
शाम के समय
घर लौटते हुए चेहरों
की बेचेनी
सिमट आती है
पैरों में!!!
तेज चलने के लिए..
कभी कभी गाड़ी के पहियों में भी
ऐसी ही बेचैनी मिलती है
जब ख़ाली सड़क को देखती है.
तेज दौड़ने के लिए..
घर लौटने वाले चेहरों की
बेचेनी तब ...
मुस्कराहट में बदल जाती है
जब ....
घर जाने वाली बस
समय पर आ जाती है .
2 टिप्पणियां:
घर की तरफ चलते पांव कहीं ठिठकते क्यों नहीं
क्यों होती है हमें रोज़ एक ठिकाने की तलाश
रोटी की भूख
अपनों का साथ.
इंतज़ार को जीवंत कर दिया आपने...साधारण बातें बताती असाधारण रचना
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