मंगलवार, 24 सितंबर 2019

एक रुपये में महिला स्वास्थ्य


‘महिलाएं टैक्स फ्री सैनेटरी नैपकिन की मांग कर रही हैं, मगर मैं चाहता हूं कि यह पूरी तरह से मुफ्त हो, क्योंकि महिलाओं की सेहत से जुड़ा यह बहुत ही गंभीर मसला है। सिर्फ रक्षा बजट में 5 फीसदी की कमी करके सरकार महिलाओं को यह सौगात दे सकती है।’ ये बाते फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार ने अपनी फिल्म पैडमैन के प्रचार के दौरान कही थी। जो आज जाकर मौजूं हुई है। फ्री तो नहीं हुआ, पर उसकी कीमत न के बराबर रख दी गई है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना के अंतगर्त सुगम एप को लांच करने के दौरान महिलाओं के लिए सैनेटरी पैड की कीमत एक रुपये प्रति पैड रख दी है। यह सुविधा प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि के अंतगर्त हर महिला उठा सकती है। पहले इसकी कीमत प्रति पैड ढाई रुपये थी। 4 जून, 2018 को ‘जन औषधि सुविधा ऑक्‍सो-बायोडीग्रेडेबल सेनेटरी नैपकीन’ की शुरूआत की गई थी। जन औषधि सुविधा की विशेष बात यह है कि यह इस्‍तेमाल के बाद ऑक्‍सीजन के संपर्क में आता है तो यह बायोडीग्रेडेबल हो जाता है। 31 अगस्‍त, 2019 तक प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केन्‍द्रों ने कुल 1.30 करोड़ से अधिक पैड की बिक्री की थी।
जन औषधि सुगम एप के अवसर पर यह तथ्य सामने आया कि बेहतर सैनेटरी नैपकिन के अभाव में 28 मिलियन किशोरियां बीच में पढ़ाई छोड़ देती हैं। उन्हें पीरियड से निपटने के लिए सुविधाजनक नैपकीन उचित दाम पर नहीं मिल पाते हैं। अब इस योजना से देश की वंचित महिलाओं और किशोरियों की ‘स्‍वच्‍छता, स्‍वास्‍थ्‍य और सुविधा’ सुनिश्चित होने की संभावना बढ़ी है। वास्तव में बहुत से शोध और अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि महिलाएं पीरियड से निपटने के लिए कई तरह के असुरक्षित तरीकों का इस्तेमाल करती हैं। यह बहुत कुछ अशिक्षा, अंधविश्वास और आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण भी होता है। वैसे तो बाजार में कई तरह के ब्रांड वाले सैनेटरी पैड उपलब्ध हैं, पर इनकी कीमत इतनी ज्यादा है कि महिलाएं अपने स्वास्थ और हाइजीन की कीमत पर इसे नजरअंदाज करती रहती हैं। ऐसे में महिलाओं के लिए स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह एक महत्‍वपूर्ण सरकारी कदम माना जा सकता है।
देखा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों या कम पढ़ी-लिखी महिलाएं आज भी पीरियड संबंधी भ्रांतियों, शर्म और अंधविश्वास की जकड़न में कैद हैं। इसलिए इस दौरान इतने अस्वास्थ्यकर तरीके अपनाये जाते हैं कि महिलाओं को अनेक तरह के रोग के रोग लग जाते हैं। देश में गर्भाशय का कैंसर या सर्वाइकल कैंसर का सबसे बड़ा कारण यही अस्वास्थकर परिस्थितियां हैं। महिलाओं में होने वाले सभी तरह के कैंसर में सर्वाइकल कैंसर 23 प्रतिशत है। शोध बताते हैं कि इसका सीधा कनेक्शन एचपीवी इंफेक्शन और पीरियड में स्वच्छता का अभाव होता है। स्वच्छता का ख्याल का मतलत पीरियड के दौरान साफ-सुथरे ढंग से रहना है। इसके लिए कहीं अधिक मात्रा में सस्ते और हाईजीन सैनेटरी नैपकिन की जरूरत होती है। हमारे देश में किशोरियों की स्कूल में 24 फीसदी अनुपस्थिति पीरियड्स के दौरान होती है। इसलिए कुछ राज्यों में सस्ते सैनेटरी पैड स्कूलों में मुफ्त दिए जा रहे हैं। पर यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि सभी लड़कियां स्कूल नहीं जा पाती हैं।

2011 में ए.सी. नीलसन और प्लान इंडिया ने ‘सैनेटरी प्रोटेक्शन : एवरी वूमेन्स हेल्थ राइट’ नाम से एक अध्ययन किया था जिसमें उन्होंने दावा किया था कि भारत में सिर्फ 12 प्रतिशत महिलाएं ही सैनेटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं, बाकी महिलाएं उन दिनों असुरक्षित साधनों का इस्तेमाल करती हैं। यह स्टडी काफी विवादित रही थी। भारत सरकार ने इस स्टडी को आधार बनाकर ही अपनी कई योजनाओं की रणनीति बनाई थी। लेकिन बाद में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-2015-16 ने एक दूसरी ही तस्वीर प्रस्तुत की। इस सर्वे के अनुसार कुल मिलाकर देश की 58 प्रतिशत महिलाएं हाइजीन तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं। आज दस में छह महिलाएं डिस्पोजेबल सैनेटरी नैपकिन प्रयोग करती हैं। इससे पता चलता है कि महिलाएं साफ-सफाई की जरूरत स्वयं समझ रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में सरकार की यह पहल महिलाओं और किशोरियों के लिए एक सहारा साबित होगी, बशर्ते प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केन्‍द्रों की संख्या और पहुंच महिलाओं तक हो जाए।

सोमवार, 12 अगस्त 2019

साइंस पढ़ने वाली महिलाएं जाती कहां हैं?

अपने लक्ष्य के लिए तीन लाख चौरासी हजार किलोमीटर की यात्रा पर चंद्रयान-2 निकल चुका है। इस मिशन की कमान संभालने वाली दो महिला वैज्ञानिक ऋतु करीधल और एम. वनिता को देश सलाम कर रहा है। इसरो की वैज्ञानिक ऋतु करीधल चंद्रयान-2 मिशन की डायरेक्टर हैं और एम. वनीता इस मिशन की प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं। इनकी अथक मेहनत का फल है कि आज देश अंतरिक्ष क्षेत्र में इतनी बड़ी उपलब्धि को सेलिब्रेट कर रहा है। महिलाओं की तरफ से देश को मिली यह पहली उपलब्धि नहीं है, जब ऐसे किसी मिशन में महिला वैज्ञानिकों ने सहयोग किया हो। इससे पहले 2013 में मंगल मिशन की सफलता का जश्न मनाती हुईं महिलाओं की तस्वीर वायरल हो चुकी है। इस फोटो में साधारण साड़ियों में लिपटी हुई महिला वैज्ञानिक मार्स आर्बिटर मिशन की सफलता का जश्न मना रही थीं। इस मिशन में आठ महिला वैज्ञानिकों ने अपनी खास भूमिका निभाई थी। इस विषय को आधार बनाकर एक फिल्म ‘मिशन मंगल’ भी बन चुकी है।
चंद्रयान-2 मिशन में इन दो महिला वैज्ञानिक के अलावा और भी महिला वैज्ञानिकों का साथ मिला। चेयरमैन के. सिवन की माने तो इस प्रोजेक्ट में 30 फीसदी महिला वैज्ञानिकों की अथक परिश्रम शामिल है। चंद्रयान-2 मिशन में मौमिता दत्ता, नंदिनी हरिनाथ, एन. वलारमथी, मीनल संपथ, कीर्ति फौजदार और टेसी थॉमस जैसी दूसरी महिला वैज्ञानिक शामिल हैं। इस उपलब्धि को बांटते हुए इसरो के चेयरमैन के. सिवन ने कहा था कि हम पुरुष और महिला वैज्ञानिकों में अंतर नहीं समझते हैं। जो भी सक्षम होता है, उसे बेहतरीन काम सौंपा जाता है। शायद इसरो के चेयरमैन का यही विश्वास आज कार्यरूप में परिणत हुआ दिखता है।
महिलाओं की विज्ञान के क्षेत्र में इन तमाम उपलब्धियों के बीच आज भी यही देखा जाता है कि विज्ञान पुरुष वर्चस्व का क्षेत्र बना हुआ है। ऐसा नहीं है कि महिलाएं विज्ञान और टेक्नॉलजी पढ़ने में रुचि नहीं ले रही हैं। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन 2016-17 बताता है कि पुरुषों के मुकाबले आधे से कहीं ज्यादा महिलाएं विज्ञान विषय में ग्रेजुएट थीं, जबकि 60 फीसदी महिलाओं ने एमसी की थीं। इसी तरह विज्ञान से पीएचडी करने वाली महिलाएं भी अधिक संख्या में थीं। पीएचडी करने वाली महिलाओं में मैथ से पीएचडी करने वाली महिलाएं 55 फीसदी से अधिक और फिजिक्स और कमेस्ट्री से पीएचडी करने वाली महिलाएं भी 30 फीसदी से अधिक थीं। आंकड़ों के प्रकाश में कहा जा सकता है कि महिलाओं की न केवल विज्ञान और तकनीकि में रुचि है, बल्कि वे आगे इस विषय की पढ़ाई भी कर नहीं हैं। सवाल यह है कि फिर क्या कारण है कि महिलाएं इसे अपना करियर बनाने में पिछड़ रही हैं। साथ-साथ विज्ञान में शोध और विभिन्न प्रकार के रिसर्च और दूसरी गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों रहती है?
समय-समय पर होने वाले विभिन्न संस्थानों के सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि केवल 25 फीसदी महिलाएं ही विभिन्न संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में साइंस फैकल्टी हैं। इसमें बायोलॉजी का सेक्टर जरूर अपवाद हैं। यहां महिलाएं अधिक संख्या में काम कर रही हैं। देश के अनुसंधान और विकास संस्थानों में 2.8 लाख वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों में से केवल 14 फीसदी महिलाएं ही काम रही हैं। संख्या के हिसाब से यह 39,389 महिलाएं हैं। जबकि वैश्विक औसत 28.4 फीसदी का है। यही हाल देश के विभिन्न आईआईटी संस्थानों का भी है। 2017 में देश के विभिन्न आईआईटी संस्थानों की विभिन्न शाखाओं में महिला आवेदक सिर्फ 10 फीसदी थीं। अगर विज्ञान और तकनीकि से संबंधित शोध और रिसर्च की बात की जाए तो महिलाएं काफी पिछड़ी हुई हैं। इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी, इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस, नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस की केवल पांच फीसदी फेलोशिप महिलाएं लेती हैं। इससे समझा जा सकता है कि जब बात साइंस और तकनीकि में करियर बनाने की आती है, तब महिलाएं कहीं न कहीं पीछे रह जा रही हैं।

मार्च, 2018 में मणिपुर यूनीवर्सिटी में सातवीं वुमन साइंस कांग्रेस का आयोजन हुआ था। महिला वैज्ञानिकों के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में यह दुर्भाग्य था कि स्टेज पर केवल दो महिला वैज्ञानिक ही भाग लेती हुई नजर आईं। यह कार्यक्रम बताता है कि देश में महिला वैज्ञानिकों की कितनी कमी है। इस आयोजन में महिला वैज्ञानिकों ने कहा कि महिलाएं बड़े पैमाने में विज्ञान क्षेत्र में पीजी और पीएचडी की पढ़ाई करती हैं, पर वे अपनी इस पढ़ाई को अपनी बायोलॉजिकल क्लॉक और पारिवारिक दबाव के कारण कॅरियर में कंवर्ट नहीं कर पाती हैं। सोसायटी ऑफ सोसियो इकोनामिक्स स्टडी एंड सर्विसेज (एसएसइएसएस), कोलकाता ने नीति आयोग के सहयोग से महिला वैज्ञानिकों पर एक स्टडी रिपोर्ट- 2017-18 तैयार करवाई है। इसमें इस बात का पता लगाने की कोशिश की गई है कि विज्ञान के क्षेत्र महिलाओं को उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में जाने के परिप्रेक्ष्य में उनके सामने क्या इश्यू और चैलेंज रहते हैं। यह सर्वे पूरे देश को छह विभिन्न जोन में बांटकर बड़े पैमाने पर किया गया।
इस सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि 15 फीसदी महिलाओं ने अपने करियर में एक वर्ष का ब्रेक लेना पड़ा। जबकि 2 फीसदी महिलाओं ने दो वर्ष का एवं एक फीसदी महिलाओं ने तीन वर्ष से अधिक समय का अपने करियर ब्रेक लेना पड़ा। करियर में महिलाओं को यह ब्रेक शादी और शादी के बाद परिवारिक जिम्मेदारियों और बच्चों की परवरिश के कारण लेने पड़ते हैं। इस सर्वे रिपोर्ट में यह भी बात सामने आई कि महिलाओं ने अपने करियर ग्रोथ के लिए शादी से पहले का समय चुना यानी उन्होंने शादी देर से की। इसके अतिरिक्त शादी के कारण उनका स्थान परिवर्तन भी एक तरह से बाधा डालता है। ऐसे में सातवीं वुमन साइंस कांग्रेस में महिला वैज्ञानिकों ने करियर में आने वाली जिन समस्याओं का जिक्र किया, उनमें से महिलाओं की परिवार संबंधी जिम्मेदारियां भी एक कारण है। अमूमन महिलाओं के करियर में जो आमतौर पर बाधाएं होती हैं, कामोवेश वही सब बाधाएं महिला वैज्ञानिकों के मार्ग में भी आती हैं। इन सबके बावजूद भी अगर महिला वैज्ञानिक हम देशवासियों को गर्व करने का मौका देती हैं, तो हमें उनके बारे में सोचना चाहिए, तभी उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है।