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...जब हम होंगे 60 साल के


  • बारह हजार करोड़ की रेमंड ग्रुप के मालिक 78 वर्षीय विजयपत सिंघानिया एक-एक पैसों के लिए मोहताज हो गए। उनके बेटे गौतम ने उन्हें न केवल घर से बेदखल कर दिया बल्कि गाड़ी व उनका ड्राइवर तक छीन लिया। मजबूर होकर विजयपत को बाम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर करके मुंबई स्थित एक घर का पजेशन मांगा। (अगस्त, 2017 में यह खबर काफी चर्चित रही थी)
  • पाकीजा और रजिया सुल्तान जैसी मशहूर फिल्म में काम करने वाली जानी मानी 67 वर्षीय अभिनेत्री गीता कपूर को उसके बेटे और बेटी अस्पताल में लवारिश छोड़कर चले गए। बाद में वे फिल्म निर्माता अशोक पंडित और रमेश तौरानी की देखभाल में रहीं, जिनका एक साल वृद्धाश्रम में रहने के बाद मई, 2018 को उनका निधन हो गया। (जून, 2017 की इस खबर ने लोगों का दिलों में मायूसी भर दी) 

वयोवृद्ध उद्योगपति विजयपत सिंघानिया और वयोवृद्ध अभिनेत्री गीता कपूर, दोनों साधारण व्यक्तियों में नहीं आते हैं, जिनके साथ ऐसा सलूक होना स्वाभाविक माना जा सकता है। इन दोनों शख्सियतों की संतानें भी हर पक्ष से मजबूत हैं। फिर उनकी संतानों द्वारा उनके साथ ऐसा व्यवहार करने के क्या कारण हो सकते हैं? यह हमारी परंपराएं तो नहीं हैं? अगर ऐसा समाज इन बड़े तबकों के साथ उनके अंतिम समय में ऐसा अमानवीय व्यवहार हो सकता है, तो जनसाधारण के जीवन में क्या नहीं हो रहा होगा। जबकि देश में जीवन प्रत्याशा औसतन 68 वर्ष से अधिक हो गई है। वास्तव में इस पर थोड़ी देर ठहरकर सोचने की जरूरत महसूस हो रही है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या निधि यानी यूएनएफपीए ने भारतीय समाज में बुजुर्गों की समस्याओं और जनसांख्यिकीय परिवेश के संबंध में सरकार तथा गैर-सरकारी संगठनों की प्रतिक्रिया पर प्रकाश डालने का प्रयास करते हुए ‘हमारे वृद्धजनों की देखभाल: शीघ्र प्रतिक्रिया’ नाम से एक रिपोर्ट तैयार की है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से हुआ विकास, जिसमें चिकित्सा विज्ञान और बेहतर पोषण तथा स्वास्थ्य देखभाल संबंधी सेवाओं को प्रदत्त कराया जाना शामिल है, जिसके परिणामस्वरूप मानव को दीर्घायु बना रहा है। इसके साथ-साथ जन्मदर में भी गिरावट आई है जिसकी वजह से देश की आबादी में वरिष्ठ नागरिकों के अनुपात में वृद्धि हुई है। कई तरह के अध्ययनों में यह बात सामने भी आ रही है।
मिनिस्ट्री आॅफ स्टेटिस्टिक एंड प्रोग्राम इमप्लीमेंटेशन की 2016 की रिपोर्ट ‘भारत में बुजुर्ग-2016’ कहती है कि वृद्धजनों की आबादी में 2001 के बाद से 35.5 फीसदी का इजाफा हो गया है। जहां 2001 में यह आबादी कुल आबादी का 7.6 थी, वहीं दस साल बाद, 2011 में बढ़कर 10.3 तक पहुंच गई। इसी तरह बुजुर्गों की निर्भरता 1961 के 11 फीसदी के मुकाबले 2011 के 14 फीसदी से अधिक हो गई है। इसी तरह यूनियन नेशंस पापुलेशन फंड की 2012 की रिपोर्ट कहती हैं कि वर्तमान 100 मिलियन यानी 10 करोड़ की बुजुर्ग आबादी 2050 तक 300 मिलियन यानी 30 करोड़ हो जाएगी। साथ ही इस बात की भी भविष्यवाणी की है कि इस अवधि तक 80 वर्ष के बुजुर्गों की संख्या लगभग सातगुना हो जाएगी। इस बढ़ती हुई बुजुर्ग जनसंख्या के लिहाज से संस्था ने हेल्थ और वेलफेयर सुविधाओं को बढ़ाने की सलाह दी थी, जिसका बोझ बढ़ता जाएगा।
प्रश्न यह है कि इस बढ़ती हुई बुजुर्ग आबादी के लिए हम कितना तैयार हैं? क्या हम इस बात के लिए सतर्क हैं कि इस आबादी के एक हिस्से की जरूरतें और आपेक्षाएं क्या हो सकती हैं? हमारा शासन और प्रशासन इसके लिए क्या योजनाएं और नीतियां बना रहा है? वास्विकता यह है कि बुजुर्गों की जनसंख्या के लिए तीन तरह की सबसे जरूरी चिंताएं होगीं। पहला, उनका स्वास्थ्य और देखभाल, दूसरा उनकी सुरक्षा और तीसरी उनका सम्मानयुक्त जीवनयापन। इन तीन फ्रंट पर समाज, व्यवस्था और सरकार को काम करना होगा।
जून, 2016 को एजवेल फाउंडेशन बुजुर्गों पर एक अध्ययन किया, जिसमें उन्होंने जो तस्वीर पेश की वह बहुत ही सोचनीय कही जा सकती है। रिपोर्ट में कहा गया कि देश के 65 बुजुर्गों के पास कोई सम्मानजनक आय के स्रोत न होने के कारण वे गरीबी में जी रहे हैं। यह रिपोर्ट कहती है कि इन बुजुर्गों में अपने अधिकारों और नियम-कानूनों के प्रति जागरुकता की कमी के चलते वे अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे हैं। इसकी सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं हो रही हैं क्योंकि वे लिंगभेद का भी शिकार हो रही हैं। ये महिलाएं लंबा वैधव्य भी ढो रही हैं, जिससे इनकी स्थिति और भी दयनीय हो गई है। अपने एक निर्धारित सैंपल में किए अध्ययन में पाया गया कि 37 फीसदी बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार किया गया, 20 फीसदी बुजुर्गों को समाजिक जीवन से काट दिया गया। जबकि 13 फीसदी बुजुर्गों को मानसिक रूप से परेशान किया गया, 13 फीसदी बुजुर्गों को मूल सुविधाओं से वंचित कर दिया गया।
रिपोर्ट ‘भारत में बुजुर्ग-2016’ भी यह बताती हैं कि दिल की बीमारी गांव की अपेक्षा शहर के बुजुर्गों में अधिक है। यह रिपोर्ट यह भी कहती है कि बुजुर्ग पुरुषों में यूरेनरी की समस्या अधिक, जबकि महिला बुजुर्गों में ज्वांइंट्स की समस्या अधिक देखी गई है। 60-64 वर्ष के वर्ग स्त्री-पुरुषों में 76 फीसदी शादीशुदा हैं, जबकि 22 फीसदी अकेले रह गए हैं जबकि 2 फीसदी ऐसे भी हैं, जिन्होंने या विवाह नहीं किया, तलाकशुदा हैं। ऐसे में बुजुर्गों के बीच अकेलापन की समस्या बढ़ती जा रही है। एकल परिवार की धारणा भी बुजुर्गों की समस्याएं बढ़ा रही है। वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम और वृद्ध शरणस्थल इनका सार्वभौमिक हल नहीं हो सकते।
अब यह समस्या एक वृहद रूप धारण करती जा रही है।  कुछ सरकारी प्रयासों से यह हल होने वाली नहीं है। जैसे हम बच्चों के प्रति संवेदनशील होते हैं, वैसे ही समाज को बुजुर्गों के प्रति अधिक सहनशील और संवेदनशील बनना पड़ेगा। बुजुर्गों की समस्याओं के रूप में लाइम-लाइट में आए सिंघानिया या गीता कपूर कोई पहली और आखिरी कहानी नहीं है। किसी समय इस कहानी में हम भी हो सकते हैं, इस बात को अगर ध्यान में रखा जाए तो बुजुर्गों के प्रति हम कहीं अधिक मानवीय दृष्टिकोण बना सकते हैं।

टिप्पणियाँ

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