सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

साइंस पढ़ने वाली महिलाएं जाती कहां हैं?

अपने लक्ष्य के लिए तीन लाख चौरासी हजार किलोमीटर की यात्रा पर चंद्रयान-2 निकल चुका है। इस मिशन की कमान संभालने वाली दो महिला वैज्ञानिक ऋतु करीधल और एम. वनिता को देश सलाम कर रहा है। इसरो की वैज्ञानिक ऋतु करीधल चंद्रयान-2 मिशन की डायरेक्टर हैं और एम. वनीता इस मिशन की प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं। इनकी अथक मेहनत का फल है कि आज देश अंतरिक्ष क्षेत्र में इतनी बड़ी उपलब्धि को सेलिब्रेट कर रहा है। महिलाओं की तरफ से देश को मिली यह पहली उपलब्धि नहीं है, जब ऐसे किसी मिशन में महिला वैज्ञानिकों ने सहयोग किया हो। इससे पहले 2013 में मंगल मिशन की सफलता का जश्न मनाती हुईं महिलाओं की तस्वीर वायरल हो चुकी है। इस फोटो में साधारण साड़ियों में लिपटी हुई महिला वैज्ञानिक मार्स आर्बिटर मिशन की सफलता का जश्न मना रही थीं। इस मिशन में आठ महिला वैज्ञानिकों ने अपनी खास भूमिका निभाई थी। इस विषय को आधार बनाकर एक फिल्ममिशन मंगल भी बन चुकी है।
चंद्रयान-2 मिशन में इन दो महिला वैज्ञानिक के अलावा और भी महिला वैज्ञानिकों का साथ मिला। चेयरमैन के. सिवन की माने तो इस प्रोजेक्ट में 30 फीसदी महिला वैज्ञानिकों की अथक परिश्रम शामिल है। चंद्रयान-2 मिशन में मौमिता दत्ता, नंदिनी हरिनाथ, एन. वलारमथी, मीनल संपथ, कीर्ति फौजदार और टेसी थॉमस जैसी दूसरी महिला वैज्ञानिक शामिल हैं। इस उपलब्धि को बांटते हुए इसरो के चेयरमैन के. सिवन ने कहा था कि हम पुरुष और महिला वैज्ञानिकों में अंतर नहीं समझते हैं। जो भी सक्षम होता है, उसे बेहतरीन काम सौंपा जाता है। शायद इसरो के चेयरमैन का यही विश्वास आज कार्यरूप में परिणत हुआ दिखता है।
महिलाओं की विज्ञान के क्षेत्र में इन तमाम उपलब्धियों के बीच आज भी यही देखा जाता है कि विज्ञान पुरुष वर्चस्व का क्षेत्र बना हुआ है। ऐसा नहीं है कि महिलाएं विज्ञान और टेक्नॉलजी पढ़ने में रुचि नहीं ले रही हैं। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन 2016-17 बताता है कि पुरुषों के मुकाबले आधे से कहीं ज्यादा महिलाएं विज्ञान विषय में ग्रेजुएट थीं, जबकि 60 फीसदी महिलाओं ने एमसी की थीं। इसी तरह विज्ञान से पीएचडी करने वाली महिलाएं भी अधिक संख्या में थीं। पीएचडी करने वाली महिलाओं में मैथ से पीएचडी करने वाली महिलाएं 55 फीसदी से अधिक और फिजिक्स और कमेस्ट्री से पीएचडी करने वाली महिलाएं भी 30 फीसदी से अधिक थीं। आंकड़ों के प्रकाश में कहा जा सकता है कि महिलाओं की न केवल विज्ञान और तकनीकि में रुचि है, बल्कि वे आगे इस विषय की पढ़ाई भी कर नहीं हैं। सवाल यह है कि फिर क्या कारण है कि महिलाएं इसे अपना करियर बनाने में पिछड़ रही हैं। साथ-साथ विज्ञान में शोध और विभिन्न प्रकार के रिसर्च और दूसरी गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों रहती है?
समय-समय पर होने वाले विभिन्न संस्थानों के सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि केवल 25 फीसदी महिलाएं ही विभिन्न संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में साइंस फैकल्टी हैं। इसमें बायोलॉजी का सेक्टर जरूर अपवाद हैं। यहां महिलाएं अधिक संख्या में काम कर रही हैं। देश के अनुसंधान और विकास संस्थानों में 2.8 लाख वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों में से केवल 14 फीसदी महिलाएं ही काम रही हैं। संख्या के हिसाब से यह 39,389 महिलाएं हैं। जबकि वैश्विक औसत 28.4 फीसदी का है। यही हाल देश के विभिन्न आईआईटी संस्थानों का भी है। 2017 में देश के विभिन्न आईआईटी संस्थानों की विभिन्न शाखाओं में महिला आवेदक सिर्फ 10 फीसदी थीं। अगर विज्ञान और तकनीकि से संबंधित शोध और रिसर्च की बात की जाए तो महिलाएं काफी पिछड़ी हुई हैं। इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी, इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस, नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस की केवल पांच फीसदी फेलोशिप महिलाएं लेती हैं। इससे समझा जा सकता है कि जब बात साइंस और तकनीकि में करियर बनाने की आती है, तब महिलाएं कहीं कहीं पीछे रह जा रही हैं।

मार्च, 2018 में मणिपुर यूनीवर्सिटी में सातवीं वुमन साइंस कांग्रेस का आयोजन हुआ था। महिला वैज्ञानिकों के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में यह दुर्भाग्य था कि स्टेज पर केवल दो महिला वैज्ञानिक ही भाग लेती हुई नजर आईं। यह कार्यक्रम बताता है कि देश में महिला वैज्ञानिकों की कितनी कमी है। इस आयोजन में महिला वैज्ञानिकों ने कहा कि महिलाएं बड़े पैमाने में विज्ञान क्षेत्र में पीजी और पीएचडी की पढ़ाई करती हैं, पर वे अपनी इस पढ़ाई को अपनी बायोलॉजिकल क्लॉक और पारिवारिक दबाव के कारण कॅरियर में कंवर्ट नहीं कर पाती हैं। सोसायटी ऑफ सोसियो इकोनामिक्स स्टडी एंड सर्विसेज (एसएसइएसएस), कोलकाता ने नीति आयोग के सहयोग से महिला वैज्ञानिकों पर एक स्टडी रिपोर्ट- 2017-18 तैयार करवाई है। इसमें इस बात का पता लगाने की कोशिश की गई है कि विज्ञान के क्षेत्र महिलाओं को उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में जाने के परिप्रेक्ष्य में उनके सामने क्या इश्यू और चैलेंज रहते हैं। यह सर्वे पूरे देश को छह विभिन्न जोन में बांटकर बड़े पैमाने पर किया गया।
इस सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि 15 फीसदी महिलाओं ने अपने करियर में एक वर्ष का ब्रेक लेना पड़ा। जबकि 2 फीसदी महिलाओं ने दो वर्ष का एवं एक फीसदी महिलाओं ने तीन वर्ष से अधिक समय का अपने करियर ब्रेक लेना पड़ा। करियर में महिलाओं को यह ब्रेक शादी और शादी के बाद परिवारिक जिम्मेदारियों और बच्चों की परवरिश के कारण लेने पड़ते हैं। इस सर्वे रिपोर्ट में यह भी बात सामने आई कि महिलाओं ने अपने करियर ग्रोथ के लिए शादी से पहले का समय चुना यानी उन्होंने शादी देर से की। इसके अतिरिक्त शादी के कारण उनका स्थान परिवर्तन भी एक तरह से बाधा डालता है। ऐसे में सातवीं वुमन साइंस कांग्रेस में महिला वैज्ञानिकों ने करियर में आने वाली जिन समस्याओं का जिक्र किया, उनमें से महिलाओं की परिवार संबंधी जिम्मेदारियां भी एक कारण है। अमूमन महिलाओं के करियर में जो आमतौर पर बाधाएं होती हैं, कामोवेश वही सब बाधाएं महिला वैज्ञानिकों के मार्ग में भी आती हैं। इन सबके बावजूद भी अगर महिला वैज्ञानिक हम देशवासियों को गर्व करने का मौका देती हैं, तो हमें उनके बारे में सोचना चाहिए, तभी उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। 

टिप्पणियाँ

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन स्वतंत्रता और रक्षा की पावनता के संयोग में छिपा है सन्देश : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तनुश्री से सवाल पूछने से पहले

नो एक शब्द ही नहीं, अपने आप में पूरा वाक्य है योरऑनर। इसे किसी तर्क, स्पष्टीकरण या व्याख्या की जरूरत नहीं है। ‘न’ का मतलब ‘न’ ही होता है योरऑनर। ’
‘न मैं नाना पाटेकर हूं और न तनुश्री, तो मैं आपके सवाल का जवाब कैसे दे सकता हूं।’

ऊपर लिखी यह दोनों लाइनें फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन ने बोली हैं। पहली लाइन फिल्म ‘पिंक’ में एक बलात्कार की शिकार लड़की का केस लड़ते हुए और दूसरी लाइन अभिनेत्री तनुश्री और नाना पाटेकर विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कही। मामला एक ही तरह का है, पर रील और रियल लाइफ का अंतर है। वास्तव में रील और रियल लाइफ में यही फर्क होता है। अगर तनुश्री और नाना पाटेकर विवाद रियल लाइफ में न होकर सिनेमा के लिए फिल्माया गया एक दृश्य जैसा होता तो? तो सदी के महानायक पुरजोर वकालत करके यह केस जीत लेते और फिल्म ‘हिट’ हो जाती। चूंकि मामला फिल्म का नहीं है, इसलिए वे बड़े ही ‘बेशर्म’ तरीके से इस सवाल से बच निकलते हैं। खैर, सदी के महानायक की छोड़िए, दरियादिल सलमान खान की बात कर लें। जब एक प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकार ने इस विवाद पर सलमान की प्रतिक्रिया जाननी चाही, तब ‘आप किस इवेंट में आई …

#मीटू : आखिरकार गुबार फूट ही पड़ा

तनुश्री और नाना के विवाद ने बहुत सी महिलाओं को यह हिम्मत दी कि यही सबसे ठीक समय है, जब वे अपनी घुटन से छुटकारा पा सकती हैं। तनुश्री से हिम्मत लेकर लेखिका और निर्देशिका विंता नंदा ने जब अभिनेता और संस्कारी बाबूजी के नाम से लोकप्रिय आलोकनाथ के बारे में विस्तार से लिखा, तो लोगों का आश्चर्यचकित हो जाना लाजिमी था। बीस साल पहले हुए विंता के यौन उत्पीड़न के बाद जिस तरह से एक के बाद एक मामले सामने आए, उससे आलोक नाथ की एक दूसरी छवि ही लोगों ने देख ली। इसी तरह तनुश्री के माध्यम से समाजसेवी नाना पाटेकर एक दूसरा स्वरूप लोगों के सामने आया। तनुश्री के समर्थन में कंगना ने जब विकास बहल पर अपनी बात रखी, तब ‘क्वीन’ जैसी वुमेन ओरिएंटेड फिल्म बनाने वाले व्यक्ति का एक और ही चेहरा सामने आया। इसी क्रम में पत्रकारिता के क्षेत्र से एक प्रमुख नाम एम.जे. अकबर का आया है। अब तक उन पर 15 महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। टेलीग्राफ, एशियन ऐज और इंडिया टुडे के शीर्ष पदों पर रहने के बाद आज वे केंद्र सरकार में विदेश राजमंत्री भी हैं।

गौर करने वाली बात है कि जिन पर भी आरोप लग रहे हैं, वे सब अपने-अपने क्…

शादी की उम्र को लेकर अंतर क्यों?

यह कैसा विरोधाभास है कि 18 साल की उम्र में सरकार चुन सकते हैं पर जीवनसाथी नहीं। इस मामले में शायद महिलाएं भाग्यशाली हैं कि वे 18 साल होने के बाद अपने लिए जीवनसाथी चुन सकती हैं, पर पुरुष नहीं। उन्हें महिला की तुलना में तीन साल और इंतजार करना पड़ता है। यही हमारे देश का कानून है- विभिन्न कानूनों के तहत शादी की न्यूनतम आयु महिलाओं के लिए 18 साल और पुरुषों के लिए 21 साल। शादी के लिए पुरुष और महिला की आयु का अंतर क्यों रखा जाता है? इस अंतर का क्या वैज्ञानिक या सामाजिक आधार है? क्या यह इस विचार को पोषित करता है कि पत्नी पति से उम्र में छोटी होनी चाहिए? इन प्रश्नों का कोई माकूल और तर्कशील उत्तर हमारे पास नहीं है। शायद इसीलिए विधि आयोग ने सुझाव दे दिया कि क्यों न पुरुषों की शादी की न्यूनतम आयु महिला के सामान 18 कर दी जाए।

बलवीर सिंह चौहान की अध्यक्षता वाली विधि आयोग ने हाल ही में ‘परिवार कानून में सुधार’ पर अपने परामर्श पत्र में पुरुषों की शादी की न्यूनतम उम्र महिला के बराबर 18 वर्ष करने का सुझाव दिया है। वैसे विधि आयोग इस सुझाव को उलट ढंग से भी कह सकता था। यानी महिला की शादी की न्यूनतम आयु पुर…