलीन हो जाता
यमुना के संघर्षशील जल में
जैसे सदियों से
यमुना में विलीन होती आ रही थी
हमारी सभ्यताओं की मलिनताएं।

000

हां, अब तक
आप सही सोच रहे होगे कि
दिल्ली में यमुना साफ-सुथरी
थोड़े ही बह रही है?
इसमें मिली हैं कई किस्म की गंदगियां
तो फर?

क्या हुआ जो डाल दिया
इतना सा
‘पवित्र कूड़ा’?

शायद
कुछ नहीं
पर थोड़ा थोड़ा करके ही तो
बहुत कुछ हुआ है!
इससे तो आप सहमत होंगे ही।

000

एक चिंता है मेरी
पर पता नहीं
कितनी जायज है?
अभी गणेश उत्सव बीता है
नव दुर्गा आने वाली है
इन सभी पवित्र मूर्तियों का
जल प्रवाह, जल विसर्जन
इसी यमुना में तो किया जाएगा!
और हां, ‘छठ’ भी तो है ?

सच में
हम कितने धर्मिक है!!!


यमुना के किनारे नावों का रंगीन नजारा (वृन्दावन, मथुरा )

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

एक शाश्वत युद्ध

इन दस महीनों मेँ
कभी भी मैंने
तुम्हारा वास्तविक नाम जानने की
कोशिश नहीं की
तुम कहाँ की रहने वाली हो
इसमे भी मेरी कोई दिलचस्पी नहीं बनी
तुम्हारे भाई बहन कितने है ?
यह भी जानने की इच्छा
कभी नहीं पनपी
मन मेँ अगर कोई इच्छा थी
तो, बस यही
कि इंसाफ हो
तुम्हें इंसाफ मिले,
भरपूर इंसाफ
उस अन्याय के खिलाफ
जिसके विरुद्ध तुम
छेड़ कर गई हो
एक शाश्वत युद्ध
इस युद्ध को जिलाए
रखना है हमें
तुम्हारे जाने के बाद
अलाव मे एक चिंगारी
दबाये रखना है
किसी दामनी, निर्भया
या ज्योति के लिए!!

(13 सितंबर को रेयरेस्ट आफ द रेयर केस पर फैसला आने के बाद...)

शनिवार, 7 सितंबर 2013

ओस की बूंद

‘रात’ कभी भी
एक क्षण को भी
दम नहीं मारती।
जबकि सभी
उसकी गोद में
अपनी थकान लेकर
समा जाते है
बेसुध बेखबर।
और 'रात'....
पूरी रात मुस्तैदी से पहरा
बिठाए रखती है
इस कायनात में
कि कहीं
किसी के सपने में
खलल न पड़ जाए!

0000
सारी रात
सभी को
मीठे सपने
बुनने देने का
परिणाम होता हैं
सुबह घास के
तिनकों पर
बिखरी...
निर्मल, ठंडी
ओस की बूंदें
जैसे कोई किसान
अभी अभी
पसीना बहाकर
लौटा हो
खेत से।
मेरे गाँव 'पतरसा ' मे एक धूधली  शाम का चित्र