सोमवार, 21 मई 2018

इस बार मॉरीशस में होगा जुटान

यूं तो 2015 में दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन, भोपाल में ही निश्चित हो गया था कि ग्यारहवां विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरीशस में 18 से 20 अगस्त तक आयोजित किया जाएगा। अब इसकी आधिकारिक घोषणा पिछले दिनों कर दी गई। इस सम्मेलन के विषय में जानकारी देने के लिए मॉरीशस से एक विशेष प्रतिनिधि दल भारत आया। मॉरीशस की शिक्षा, मानव संसाधन मंत्री लीला देवी दुकन लछुमन और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस सम्मेलन का लोगो और वेवसाइट जारी करते हुए इस संबंध में जानकारी दी। इस अवसर पर सुषमा स्वराज ने कहा कि भाषा और संस्कृति साथ-साथ चलते हैं। एक के खत्म होने पर दूसरा अपने आप ही विलीन हो जाता है। ऐसे में भारत के बाहर भी हिन्दी को जीवित रखने में इस सम्मेलन की बड़ी भूमिका है। साथ ही लीला देवी ने हिन्दी भाषा की दशा पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि आज हिन्दी की हालत पानी में जूझते जहाज की तरह हो गई है।
मॉरीशस में यह तीसरा सम्मेलन होगा। इस का आयोजन स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय संस्थान में होगा। इस सम्मेलन का विषय वैश्विक हिन्दी और भारतीय संस्कृति है। इससे पहले यहां पर 1976 और 1993 में विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन हो चुका है। इस बार खासतौर पर गंगा आरती का एक कार्यक्रम रखा गया है। गंगा नदी भारतीय संस्कृति का प्रतीक है, इसलिए इस सम्मेलन गंगा आरती का रखा जाना अच्छा संदेश है। ग्यारहवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान एक विषय ‘ भोपाल से मारीशस’ रखा गया है, जहां भोपाल में आयोजित दसवें विश्व हिन्दी दिवस के दौरान गठित समितियां यहां अपने एक साल के कामकाज का लेखाजोखा प्रस्तुत करेंगी। सम्मेलन स्थल पर हिन्दी भाषा के विकास से संबंधित कई प्रदर्शनियां लगाई जाएंगी। सम्मेलन के दौरान शाम को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम और कवि सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा। विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरीशस की सम्मेलन सामग्रियों को तैयार करने और प्रकाशन में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद द्वारा गगनांचल का विशेष अंक निकाला जाएगा, जो सम्मेलन को समर्पित होगा। जैसा कि हर साल होता है, इस वर्ष भी भारत एवं अन्य देशों के हिन्दी सेवियों को उनके विशेष योगदान के लिए "विश्व हिन्दी सम्मान” से सम्मानित किया जाएगा।
विश्व हिन्दी सम्मेलन हिन्दी भाषा का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन है, इसमें विश्व भर से हिन्दी के विद्वान, साहित्यकार, पत्रकार, भाषा विज्ञानी, विषय विशेषज्ञ तथा हिन्दी प्रेमी जुटते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की राष्ट्रभाषा के प्रति जागरूकता पैदा करने, समय-समय पर हिन्दी की विकास यात्रा का आकलन करने, लेखक व पाठक दोनों के स्तर पर हिन्दी साहित्य के प्रति सरोकारों को और दृढ़ करने, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहन देने तथा हिन्दी के प्रति प्रवासी भारतीयों के भावुकतापूर्ण व महत्वपूर्ण रिश्ते को गहराई से मान्यता प्रदान करना ही इन सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य रहा है। 1975 से अब तक दस विश्व हिंदी सम्मेलन संपंन हो चुके हैं। ये सभी सम्मेलन माॅरीशस, भारत, त्रिनिडाड व टोबेगो, लंदन और सूरीनाम जैसे विश्व के विभिन्न देशों में संपंन हुएहै। 2007 में आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन न्यूयार्क में हुआ तथा नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन सितंबर 2012 में दक्षिण अफ्रीका में हुआ और  दसवां सम्मेलन, भोपाल यानी भारत में हो चुका है।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए 1936 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की स्थापना एक स्वयं संचालित संस्था के रूप में की थी। तब इसके संस्थापकों में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, पं जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, आचार्य नरेन्द्र देव, आचार्य काका कालेलकर, सेठ जमनालाल बजाज आदि गणमान्य एवं स्वतंत्रता प्रेमी थे। जिन्होंने हिन्दी को एक राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित किया। इसी संगठन ने 1975 में प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की पहल पर विश्व हिन्दी सम्मेलनों की एक श्रृंखला की परिकल्पना की। इस तरह नागपुर में पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन संपंन हुआ। सम्मेलन में 30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिलाया जाएगा। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा का स्थान दिलाया जाए, के लिए अभी भी प्रयास किया जा रहा है। 

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

कई यादें छोड़ गया थियेटर ओलंपिक

जब मेला उठता है तो अपनी कई यादें छोड़ जाता है। देश में संपन्न हुए आठवें थियेटर ओलंपिक्स के विषय में भी यह कहा जा सकता है। यह मेला था नाटक का, देशी-विदेशी कलाओं का, लोक कलाओं का, नुक्कड़ नाटकों का, विविध कलाओं पर चर्चा-परिचर्चा का, कुछ सीखने का और कुछ सिखाने का। पूरे 51 दिन धूम मचाकर आठवें थियेटर ओलंपिक्स का समापन 8 अप्रैल को मुंबई में हो गया।दुनिया में रंगमंच के इस सबसे बड़े महोत्सव की पहली बार मेजबानी देश के संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने सफलतापूर्वक की। इस आयोजन का शुभांरभ 17 फरवरी को लालकिले पर उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने केंद्रीय संस्कृति राज्य मंत्री डॉ. महेश शर्मा के साथ किया था। 






क्या है थियेटर ओलंपिक्स

डेल्फी, ग्रीस में प्रसिद्ध ग्रीस थियेटर डॉयरेक्टर थियोडोरोस टेरज़ोपोलोस की अगुवाई में 1993 में थिएटर ओलंपिक की स्थापना की गई। यह एक गैरसरकारी संस्था है। थियेटर ओलंपिक एक अंतरराष्ट्रीय उत्सव है, जो दुनिया भर के जानेमाने थियेटर जानकारों के कामों को सबके सामने लाता है। एक तरह से यह थियेटर की विरासत को सामने लाने की पहल करने के उद्देश्य से संचालित है। थियेटर ओलंपिक की एक कमेटी है, जिसके इस समय चौदह सदस्य हैं, जो अपने-अपने देश के जानेमाने थियेटर जानकार हैं। इस समय हमारे देश से एनएसडी के चेयरपर्सन रतन थियम इसके सदस्य हैं। थियेटर की स्थापना के समय आठ देशों के प्रतिनिधि सम्मिलित थे, जिन्होंने आपसी समझ से इसे नॉन-प्रॉफिट आर्गनाइजेशन बनाया। इसका हेडक्वार्टर एथेंस में है। हर साल एक बार इसकी मीटिंग होती है। ओलंपिक थियेटर हमेशा अलग-अलग देशों में आयोजित किए जाते हैं। 1995 में थियेटर ओलंपिक की मेजबानी करने वाला पहला देश ग्रीस था। जापान ने 1999 में शिजुओका में दूसरे संस्करण की मेजबानी की थी। उसके बाद 2001 में रूस ने आयोजित किया। 2006 में ओलंपिक का आयोजन तुर्की के इस्ताम्बुल में हुआ और चार साल बाद 2010 में सोल, दक्षिण कोरिया में हुआ। 2014 में चीन ने इसे बीजिंग में आयोजित किया और 2016 में व्रोकला, पोलैंड में सातवां थियेटर ओलंपिक आयोजित किए गए। भारत इस वैश्विक आयोजन के आठवें संस्करण की मेजबानी कर इस शानदार सूची में शामिल होने के लिए पूरी तरह से तैयार है।






विदेशी कला-संस्कृति की छटा

इस दौरान ऑस्ट्रेलिया, अजेरबैजान, बांग्लादेश, बेल्जियम, ब्राजील, चीन, चेक गणराज्य, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, इज़राइल, इटली, जापान, लिथुआनिया, मॉरीशस, नेपाल, पोलैंड, रूस, श्रीलंका, दक्षिण कोरिया, स्पेन, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका समेत 30 देशों के प्रतिभागी रंगमंच में अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया गया। इस भव्य महोत्सव में आमंत्रित अतिथियों में थियोडोरोस टेरज़ोपोलोस (चेयरमैन, थियेटर ओलंपिक अंतरराष्ट्रीय समिति, ग्रीस), लियु लिबिन (चीन), जैरोस्ला फ्रेट (पोलैंड), सहिका टेकंद (तुर्की), यूजिनो बार्बा (डेनमार्क), रोमियो कास्टेलुच्ची (इटली), पिपो डेलबोनो (इटली) और जैन फैबर (बेल्जियम) शामिल हुए और कला प्रेमियों से मुखातिब हुए।






मंगलवार, 23 जनवरी 2018

कितना सहायक होगा Nari Portal

साल की शुरुआत महिलाओं के लिए सौगात लेकर आया। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने ऑनलाइन पोर्टल नारी http://www.nari.nic.in को लांच कर दिया। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सूचना या जानकारी के अभाव में सरकारी स्तर पर किसी भी योजना के बनाने से कोई लाभ जनता तक नहीं पहुंच सकता है। इसलिए जब भी कोई योजना बनाई जाती है, तो उसके प्रचार-प्रसार की भी व्यवस्था की जाती है। इससे लोगों को उन चीजों के बारे में जानकारी मिलती है और वे सीधे उनका लाभ लेने की स्थिति में आ जाते हैं। अगर इस तरह की चीजों पर केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय सुधि ले रहा है, तो यह प्रशंसा की बात है। नारी पोर्टल के माध्यम से महिला सशक्तिकरण को मूर्तरूप देने में काफी सुविधा होगी, ऐसी आशा व्यक्त की जा रही है। इसी दिन ई-संवाद नाम से एक वेबसाइट भी शुरू की गई है। देश में महिलाओं और बच्चों के बीच में कई प्रकार के एनजीओ काम करते हैं। इसलिए मंत्रालय चाहता है कि इन एनजीओ से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव हमें मिल सके। ऐसे ही संवाद को स्थापित करने के लिए ई-संवाद शुरू किया जा रहा है। ऐसे किसी भी एनजीओ के बारे में महिलाएं जानकारी जुटा कर अपने एलाके में इसका लाभ भी उठा सकती हैं। फिलहाल यह पोर्टल अभी अंग्रेजी भाषा में ही है, हिंदी भाषा में अभी यह कोई जानकारी नहीं दिखा रहा है।
02 जनवरी को महिला के सशक्तिकरण के लिए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका संजय गांधी ने ऑनलाइन पोर्टल ‘नारी’ का शुभारंभ कर जनता को सौंप दिया। इस पोर्टल के माध्यम से महिलाएं सरकारी योजनाओं और पहलों की जानकारी आसानी से प्राप्त हो सकेंगी। महिलाओं को अधिकारों, योजनाओं, आर्थिक अवसर, सामाजिक सहयोग, कानूनी सहायता, आवास आदि उपलब्ध कराने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों ने विभिन्न योजनाएं लागू की हैं। परंतु इनके प्रावधानों के प्रति जागरूकता का अभाव है। इन सारी सूचनाओं को एक स्थान पर सुलभ कराने के उद्देश्य से ‘नारी’ पोर्टल में महिलाओं के कल्याण के लिए 350 सरकारी योजनाओं से संबंधित व अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराई गई हैं। पोर्टल में विभिन्न मंत्रालयों/विभागों के लिए महत्वपूर्ण लिंक दिए गए हैं। नारी पोर्टल जानकारी के लिहाज से अपडेट बनाया गया है। यहां जॉब सर्च की सुविधा भी महिलाओं के लिए उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त मैटेर्निटी लीव, बीमा और बचत-निवेश के बारे में जानकारी, बैंक अकाउंट खोलने, बैंक लोन, पासपोर्ट बनाने आदि की जानकारी पाई जा सकती है।
पोर्टल के पहले पेज पर महिला सुरक्षा संबंधी भाग में महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा, किसी भी प्रकार की हिंसा होने पर उसे रिपोर्ट कराने की जानकारी, शादी के बाद होने वाली परेशानियों में मदद, ऑफिस महिलाओं के साथ होने वाला किसी भी प्रकार के शोषण के बारे में जानकारी और उसके निदान के लिए आवश्यक  सूचनाएं, इसके साथ ही साथ गर्भावस्था के बारे सूचनाएं काफी महत्वपूर्ण हैं। मंत्रालय ने महिला सुरक्षा के संबंध में जो मैट्रिमोनियल वेबसाइट्स के लिए जारी दिशा-निर्देश, एनआरआई शादी के लिए जारी निर्देशों और सुझावों, साथ ही साइबर अपराधों से सुरक्षा के लिए भी जानकारी इस पोर्टल पर विस्तार से बताया गया है। महिलाओं के बच्चा गोद लेने के संबंध में कई सुधार संबंधी योजना हैं। इसके मद्देनजर इस पोर्टल में गोद लेने की प्रक्रिया, शर्तें आदि बातें यहां बताई गईं हैं। स्वास्थ और पोषण से संबंधित विविध जानकारी का भंडार यहां देने की कोशिश की गई है। पोषण संबंधी टिप्स, जंक फूड संबंधी गाइडलाइन, मातृत्व संबंधी सुझाव, मेंस्ट्रुअल हाईजींन के बारे में भी काफी जानकारी जुटाई गई है। इसमें एक भाग फैमिली प्लानिंग का भी है, जो देश की बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए उचित भी है। हमारे यहां महिलाओं की शारीरिक समस्याओं पर तो लोग ध्यान दे देते हैं पर मानसिक समस्याओं को नजरअंदाज करते रहते हैं। इसके प्रति जागरुकता के लिए पोर्टल का एक भाग निर्धारित किया गया है।
इसके अतिरिक्त राज्य और केंद्र सरकार की सारी योजनाओं के बारे में जानकारी यहां मिल सकती है। साथ ही साथ पोर्टल में वोटर आईडी, आधार कार्ड, बैंक अकांउट खोलने, बैंक लोन लेने जैसी महत्वपूर्ण जानकारी भी यहां पाई जा सकती है। कोई भी महिला एक सिंपल क्लिक के बाद यह जानकारी पा सकती है। इन साधारण सी जानकारी के अभाव में महिलाओं को काफी कष्ट उठाने पड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए अधिकांश महिलाएं इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि कठिन परिस्थितियों में महिलाओं की सहायता के लिए 168 जिलों में वन स्टॉप सेंटर बनाए गए हैं। या प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवासों के पंजीयन में महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है। तथा कई राज्यों में लड़कियों की शिक्षा के लिए वित्तीय मदद भी दी जाती है। ऐसी जानकारी यहां विभिन्न पोर्टल/वेबसाइट पर बिखरी हुई है।

इस तरह की ढेर सारी जानकारी वास्तव में महिलाओं के पक्ष में है, लेकिन इस पोर्टल को देखते समय प्रश्न यह भी उठता है कि देश की महिलाओं की अशिक्षा, कम्प्यूटर की उपलब्धता और तकनीकी ज्ञान का अभाव ऐसे कारक हैं, जिसकी वजह से इस पोर्टल का लाभ उठाने वालों की संख्या काफी सीमित ही रहेगी। 2011 की जनगणना के अनुसार महिलाओं की साक्षारता दर लगभग 65 फीसदी थी। हमारे यहां अभी भी 35 फीसदी महिलाएं साक्षार नहीं हैं। आंकड़े बताते हैं कि रूरल क्षेत्रों में 100 में से एक लड़की क्लास 12 की पढ़ाई के लिए जा पाती है। साथ ही लगभग 40 फीसदी लड़कियां कक्षा पांच के बाद स्कूल छोड़ देती हैं। मोबाईल फोन प्रयोग के बारे में बात की जाए तो चौथे राष्ट्रीय परिवार-स्वास्थ सर्वे-2015-16 के अनुसार देश में केवल 46 फीसदी महिलाओं के पास खुद का मोबाईल फोन है जिसका वे प्रयोग करती हैं। स्टेटिस्टा के हवाले से बताया जाए तो देश में जहां 71 फीसदी पुरुष इंटरनेट यूज करते हैं वहीं 29 फीसदी महिलाएं ही इंटरनेट प्रयोग करती हैं। इन आंकड़ों में अपनी बात कहे जाने का एक ही अर्थ हैकि ऐसी स्थिति में महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा बनाया गया नारी पोर्टल कितना महिलाओं का होगा और महिलाएं कितना इस पोर्टल का लाभ उठा सकेगीं?

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

काम की होंगी महिला सरपंच

‘मुखिया पति’ या ‘सरपंच पति’, यह सम्बोधन उस व्यवस्था के लूप होल है, जिसे बड़ी सद्इच्छा से शुरू किया गया था। ढाई दशक पहले राजनीतिक सत्ता में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए त्रि-स्तरीय स्थानीय चुनावों में आरक्षण देकर उनके हक और हुकूक को पुख्ता किया गया था। इन प्रावधानों को बनाने के पीछे यह मान्यता थी कि इससे महिला सशक्तिकरण में इजाफा होगा। महिलाओं में आत्म-सम्मान, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता का विकास किया जाएगा। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि संविधान से मिले इस अधिकार का महिलाएं उपयोग नहीं कर सकीं, और वे पुरुषों की रबर स्टाम्प बनकर रह गईं। देश के विभिन्न राज्यों में पंचायत और निकाय चुनाव हुए, महिलाएं आरक्षण के बल पर चुनकर आईं, पर वे ‘डमी सरपंच’ ही बनकर रह गईं। 1993 से मिले इस अधिकार का उपयोग अब तक महिलाएं कर तो रही हैं, पर वे अपने पुरुष साथियों की छाया मात्र ही बनी रह गई हैं, फिर चाहे वे उनके पति हों, बेटे हों या पिता ही क्यों न हों। इस साल पंचायत दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘मुखिया पति’ या ‘सरपंच पति’ जैसी बुराई की तरफ इशारा किया था। ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए किसी बहुत बड़े शोध की जरूरत नहीं होगी? महिलाओं का सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा होना, शिक्षा की कमी, पुरुष सत्तात्मक समाज, महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी कम होना, उन्हें बाहर के कामों के लिए अयोग्य मानने की मानसिकता, ऐसे बहुत से कारक हैं, जो संविधान से मिले अधिकारों के उपयोग के लिए एक महिलाओं को नि:सहाय कर देते हैं।
शायद यही सब सोचकर और ध्यान में रखकर वास्तविक रूप से महिलाओं की भागीदारी बनाए रखने के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका संजय गांधी ने 27 नवंबर को पंचायती राज संस्थानों की निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों यानी ईडब्ल्यूआर और मास्टर ट्रेनर्स (प्रधान प्रशिक्षकों) के लिए एक गहन प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरूआत की। उनकी प्रशासनिक क्षमता विकास के इस कार्यक्रम का आयोजन महिला और बाल विकास मंत्रालय के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक कोऑपरेशन एण्ड चाइल्ड डेवलपमेंट (एनआईपीसीसीडी) करेगा। इस अभियान की योजना प्रत्येक जिले से लगभग 50 ईडब्ल्यूआर को प्रशिक्षित करते हुए मार्च, 2018 तक कुल 20,000 ईडब्ल्यूआर को प्रशिक्षित करने की है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य एक आदर्श गांव पाने की कोशिश होगी, वहीं इसका सबसे बड़ा फायदा महिलाओं को भविष्य के राजनीतिक प्रतिनिधियों के रूप में तैयार करना होगा। अगर महिलाएं लोकसभा और विधानसभा के लिए आरक्षण की लड़ाई लड़ रही हैं, तो इसमें वास्तविक भागीदारी के लिए इस तरह से प्रशिक्षित होना और भी आवश्यक है।
जब विभिन्न राज्यों ने अपने यहां महिलाओं के लिए पंचायत और निकाय चुनावों में 50 प्रतिशत सीटों को आरक्षित करके उन्हें रसोई और घर सीमित भूमिका से निकालकर सार्वजनिक जीवन में खड़ा किया, तब यह महिलाओं के लिए ही आश्चर्य का विषय बन गया था। उन्हें जो बचपन और पीढियों से सिखाया गया था कि वे पुरुषों के कार्यक्षेत्र में हस्ताक्षेप नहीं कर सकती हैं, वह सब करने के लिए देश का कानून उन्हें कह रहा था। ना…ना… करते हुए महिलाएं जब अपना घर छोड़कर सार्वजनिक रूप से वोट मांगने, पंचायतों का कामकाज देखने के लिए बाध्य हुईं, तो उन्हें अपने पर विश्वास ही नहीं हुआ। कई जगह मुखिया बनी महिलाएं अपना घूंघट तक उठाने के लिए तैयार नहीं हुई थीं। फिर भी उन्हें सार्वजनिक जीवन में प्रवेश दिया गया, भले ही यह उनके लिए संविधान प्रदत्त था। भले ही वे अपने आश्रित पुरुषों के लिए रबर स्टाम्प थीं। भले ही वास्तविक रूप से ‘मुखिया पति’ या ‘सरपंच पति’ उनके प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे थे, फिर भी उनका सार्वजनिक जीवन में प्रवेश हो गया था। वर्षों बाद यह बदलाव दिख भी रहा है। जब हमें यह सूचना या आंकड़े मिलते हैं कि हरियाणा पंचायत चुनाव, 2016 में महिलाओं के संवैधानिक आरक्षण 33 प्रतिशत होते हुए भी 42 प्रतिशत पंच, 41.37 प्रतिशत सरपंच, 41.9 प्रतिशत पंचायत समिति सदस्य तथा 43.5 प्रतिशत जिला परिषद सदस्य महिलाएं बन चुकी हैं। इतना ही नहीं हरियाणा के सरपंचों में 51 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं, जो सामान्य सीटों पर पुरुषों को चुनाव हराकर निर्वाचित हुई हैं। इससे समझा जा सकता है कि हरियाणा जैसे राज्य में जहां महिलाओं के साथ लिंग भेद काफी होता है, वहां इस तरह का परिणाम कुछ शुभ संकेत जरूर देता है। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का भी यही हाल है, यहां प्रदेश की 43.86 प्रतिशत ग्राम पंचायतों में मुखिया महिलाएं हैं। उत्तर प्रदेश में महिलाओं को सिर्फ 33 फीसदी आरक्षण मिला हुआ है। इसके बावजूद 11 प्रतिशत अधिक पदों पर महिलाओं ने अधिकार क्षेत्र में ले लिया है। राजस्थान में महिलाओं को जहां पंचायती राज व्यवस्था में 50 प्रतिशत आरक्षण है। यहां उनकी भागीदारी पुरुषों के मुकाबले अधिक है। इस व्यवस्था में कमी जिस चीज की है, उस पर देर से ही सही, महिला और बाल विकास मंत्रालय ने सही ध्यान दे दिया है।


(युगवार्ता साप्ताहिक में प्रकाशित)