क्या महिलाओं को पीरियड लीव मिलनी चाहिये या इसकी कोई जरूरत नहीं है? क्या इससे समाज में लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा या लैंगिक समानता के लिये ऐसी नीतियों का होना जरूरी है? इन्हीं सब बातों में उलझकर रह गया है यह महत्वपूर्ण मुद्दा।
- महिलाओं की पीरियड से संबंधित समस्याओं को मान्यता दी जाए, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कानून व नीति भी बनाई जानी चाहिए। साथ ही उन्हें मासिकधर्म से संबंधी अवकाश भी प्रदान किया जाना चाहिए। इस याचिका में महिलाओं की पीरियड से संबंधित कुछ बीमारियों का भी जिक्र किया गया है जैसे-डिसमिनोरिया एंडोमेट्रोयोसिस, पीआईडी। इसमें अनु.14 समानता का अधिकार, अनु. 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला दिया गया। साथ ही अनु. 32, (रिट जारी करने का अधिकार) अनु. 141 और 142 का भी उल्लेख किया गया है।
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की दो-जजों की बेंच ने महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान छुट्टी देने वाला कानून बनाने की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने आगाह किया कि मासिक धर्म के लिए अनिवार्य छुट्टी देने से अनजाने में महिलाओं के करियर में रुकावट आ सकती है और उन्हें ’बड़ी जिम्मेदारियों’ से वंचित होना पड़ सकता है। इससे महिलाओं की प्रोफेशनल ग्रोथ पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके बजाय, कोर्ट ने राज्यों द्वारा ‘स्वैच्छिक’ पहल करने को बढ़ावा दिया।
सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में शैलेंद्र मणि द्वारा जारी की गई यह तीसरी याचिका थी। इस याचिका में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी नीति बनाएं, जो महिलाओं को पीरियड लीव प्रदान करती हो। इस मामले को तर्कसंगत बनाने के लिये महिलाओं की कुछ बीमारियों एवं संवैधारिक अनुच्छेदों को जिक्र किया गया ताकि इस दावे को अधिक मजबूती प्रदान की जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई के लिये मनाकर दिया। इसके लिये सुप्रीम कोर्ट ने अपने तर्कों को विस्तार से रखा है। इस मामले पर सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट ने तब मना किया है, जब जनवरी में ही मासिकधर्म स्वच्छता को ‘फंडामेंटल राइट’ घोषित करते हुये सभी राज्यों और केंद्रशासित राज्यों मासिकधर्म स्वच्छता को मेंनटेन रखने के लिये निर्देष दिये थे। सभी निजी और सरकारी स्कूलों को कोर्ट ने निर्देश दिये थे कि मासिकधर्म स्वच्छता से संबंधित जो बेसिक सुविधाएं जैसे अलग वाॅशरूम और सैनेटरी पैड उपलब्ध कराएं जाएं। सुप्रीम कोर्ट की यह व्याख्या अनु. 21 के अंतगर्त दी गई, जो व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देती है।
इससे पहले भी 2024 में चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्र की बेंच ने पीरियड लीव की याचिका पर सुनवाई करते हुये कई महत्वपूर्ण बातें कही थीं। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि पीरियड लीव पर दो बहुत ही अलग दृष्टिकोण से बात हो रही है। पहली, पीरियड लीव होने से महिलाओं को कार्यबल का हिस्सा बनने के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता है। दूसरा, पीरियड लीव को अनिवार्य बनाने से महिलाओं के रोजगार पर एक तरह का प्रतिबंध लग सकता है, क्योंकि नियोक्ता महिलाओं को कार्यबल में शामिल करने से विमुख हो जायेगा। हम ऐसा नहीं चाहते हैं। इससे पहले भी जब इस तरह की मांग को लेकर याचिका दी गई थी, तब चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ता को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से संपर्क करने की सलाह दी थी।
पीरियड लीव को लेकर देश में अब तक कोई कंेद्रीय नीति नहीं है। पीरियड लीव को लेकर संसद में कई सांसदों ने प्राइवेट बिल पेश किये हैं, जिन पर विचार नहीं किया गया है। हां, राज्य स्तर पर कुछ रियायतें महिलाओं और लड़कियों को दी जा रही हैं। बिहार देश का पहला देश था, जहां 1992 में राज्य महिला कर्मचारियों को महीने में दो दिन की पीरियड लीव मिलती है। इसी तरह ओडिशा में भी सरकारी महिला कर्मचारियों को हर महीने दो दिन के अवकाश की व्यवस्था दी गई है। 2023 में केरल सरकार ने सरकारी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली छात्राओं को पीरियड लीव के तहत अटेंडेस में रियायत दी गई है। सिक्किम हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री में काम करने वाली महिला कर्मचारियों को पीरियड लीव के तहत हर महीने तीन दिन छुट्टी लेने की व्यवस्था की गई है। कर्नाटक राज्य ने 2025 में सभी प्राइवेट और सरकारी क्षेत्र की महिला कर्मचारियों को हर महीने एक दिन की पेड पीरियड लीव देना अनिवार्य कर दिया है।
2020 में जोमैटो ने हर साल दस दिन की पीरियड लीव प्रदान की है। इसके अतिरिक्त बाइजूज, स्विगी, कल्चरल मशीन ने पीरियड लीव संबंधी नीतियां बनाई है। 2025 में एलएंडटी ने हर महीने एक दिन की पेड पीरियड लीव दी है जिससे कंपनी लगभग 5000 महिलाओं को फायदा होगा। 2025 में ही एसर इंडिया ने मात्रीका पाॅलिसी शुरू की जिसमें महिलाओं को हर महीने एक दिन की पेड लीव दी गई। 2025 में एसएमएफजी इंडिया क्रेडिट ने सभी महिला कर्मचारियों को एक दिन की पेड पीरियड लीव दी है। देखा जाये तो यह महिला श्रम को आकर्षित करने का ही काम करती हैं। जहां महिलाओं को मैटेर्निटी लीव, वर्क फ्राम होम और क्रैच जैसी सुविधाएं होती हैं, वहां महिलाएं काम करना ज्यादा पसंद करती हैं। दूसरी ओर, पीरियड लीव संबंधी डर को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि जापान में जहां 1947 में इस तरह के प्रावधान है, वहां 2017 के एक सर्वे से पता चलता है कि 0.9 प्रतिशत महिलाओं ने ही इस लीव को लिया था। इसी तरह साउथ कोरिया की लगभग 20 प्रतिशत महिलाओं ने पीरियड लीव का उपभोग किया है। तो डर की वजह क्या है?
दरअसल पीरियड लीव एक ऐसा मुद्दा बनता जा रहा है, जो बेहद संवेदनशीलता की मांग करता है। दोनों तरफ की बहसें, मुहाबिसे और तर्क अपनी जगह हैं, और इसके डर भी मायने रखते हैं। जिस देश में घर के अंदर टाॅयलेट मिलने पर इतने दशक लग गए, उसे देखते हुये महिलाओं के संदर्भ में यह मांग गैरवाजिब लग रही है, तो कोई बड़ी बात नहीं है। देश में सार्वजनिक शौचालयों की तो क्या कहें, जहां महिलाएं काम पर जा रही हैं, वहां के टाॅयलेट की जो दशा है, वह किसी से छुपी हुई नहीं है। ये वह बेसिक जरूरत है जिसके कारण बहुत सी बीमारियों की शिकार महिलाएं असमय हो जाती हैं। तो फिर मासिक सायकल जैसे समय में उनकी स्थिति पर सोचा ही जा सकता है। स्कूलों के संदर्भ में जो बात सुप्रीम कोर्ट ने हाल की में कही है, वह उतनी ही वास्तविक है, जितनी कामकाजी जगहों में स्वच्छ, साफ, पर्याप्त टाॅयलेट की सुविधा का ना होना। लेकिन सुप्रीम कोर्ट पीरियड लीव को संवेदनशीलता और आपसी समझ से लाने के पक्ष में है, नहीं तो इससे महिलाओं की रोजी-रोटी पर संकट उत्पन्न हो जायेगा, यह बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। इस संदर्भ में एक स्टैंडअप कमेडियन उरोज असफाक की वायरल क्लिप का संदर्भ कहीं अधिक मौजूं होगा, जिसमें उन्होंने व्यंग्यात्मक रूप से कहा है- अगर मर्दों को 150 बार पीरियड हुआ होता, तो अब तक हम पीरियड जयंती मना रहे होते। हमारे पास एक पीरियड मिनिस्टर और पीएमएस रीलीफ फंड भी होता।
