गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बैंड बाजा बारात और सोशल मीडिया


 

हमारे हाथों में मोबाइल एक ऐसी डिवाइस है, जिसमें अधिकांश गतिविधियों की लाॅगबुक दर्ज रहती है, चाहे या अनचाहे। यही कारण है कि यहां होने वाली गतिविधियां शादी जैसे नाजुक रिश्तों पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रही हैं। अगर जल्द नहीं संभलें, तो सोशल मीडिया में बिखरा यह स्यापा हमारे कई रिश्तों को खा जाएगा।

 

2025 को ‘लवयापा’ नाम से एक मूवी आई थी, जिसकी कहानी जेन-जी के रिलेशनशिप पर आधारित थी। कहानी में शादी के लिये नायक नायिका के पिता के सामने उपस्थित होता है और नायिका के साथ शादी की इच्छा व्यक्त करता है। पिता राजी होता है पर एक शर्त के बाद। शर्त होती है कि एक दिन के लिये नायक और नायिका अपना-अपना मोबाइल एक दूसरे को दे देंगे, प्रयोग करने के लिये। और यही से प्यार-स्यार की जगह लब का स्यापा शुरू हो जाता है। जहां दोनों नायक-नायिका प्यार की दुहाई देकर शादी करने वाले थे, वहीं एक दूसरे के मोबाइल हाथ में आने के बाद उनकी ऐसी सच्चाई सामने आती है, जिससे दोनों अब तक अंजान थे। एक दूसरे के सामने आती इन सच्चाइयों के कारण उनके बीच टकरार, दरार और फाइट शुरू हो जाती है। उनका विश्वास चुक जाता है, फलतः रिश्ता टूट जाता है। चूंकि यह फिल्म है, तो बड़े-बुजुर्ग बीच में आकर संबंधों के बीच में पड़ी दरार को भरने का काम करते हैं। दोनों को रियल लाइफ के सबक सिखाते हैं, फलतः ‘लवयापा’ की हैप्पी एंडिग हो जाती हैं, पर क्या रियल लाइफ में ऐसा संभव है।

शायद नहीं। तभी तो एक चौकाने वाली रिपोर्ट एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने हाल ही में प्रसारित की है। स्थानीय रिसर्च के बाद आई इस खबर में बताया गया है कि इंदौर जैसे बड़े शहर में 40 दिनों में ही 150 शादियां रद्द हो गईं। वजह कई थीं, पर सबसे बड़ी वजह बनी सोशल मीडिया पोस्ट। भावी दुल्हा और दुल्हनों की पुरानी सोशल मीडिया से जुड़ी गतिविधियां सामने आने से जो अविश्वास की धारा पैदा हुआ, वह अंततः शादी रद्द होने के मुकाम को पहुंच गई। रिपोर्ट के अनुसार 62 फीसदी शादियां टूटने की वजह सीधे तौर पर सोशल मीडिया से उपजी गतिविधियां थीं। इन गतिविधियों को लेकर दोनों पार्टि’ज में जो कहा-सुनी हुई, उसने झगड़े का रूप ले लिया, आखिर रिश्ता खतम करना पड़ा। पहले जहां शादी टूटने की वजह कोई गंभीर पारिवारिक, सामाजिक मामला होता था, जिसके सामने आने के बाद शादियां कैंसिल कर दी जाती थी, पर आज 60 से 70 फीसदी मामलों में सोशल मीडिया में किये गये पोस्ट, कमेंट्स, इमोजी, लाइक्स या फिर फ्रेंड लिस्ट में वह क्यों है, को लेकर मन-मुटाव यहां तक पहुंच रहा है कि शादी ही रद्द हो रही हैं। यह देखकर समझा जा सकता है कि सोशल मीडिया की पहुंच हमारे जीवन में अब कहां तक हो चुकी है। परिणाम है रिश्तों का बिखर जाना, क्योंकि यह रियल लाइफ है फिल्म नहीं।

पहले जहां शादी टूटने की वजह कोई गंभीर पारिवारिक, सामाजिक मामला होता था, जिसके सामने आने के बाद शादियां कैंसिल कर दी जाती थी, पर आज 60 से 70 फीसदी मामलों में सोशल मीडिया में किये गये पोस्ट, कमेंट्स, इमोजी, लाइक्स या फिर फ्रेंड लिस्ट में वह क्यों है?

शादी जैसे रिश्तों के बीच सोशल मीडिया का यूं फिल्मी खलनायक के रूप में उभरने का मतलब है कि हम डिजिटल जिंदगी को लेकर इतने सीरियस नहीं हुये हैं, जितना हमें होना चाहिए था। हमें लगता है कि सोशल मीडिया में हम कुछ भी करके निकल जाएंगे, किसी को या हमें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। ऐसा सोचना भी आज सोशल मीडिया के महत्व को कम करके आंकना है। आज जब भी कोई कंपनी अपने लिये एक अच्छे इम्प्लाई को ढूंढ़ती है, तो कम से कम उसका लिंक्डइन प्रोफाइल जरूर चेक करती है। यह प्रैक्टिस उनके लिये एक अच्छा उम्मीदवार ढूंढ़ने में काफी मददगार होता है। आज एक रिक्रूटर के लिये अपने इम्प्लाई की सोशल मीडिया स्क्रीनिंग जरूरी हो गई है, भले ही यह वैध न हो। 2023 के रिज्मेबिल्डर सर्वे के अनुसार 73 फीसदी हायरिंग में मैनेजरों ने उम्मीदवारों की सोशल मीडिया प्रजेंस के नंबर दिये और उनकी उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया। जबकि 85 फीसदी ने माना कि उन्होंने अपने उम्मीदवारों की उम्मीदवारी रद्द कर दी, जब उन्हें उनकी ऑनलाइन प्रोफाइल में कुछ गलत दिखा। तो समझा जा सकता है कि हमारी सोशल मीडिया संबंधी गतिविधियां कहां तक पहुंच रखती हैं। तो फिर शादी-विवाह जैसे मामले इनसे दूर कैसे रह सकते हैं।

2023 के रिज्मेबिल्डर सर्वे के अनुसार 73 फीसदी हायरिंग में मैनेजरों ने उम्मीदवारों की सोशल मीडिया प्रजेंस के नंबर दिये और उनकी उम्मीदवारी को आगे बढ़ाया। जबकि 85 फीसदी ने माना कि उन्होंने अपने उम्मीदवारों की उम्मीदवारी रद्द कर दी, जब उन्हें उनकी ऑनलाइन प्रोफाइल में कुछ गलत दिखा।

सोशल मीडिया संबंधी यह मामले शादी से पहले ही पता चलने के बाद शादी रद्द होने का कारण बन रहे हैं। पर लगभग दो दशकों से आपसी रिश्ते खराब करने का एक कारण सोशल मीडिया दर्ज हो रहा है, ऐसा कई रिसर्च हमें बता रही है। कपल्स हों, या फे्रंड्स सोशल मीडिया का अधिक उपयोग उनके आपसी रिश्तों में दूरियां पैदा कर देता है। ‘कंप्यूटर इन ह्यूमन विहैवियर में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि शादीशुदा जिंदगी की गुणवत्ता और सोशल मीडिया दोनों का संबंध रहा है। जो लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करते हैं, वे रेगुलर सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों की तुलना में अपनी शादी में 11 फीसदी अधिक खुश रहते हैं। इसी रिपोर्ट में बहुत ही विस्तार से बताया गया है कि पहली बार पति-पत्नियों के बीच सोशल मीडिया कैसे घुस गया और रिश्ते खराब करने लगा। इस संबंध में पहली रिपोर्ट 2009 में आई थी, जब यूके की डिवोर्स आॅनलाइन कंपनी के एक एग्जीक्यूटिव, मार्क कीनन ने पाया कि कंपनी की 5000 सबसे नये तलाक के आवेदनों में से 989 में ‘फेसबुक’ शब्द आया था। इसी तरह, अमेरिकन एकेडमी ऑफ मैट्रिमोनियल लॉयर्स (एएएमएल) के 2010 के एक सर्वे में पाया गया कि पांच में से चार वकीलों ने बताया कि फेसबुक से मिले ‘सबूतों’ के आधार पर तलाक के मामलों की संख्या बढ़ रही है। इसके अलावा, सोशल नेटवर्क साइट पर धोखा देने का पता लगाने में मदद के लिए वेबसाइट्स भी बनाई गई हैं। उदाहरण के लिए FacebookCheating.com इसके द्वारा अपने पार्टनर के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर का पता लगाया जा सकता था।

इसकी वजह है इंटरनेट और सबसे बड़ी ताका-झांकी की जगह ‘सोशल मीडिया’ यानी हमारी फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, टिकटाॅक, टिंडर या एक्स प्रोफाइल। अगर जेन-जी की बात की जाये, तो जितनी वे आपस में बाते नहीं करते उतना वे ‘टेक्स्ट’ करते हैं।


यह सब तब हो रहा था, जब फेसबुक जैसी एक ही सोशल मीडिया साइट हमारे जीवन में आ गई थी। और इस पर मौजूद हम इस बात के लिए हम एसोर थे कि यहां कुछ भी किया जा सकता है, हमें कौन ‘जज’ करेगा। लेकिन हम ‘जज’ किये जा रहे थे। इसका असर भी पड़ने लगा था। यह रिपोर्ट हमारे देश समाज की न हो, पर आज हमारी भी वहीं स्थिति हो गई है। जब सोशल मीडिया का संसार काफी फैल चुका है। यह इंदौर की इस छोटी सी रिपोर्ट से समझा जा सकता है। हमारे हाथों में मोबाइल एक ऐसी डिवाइस है, जिसमें हमारे द्वारा की गई अधिकांश गतिविधियों की एक लाॅगबुक तैयार होती है, हम चाहें या न चाहें। इसकी वजह है इंटरनेट और सबसे बड़ी ताका-झांकी की जगह ‘सोशल मीडिया’ यानी हमारी फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, टिकटाॅक, टिंडर या एक्स प्रोफाइल। अगर जेन-जी की बात की जाये, तो जितनी वे आपस में बाते नहीं करते उतना वे ‘टेक्स्ट’ करते हैं। उनका सोना, जागना, खाना, पीना सभी कुछ सोशल मीडिया ही निर्धारित कर रहा है। यहां होने वाले मेल-मिलाप, बातचीत चाहे उनकी भाषा डिजिटल ही क्यों न हो, यह सब हमारा भविष्य तय कर रहे हैं। सोशल मीडिया के बहाने कोई भी थोड़े प्रयासों से हमारे बारे में बहुत कुछ जान सकता है। भले ही यहां की गईं गतिविधियां का सीधा मतलब वह न हो, जो दूसरा कोई समझ रहा है। लेकिन इसकी जबावदेही हमारी ही बनती है, और सभी उठने वाले सवालों के जवाब हमें ही देने होते हैं। नहीं तो ‘लवयापा’ की तरह ‘अच्छी खासी लाइफ को बिगबाॅस बना दिया है इस फोन ने’ की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए निजी जीवन में रिश्तों को लेकर हमारे किरदार पर कोई उंगली न उठा दे, इसके लिये ईमानदारी बनाये रखनी पड़ेगी यहां भी, और वहां भी।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

आई एम जाॅर्जियाः 'मैं यहां तक कैसे पहुंची'


इटली की प्रधानमंत्री जाॅर्जिया मेलोनी की लिखी हुई आत्मकथा इस समय देश में भी चर्चा का विषय बन गई है। मूल रूप से इटली में ख्याति पा चुकी किताब के भारतीय संस्करण की प्रस्तावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखी है, जो भारत-इटली द्विपक्षीय संबंधों में जुड़ने वाली एक और कड़ी बन रही है।


देश में इटली की प्रधानमंत्री जाॅर्जिया मेलोनी चर्चा में हैं। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी जिंदगी के बारे एक किताब लिखी है यानी आत्मकथा। इसका भारतीय संस्करण रूपा पब्लिकेशन से आया है। और इस किताब की प्रस्तावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखी है। किताब का नाम है- ‘आई एम जाॅर्जिया-माय रूट्स, माय प्रिंसिपल्स।’ यह किताब जल्द ही देश भर में उपलब्ध हो जायेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस किताब की प्रस्तावना में बताया है कि किताब ‘उनके मन की बात है।’ साथ ही कहा है कि मेलोनी का जीवन राजनीति या सत्ता की खोज से अधिक साहस, विश्वास और लोकसेवा के संकल्प का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने उनकी इस यात्रा को भारतीय परंपरा के ‘नारी शक्ति’ के विचार से जोड़ा है, जिसे भारतीय परंपरा में हजारों वर्षों से पूजा जाता रहा है। इसे एक व्यक्तिगत और आत्ममंथन से भरी हुई यात्रा कहा है। उन्होंने लिखा है कि मुझे विश्वास है कि एक जबरदस्त नेता और देशभक्त की कहानी के रूप में इसे खूब सराहा जाएगा। मेलोनी ने मोदी की प्रस्तावना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे ‘बहुत सम्मानित’ महसूस कर रही हैं।’

वास्तव में इस किताब में लिखी गई प्रस्तावना केवल प्रस्तावना नहीं है, बल्कि भारत और इटली के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों की लड़ी की एक कड़ी है। 2022 में इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने वाली जाॅर्जिया मेलोनी ने मार्च 2023 में भारत की राजकीय यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान, दोनों देशों के बीच संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुंचा दिया गया था। तभी से दोनों नेताओं ने घनिष्ठ संपर्क बनाए रखा है, जिसमें आपसी हित के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए टेलीफोनिक बातचीत भी शामिल है। दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत तालमेल कई मुलाकातों के दौरान दिखा। जैसे कि 2023 के अंत में सीओपी28 सम्मेलन में मेलोनी ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ ली गई सेल्फी सोशल मीडिया में पेास्ट की जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने रीपोस्ट करते हुए लिखा, ‘मित्रों से मिलना हमेशा आनंददायक होता है।’ 

ब्रदर आॅफ इटली की नेता जॉर्जिया मेलोनी इटली की राजनीति में दक्षिणपंथी धड़े से संबंध रखती हैं। मेलोनी के इटली की सत्ता तक पहुंचने ने करीब आठ दशकों के राजनीतिक इतिहास को बदलकर रख दिया। 1945 से 2022 तक विभिन्न तरह के गठबंधनों में अब तक वामपंथी या सेंट्रल वाम सरकारों ने इटली को नेतृत्व किया था। इसी जीत के साथ जॉर्जिया मेलोनी यूरोप के साथ-साथ अन्य देशों में भी चर्चा का विषय बन गई हैं। इस चर्चा में लाने में उनके विचार बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं। वे बड़ी बेबाक और निडर हैं। खुलकर अपने विचार रखने के कारण ही वे इटलीवासियों का दिल जीतती आईं हैं। वे वेनिटो मुसोलिनी की बपचन से फैन रही हैं। युवा नेता के तौर पर वे इसके लिए सड़कों पर भी उतरती थीं। 

बहुत ही छोटी उम्र में उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर दी थी। उनके पिता फ्रांसिस्को बेशक वामपंथी विचारधारा वाले थे, लेकिन वे अपनी मां की छत्र-छाया में पली-बढ़ीं। उनके माता-पिता उनके पैदा होने से पहले ही अलग हो गए थे। होश संभालते ही वे राजनीति की पथरीली सड़क पर निकल पड़ी। उनके ऊपर उनकी मां का प्रभाव बहुत पड़ा। बहुत ही संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में उनका और उनकी बहन एरियाना का पालन-पोषण हो सका। इस संघर्ष और दुनिया की वास्तविकता का उनके जीवन में गहरा प्रभाव है। अपने विचारों के प्रति दृढ संकल्प रहने के प्रति इसी भावना ने उनका साथ दिया है। इसी के बलबूते वेे आम इटलीवासियों से जुड़ सकीं। 

इटली की राजधानी रोम वह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जगह है, जहां वे जन्मीं थीं। इसका प्रभाव उन्हें खुद को इतालवी मानने पर गर्व का अनुभव कराता है। इस आत्मकथा को लिखे जाने को लेकर उनका कहना है कि ‘मैंने बहुत से लोगों को खुद के बारे में और मेरे विचारों के बारे में बात करते सुना है, लेकिन मुझे लगता है कि वे यह नहीं जानते वे मुझे कैसे चित्रित कर रहे हैं। इसलिए मैंने यह फैसला किया कि मैं अपने बारे में खुद ही बताऊँ कि मैं क्या हूं, मैं किसमें विश्वास करती हूं, और मैं यहां कैसे पहुंची।’ 


बुधवार, 20 अगस्त 2025

शतरंज के खेल में महिला ‘अंडरडाॅग खिलाड़ी’यों की जीत


शतरंज में प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता है। लेकिन शतरंज के महान खिलाड़ी गैरी कास्परोव यह नहीं मान सके। उन्होंने ‘महिला शतरंज’ को असली शतरंज नहीं माना। उनके लिये ‘असली शतरंज’ और ‘महिला शतरंज’ में अंतर बना रहा। दिव्या देशमुख पहली भारतीय फिडे महिला चेस वर्ल्ड  कप चैंपियन बनने के साथ ग्रैंडमास्टर बनकर छा गई हैं। दिमाग के इस खेल में ‘अंडरडाॅग खिलाड़ी’ मानी जाने वाली महिलाओं का अब तक का यह सफर कैसा रहा, आइए जानते हैं...


अट्ठाइस जुलाई को शतरंज खिलाड़ी दिव्या देशमुख ने इतिहास रच दिया। जार्जिया के बतूमी में आयोजित फिडे महिला वर्ल्ड कप 2025 में खिताबी जीत के साथ भारतीय शतरंज के इतिहास में वे पहली महिला खिलाड़ी बन गई हैं, जिन्होंने यह खिताब अपने नाम किया। इस रोमांचकारी क्षण के लिये हम इस जीत से पहले ही आश्वस्त हो गये थे, क्योंकि फाइनल में दोनों खिलाड़ी भारतीय ही थीं। 19 वर्षीय दिव्या की जीत ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया, क्योंकि उनके मुकाबले में दिग्गज खिलाड़ी ग्रांडमास्टर 38 वर्षीय कोरेरू हम्पी थीं। इस जीत ने दिव्या को गै्रंड मास्टर का खिताब और 42 लाख की राशि का हकदार बना दिया है। साथ ही वे बेहद प्रतिष्ठित कैंडिडेट्स टूर्नामेंट के लिये क्वालीफाई कर गई हैं।

इस टूर्नामेंट को कई उपलब्धियों के लिये याद किया जायेगा। इसमें पहली बार देश  की नामीगिरामी चार भारतीय महिला खिलाड़ियों कोनेरू हम्पी, हरिका द्रोणवल्ली, आर. वैशाली और दिव्या देशमुख ने क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई थी। यह हमारे लिये एक ऐतिहासिक उपलब्धि रही। सबसे बड़ी बात कि इस टूर्नामेंट ने चीन की दिग्गज खिलाड़ियों को हराते हुये फाइनल में दोनों भारतीय महिला खिलाड़ी आमने-सामने आ गईं। इस ‘चाइनीज वाॅल’ को तोड़ने में कोनेरू हंपी और दिव्या ने अपनी मुख्य भूमिका निभाई। महिला वर्ग में टॉप 100 में सबसे उपर चीन की खिलाड़ी हैं। चीन की 14 महिला खिलाड़ियों के बाद भारत की 9 महिला खिलाड़ी इस टॉप 100 में शामिल हैं। लेकिन इस फिडे वल्र्ड कप में कोनेरू और दिव्या ने इसी चीनी दिवार को तोड़ा और चीनी चुनौतियों खत्म करते हुये खिताब को देश की झोली में डाल दिया। 

सभी देशवासी दिव्या की यह उपलब्धि खूब चियर कर रहे हैं। शासन-प्रशासन भी आज उनकी इस कामयाबी में अपना हिस्सा ढूंढ़ रहा है। लेकिन यह दिव्या और कोनेरू ही बता पाएगीं कि वे यहां तक कैसे पहुंचीं। भारतीय महिला शतरंज खिलाड़ियों का सफर अन्य खेलों की तरह ही संघर्ष से भरा रहा है। यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि आज भी इसकी स्थिति विश्व स्तर से लेकर देश स्तर तक कमोवेश पुरूष खेलों की तुलना में कमतर ही है। चाहे वह खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाएं हों या टूर्नामेंट जीत पर मिलने वाली धनराशि का सवाल हो, महिलाओं की योग्यताएं कमतर ही रखी गई हैं। शतरंज वैसे तो दिमाग का खेल माना जाता है, मगर शारीरिक रूप से कमतर मानने के साथ-साथ उन्हें दिमागी रूप से भी कमतर मानकर भेदभाव किया जाता है। विश्व से देश स्तर की महिला शतरंज खिलाड़ियों के अनुभव बहुत कुछ ऐसी ही कहानी कहते हैं।  

देश में महिला शतरंज खिलाड़ी की पहली दस्तक 1933 में ही मिल गई थी। जब मिस फातिमा ने ब्रिटिस चेस फेडरेशन के सहयोग से होने वाली ब्रिटिश महिला शतरंज चैंपियनशिप में न केवल भाग लिया, बल्कि जीता भी। मिस फातिमा से दिव्या देशमुख तक का यह सफर अभी तक चल रहा है। दिव्या देशमुख को मिलाकर अब तक देश में कुल चार महिला ग्रैंडमास्टर बन गईं हैं। कोनेरू हम्पी देश की पहली महिला ग्रैंडमास्टर बनीं, उनके बाद द्रोणावल्ली हरिका बनीं, तीसरी ग्रैंडमास्टर आर. वैशाली हैं और अब दिव्या देशमुख। कोनेरू हम्पी देश की एक उत्कृष्ट शतरंज खिलाड़ी हैं। वे विश्व की सबसे कम उम्र की ग्रैंडमास्टर बन गई थीं मात्र 15 वर्ष की उम्र में। उन्होंने सर्वोच्च रेटिंग प्राप्त महिला शतरंज खिलाड़ी जुडिट पोल्गार का रिकार्ड तोड़ दिया था, जब वे गैंडमास्टर बनीं, तब वे पोल्गार से तीन महीने छोटी थीं।

 वे कहती हैं कि लड़कियां को ‘अंडरडाॅग खिलाड़ी’ माना जाता है। वे सामान्य रूप से लड़कों और लड़कियों दोनों वर्गों में खेलती थीं। उन्होंने 1999 और 2000 में क्रमशः 12 और 13 साल की उम्र में एशियाई अंडर-12 और राष्ट्रीय अंडर-14 खिताब जीते, दोनों ही लड़कों के वर्ग में। उन्होंने अंडर 10, 12, 14 और 20 विश्व चैंपियनशिप में शीर्ष पुरस्कार जीते। जिस तेजी से वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही थीं, वह सबके लिये सामान्य नहीं था। दिमाग के इस खेल में उनकी उत्कृष्टता कुछ लोगों को बर्दास्त नहीं हो रही थी। 2002 में ग्रैंडमास्टर बनने के बाद हम्पी का स्वतः चयन पुरुष राष्ट्रीय-ए टूर्नामेंट के लिये हुआ, जो कुछ पुरूष साथियों को स्वीकार नहीं हुआ। इसलिये खुद को और योग्य साबित करने के लिये उन्होंने क्वालीफायर टूर्नामेंट के पुरुष ड्राॅ में प्रवेश किया और दूसरे स्थान पर रहीं। सवाल है कि अगर शतरंज दिमाग का खेल है, तो भी महिलाएं बराबरी पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकतीं।

अब तक की सबसे सफल और सर्वोच्च रेटिंग वाली महिला खिलाड़ियों में से एक, जुडिट पोल्गर हैं, जिन्होंने अपने समय के कई दिग्गज पुरुष खिलाड़ियों को हराया। वे पुरुष प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिये काफी चर्चित रहती थीं। गैरी कास्पारोव, अनातोली कार्पोव, व्लादिमीर क्रैमनिक और विश्वनाथ आनंद उनसे हार चुके हैं। शतरंज में गैरी कास्पारोव अब तक के सबसे महान खिलाड़ी माने जाते हैं, जुडिट ने 2002 में एक क्लासिकल गेम में हराकर इतिहास रच दिया था। जुडिट पोल्गार न केवल महिला शतरंज में बल्कि संपूर्ण शतरंज इतिहास में अद्वितीय स्थान रखती हैं। उन्होंने यह साबित किया कि शतरंज में प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता है। लेकिन गैरी कास्परोव यह नहीं मान सके। उन्होंने ‘महिला शतरंज’ को असली शतरंज नहीं माना। उनके लिये ‘असली शतरंज’ और ‘महिला शतरंज’ में अंतर था।

शतरंज के सभी स्तरों पर लैंगिक पूर्वाग्रह की समस्याएं व्याप्त हैं। यह विश्व स्तर पर है- प्रारंभ से लेकर मध्यवर्ती और पेशेवर खिलाड़ियों तक जारी है। उच्चतम स्तर पर महिला शतरंज खिलाड़ियों की संख्या पुरुष समकक्षों की तुलना में काफी कम है। 1,600 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय शतरंज ग्रैंडमास्टर्स में से केवल 37 महिलाएं हैं, यह संपूर्ण का लगभग दो फीसदी होता है। महिला शतरंज टूर्नामेंट की पुरस्कार राशि पुरुषों के टूर्नामेंटों की तुलना में काफी कम होती है। महिला विश्व शतरंज चैंपियनशिप, जो महिलाओं की सबसे बड़ी शतरंज प्रतियोगिता है, इसकी धनराशि विश्व शतरंज चैंपियनशिप की धनराशि से 10 फीसदी कम है।

हाल के वर्षों में, शतरंज में लैंगिक असमानता के बारे में चर्चाएं हो रही है। वेतन में अंतर, नेतृत्वकारी पदों पर महिलाओं की कम संख्या, खेल में लैंगिक भेदभाव और उत्पीड़न की समस्याओं को खिलाड़ियों और खेल संगठनों दोनों ने उजागर किया है और उनका समाधान भी किया है। शतरंज में लैंगिक विविधता और समावेशन को बढ़ावा देने के प्रयास जारी हैं, इस उम्मीद के साथ कि महिलाएं इस खेल में आगे बढ़ती रहेंगी और उनके योगदान को मान्यता और सम्मान मिलेगा।


शनिवार, 19 जुलाई 2025

क्या हो सकते हैं भविष्य में दो दो दलाईलामा

 

तिब्बतियों के सबसे बड़े आध्यात्मिक नेता ने अपने उत्तराधिकार के सवाल पर जो बातें स्पष्ट की हैं , उससे दलाईलामा के चुनाव पर चीन  के साथ गतिरोध कायम रहेगा, यह स्पष्ट हो गया है। ऐसे में क्या यह संभव है कि हम भविष्य में दो दो दलाईलामा देखे।

अगला दलाईलामा कब, कौन और कहां  से होगा, ये सभी सवाल अब भविष्य के गर्भ में चले गये हैं। अपने 90वें जन्म दिवस के अवसर पर 06 जुलाई को 14वें दलाईलामा ने मैकलाॅडगंज, धर्मशाला में अपने उद्बोधन में बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया है। तिब्बतियों के सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरू दलाईलामा ने कहा कि उनकी मृत्यु के बाद उनका उत्तराधिकारी होगा। अपने जन्मदिन के अवसर पर दिये गये अपने संदेश में दलाईलामा ने कहा कि पिछले चैदह सालों में तिब्बती परंपराओं से जुड़े नेताओं और लोगों ने उन्हें पत्र लिखकर सूचित किया है कि दलाईलामा की संस्था को जारी रहना चाहिये। साथ ही तिब्बत में रहने वाले तिब्बती लोगों ने भी यही अपील की है। दलाईलामा ने कहा कि इन सभी अनुरोधों के मद्देनजर वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि दलाईलामा की संस्था जारी रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगले दलाईलामा को मान्यता देने के लिये गोदेन फोडरंग ट्रस्ट जिम्मेवार होगा। उन्हेांने स्पष्टतः कहा कि गोदेन फोडरंग ट्रस्ट ही अगले दलाईलामा के पुनर्जन्म को मान्यता देने का एक मात्र अधिकारी है और किसी अन्य को इस मसले में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

दलाईलामा के इस उद्बोधन से कई बातें स्पष्ट हो गई हैं। पहली, उनका उत्तराधिकारी होगा। दूसरी, तिब्बती बौद्ध परंपरा के अनुसार पुनर्जन्म की अवतार परंपरा का पालन किया जायेगा। और तीसरा, ‘किसी अन्य’ (उनका इशारा चीन की तरफ था) को इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होगा। उन्होंने तिब्बती बौद्ध अवतार परंपरा के पालन के लिये अंतिम निर्णय गोदेन फोडरंग ट्रस्ट को सौंप दिया है, जो उनकी भारत में चल रही निर्वासित सरकार का एक अंग है। इस ट्रस्ट की स्थापना 2011 में धर्मशाला में दलाईलामा के कार्यालय से जोड़कर की गई है। इसके प्रमुख दलाईलामा हैं और इसके अन्य सदस्यों में उनके कुछ सहयोगी शामिल हैं। इसका प्रबंधन समधोंग रिनपोछे करते हैं। ‘गोदेन फोडरंग’ मूल रूप से ल्हासा, तिब्बत के ड्रेपुंग मठ में दलाईलामा का आध्यात्मिक निवास था। पोटाला पैलेस के निर्माण के बाद दलाईलामा इस आवासीय परिसर से दूर चले गये थे। यह ट्रस्ट दलाईलामा की परंपरा का संरक्षण करता है, उनके आध्यात्मिक एवं मानवतावादी कार्यों का समर्थन करता है। यही भविष्य के दलाईलामा की पहचान की आधिकारिक प्रक्रिया का संचालन करेगा।

जब अध्यात्मिक गुरू दलाईलामा ने अपने उत्तराधिकार की जिम्मेदारी गोदेन फोडरंग ट्रस्ट को सौंप दी है और साथ ही ‘किसी अन्य’ को हस्तक्षेप न करने के लिये कहा है, तो जाहिर है कि उनकी मृत्यु के बाद अगले दलाईलामा की खोज पारंपरिक तिब्बती बौद्ध रीति-रिवाजों के अनुसार होगी-जैसे धर्मगुरुओं के परामर्श, संकेतों की खोज, झील दर्शन, पूर्व दलाईलामा की वस्तुओं की पहचान आदि के द्वारा। तिब्बतियों के दलाईलामा जीवित बुद्ध हैं। सभी दलाईलामाओं को करुणा के बोधिसत्व ‘अवलोकितेश्वर’ का अवतार माना जाता है। बौद्धों के लिए, अंतिम लक्ष्य ‘निर्वाण’ है यानी जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति। फिर यह पुर्नजन्म का क्या मतलब है। दरअसल, महायान संप्रदाय के अंतर्गत आने वाले पूर्वी एशियाई और तिब्बती बौद्ध मानते हैं कि बोधिसत्व इस सर्वोच्च बोध तक पहुंच चुके हैं। इसके अलावा, महायानी बौद्धों का मानना है कि बोधिसत्व पुनर्जन्म लेना चुनते हैं, ताकि वे संसार के दुख और पीड़ा को अनुभव कर सकें, ताकि अन्य प्राणियों को ज्ञान प्राप्ति में सहायता कर सकें। ‘तुल्कू’ प्रणाली तिब्बती बौद्ध धर्म का मूल आधार है, जो पुनर्जन्म को केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, करुणा और मार्गदर्शन का साधन मानती है।

इसके विरूद्ध चीनी कम्युनिस्ट सरकार जो वर्तमान दलाईलामा को ‘अलगाववादी’ मानते है, और तिब्बती बौद्ध दलाईलामा का चुनाव करना अपना अधिकार भी मानते है। इसलिये यह मामला चीनी सरकार के लिये राजनीतिक अधिक और धार्मिक कम है। चीन का मानना है कि दलाईलामा का चुनाव केवल 18वीं सदी की किंग राजवंश द्वारा शुरू की गई ‘गोल्डन अर्न’ (स्वर्ण कलश) प्रणाली से होना चाहिए। इसमें संभावित पुनर्जन्मीं बच्चों के नाम एक कलश में रखे जाते हैं और लॉटरी निकाल कर चुना जाता है। यह प्रणाली ऐतिहासिक रूप से उपयोग की गई थी, लेकिन अनिवार्य नहीं थी और अक्सर तिब्बती लामा इसे अस्वीकार करते थे। यह पूरी तरह से तिब्बती धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है। जब मौजूदा 14वें दलाईलामा का निधन होगा, चीन तिब्बत के भीतर अपने अनुकूल एक बालक को चुनकर उसे दलाईलामा घोषित करेगा। ऐसा माना जाता है कि यह चीन के लिए एक ‘प्रोपेगेंडा लामा’ होगा, जिसका उपयोग वह तिब्बती असंतोष को नियंत्रित करने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘धार्मिक स्वतंत्रता दिखावे’ के लिए कर सकेगा।

इस दौरान चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि ‘दलाईलामा के पुनर्जन्म को धार्मिक परंपराओं, चीनी कानूनों के साथ-साथ धार्मिक रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक परंपराओं (जैसे स्वर्ण कलश) प्रणाली का पालन करना होगा, इसे चीन की केंद्रीय सरकार की मंजूरी लेनी होगी।’ 1959 में वर्तमान दलाईलामा को चीनी कम्युनिस्ट सरकार माओत्से तुंग के बढ़ते दबाव और तिब्बत पर कब्जे के बाद भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। इसलिये तभी से वर्तमान दलाईलामा धर्मशाला से अपनी निर्वासित सरकार चला रहे हैं और तिब्बत को स्वायत्ता दिलाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं। अगला संघर्ष इन सबसे अलग दलाईलामा चुनाव परंपरा को बनाये रखना और तिब्बती लोगों को एकजुट रखना होगा। यह संघर्ष दलाईलामा से अधिक तिब्बती लोगों के लिये परीक्षा की घड़ी है।


क्या है दलाईलामा चुनने की तिब्बती परंपरा

बौद्ध धर्म में ‘अनात्म’ का सिद्धांत है, यानी स्थायी, अपरिवर्तनीय आत्मा (आत्म) का अस्तित्व नहीं है। फिर भी, कर्म और चित्त की धारा पुनर्जन्म का आधार बनती है। इसको ऐसे समझा जा सकता है- जैसे एक दीपक की लौ बुझती है और दूसरी लौ उससे जलाई जाती है। वह अगली लौ पूर्व की निरंतरता है, लेकिन वही नहीं है। महायान बौद्ध मान्यता के अनुसार पुनर्जन्म का संबंध मृत्यु के बाद चित्त की ऊर्जा अगले शरीर में प्रवेश करती है। यह ऊर्जा पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार नया जन्म ग्रहण करती है। महायान परंपरा में बोधिसत्व पुनर्जन्म लेते हैं, ताकि वे दूसरों को मुक्त कर सकें। दलाईलामा, पंचेन लामा, आदि ऐसे ही तुल्कू (पुनर्जन्मी लामा) माने जाते हैं। ‘तुल्क’ ऐसा व्यक्ति जो जानबूझकर करुणा के साथ पुनर्जन्म लेता है, ताकि दूसरों की मुक्ति में सहायता कर सके। बोधिसत्व यह प्रतिज्ञा लेते हैं कि वे निर्वाण में विलीन होने से पहले सभी प्राणियों की मुक्ति के लिए बार-बार जन्म लेंगे। यह पुनर्जन्म कर्मवश नहीं, बल्कि करुणा और संकल्पवश होता है।

पिछले तुल्कू (लामा) की मृत्यु के बाद, उनके पुनर्जन्म की तलाश में कई प्रक्रिया अपनाई जाती हैं। जिसमें वरिष्ठ लामा स्वप्न, ध्यान, और विशेष झील (जैसे लामो लात्सो) में आए दर्शन को आधार बनाते हैं। उम्मीदवार बच्चे की पहचान के लिये विशिष्ट लक्षणों जैसे बच्चे का व्यवहार, उसका बोलना, कुछ विशेष बातें याद होना, देखा जाता है। ऐसे बच्चे की परीक्षा के लिये उसे पूर्व लामा की वस्तुएं (जैसे माला, चश्मा, किताब) और कुछ नकली वस्तुएं मिलाकर दी जाती हैं। यदि वह सही वस्तुएं पहचान ले, तो यह पुनर्जन्म का प्रमाण माना जाता है। ऐसे चुने हुये बच्चे को ल्हासा (निर्वासन की स्थिति में धर्मशाला) लाकर उसे दलाईलामा के अनुरूप लालन-पालन किया जाता है। यहीं पर चुने हुये बच्चे को बौद्ध दर्शन, तिब्बती भाषा-संस्कृति और तर्कशास्त्र का प्रशिक्षण दिया जाता है। बच्चे के युवा होने तक यह सभी शिक्षाएं पूर्ण की जाती हैं और इसके बाद उनकी परीक्षा भी ली जाती है।


मंगलवार, 1 जुलाई 2025

तीन पहर की कवि-पीड़ा

इमरजेंसी के दौरान जब बीमार जयप्रकाश नारायण जी को जेल में बंद न रखकर दिल्ली मेडिकल इंस्टिट्यूट में रखा गया, तब कवि, गांधीवादी साहित्यकार भवानी प्रसाद मिश्र जयप्रकाश नारायण से मिलने गये। देखते ही उन्होंने कवि से पूछा- ‘कलम चल रही है।’ कवि ने कहा-‘त्रिकाल संध्या करता हूं। एक कविता सुबह, एक शाम, एक दोपहर।’ इमरजेंसी के दौरान भवानी प्रसाद मिश्र ने 18-19 सौ कविताएं रची थी। देश में इस दौर में जैसे भी घटनाक्रम चल रहे थे, यह कविताएं उन्हीं के बारे में कवि की अभिव्यक्ति थी। इस दौरान उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता ‘चार कौए उर्फ चार हौए’ ने सरकार को हैरान और परेशान किया, वहीं आंदोलनकारियों को हौसला दिया। 

इमरजेंसी के दौर में जब साधारण सी बातें बगैर सेंसर के छप नहीं पा रही थीं, तब ‘चार कौए उर्फ चार हौए’ जैसी कविता लोगों तक पहुंची कैसे। दरअसल, यही कहानी काफी दिलचस्प है। भवानी प्रसाद मिश्र ने अपनी आपातकाली कविताओं की किताब ‘त्रिकाल संध्या’ छपने के दौरान इसका खुलासा किया था। यह कविता सबसे पहले साप्ताहिक हिन्दुस्तान में बच्चों के पृष्ठ पर छपने के लिये भवानी प्रसाद जी ने भेजी थी। कविता के स्वीकृति होने के बाद कवि ने बच्चों के विभाग की संपादिका को एक पत्र लिखकर इस कविता के ‘असली मर्म’ के बारे में लिखकर भेज दिया, ताकि उन पर अंजाने में कोई संकट न आ जाए। हश्र वही हुआ, जो होना चाहिए था। कविता नहीं छापी गई। लेकिन कविता की ‘सुगंध’ सुगबुगाहट कई जगह पहुंच गई। इसके बाद यह कविता अंडरग्राउण्ड पत्रों में छापी गई, क्योंकि सरकार के विरोध उस समय प्रतिनिधि अखबारों में कुछ खास नहीं छप पा रहा था। वहीं से यह ऐसी चर्चित हुई, कि हर आजादी पसंद आंदोलनकारियों के जुबान पर आ गई।

इमरजेंसी के दौरान तो यह कविता लोकप्रिय रही ही, इमरजेंसी के बाद भी यह कविता जगह-जगह पढ़ी जाती रही। भवानी प्रसाद जी कहते हैं कि ‘आपातकाल उठने पर तो सब बहादुर हो गए। टेलीविजन ने मुझसे यह कविता पढ़वाई- आपातकाल में तो मैंने रेडियो और टेलीविजन पर जाना बंद कर दिया था।’ टेलीविजन प्रसारण के बाद ही इस कविता की लोकप्रियता की वजह से भवानीप्रसाद जी की इमरजेंसी की कविताएं संग्रह के रूप में ‘त्रिकाल संध्या’ नाम से आज हम सब जानते हैं। इस व्यंग्यात्मक कविता के विषय में खुद भवानी प्रसाद जी कहते हैं कि ‘इसमें जो चार कौए उर्फ चार हौए हैं, उनमें तब मैंने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, कांग्रेस अध्यक्ष और श्री संजय को गिना था।’

‘त्रिकाल संध्या’ में कुल 96 कविताएं हैं। जिसमें इमरजेंसी के दौरान लिखी गई यानी 26 जून, 1975 से लेकर 1 अगस्त, 1975 तक की रचनाओं का समावेश किया गया है। इसमें राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को दृष्टिगत रखते हुये विभिन्न विषयों का समावेश किया गया है। वैसे तो भवानी प्रसाद को गांधीवादी कवि कहा जाता है। वे न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि गांधीवादी चिंतन से पूरा सरोकार भी रखते थे। इसी के चलते उन्होंने ‘गांधी पंचशती’ की रचना भी की। लेकिन इमरजेंसी ने उन्हें इतना उद्द्वेलित किया, कि ‘त्रिकाल संध्या’ की रचनाओं का स्वरूप इन सबके विपरीत तीखा और मारक बन पड़ा हैं, जो समय -परिस्थिति के अनुकूल भी हैं। 

इमरजेंसी लोकतंत्र पर हमला थी, फासीवाद व अधिनायकवादी राजनीति का बीजारोपण था। ऐसे काल में जब चारों ओर भय का वातावरण हो, खौफ, आतंक और डर व्याप्त हो, ऐसे में एक हिंन्दी साहित्य का कवि अपनी कलम की पक्षधरता जिस ओर रखता है, उसे आज याद किया जाना चाहिए। इसलिए भवानी प्रसाद की कविताओं का यह संग्रह ‘त्रिकाल संध्या’ पर बात की जानी चाहिए, क्योंकि इसकी उम्र भी आपातकाल जितनी हो चुकी है, और आज भी उतना ही प्रासंगिक भी है। वह इसलिए भी, क्योंकि इसमें सच्चाई है।

देश में इमरजेंसी के दौरान कलमप्रेमियों को जिस तरह से डरा-धमका कर चुप करा दिया गया था, वजह वही इमरजेंसी का अनकहा सेंसरशिप। चोरी-छिपे अंडरग्राउंड पत्रों और परचों में कुछ बहुत छप रहा था। बड़े अखबारों और पत्रिकाओं की बहुत हिम्मत नहीं थी कि वे बगैर किसी सेंसर के कुछ भी छापकर संकट मोल ले सके। भावानी प्रसाद मिश्र लिखते हैं- ‘किस किस महारथी का नाम लूं। साधारण साधारण कविताएं नहीं छापी, यांे तो मांग-मांगकर छापते थे। तो कविताएं ‘भूमिगत’ पत्रकों में छपने लगीं-नाम देने पर मेरा आग्रह रहता था। और उजागर छपीं अहमदाबाद के गुजराती पत्र ‘भूमिपुत्र’ में। इस पत्र ने इन कविताओं और अपने संपादकीय आदि के कारण कष्ट भी भरपूर भोगा। हमारे हिंदी पत्र तब भी मलाई खाते रहे और अब भी खाने में होड़ लगा रखी है।’

इमरजेंसी में जयप्रकाश नारायण सरीखे नेताओं को बंदी बना दिया गया और उनकी खबर न मिल पाने से कवि सहित जनता काफी संशय में थी। उनकी किसी भी प्रकार की खबर न अखबारों से मिल पा रही है और न उनसे मिलकर जाने वालों से कुछ पता लग पा रहा है। जयप्रकाश नारायण को लेकर भवानी प्रसाद जी के मन में जैसे विचार आ-जा रहे थे, उन सबके बारे में ‘तुम भीतर बंद हो और हम बाहर’ कविता में काफी विस्तार से लिखा है। ‘त्रिकाल संध्या’ संग्रह में यह कविता भी लगभग 350 लाइनों में दर्ज है। यह कविता 25 जुलाई को लिखनी शुरू हुई और पूरी हुई 28 जुलाई, 1975 तक। अब तक इमरजेंसी का एक महीना पूरा हो चुका था। 

यहां इस कविता का जिक्र जरूरी है, क्योंकि इस लंबी एक कविता के माध्यम से आसानी से एक महीने में ही देश के इमरजेंसी के हालात को समझा जा सकता है। बहुत ही बारीकी से डायरीनुमा अंदाज में बातें दर्ज हुई हैं। दिन-ब-दिन क्या घट रहा था, कैसे हो रहा था, इसे एक मात्र कविता के माध्यम से जाना जा सकता है, कि अभिव्यक्ति का गला कैसे पकड़ा गया था। यहां कविता के कुछ अंश इस प्रकार हैं- तुम बंद हो हम बाहर हैं, तुम हमारी बात घुमा रहे हो मन में, और हम सोचते हैं, क्या जाने कैसे हो तुम भीतर.... अखबार तो तुम्हारा नाम तक, नहीं छापते, तुम्हारी खबरें कैसे छापेंगे, फिर आदमी एक जगह, चार से ज्यादा इकट्ठा नहीं किए जा सकते....भीष्मों ने चुप्पी साध ली है, द्रोणों ने सिर झुका लिया है, कृपाचार्य बीमार हैं, और भी दो चार हैं, जिन्होंने कोशिश की थी, कहने की, मगर वे जहां जिस आसन पर बैठे हैं, वहां बैठे रहने की जरूरत, उन्हें हर सत्य से बड़ी लग रही है, छिन जाएगी सच कहने से वह गादी....वैसे नयी बात नहीं थी, संघर्षों में पक्ष कई बार बदल लेते हैं लोग, मगर यहां उससे कुछ अधिक हुआ, एक शब्द का सहारा, तुम्हें बंद कर रखने का तर्क बन गया....आज नहीं तो कल सारी दुनिया के लोग, उन्हें उनके सही रूप में देखेंगे, वे उन्हें किन्हीं सिद्धांतों की नहीं, उनकी काली करतूतों की धूप में देखेंगे... और खबरें क्या कहंे, खबरें तो आती नहीं हैं अफवाहें आती हैं, .....देश अफवाहों के बीच जी रहा है....पुराने शाह थे सुल्तान थे, अब राष्ट्रपति हैं प्रधानमंत्री हैं, धर्म को रखकर ताक पर घंटा झालर बजा दो... तमगों की तरह लटकाए फिरती है वह, अनीति क्रूरता और अत्याचार को, विचार को थमा देती है नारे, फिरते हैं बेचारे विचार, सड़कों पर मारे मारे नारों को धरे ओंठ पर।


शनिवार, 3 मई 2025

‘ओलंपिक खेल पुरुषों के लिये ही होने चाहिए’ से लेकर क्रिस्टी कोवेंट्री तक महिलाओं का संघर्ष

 

पेरिस में 1900 में पहली बार महिलाओं ने इन खेलों में शामिल होने की अनुमति मिली थी, तब कोई नहीं सोच सकता था कि महिलायें अपने घरेलू जिंदगी से निकलकर हर तरह के खेलों में न केवल भाग लेंगी, बल्कि अच्छा प्रदर्शन भी कर सकेंगी। इन वर्षों में 1900 से 2024 तक महिलाओं की ओलंपिक में भागीदारी 22 से 5,250 तक पहुंच गई। यह यात्रा बहुत ही अद्भुत और संघर्ष भरी रही, इसे स्वयं महिलाओं को भी जानना चाहिये।

आधी आबादी की दृष्टि से मार्च से अप्रैल के बीच खेल के मैदान से दो शानदार खबरें आ चुकी हैं। पहली, 20 मार्च को जिम्बाब्बे की क्रिस्टी कोवेंट्री अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की अध्यक्ष चुनी गईं। जिम्बाब्बे की खेल मंत्री और दो बार की ओलंपिक तैराकी स्वर्णपदक विजेता ने सात उम्मीदवारों के इस चुनाव में पहले दौर में ही शानदार जीत हासिल की। 131 साल के इतिहास में इस पद को पाने वाली क्रिस्टी न केवल पहली महिला बल्कि पहली अफ्रीकी भी हैं। अब तक की सबसे युवा (41 वर्ष) क्रिस्टी कोवेंट्री को इस पद पर कुल आठ साल यानी 2033 तक कार्यरत रहेंगी।

दूसरी, 10 अप्रैल को खबर आई कि होने वाले लाॅस एंजिल्स ओलंपिक में पहली बार पुरूषों की तुलना में ज्यादा महिलाएं हिस्सा लेंगी। यह आंकड़ा महिला खिलाड़ियों के पक्ष में तब झुक गया, जब ओलंपिक समिति ने महिलाओं के टूर्नामेंट में दूसरे खेलों में चार टीमों का इजाफा किया। महिलाओं के वाॅटर पोलो में 2 टीमों और मुक्केबाजी में एक अतिरिक्त भार वर्ग जोड़ने से कुल टीमें क्रमशः 12 और 07 हो गईं। इस आंकड़ों को प्रभावित करने वाला दूसरा कारण पुरुषों की फुटबाॅल प्रतियोगिता को 16 टीमों से घटाकर 12 कर दिया गया है। इस तरह अब 36 खेलों में महिलाओं के पास पुरुषों 5,543 की तुलना में ज्यादा भागीदारी 5,655 होगी।

पेरिस ओलंपिक 2024 में आधी आबादी के लिये खुशी की बात थी कि इस खेल में महिलाओं की भागीदारी का हिस्सा 50 फीसदी पहुंच गया था। ओलंपिक इतिहास में इसे पूर्ण लैंगिक समानता वाला आयोजन कहा जा सकता है। इस आयोजन में कुल 10,500 खिलाड़ियों ने भाग लिया था जिसमें पुरुष और महिला खिलाड़ियों की संख्या क्रमशः 5250, 5250 थी। इस आयोजन में कुल महिला स्पर्धाएं 152 एवं पुरुष स्पर्धाएं 157 एवं मिश्रित स्पर्धाएं 20 थीं। हालांकि पुरुषों की स्पर्धाओं की संख्या थोड़ी ज्यादा थी, लेकिन खुशी की बात यह थी कि लैंगिक समानता की दिशा में यह एक बड़ा कदम था। 1900 में पेरिस में आयोजित ओलंपिक पहली बार महिलाओं को भाग लेने की अनुमति मिलने से लेकर पेरिस ओलंपिक 2024 तक की यात्रा बहुत ही संघषपूर्ण थी।

1896 में आयोजित पहले ओलंपिक तक पियरे डी कुबर्टिन मानते थे कि महिलाओं का प्रतिस्पर्धी खेलों में भाग लेना ‘आप्राकृतिक’ है। ‘ओलंपिक खेल पुरुषों के लिये होने चाहिए... महिलाओं की भूमिका केवल विजेताओं को ताज पहनाने की होनी चाहिए।’

पेरिस ओलंपिक तक लैंगिक बराबरी, क्रिस्टी कोवेंट्री का आईओसी का अध्यक्ष बनना और अब 2028 के ओलंपिक में महिला खिलाड़ियों का मेजोर्टी में आना आधुनिक ओलंपिक के 131 वर्षों के इतिहास के वे मील के पत्थर हैं, जहां पर बैठकर सुस्ताते हुये खेलों के प्रति महिलाओं के संघर्षों की गाथा सुनी जा सकती है। फ्रांस के पियरे डी कुबर्टिन ने जब प्राचीन ओलंपिक खेलों को पुनर्गठित करते हुये 1894 में जब आधुनिक ओलंपिक की नींव डाली, तब तक उनका इरादा पुरुषों और महिलाओं की समान भागीदारी की कौन कहे, उन्हें मैदान में लाने के पक्ष में भी नहीं थे। 1896 में आयोजित पहले ओलंपिक तक पियरे डी कुबर्टिन मानते थे कि महिलाओं का प्रतिस्पर्धी खेलों में भाग लेना ‘आप्राकृतिक’ है। ‘ओलंपिक खेल पुरुषों के लिये होने चाहिए... महिलाओं की भूमिका केवल विजेताओं को ताज पहनाने की होनी चाहिए।’ कुबर्टिन उस समय महिलाओं के प्रति प्रचलित परंपरावादी और रूढ़िवादी सोच के मालिक थे। वे महिलाओं को खेलों में सहभागी नहीं, बल्कि सौंदर्य और संस्कार का प्रतीक मानते थे। ‘नारी सुलभ मर्यादा’ का तर्क भी देते थे। शारीरिक खेल महिलाओं को ‘अनाकर्षक और कठोर’ बना देंगे। खेल की प्रतियोगिताएं ‘नारी सुलभता’ के विरूद्ध है। ऐसी बातों के चलते पहला ओलंपिक महिलाओं की उपस्थिति के बगैर हुआ।

इन खेलों में महिलाओं की भागीदारी के बारे में कुबर्टिन की सोच बदली हो या न बदली हो, पर दुनिया धीरे-धीरे बदल रही थी। तब 1900 में पेरिस में आयोजित आधुनिक ओलंपिक खेलों के इस दूसरे संस्करण में महिलाओं ने ओलंपिक खेलों में भाग लिया। कुल 22 महिलाओं ने इसमें भागीदारी की थी। इस ओलंपिक में महिला भागीदारी बहुत ही सीमित और प्रतीकात्मक थी। पांच देशों की महिलाओं ने इन खेलों में भाग लिया था, जो संपूर्ण संख्या (कुल 997) का केवल 02 फीसदी था। इसमें महिलाओं ने टेनिस, गोल्फ, क्रोके और नौकायन जैसी प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया था। टेनिस में चार्लोट कूपर ने जीत दर्ज करके दिखा दिया कि महिलाएं भी प्रतिस्पर्धी खेलों में जीत सकती हैं। (क्योंकि इससे पहले महिलाओं का किसी भी खेल भाग लेने को शक की निगाह से देखा जाता था। खेलों के दौरान कई तरह की अफवाहें फैलाना समान्य बात थी) और यहीं से सीमित और नियंत्रित रूप से महिलाओं को ओलंपिक खेलों में भाग लेने की अनुमति दी जाने लगी।

1900 में पेरिस में आयोजित आधुनिक ओलंपिक खेलों के इस दूसरे संस्करण में महिलाओं ने ओलंपिक खेलों में भाग लिया। कुल 22 महिलाओं ने इसमें भागीदारी की थी। इस ओलंपिक में महिला भागीदारी बहुत ही सीमित और प्रतीकात्मक थी।

जब सीमित ही सही महिलाओं को निरंतर 1912,1920,1924,1928 तक इन खेलों में धीरे-धीरे महिलाओं की संख्या बढ़ रही थी। पर कुबर्टिन और उनके जैसे समाज के अन्य पुरुषों के विचार नहीं बदल पा रहे थे, तभी फ्रांस की एलिस मिलियट जैसी महिला का उदय होता है जिन्होंने महिलाओं के लिये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में समान भागीदारी के लिये संघर्ष किया। उन्हीं के संघर्ष का परिणाम था पेरिस में 1922 में आयोजित हुये ‘वुमेंस ओलंपिक गेम’ की शुरूआत। आईओसी और आईएएएफ (इंटरनेशनल एसोसिएशन आॅफ एथलेटिक्स फेडरेशन) ने महिलाओं को ओलंपिक की मुख्य एथलेटिक्स स्पर्धाओं में भाग लेने से मना कर दिया था। इस भेदभाव के विरोध में एलिस मिलियट ने स्वयं ही महिला ओलंपिक आयोजित करने की सोची और वह कर दिखाया जिसके लिये महिलाओं को उनका ऋणी होना चाहिए।

वूमेंस ओलंपिक गेम्स के कुल चार संस्करण आयोजित हुये- 1922 से 1934 तक। इन खेलों में महिलाओं ने तमाम एथलेटिक्स स्पर्धाओं में जमकर भाग लिया और पुरूषों की सोच के विरूद्ध अपना प्रदर्शन दिखाया। इसका परिणाम यह हुआ कि 1928 से एथलेटिक्स और अन्य स्पर्धाओं में धीरे-धीरे महिलाओं को शामिल किया जाने लगा। इस आयोजन से आईओसी और आईएएएफ पर चौतरफा दबाव भी पड़ा। अब ये संस्थाएं नहीं चाहती थीं कि महिलाओं के लिये कोई अलग आयोजन आयोजित हों। एलिस मिलियट और एफएसएफआई (फेडरेशन स्पोर्टिव फेमिनिन इंटरनेशनल) का मकसद शुरू से था भी यही कि महिलाओं को मुख्य ओलंपिक में बराबरी के साथ जोड़ा जाए, न कि वे अलग आयोजन हमेशा करती रहें। अंततः वे आधी आबादी को उनका हक दिलाने में सफल रहीं।

जब पेरिस में 1900 में पहली बार महिलाओं ने इन खेलों में शामिल होने की अनुमति मिली थी, तब कोई नहीं सोच सकता था कि महिलायें अपने घरेलू जिंदगी से निकलकर हर तरह के खेलों में न केवल भाग लेंगी, बल्कि अच्छा प्रदर्शन भी कर सकेंगी। इन वर्षों में 1900 से 2024 तक महिलाओं की ओलंपिक में भागीदारी 22 से 5,250 तक पहुंच गई। यह यात्रा बहुत ही अद्भुत और संघर्ष भरी रही, इसे स्वयं महिलाओं को भी जानना चाहिये।

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

साहित्योत्सव : साहित्यिक नदियों का संगम



















बसंत जैसे सुहावना मौसम में राजधानी दिल्ली साहित्य-संस्कृति से लबरेज उत्सवों से दमक उठती है। साहित्य-संस्कृति का गढ़ बन चुकी दिल्ली में इतने समारोह हो रहे होते हैं कि साहित्य-संस्कृति प्रेमियों के लिये चुनाव की समस्या खड़ी हो जाती है कि किन-किन उत्सवों में भाग लें, आखिर में उन्हें कुछ को छोड़ना ही पड़ता है। इधर, साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित छह दिवसीय भव्य, वृहद और विस्तृत साहित्योत्सव संपन्न हुआ। साहित्य अकादमी, दिल्ली में नजदीकि मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन से ही इस उत्सव की सुगबुगाहट मिलनी शुरू हो जाती थी। कुछ सालों से हर बड़े साहित्य-संस्कृति और मीडिया के ठिकाने लिट्फेस्ट जैसे बड़े बड़े इंवेट्स प्लान कर रहे हैं, जो काफी सुर्खियां भी बटोरते हैं, साहित्य अकादमी भी इसी राह में है। हालिया तीन साल पहले तक ऐसा नहीं था। पिछले साल साहित्य अकादमी की स्थापना के सत्तर साल पूरे होने के उपलक्ष्य में हर साल आयोजित होने वाले इस उत्सव को इतनी भव्यता से मनाया गया कि यह विश्व का सबसे बड़ा साहित्योत्सव बन गया। इस दौरान 190 से अधिक सत्रों में 1100 से अधिक प्रसिद्ध लेखकों और विद्वानों ने भाग लिया था। इस बार कुछ कम, पर कुछ ऐसा ही माहौल छह दिनों तक बना रहा।

एशिया का सबसे बड़ा साहित्यिक आयोजन का रिकार्ड बनाते हुये संपन्न हुआ साहित्योत्सव 7-12 मार्च तक चला। अकादमी के अनुसार इस दौरान 100 से अधिक सत्रों में कुल 700 से अधिक लेखकों
और विद्वानों ने भाग लिया। और इस दौरान देश की 50 से अधिक भाषाओं का प्रतिनिधित्व किया गया। इस समारोह के दौरान पूरे देश से आये हर तबके के साहित्यकार और साहित्य प्रेमी नजर आये। साहित्य अकादमी के प्रांगण में इतनी भाषा और बोली बोलने वाले साहित्य प्रेमी नजर आ रहे थे कि एकबारगी ‘मिनी इंडिया’ जैसा दृश्य बन गया था। भारतीय प्रसिद्ध नदियों के नामों से संबोधित समागार पूरे अकादमी प्रांगण में विभिन्न तरह की चर्चाओं, बहसों और कविता-कहानी सम्मेलनों से भरे रहे। बहुभाषी साहित्यकारों से मिलने का यह सुनहरा अवसर कोई भी साहित्यप्रेमी खोना नहीं चाह रहा था, खासकर युवाओं में भरपूर उत्साह देखा गया। इस बार युवा साहिती और एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मेलन में संबंधित लेखकों को मुखर होकर अपनी बात रखते देखा गया।

07 मार्च को साहित्योत्सव का विधिवत उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया। इस अवसर पर उन्होंने देश के साहित्य की गतिशीलता और जीवंतता को उसकी विशेषता बताते हुए कहा कि तकनीक के समय में अनुवाद के जरिए हमारा साहित्य अब वैश्विक होने लगा है। अब उस पर चर्चा प्रारंभ हो गई है। पूरी दुनिया का भारत को देखने का नजरिया बदला है। इस अवसर पर संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव अमृता प्रसाद साराभाई भी उपस्थित थीं। साथ अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक भी मंचासीन रहेे।

पहले दिन 20 विभिन्न कार्यक्रमों में 100 से अधिक लेखकों ने सहभागिता की। कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में आदिवासी कविता एवं कहानी-पाठ और पैनल चर्चा हुयी। भारतीय साहित्य में नदियां, भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र की लोक संस्कृति, भारत की साहित्यिक कृतियों में लुप्त होता ग्रामीण समाज आदि विषयों पर भी विधिवत वक्तव्य दिए गए। अनेक सत्रों में बहुभाषी कविता और कहानी के पाठ किए गए।  

08 मार्च को दूसरे दिन साहित्य अकादमी पुरस्कार-2024 के पुरस्कृत विद्वानों को पुरस्कार दिये गये। इस समारोह के मुख्य अतिथि प्रख्यात अंग्रेजी नाटककार महेश दत्तानी थे। इसकी अध्यक्षता अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने की। साथ ही समापन वक्तव्य उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा ने प्रस्तुत किया। इस समारोह में 22 साहित्यकारों को पुरस्कृत किया गया। इस बार हिंदी के लिये प्रसिद्ध कवयित्री गगन गिल को उनकी पुस्तक ‘मैं जब तक आई बाहर’ के लिये यह सम्मान दिया गया है। संस्कृत के लिये दीपक कुमार शर्मा एवं अंग्रेजी के लिये इस्तेरीन कीरे को दिया गया है। कन्नड भाषा के लिए पुरस्कृत रचनाकार नहीं आ सके थे। बांग्ला भाषा का पुरस्कार घोषित नहीं किया गया था। डोगरी का पुरस्कार उनकी बेटी ने लिया और अंग्रेजी का पुरस्कार उनके प्रतिनिधि ने ग्रहण किया। पुरस्कार अर्पण समारोह के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत प्रख्यात बांसुरी वादक हरिप्रसाद चैरसिया के भतीजे राकेश चैरसिया का बांसुरी वादन प्रस्तुत किया गया।

09 मार्च को साहित्योत्सव के तीसरे दिन 22 सत्रों में आयोजित कई कार्यक्रमों में सबसे अधिक आकर्षित करने वाला सत्र पुरस्कृत रचनाकारों का ‘लेखक सम्मिलन’ था। लेखक सम्मिलन में रचनाकारों ने अपनी सृजन की रचना प्रक्रिया को पाठकों के साथ साझा किया। अपने हिंदी  कविता संग्रह के लिए पुरस्कृत गगन गिल ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि कवि को न कविता लिखना आसान है न कवि बने रहना। कविता भले बरसों से लिख रहे हो, कवि बनने में जीवन भर लग जाता है। उन्होंने कविता को गूंगे कंठ की हरकत बताते हुए कहा कि अपने चारों तरफ अन्याय और विमूढ़ कर देने वाली असहायता में कई बार कवि को उन शब्दों को ढूंढ़ कर भी लाना मुश्किल होता है जिससे वह उसका प्रतिकार कर सके। 

इसके अतिरिक्त भारतीय ऐतिहासिक कथा साहित्य की सार्वभौमिकता और साझा मानव अनुभव, क्या जनसंचार माध्यम साहित्यिक कृतियों के प्रचार प्रसार का एकमात्र साधन है?, वैश्विक साहित्यिक परिदृश्य में भारतीय साहित्य, ओमचेरी एन.एन. पिल्लै जन्म शतवार्षिकी संगोष्ठी, आधुनिक भारतीय साहित्य में तीर्थाटन आदि विषयों पर चर्चा हुयी। साथ ही युवा साहिती तथा बहुभाषी कविता और कहानी पाठ के कई सत्र हुए। प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक उपमन्यु चटर्जी ने संवत्सर व्याख्यान प्रस्तुत किया जिसका विषय था ‘ध्यान देने योग्य कुछ बातें।’

साहित्योत्सव के चैथे दिन, 10 मार्च को 22 से अधिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें 140 से अधिक लेखकों ने भाग लिया। इस दिन 05 बहुभाषी कवि सम्मेलन और 04 कथा सम्मेलन आयोजित हुये। इसके अतिरिक्त स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय साहित्य में ‘राष्ट्र’ की अवधारणा, क्या कॉमिक्स साहित्य है, रंगमंचः भारतीय समाज में परिवर्तन के प्रतिबिंब के रूप में, सांस्कृतिक रूप से भिन्न भाषाओं में साहित्यिक कृतियों के अनुवाद में चुनौतियां, प्रवासी लेखन में मातृभूमि आदि महत्वपूर्ण विषयों पर परिचर्चाएं हुईं। इस दिन की महत्वपूर्ण परिचर्चा ‘साहित्य और समाजिक न्याय’ की अध्यक्षता पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने की। इस परिचर्चा में ए.पी. महेश्वरी, मुकुल कुमार एवं अश्विनी कुमार ने भाग लिया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा कि साहित्य और कानून का आपस में गहरा संबंध है। साहित्य का सामाजिक न्याय के साथ सुखद गरिमापूर्ण और प्रभावशाली संबंध है।

‘भारतीय साहित्यिक परंपराएंः विरासत और विकास’ शीर्षक से राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी शुभारंभ हुआ, जिसका उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात बांग्ला विद्वान एवं अनुवादक सुकांत चैधरी ने दिया तथा बीज वक्तव्य प्रख्यात अंग्रेजी लेखक मकरंद परांपजे ने दिया। इस संगोष्ठी के अन्य सत्रों में भारतीय नाटकः उत्कृष्टता की परिभाषा एवं प्राचीन भारतीय साहित्य और भारत में अनुवाद विषयों पर व्यापक पर चर्चाएं हुईं। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत फौजिया दास्तानगो और रीतेश यादव द्वारा दास्तान-ए-महाभारत पेश की गई।

पांचवें दिन, 11 मार्च को ‘भारत की अवधारणा’ पर विचार-विमर्श के साथ ही प्रख्यात लेखक मोहन राकेश एवं कवि गोपालदास नीरज को उनकी जन्मशताब्दियों के अवसर पर याद किया गया। मोहन राकेश जन्मशती संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने की और बीज वक्तव्य प्रख्यात हिंदी नाट्य समालोचक जयदेव तनेजा ने दिया। साथ प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज की जन्मशती पर ‘कवि नीरजः अप्रतिम रोमांटिक दार्शनिक’ शीर्षक से हुई परिचर्चा की अध्यक्षता गीतकार बालस्वरूप राही ने की और मिलन प्रभात गुंजन के साथ ही अलका सरावगी, निरुपमा कोतरू और रत्नोत्तमा सेनगुप्ता ने हिस्सा लिया। ‘कथासंधि’ के अंतर्गत कथाकार जितेंद्र भाटिया का कथा-पाठ भी हुआ। अंत में सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत नलिनी जोशी ने हिंदुस्तानी गायन प्रस्तुत किया।

साहित्योत्सव के अंतिम दिन 15 सत्रों में दिव्यांग लेखक एवं साहित्य में रूचि रखने वाले बच्चे भी इसका हिस्सा बने। 10 भाषाओं के दिव्यांग लेखकों ने विनोद आसुदानी एवं अरविंद पी. भाटीकर की अध्यक्षता में काव्य-पाठ एवं कहानी पाठ प्रस्तुत किया। आठ विचार-सत्रों में भविष्य के उपन्यास, भारत की सांस्कृति परंपरा पर वैश्वीकरण का प्रभाव, अनूदित कृतियों को पढ़ने का महत्व, एकता और सामाजिक एकजुटता, कृत्रिम बुद्धिमता और साहित्यिक रचनाएं आदि विषयों पर विचार विमर्श हुआ। ‘भारतीय साहित्यिक परंपराएंः विरासत और विकास’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन भारतीय कविता, दलित साहित्य एवं आध्यात्मिक साहित्य पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। इन सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ एवं विष्णु दत्त राकेश ने की। 

बच्चों के लिए चित्रकला, रेखांकन प्रतियोगिता एवं भाषण प्रतियोगिताएं आयोजित की गई जिनमें 15 स्कूलों के 300 से ज्यादा बच्चों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में 12 बच्चों को पुरस्कृत किया गया। एक अन्य कार्यक्रम ‘लेखक से भेंट’ प्रख्यात बांग्ला लेखक सुबोध सरकार के साथ किया गया। इस अवसर पर उनकी पुरस्कृत बाङ्ला कविता-संग्रह के हिंदी अनुवाद ‘द्वैपायन सरोवर के किनारे’ का लोकार्पण विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के कर कमलों से हुआ। इस अवसर पर पुस्तक की अनुवादिका अमृता बेरा और साहित्य अकादेमी के सचिव भी उपस्थित थे।

                                                                                                                (इस रिपोर्ट का सम्पादित भाग नवोत्थान पत्रिका में प्रकाशित.)