शनिवार, 20 जुलाई 2013

ये खूटियां

खूंटी
छोटी-बड़ी, मोटी-पतली
स्टील, लोहे और तो और
प्लास्टिक की भी
जैसा आप चाहे।
दादा-दादी और नाना-नानी के
जमाने वाली तो बिलकुल नहीं
खूब सजी-संवरी
विभिन्न आकारों, प्रकारों में भी
रंगों का भी कोई जवाब नहीं
खूब रंग-बिरंगी, तितलियों सरीखी
बिलकुल नजाकत के साथ फौलाद
अपनी पसंदानुसार
कहीं भी लगा दें
दीवालों पर, अलमारी में
किसी लुकने-छिपने वाली जगहों पर
जहां किसी और की नजर न पहुंच सके
कभी-कभी दरवाजों के पीछे भी
ठोक सकते हैं इन्हें
एक हथौड़ी के बल से।
कोई गिला नहीं
कोई नाराजगी नहीं
मूक, अविचल
बिलकुल एक औरत की तरह
सबकुछ सहती
सबकुछ ढोती
सजीव बनते घर में
लगी ये निर्जीव
खूटियां।

2 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

सुन्दर काव्य रचना।। धन्यवाद।

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मदन मोहन सक्सेना ने कहा…

बहुत उत्कृष्ट
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