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सशक्त होतीं महिला वोटर

हमेशा से यह धारणा रही है कि महिलाएं वोट डालने के मामले में अपने परिवार का अनुसरण करती रही हैं और करती हैं। शायद यही कारण है कि देश की आधी आबादी को सत्ता में एक फिलर के तौर पर ही ट्रीट किया जाता है। राजनीतिक दलों की नजर उनके वोटों पर रहती तो हैपर वे उन्हें एक स्वतंत्र वोटर के रूप नहीं ले पाते हैं। इसलिए उनके घोषणापत्रों में भी महिलाओं के हिस्से में कोई ठोस योजनाओं की जगह लोकलुभावन और ‘राशन वितरण प्रणाली’ जैसे वादे ही नजर आते हैं। कई दल तो उन्हें साड़ीचूड़ीकुकरटीवी बांटकर ही उनके वोट हासिल करते हैं। कहने का अर्थ है कि देश में महिलाओं को एक अलग वोट बैंक के रूप में देखने और समझने की प्रवृत्ति बहुत देर से विकसित हुई।
सवाल है कि राजनीतिक दल महिलाओं को एक स्वतंत्र वोट बैंक के रूप में क्यों नहीं लेते हैं। क्या महिलाएं वोट करते समय स्वतंत्र नहीं होती हैंइसलिए राजनीतिक दल उन्हें एक इकाई न मानकर परिवार के साथ जोड़कर गिन लेते हैं। आज भी क्या महिलाओं की वोटिंग से राजनीति प्रभावित नहीं होती हैइन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के एक विश्लेषण पर नजर डालनी होगी। फरवरी, 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। लेकिन यहीं आठ महीने बाद हुए चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी की किस्मत बदल गईं। विधानसभा की कुल सीटों में से 87 सीटों में महिलाओं ने जमकर वोटिंग कीयह पहले के मुकाबले 2.5 फीसदी अधिक वोटिंग थी। जाहिर था कि नीतीश कुमार महिलाओं की वोटिंग से ही मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। उन्होंने महिलाओं के वोटों को एक संस्थागत रूप देते हुए शराबबंदीव्यवसायिक प्रशिक्षणकिशोरियों को साइकिल वितरण,छात्रवृत्तिसैनेटरी नैपकिन वितरण जैसे वादे किए थे।
हाल ही में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी महिला वोटर का महत्व रेखांकित किया जा सकता है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि ऐसी विधानसभा सीटों पर जहां महिलाओं ने 2013 के मुकाबले अधिक वोटिंग कीवहां सीटिंग प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ाइसके विपरीत कम महिला वोटिंग होने से सिटिंग प्रत्याशी फिर से चुन लिए गए। मध्यप्रदेश की ऐसी सात सीटों पर महिला वोटिंग पहले के मुकाबले 10 प्रतिशत अधिक थी। जब ओडिशा और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों ने अपनी-अपनी पार्टी में लिंग असमानता दूर करने के वास्ते इस लोकसभा चुनाव में 33 और 41 प्रतिशत सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित कर दियातो इसे महिला वोटर को आकर्षित करने की रणनीति के तहत देखा जाना गया। इस रणनीति में दोनों राज्यों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का विधानसभाओं में अधिक वोटिंग रही है।  
देश में महिलाओं को वोटिंग के अधिकार के लिए कोई जद्दोजहद नहीं करनी पड़ी। तमाम अधिकारों के साथ ही महिलाओं को पुरुषों के समान वोट करने का अधिकार भी दे दिया गया। देश के स्वतंत्रता आंदोलन ने महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया थापर स्वतंत्रता मिलने के बाद लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी काफी देर से हुई। इसके कई कारण हो सकते हैं। लेकिन धीरे-धीरे यह ट्रेंड बदला। 2014 के लोकसभा चुनाव में महिला वोट प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले अधिक रहा। इस लोकसभा चुनाव में महिला और पुरुष वोट प्रतिशत दोनों बढ़ा थापर पुरुषों के मुकाबले 1.79 फीसदी महिलाएं अधिक मात्रा में वोट देने निकलीं। यह पहली बार हुआ था। चौथी से पंद्रहवीं लोकसभा में महिलाओं की वोटिंग प्रवृत्ति देखी जाएतो स्पष्ट पता चलता है कि महिलाएं कुल वोटिंग का 55-56 प्रतिशत का आंकड़ा ही छू पाई थीं। जबकि इस दौरान पुरुष वर्ग कभी भी कुल वोटिंग का 60 प्रतिशत से कम नहीं रहा। महिलाओं ने सबसे कम वोटिंग 1980 में सातवीं लोकसभा के लिए की थीं। तमाम सुधारों के बाद दसवीं लोकसभा के चुनाव के बाद महिला वोटिंग में उत्तरोत्तर सुधार आता गया। और यही कारण है कि सोलहवीं लोकसभा में महिलाओं ने अब तक की सबसे अधिक वोटिंग की। आज देश की 543 लोकसभा सीटों में से 73 सीटें ऐसी हैंजहां पुरुषों की अपेक्षा महिला वोटर अधिक हैं। ये संख्या 1200 से 70,000 तक अधिक है।
इस लोकसभा चुनाव में महिला वोटर के विषय में परंपरागत धारणा बदलेगी कि नहींइस संदर्भ में सीएसडीएस-लोकनीति-क्विंट ने संयुक्त रूप से फरवरी, 2019में दिलचस्प सर्वे किया। इस सर्वे में महिला और पुरुषों की इस प्रवृत्ति पर अध्ययन किया गया कि वे वोट करते समय किन मुद्दों को दृष्टिगत रखते हैं। इस सर्वे में 68 प्रतिशत युवा महिलाओं ने माना कि महिलाओं को पुरुषों की तरह राजनीति में भाग लेना चाहिए। इसी सर्वे में पांच में से तीन महिलाओं ने कहा कि वे अपने परिवार या पति से प्रभावित हुए बगैर लोकसभा 2019 चुनाव के लिए वोट करेंगी। 65 प्रतिशत पहली बार वोट करने जा रही युवतियों ने नहीं माना कि महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अच्छी नेता नहीं होती हैं। साथ ही दो तिहाई युवतियों ने राजनीति में अपनी रुचि भी जाहिर की। अतकह सकते हैं कि धीरे-धीरे ही सहीराजनीति के प्रति महिलाओं की रुचि-समझ के साथ-साथ दखलंदाजी बढ़ रही है। सत्ता में अपनी भागीदारी के प्रति अधिक सचेत बनने की कोशिश में आधी आबादी की ये युवा पीढ़ी है। इसी तरह अगर मुद्दों की बात करेंतो अब राजनीतिक दल उन्हें केवल परिवार की ईकाई के तौर पर ही नहीं देख सकते हैं। अब उन्हें प्रभावित करने के लिए इन दलों को रणनीतिक रूप से काम करना होगा। यह इस लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में भी देखा जा सकता है। महिलाएं किन मुद्दों के लिए वोट करती हैंइस संदर्भ में चेंज डॉट ओआरजी का एक ऑनलाइन सर्वे भी देखा जा सकता है। इस सर्वे में 39 में से महिलाओं ने जिन्हें अपने लिए जरूरी बतायाउनमें सुरक्षान्याय व्यवस्थापानी-बिजली की अच्छी सुविधाकचरा निस्तारण की सुविधाप्रदूषण को अपनी प्राथमिकता बताया। जाहिर है कि महिलाओं के अपने मुद्दे हैंयह दूसरी बात हैकि राजनीतिक दल उन्हें प्राथमिकता में नहीं लेते हैं। पर वह समय अधिक दूर नहीं हैजब राजनीति महिलाओं को नजरअंदाज कर सकेगीं। 

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