बुधवार, 19 सितंबर 2012

प्रेम का टी-प्वांइट


पहले सीध रास्ता ही था
इधर उधर नहीं मुड़ना था
मंजिल तो सामने ही दिख रही थी।
इसलिए कोई जद्दोजहद नहीं थी।
किसी को ओवरटेक भी नहीं करना था
था ही सीध, सरल, समतल रास्ता।
साथ में ठंडी हवा, शीतल छाया भी,
कोई मोड़, घुमाव भी नहीं दिख रहा था।
जिससे पहले ही सावधन हो जाया जाए।

जैसे जैसे आगे बढ़ते गए, रास्ता सीधा ही दिखता रहा।
मंजिल पहुंच के दायरे में दिख रही थी
अचानक...
यह टी प्वांइट कैसा!
यहां तो इतने लोग खडे़ है।
भला कब से?
आगे क्यों नहीं बढ़े?
एक से पूछा भई, अब वहां किस रास्ते से जाना पड़ेगा?
कोई उत्तर नहीं मिला।
कांधे पर हाथ रखकर झकझोरते हुए पूछा।
फिर भी कोई उत्तर नहीं।

लगता है इसी बात का उत्तर जानने के इंतजार में
वे वर्षों से बुत बन गए।
0000
पीछे मुड़कर अपना सीध रास्ता देखना चाहा-
आश्चर्य,
रास्ते की जगह झाड़-झंगाड़ का
एक आदिम जंगल उग गया था वहां..
... तत्काल।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

अंतर : भूख का


हम ‘भूख’ में है,
जैसे कोई युवा होता है प्यार में।
इसमें कोई छायावादी बिंब नहीं है हमारा,
बता सके कि-
हम भी भूखे है।

इस भूख के पीछे,
पीढि़यों का अ-लिखा इतिहास है,
जो पढ़ाया नहीं जाता है कहीं।
इसलिए शोद्यार्थियों ने
कभी कोई थीसिस भी नहीं लिखी।

दूसरी तरफ-
वे लोग उल्टियां कर रहे है,
हमारी भूख से बड़ी है उनकी भूख

इसलिए आज हम उनकी उदरपूर्ति के लिए
अपने -आपको
समर्पित करते हैं पूरी तरह से।

आओ, निगल लो हमें।
ताकि...
तुम्हारे भरे पूरे पेट में बैठकर ही
तुम्हारी उल्टियों को नियंत्रित कर सके।

...............................
यही है-
सत्ता की भूख और हमारी भूख का
बुनियादी अंतर

( खंडवा में पिछले 17 दिनों तक किसानों द्वारा किये गए जल सत्याग्रह के नाम )



रविवार, 6 मार्च 2011

कोख, कूड़ेदान और इतिहास

इतिहास के नाम पर मुझे
सबसे पहले याद आते हैं वो अभागे
जिनके खून से
लिखा गया इतिहास
जो श्रीमंतों के हाथियों के पैरों तले
कुचल दिये गये
जिनकी चीत्कार में
डूब गया हाथियों का चिघाड़ना।
वे अभागे अब कहीं नहीं हैं इतिहास में
जिनके पसीने से जोड़ी गयी
भव्य प्राचीरों की एक-एक ईंट
पर अभी भी है मिस्र के पिरामिड
चीन की दीवार और ताजमहल।
सारे महायु(ों के आयुध
वे अभागे अब
कहीं नहीं हैं इतिहास में।
सारे पुरातत्ववेत्ता जानते हैं कि
जिनकी पीठ पर बने बकिंघम पैलेस जैसे महल
वे अभागे, भूत-प्रेत-जिन्न
कुछ भी नहीं हुए इतिहास के।
इतिहास के नाम पर मुझे
याद आते हैं वे अभागे बच्चे
जो पाठशालाओं में पढ़ने गये
और इस जुर्म में
टाँग दिये गये भालों की नोक पर।
इतिहास के नाम पर मुझे
याद आती हैं वे अभागी बच्चियाँ
जो राजे-रजवाड़ों के धायघरों में पाली गयीं
और जिनकी कोख को कूड़ेदान बना दिया गया।
इतिहास के नाम पर मुझे
याद आती हैं वे अभागी
घसिआरिन तरुणियाँ
जिनसे राजकुमारों ने प्रेम किया
और बाद में उनके सिर के बाल
किसी तालाब में सेवार की भांति तैरते मिले।
इतिहास नायकों का भरण-पोषण
करने वाले इनके अभागे पिताओं के नाम पर
नहीं रखा गया
हमारे देश का नाम भारतवर्ष!
हमारी बहुएँ और बेटियाँ
जिन्हें अपनी पहली सुहागिन-रात
किसी राजा-सामंत या मंदिर के पुजारी के
साथ बितानी पड़ी
इस धरती को
उनके लिए नहीं कहते भारत माता।
( अतीत से सवाल करती दिनेश कुशवाह की कविता "कोख, कूड़ेदान और इतिहास" पाखी के फरवरी अंक में प्रकाशित हुई )

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

यमुना के पुल पर


दिल्ली
यमुना के पुल पर
छोटे छोटे बच्चे खेल रहे है
रेलिंग के इर्द गिर्द
बेखौफ ...
वैसे ही दौड़ रही है
पुल पर
ब्लू लाइन बसें
कारें स्कूटरअदि
बच्चो की मांओं ने
सजा रखी है
अपनी अपनी दुकानें
फ्रेश रिटेलर की तरह
ताजी सब्जियां -फल और
हरी धनियाँ और हरी मिर्च
एक कनात में सजी हुई
सब्जी मंडी जैसा कोई शोर गुल नहीं
मौन ही जिनका अभिजातपन है..
सभ्रांत घरों में जानें को उत्सुक
फल और सब्जियां....
कारों के रुकने के इंतजार में है

छोटे छोटे बच्चे खेल रहे है
बेखौफ .यमुना के पुल पर
उनकी मांएं बेच रही है
ताजी सब्जियां और फल
बेखौफ यमुना के.पुल पर
.बेखौफ गाड़ियाँ दौर रही है
यमुना के पुल पर
पर यमुना बह रही है
अपने तटबंधो में
डरते-डरते...
दिल्ली में !!!

रविवार, 30 जनवरी 2011

चेहरों की बेचेनी


शाम के समय
घर लौटते हुए चेहरों
की बेचेनी
सिमट आती है
पैरों में!!!
तेज चलने के लिए..

कभी कभी गाड़ी के पहियों में भी
ऐसी ही बेचैनी मिलती है
जब ख़ाली सड़क को देखती है.
तेज दौड़ने के लिए..

घर लौटने वाले चेहरों की
बेचेनी तब ...
मुस्कराहट में बदल जाती है
जब ....
घर जाने वाली बस
समय पर आ जाती है .

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

शनिचर हरता!

प्रत्येक शनिवार
हमारा शनिचर उतारने के लिए
मिल जायेगे, हर चौराहे और
रेड लाइट पर
अबोध, बुझे से, गंदे -फटे कपड़े में
बहुत से बचपन।
एक लोटे में
एक लोहे की मूर्ति ,
और थोड़े से कडुवे तेल के साथ
घूमते यह नन्हें
शनिचर हरता !
दीदी, भैया, आंटी कह कर
प्रगट हो जाते है एक देवता की तरह
और मारे डर के, एक -दो रुपये में
इस तत्काल प्रगट शनि से
पीछा छुडाते हम, एक चौराहे से
दुसरे चौराहे चले जाते।
पर हर चौराहे पर डटे
हे नन्हें शनिचर हरता!
तुम्हारा शनिचर कौन हरेगा?
कब हरेगा?
तुम्हारे लिए हर चौराहे
और रेड लाइट पर
कौन खड़ा होगा?
स्वयं शनि देवता
या खुद तुम!
पर कब???

सोमवार, 8 मार्च 2010

बस आज 'एक दिन'



बस आज 'एक दिन'


अलार्म बजने पर


क्या नहीं उठूंगी सबसे पहले


कोई दे जायेगा सुबह की चाय


क्या मेरे बिस्तर पर


नही बेलनी पड़ेगी आज रोटियां ।


दफ्तर जाते समय


आज, नहीं घूरेगा मेरा पडोसी


नुक्कड़ पर बैठे लडके


नहीं गायेगे वह गाना


'एक बार ...आ जा आ जा '


बस की भीड़ में आज नहीं


लेगा कोई चिकोटी...


ऑफिस में बगल की सीट में


बैठने वाले वर्मा जी


नहीं सुनायेंगे कोई


...नॉनवेचुटकला...


मुझे कमतर न मानते हुए मेरे बॉस


आज देगे मुझे 'योग्यतम' जिम्मेदारी


इसी ख़ुशी के साथ


जब मैं पहुचुगी घर


थोड़ी देर से,


तो पति की निगाहे नहीं करेगी


कोई सवाल...


बस आज एक दिन


'महिला दिवस' पर !!!