एशिया का सबसे बड़ा साहित्यिक आयोजन का रिकार्ड बनाते हुये संपन्न हुआ साहित्योत्सव 7-12 मार्च तक चला। अकादमी के अनुसार इस दौरान 100 से अधिक सत्रों में कुल 700 से अधिक लेखकों
और विद्वानों ने भाग लिया। और इस दौरान देश की 50 से अधिक भाषाओं का प्रतिनिधित्व किया गया। इस समारोह के दौरान पूरे देश से आये हर तबके के साहित्यकार और साहित्य प्रेमी नजर आये। साहित्य अकादमी के प्रांगण में इतनी भाषा और बोली बोलने वाले साहित्य प्रेमी नजर आ रहे थे कि एकबारगी ‘मिनी इंडिया’ जैसा दृश्य बन गया था। भारतीय प्रसिद्ध नदियों के नामों से संबोधित समागार पूरे अकादमी प्रांगण में विभिन्न तरह की चर्चाओं, बहसों और कविता-कहानी सम्मेलनों से भरे रहे। बहुभाषी साहित्यकारों से मिलने का यह सुनहरा अवसर कोई भी साहित्यप्रेमी खोना नहीं चाह रहा था, खासकर युवाओं में भरपूर उत्साह देखा गया। इस बार युवा साहिती और एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मेलन में संबंधित लेखकों को मुखर होकर अपनी बात रखते देखा गया।
07 मार्च को साहित्योत्सव का विधिवत उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया। इस अवसर पर उन्होंने देश के साहित्य की गतिशीलता और जीवंतता को उसकी विशेषता बताते हुए कहा कि तकनीक के समय में अनुवाद के जरिए हमारा साहित्य अब वैश्विक होने लगा है। अब उस पर चर्चा प्रारंभ हो गई है। पूरी दुनिया का भारत को देखने का नजरिया बदला है। इस अवसर पर संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव अमृता प्रसाद साराभाई भी उपस्थित थीं। साथ अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक भी मंचासीन रहेे।
पहले दिन 20 विभिन्न कार्यक्रमों में 100 से अधिक लेखकों ने सहभागिता की। कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में आदिवासी कविता एवं कहानी-पाठ और पैनल चर्चा हुयी। भारतीय साहित्य में नदियां, भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र की लोक संस्कृति, भारत की साहित्यिक कृतियों में लुप्त होता ग्रामीण समाज आदि विषयों पर भी विधिवत वक्तव्य दिए गए। अनेक सत्रों में बहुभाषी कविता और कहानी के पाठ किए गए।
08 मार्च को दूसरे दिन साहित्य अकादमी पुरस्कार-2024 के पुरस्कृत विद्वानों को पुरस्कार दिये गये। इस समारोह के मुख्य अतिथि प्रख्यात अंग्रेजी नाटककार महेश दत्तानी थे। इसकी अध्यक्षता अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने की। साथ ही समापन वक्तव्य उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा ने प्रस्तुत किया। इस समारोह में 22 साहित्यकारों को पुरस्कृत किया गया। इस बार हिंदी के लिये प्रसिद्ध कवयित्री गगन गिल को उनकी पुस्तक ‘मैं जब तक आई बाहर’ के लिये यह सम्मान दिया गया है। संस्कृत के लिये दीपक कुमार शर्मा एवं अंग्रेजी के लिये इस्तेरीन कीरे को दिया गया है। कन्नड भाषा के लिए पुरस्कृत रचनाकार नहीं आ सके थे। बांग्ला भाषा का पुरस्कार घोषित नहीं किया गया था। डोगरी का पुरस्कार उनकी बेटी ने लिया और अंग्रेजी का पुरस्कार उनके प्रतिनिधि ने ग्रहण किया। पुरस्कार अर्पण समारोह के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत प्रख्यात बांसुरी वादक हरिप्रसाद चैरसिया के भतीजे राकेश चैरसिया का बांसुरी वादन प्रस्तुत किया गया।
09 मार्च को साहित्योत्सव के तीसरे दिन 22 सत्रों में आयोजित कई कार्यक्रमों में सबसे अधिक आकर्षित करने वाला सत्र पुरस्कृत रचनाकारों का ‘लेखक सम्मिलन’ था। लेखक सम्मिलन में रचनाकारों ने अपनी सृजन की रचना प्रक्रिया को पाठकों के साथ साझा किया। अपने हिंदी कविता संग्रह के लिए पुरस्कृत गगन गिल ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि कवि को न कविता लिखना आसान है न कवि बने रहना। कविता भले बरसों से लिख रहे हो, कवि बनने में जीवन भर लग जाता है। उन्होंने कविता को गूंगे कंठ की हरकत बताते हुए कहा कि अपने चारों तरफ अन्याय और विमूढ़ कर देने वाली असहायता में कई बार कवि को उन शब्दों को ढूंढ़ कर भी लाना मुश्किल होता है जिससे वह उसका प्रतिकार कर सके।
इसके अतिरिक्त भारतीय ऐतिहासिक कथा साहित्य की सार्वभौमिकता और साझा मानव अनुभव, क्या जनसंचार माध्यम साहित्यिक कृतियों के प्रचार प्रसार का एकमात्र साधन है?, वैश्विक साहित्यिक परिदृश्य में भारतीय साहित्य, ओमचेरी एन.एन. पिल्लै जन्म शतवार्षिकी संगोष्ठी, आधुनिक भारतीय साहित्य में तीर्थाटन आदि विषयों पर चर्चा हुयी। साथ ही युवा साहिती तथा बहुभाषी कविता और कहानी पाठ के कई सत्र हुए। प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक उपमन्यु चटर्जी ने संवत्सर व्याख्यान प्रस्तुत किया जिसका विषय था ‘ध्यान देने योग्य कुछ बातें।’
साहित्योत्सव के चैथे दिन, 10 मार्च को 22 से अधिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें 140 से अधिक लेखकों ने भाग लिया। इस दिन 05 बहुभाषी कवि सम्मेलन और 04 कथा सम्मेलन आयोजित हुये। इसके अतिरिक्त स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय साहित्य में ‘राष्ट्र’ की अवधारणा, क्या कॉमिक्स साहित्य है, रंगमंचः भारतीय समाज में परिवर्तन के प्रतिबिंब के रूप में, सांस्कृतिक रूप से भिन्न भाषाओं में साहित्यिक कृतियों के अनुवाद में चुनौतियां, प्रवासी लेखन में मातृभूमि आदि महत्वपूर्ण विषयों पर परिचर्चाएं हुईं। इस दिन की महत्वपूर्ण परिचर्चा ‘साहित्य और समाजिक न्याय’ की अध्यक्षता पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने की। इस परिचर्चा में ए.पी. महेश्वरी, मुकुल कुमार एवं अश्विनी कुमार ने भाग लिया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा कि साहित्य और कानून का आपस में गहरा संबंध है। साहित्य का सामाजिक न्याय के साथ सुखद गरिमापूर्ण और प्रभावशाली संबंध है।
‘भारतीय साहित्यिक परंपराएंः विरासत और विकास’ शीर्षक से राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी शुभारंभ हुआ, जिसका उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात बांग्ला विद्वान एवं अनुवादक सुकांत चैधरी ने दिया तथा बीज वक्तव्य प्रख्यात अंग्रेजी लेखक मकरंद परांपजे ने दिया। इस संगोष्ठी के अन्य सत्रों में भारतीय नाटकः उत्कृष्टता की परिभाषा एवं प्राचीन भारतीय साहित्य और भारत में अनुवाद विषयों पर व्यापक पर चर्चाएं हुईं। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत फौजिया दास्तानगो और रीतेश यादव द्वारा दास्तान-ए-महाभारत पेश की गई।
पांचवें दिन, 11 मार्च को ‘भारत की अवधारणा’ पर विचार-विमर्श के साथ ही प्रख्यात लेखक मोहन राकेश एवं कवि गोपालदास नीरज को उनकी जन्मशताब्दियों के अवसर पर याद किया गया। मोहन राकेश जन्मशती संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने की और बीज वक्तव्य प्रख्यात हिंदी नाट्य समालोचक जयदेव तनेजा ने दिया। साथ प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज की जन्मशती पर ‘कवि नीरजः अप्रतिम रोमांटिक दार्शनिक’ शीर्षक से हुई परिचर्चा की अध्यक्षता गीतकार बालस्वरूप राही ने की और मिलन प्रभात गुंजन के साथ ही अलका सरावगी, निरुपमा कोतरू और रत्नोत्तमा सेनगुप्ता ने हिस्सा लिया। ‘कथासंधि’ के अंतर्गत कथाकार जितेंद्र भाटिया का कथा-पाठ भी हुआ। अंत में सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत नलिनी जोशी ने हिंदुस्तानी गायन प्रस्तुत किया।
साहित्योत्सव के अंतिम दिन 15 सत्रों में दिव्यांग लेखक एवं साहित्य में रूचि रखने वाले बच्चे भी इसका हिस्सा बने। 10 भाषाओं के दिव्यांग लेखकों ने विनोद आसुदानी एवं अरविंद पी. भाटीकर की अध्यक्षता में काव्य-पाठ एवं कहानी पाठ प्रस्तुत किया। आठ विचार-सत्रों में भविष्य के उपन्यास, भारत की सांस्कृति परंपरा पर वैश्वीकरण का प्रभाव, अनूदित कृतियों को पढ़ने का महत्व, एकता और सामाजिक एकजुटता, कृत्रिम बुद्धिमता और साहित्यिक रचनाएं आदि विषयों पर विचार विमर्श हुआ। ‘भारतीय साहित्यिक परंपराएंः विरासत और विकास’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन भारतीय कविता, दलित साहित्य एवं आध्यात्मिक साहित्य पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। इन सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ एवं विष्णु दत्त राकेश ने की।
बच्चों के लिए चित्रकला, रेखांकन प्रतियोगिता एवं भाषण प्रतियोगिताएं आयोजित की गई जिनमें 15 स्कूलों के 300 से ज्यादा बच्चों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में 12 बच्चों को पुरस्कृत किया गया। एक अन्य कार्यक्रम ‘लेखक से भेंट’ प्रख्यात बांग्ला लेखक सुबोध सरकार के साथ किया गया। इस अवसर पर उनकी पुरस्कृत बाङ्ला कविता-संग्रह के हिंदी अनुवाद ‘द्वैपायन सरोवर के किनारे’ का लोकार्पण विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के कर कमलों से हुआ। इस अवसर पर पुस्तक की अनुवादिका अमृता बेरा और साहित्य अकादेमी के सचिव भी उपस्थित थे।
(इस रिपोर्ट का सम्पादित भाग नवोत्थान पत्रिका में प्रकाशित.)