यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।।
‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्’ को चरितार्थ करती एक खबर 13 जनवरी को गौतमबुद्धनगर जिले से आई है। इस खबर में था कि नये साल 2026 का स्वागत करने के लिए युवाओं ने डिजिटल वॉलेट से लेकर निजी और राष्ट्रीयकृत बैंकों से 14 करोड़ रुपये से ज्यादा कर्ज लेकर खर्च कर डाले। 25 दिसंबर से एक जनवरी 2026 तक क्रेडिट कार्ड, नो-कॉस्ट ईएमआई और बाय नाउ पे लेटर (बीएनपीएल) के माध्यम से यह कर्ज लिए गए। इस खबर के अनुसार एक सप्ताह में 23,858 युवाओं ने यह कर्जे लिए। यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि इन आंकड़ों में कुछ निजी बैकों की इस अवधि में लिए गए लोन का डिटेल नहीं मिल सकी है। अगर इन्हें भी शामिल किया गया होता, तो यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा हो सकता था। इस प्रकार इन युवाओं ने यह कर्ज के पैसे नये साल के स्वागत में होटलों, बार की नाइट पार्टियों, क्लब एंट्री पास, ऑनलाइन केक आर्डर और नाइट आउट पार्टी में खर्च किए। ये कर्जे लोगों ने फोन पे, यूपीआई सहित कई ऑनलाइन प्लेटफाॅर्म से छह महीने से लेकर एक साल तक के लिए उधार लिए हैं।
इसी तरह त्योहारों के मौसम नवंबर, 2025 में पैसा बाजार का एक दिलचस्प सर्वे आया था। सर्वे में बताया गया कि इस बार त्योहारों विशेषतः दीपावली को देखते हुए पर्सनल लोन लेने वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। यह सर्वे 10,200 से अधिक लोगों पर किए गए थे। इनमें से 41 फीसदी लोगों ने पहली बार पर्सनल लोन लिया था। यानी त्योहारों में खरीददारी करने और घर की साज-सज्जा के लिये ये लोन लिये गए, जिसमें भी 41 फीसदी लोगों ने पहली बार लोन लेकर अपने स्टेटस को बनाए रखने के लिये कर्ज लिया। सबसे खास बात यह कि 46 फीसदी लोगों ने कहा कि वे अगली बार भी इस आसानी से मिलते कर्जे का लाभ उठाना चाहेंगे।
पैसा बाजार की एक रिपोर्ट के अनुसार कर्ज लेने वाले लोगों की औसत उम्र में कमी आई है। जहां पहले कर्ज लेने वालों की औसत आयु 47 साल होती थी, वहीं अब 25 से 28 साल की उम्र में ही लोग कर्ज लेना शुरू कर देते हैं।
त्योहारों के दौरान पर्सनल लोन लेने का सबसे बड़ा कारण घर की मरम्मत और
फर्निशिंग रहा, जिसका कुल
हिस्सा 18 फीसदी तक था। इसके बाद 15 फीसदी लोगों ने घर की वेलनेस को बढ़ाने के लिये
इलेक्ट्रॉनिक सामान और उपहोरों के लिए कर्ज लिया। वहीं 12 फीसदी ने सोना-गहनों के
लिए और 10 फीसदी ने पुराने कर्ज चुकाने या फैशन शॉपिंग के लिए ये सभी कर्जे लिए।
अगर लोन लेने की एमाउंट की बात की जाये, तो लगभग 60 फीसदी लोगों ने 5 लाख रुपये से कम का लोन लिया, जबकि 42 फीसदी ने 5 साल से कम की अवधि चुकाने के
लिये चुनी। लोन लेने का यह पैटर्न दिखाता है कि लोग अब उधारी लेकर त्योहारों का
आनंद लेने से नहीं चूक रहे हैं।
मई, 2025 में पैसा बाजार
की एक रिपोर्ट के अनुसार कर्ज लेने वाले लोगों की औसत उम्र में कमी आई है। जहां
पहले कर्ज लेने वालों की औसत आयु 47 साल होती थी, वहीं अब 25 से 28 साल की उम्र में ही लोग कर्ज लेना शुरू कर देते हैं।
जाहिर है कि अब कहीं ज्यादा युवा लोग कर्ज ले रहे हैं। जहां 1960 दशक के जन्में
लोगों के कर्ज लेने का कारण होम या निजी वाहन लोन होता था, वहीं 1990 दशक की पीढ़ी व्यक्तिगत ऋण या उपभोक्ता
सामानों के लिये कर्जे ले रही है। वास्तव में इन सब के बीच सामाजिक और आर्थिक रूप
से कई परिवर्तन होने से भारतीय उपभोक्ता काफी बदल गया है।
कभी भारतीय समाज में कर्जा लेना अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। बचत को महत्व देना और जितनी चादर, उतना पैर फैलाना कहावतें समझाई जाती रही हैं। लेकिन अब वह मूल्य नहीं रहे। इसके अंदर में सामाजिक रूप से कई तरह की चीजें काम कर रही हैं।
युवा पीढ़ी का यूं कर्जे लेकर खुशियां खरीदने के मामले देखकर इतना तो
समझ आ रहा है कि कर्ज लेना अब कोई ‘टैबू’ वाली बात नहीं
रह गई है। कभी भारतीय समाज में कर्जा लेना अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। बचत
को महत्व देना और जितनी चादर, उतना पैर
फैलाना कहावतें समझाई जाती रही हैं। लेकिन अब वह मूल्य नहीं रहे। (यहां यह नहीं
समझा जाना चाहिए, कि वे बातें
सही थी, या अब गलत है।) इसके अंदर में सामाजिक रूप से कई
तरह की चीजें काम कर रही हैं। जिनको समझना जरूरी है, तभी पता चल सकता है कि मिलेनियम पीढ़ी और बाद की जेनजी कैसे कर्ज लेकर ‘घी’ पीने की मानसिकता के कब्जे में आ गये हैं, जिसे हमारी परंपरा में तो अच्छा नहीं कहा गया
है।
पीडब्ल्यूसी इंडिया और फिनटेक फर्म परफियोज की एक फरवरी, 2025 की स्टडी से पता चला है कि भारतीय अपनी
इनकम का एक-तिहाई हिस्सा लोन चुकाने पर खर्च करते हैं। यह स्टडी 30 लाख टेकसैवी
भारतीय उपभेाक्ताओं की उपभोग संबंधी कार्यों पर आधारित है। ‘हाउ इंडिया स्पेंड्सः ए डीप डाइव इनटू कंज्यूमर
स्पेंडिंग बिहेवियर’ नाम की इस
स्टडी में अलग-अलग शहरों के लोगों की मंथली सैलरी 20,000 से 1,00,000 के बीच थी, और वे टियर-थ्री शहरों से लेकर मेट्रोपॉलिटन
शहरों तक के थे। स्टडी में पता चला कि अपर-मिड-लेवल कमाने वाले लोग अपनी सैलरी का
एक बड़ा हिस्सा लोन ईएमआई चुकाने में खर्च करते हैं, जबकि एंट्री-लेवल कमाने वाले लोग दोस्तों, परिवार या लोकल कर्ज देने वालों जैसे इनफॉर्मल
सोर्स से ज्यादा बार लोन लेते हैं।
स्टडी में पता चला कि अपर-मिड-लेवल कमाने वाले लोग अपनी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा लोन ईएमआई चुकाने में खर्च करते हैं, जबकि एंट्री-लेवल कमाने वाले लोग दोस्तों, परिवार या लोकल कर्ज देने वालों जैसे इनफॉर्मल सोर्स से ज्यादा बार लोन लेते हैं।
रिपोर्ट ने खर्चों को तीन मुख्य ग्रुप में बांटा है- जरूरी खर्चे (39
फीसदी), जरूरतें (32 फीसदी), और अपनी मर्जी के खर्चे (29 फीसदी)। जरूरी
खर्चों में लोन चुकाना और इंश्योरेंस प्रीमियम शामिल हैं, जबकि जरूरतों में घर के खर्चे जैसे यूटिलिटी बिल, फ्यूल, दवाएं और किराने का सामान शामिल हैं। वहीं, अपनी मर्जी के खर्चों में एंटरटेनमेंट, बाहर खाना, ऑनलाइन गेमिंग और दूसरी गैर-जरूरी चीजों से जुड़े खर्चे शामिल हैं।
स्टडी में देखा गया कि इनकम लेवल बढ़ने के साथ खर्च करने की आदतें बदल जाती हैं।
एंट्री-लेवल कमाने वालों से ज्यादा इनकम वाले ग्रुप में जाने पर अपनी मर्जी के
खर्चे 22 फीसदी से बढ़कर 33 फीसदी हो जाते हैं।
इस स्टडी में यह भी देखा गया कि देश में 2019 और 2024 के बीच हर साल
सैलरी में 9.1 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है। 2023-24 में, भारत की प्रति व्यक्ति डिस्पोजेबल इनकम 2.14 लाख
रुपये तक पहुंच गई, जो 13.3 फीसदी
बढ़ी। इसी समय, देश की कुल बचत
2023-24 में 30 फीसदी कम हो गई। रिपोर्ट में कहा गया है, बचत में यह गिरावट बढ़ते खर्च के मामले में
कंज्यूमर खर्च के पैटर्न में बदलाव का संकेत देती है, जिसमें ज्यादा खर्च जरूरी और गैर-जरूरी दोनों
चीजों पर किया जा रहा है। तेजी से उपभोक्ता बनता युवा वर्ग अब बचत के बारे में
नहीं सोच रहा है।
भारतीय परिवार अपनी लाइफस्टाइल को फंड करने के लिए तेजी से लोन ले रहे हैं, और बचत की पारंपरिक संस्कृति से दूर जा रहे हैं। मेरे माता-पिता की पीढ़ी कर्ज लेना पसंद नहीं करती थी, कम से कम घूमने और फोन के लिये तो कतई नहीं।
इस साल नवबंर में त्योहारी बढ़ते कर्जो को देखकर कॉइनस्विच के
को-फाउंडर आशीष सिंघल ने अपनी एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि भारतीय परिवार
अपनी लाइफस्टाइल को फंड करने के लिए तेजी से लोन ले रहे हैं, और बचत की पारंपरिक संस्कृति से दूर जा रहे हैं।
मेरे माता-पिता की पीढ़ी कर्ज लेना पसंद नहीं करती थी, कम से कम घूमने और फोन के लिये तो कतई नहीं।
आंकड़ों का हवाला देते हुये उन्होंने कहा था कि भारत में अब हर व्यक्ति पर औसत
घरेलू कर्ज 4.8 लाख रुपये हो गया है, जो सिर्फ दो साल पहले 3.9 लाख रुपये था। ‘यह इनकम के साथ नहीं बढ़ रहा है। यह इनकम से
ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है।’ इससे भी ज्यादा
चिंता की बात यह है कि इस बढ़ोतरी के पीछे किस तरह का कर्ज है। ‘इस कर्ज का आधे से ज्यादा हिस्सा घर खरीदने या
बिजनेस शुरू करने के लिए नहीं है। यह पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड और ऑटो लोन हैं। हम बनाने के लिए नहीं, बल्कि खर्च करने के लिए कर्ज ले रहे हैं।’ शायद यही हमारी सामुहिक चिंता का विषय है।
