शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

बंदिश से परे तीजन बाई

छत्तीसगढ़ी पारंपरिक लोककला पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय स्तर की पहचान देने वाली तीजन बाई इस संसार को छोड़कर जा चुकी हैं। पंडवानी जैसी पुरुष  प्रधान कला में अपनी छाप ऐसी छोड़कर गई हैं कि पंडवानी और तीजन बाई एक दूसरे के पर्याय हो गए हैं। साथ ही हमारे लिए छोड़कर गई  हैं पंडवानी लोककला की एक भरपूर विरासत। 

पंडवानी की कथा समाप्त नहीं हुई है, पर जिस आवाज ने उसे बुलंदी दी वह थम चुकी है। 05 जुलाई को पंडवानी की पर्याय बन चुकी तीजन बाई ने लंबी बीमारी के बाद देह त्याग दी। 2023 से ही वे बीमार चल रही थीं। अपने बेटे की अकस्मिक मृत्यु के बाद उन्हें पक्षाघात हुआ था और उसके बाद उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। इस बीमारी के दौर में उनकी सरकारी पेंशन तक बंद हो गई थी। जब यह बात मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंची, तब जाकर उन्हें अच्छे इलाज के लिए इसी रायपुर के एम्स में लाया गया था। अच्छे इलाज की कमी और आर्थिक अभाव के कारण वे पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो सकीं। अंततः इसी बीमारी के साथ उन्होंने इस जगत को छोड़ दिया। साथ ही छोड़कर गई पंडवानी लोककला की एक भरपूर विरासत।

ब्रजलाल पारधी उनके नाना थे, जिन्हें पहली बार पंडवानी कथा कहते सुना था। उस पर मोहित होने का एहसास उन्हें किशोरावस्था में हो गया था। उनके नाना ने ही चुपके से उन्हें पंडवानी के लिए प्रेरित किया क्योंकि वे जानते थे कि तीजन ने जो इच्छा जताई है वह संभव होने के लिए कई बलिदान मांगेगी। अपने कई इंटरव्यू में वे सगर्व बताती हैं कि उनके नाना ने वह तंबुरा भी दिया, जो बाद में उनकी प्रमुख मंचीय पहचान बन गया। पंडवानी गायन के बदले सबसे पहले उनके पिता ने ही उनकी पिटाई की थी। लेकिन पंडवानी के प्रति उनकी जिद्द और जद्दोजेहद ने घर निकाला तक सहा। बगैर खाने और घर के वे पंडवानी के प्रेम के सहारे जीवित रहीं। 13 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पहली प्रस्तुति दुर्ग के चंदखुरी गांव में दी थी। इसके बाद तीजन बाई ने अपने जीवन का अर्थ पंडवानी में ही समाहित कर दिया।

1956 में दुर्ग के अटारी गांव में जन्मीं तीजन बाई गाने-बजाने वाले घुमंतु समुदाय से ही आती थीं। गीत-संगीत उन्हें विरासत में मिला था। उनके पिता छुनुक राम बांस बजाते और मां सुखवती बांस गीत गाती थीं। वे छह भाई-बहन थे। 12 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह ऐसे व्यक्ति से हुआ जिसकी पहले से ही दो शादियां हो चुकी थीं। ऐसे कलहपूर्ण जीवन से उबकर वे जल्दी ही अपने घर लौट आईं और अपने पंडवानी के शौक को पूरा करने में समय लगाने लगीं। क्योंकि पंडवानी कला का मंचन कोई भी महिला कलाकार नहीं कर सकती थी, इसलिए इस राह में उन्हें अपने समुदाय पारथी से तिरस्कार भी खूब मिला।

भारतीय सभ्यता-संस्कृति की पहचान महाभारत जैसे महाकाव्य को लोककला पंडवानी के रूप में उनकी प्रस्तुतियां जनमानस की स्मृतियों को पुख्ता करने वाली थी। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों की जड़ हमारे पुर्वजों की स्मृतियों में ही है। उनकी पंडवानी प्रस्तुतियों नेे हमारी संस्कृति को पुष्ट करने का काम अपनी देशज और भदेस शैली में बखूबी किया।

चूकिं वे पढ़ी-लिखी बिलकुल भी नहीं थी, इसलिए वे जो कुछ भी महाभारत की कथाएं याद करती थीं, वे सब सुनकर ही याद करती थीं। हाथ में तंबुरा लिए बोल्ड छवि के साथ जब अपनी बुलंद और सुरीली आवाज में महाभारत की कहानी सुनाती तो दर्शक सम्मोहित हो जाते थे। उनकी प्रस्तुतियों में उर्जा, आक्रामकता, कठोरता से लेकर कोमलता और वात्सल्य के भाव दर्शकों के भीतर तक उतर जाते थे। भारतीय सभ्यता-संस्कृति की पहचान महाभारत जैसे महाकाव्य को लोककला पंडवानी के रूप में उनकी प्रस्तुतियां जनमानस की स्मृतियों को पुख्ता करने वाली थी। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों की जड़ हमारे पुर्वजों की स्मृतियों में ही है। उनकी पंडवानी प्रस्तुतियों नेे हमारी संस्कृति को पुष्ट करने का काम अपनी देशज और भदेस शैली में बखूबी किया।

पुरुष वर्चस्व वाली लोक कला पंडवानी से प्रेम करने और उसमें अपनी पहचान बनाने के लिए उन्होंने वही सब संघर्ष किया जो हर स्त्री को ‘समाज विद्रोही’ धारा के पार लगने के लिए करना जरूरी होता है। 13 वर्ष की अवस्था में अपनी पहली प्रस्तुति देने और पहली दुखमयी शादी से निकलने के बाद उन्होंने प्रेम विवाह किया। इस विवाह से उन्हें तीन संतानें हुईं। जैसे-तैसे गृहस्थी की गाड़ी चल निकली। पर उनकी इस शादी में भी उनका पंडवानी प्रेम आड़े आ गया। उनके पति को भी मंच पर उनका ‘गाना-बजाना’ पसंद नहीं था। वे मंच तक पहुंचकर उनका विरोध और मारपीट करने लगे। अंत में उन्होंने पति की जगह पंडवानी को चुन लिया और अपने बच्चों को समेटकर अपनी नई यात्रा पर निकल पड़ी।

पंडवानी गायन तब महिलाएं मंच पर बैठकर ही गा सकती थीं, जिसे वेदमती शैली कहा जाता था। जबकि खड़े होकर पूरे एक्ट के साथ गाने का अधिकार पुरुषों का होता था जिसे कपालिक शैली कहा जाता है। इसी कपालिक शैली में तीजन बाई पंडवानी गाती थीं।

पति का घर छोड़कर अपने बगल के गांव में जाकर डेरा जमा लिया और पंडवानी करने लगीं। भीड़ जुटी, खूब सराही गईं और साथ में खाने-रहने का बंदोबस्त भी हो गया। पंडवानी कथा में हुंकार भरने वाले रागी उम्मेद सिंह ने महाभारत की कई कथाओं को सुनाकर उन्हें कंठस्थ कराया। यहीं उन्होंने लगातार तीन दिनों तक पंडवानी गाया, तो उनकी धूम मच गई। यहीं से उनके आत्मविश्वास में खासी वृद्धि हुई। पंडवानी गायन तब महिलाएं मंच पर बैठकर ही गा सकती थीं, जिसे वेदमती शैली कहा जाता था। जबकि खड़े होकर पूरे एक्ट के साथ गाने का अधिकार पुरुषों का होता था जिसे कपालिक शैली कहा जाता है। इसी कपालिक शैली में तीजन बाई पंडवानी गाती थीं। साथ महाभारत के प्रसंगों को अपनी कल्पना जीवंत भी करती थीं। वर्षों त कवे अपनी तरह पंडवानी गाती रहीं, फिर उनकी ख्याति भोपाल के भारत भवन पहुंची और उन्होंने वहां अपनी प्रस्तुति दी।

तीन दिन तक पंडवानी करने के बाद, सात दिन और फिर महाभारत के 18 पर्व को 18 दिनों तक लगातार प्रस्तुत करके उन्होंने अपने क्षेत्र में काफी नाम कमा लिया था। इसी बीच उनका पति उन्हें मनाने आए। यह सब कुछ समय तक ही निभ सका। अंततः तीजन बाई ने फिर से पंडवानी को चुना और हमेशा के लिए अपने पति को छोड़ दिया। कुछ सालों बाद तीजनबाई ने अपने संगतकार तुलसीराम देशमुख को अपना जीवन साथी बनाया, जिन्होंने उनका साथ निभाया। उन्होंने मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर के साथ नया थियेटर के लिए भी कुछ काम किया, लेकिन वे जल्दी ही इसे छोड़कर पंडवानी की तरफ मुड़ गईं। हबीब तनवीर ने ही उन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उनकी कला का परिचय कराया। यहीं से उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। उन्होंने फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन जैसे देशों में कई कई बार जाकर अपनी कला का प्रर्दशन किया। पेरिस के कलाप्रेमी उनके दीवाने थे, सबसे ज्यादा बार उन्होंने पेरिस में पंडवानी प्रस्तुतियां दीं। उन्होंने प्रसिद्ध ‘भारत एक खोज’ सीरियल में भी काम किया था।

मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर के साथ नया थियेटर के लिए भी कुछ काम किया, लेकिन वे जल्दी ही इसे छोड़कर पंडवानी की तरफ मुड़ गईं। हबीब तनवीर ने ही उन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उनकी कला का परिचय कराया। यहीं से उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।

तीजन बाई को उनकी विशिष्ट कला को सरकार ने तीनों पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया। 1988 में उन्हें पद्मश्री, 2003 में पद्भूषण और 2019 में पद्विभूषण से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2007 में नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित किया गया। 2003 में उन्हें विलासपुर के गुरूघासीदास विश्वविद्यालय ने डी-लिट् और 2017 में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से भी डी-लिट् से सम्मानित किया। बीच में यह भी खबर आई थी कि उन पर एक फिल्म भी बनाई जा रही है, जो उनके जीते-जी नहीं हो सका। उन्होंने पंडवानी को शिखर तक पहुंचाया ही नहीं, बल्कि इस विरासत को बांटकर भी गई। उन्होंने अपने संरक्षण में 200 विद्यार्थियों को प्रशिक्षित भी किया। ऐसी अनमोल विरासत को खड़ा करने वाली तीजन बाई का संघर्ष तभी सार्थक होगा, जब इनमें से कोई उनके मुकाबले आगे की सीढ़िया पार करेगा।


 


 

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