शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

साहित्योत्सव : साहित्यिक नदियों का संगम



















बसंत जैसे सुहावना मौसम में राजधानी दिल्ली साहित्य-संस्कृति से लबरेज उत्सवों से दमक उठती है। साहित्य-संस्कृति का गढ़ बन चुकी दिल्ली में इतने समारोह हो रहे होते हैं कि साहित्य-संस्कृति प्रेमियों के लिये चुनाव की समस्या खड़ी हो जाती है कि किन-किन उत्सवों में भाग लें, आखिर में उन्हें कुछ को छोड़ना ही पड़ता है। इधर, साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित छह दिवसीय भव्य, वृहद और विस्तृत साहित्योत्सव संपन्न हुआ। साहित्य अकादमी, दिल्ली में नजदीकि मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन से ही इस उत्सव की सुगबुगाहट मिलनी शुरू हो जाती थी। कुछ सालों से हर बड़े साहित्य-संस्कृति और मीडिया के ठिकाने लिट्फेस्ट जैसे बड़े बड़े इंवेट्स प्लान कर रहे हैं, जो काफी सुर्खियां भी बटोरते हैं, साहित्य अकादमी भी इसी राह में है। हालिया तीन साल पहले तक ऐसा नहीं था। पिछले साल साहित्य अकादमी की स्थापना के सत्तर साल पूरे होने के उपलक्ष्य में हर साल आयोजित होने वाले इस उत्सव को इतनी भव्यता से मनाया गया कि यह विश्व का सबसे बड़ा साहित्योत्सव बन गया। इस दौरान 190 से अधिक सत्रों में 1100 से अधिक प्रसिद्ध लेखकों और विद्वानों ने भाग लिया था। इस बार कुछ कम, पर कुछ ऐसा ही माहौल छह दिनों तक बना रहा।

एशिया का सबसे बड़ा साहित्यिक आयोजन का रिकार्ड बनाते हुये संपन्न हुआ साहित्योत्सव 7-12 मार्च तक चला। अकादमी के अनुसार इस दौरान 100 से अधिक सत्रों में कुल 700 से अधिक लेखकों
और विद्वानों ने भाग लिया। और इस दौरान देश की 50 से अधिक भाषाओं का प्रतिनिधित्व किया गया। इस समारोह के दौरान पूरे देश से आये हर तबके के साहित्यकार और साहित्य प्रेमी नजर आये। साहित्य अकादमी के प्रांगण में इतनी भाषा और बोली बोलने वाले साहित्य प्रेमी नजर आ रहे थे कि एकबारगी ‘मिनी इंडिया’ जैसा दृश्य बन गया था। भारतीय प्रसिद्ध नदियों के नामों से संबोधित समागार पूरे अकादमी प्रांगण में विभिन्न तरह की चर्चाओं, बहसों और कविता-कहानी सम्मेलनों से भरे रहे। बहुभाषी साहित्यकारों से मिलने का यह सुनहरा अवसर कोई भी साहित्यप्रेमी खोना नहीं चाह रहा था, खासकर युवाओं में भरपूर उत्साह देखा गया। इस बार युवा साहिती और एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मेलन में संबंधित लेखकों को मुखर होकर अपनी बात रखते देखा गया।

07 मार्च को साहित्योत्सव का विधिवत उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया। इस अवसर पर उन्होंने देश के साहित्य की गतिशीलता और जीवंतता को उसकी विशेषता बताते हुए कहा कि तकनीक के समय में अनुवाद के जरिए हमारा साहित्य अब वैश्विक होने लगा है। अब उस पर चर्चा प्रारंभ हो गई है। पूरी दुनिया का भारत को देखने का नजरिया बदला है। इस अवसर पर संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव अमृता प्रसाद साराभाई भी उपस्थित थीं। साथ अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक भी मंचासीन रहेे।

पहले दिन 20 विभिन्न कार्यक्रमों में 100 से अधिक लेखकों ने सहभागिता की। कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में आदिवासी कविता एवं कहानी-पाठ और पैनल चर्चा हुयी। भारतीय साहित्य में नदियां, भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र की लोक संस्कृति, भारत की साहित्यिक कृतियों में लुप्त होता ग्रामीण समाज आदि विषयों पर भी विधिवत वक्तव्य दिए गए। अनेक सत्रों में बहुभाषी कविता और कहानी के पाठ किए गए।  

08 मार्च को दूसरे दिन साहित्य अकादमी पुरस्कार-2024 के पुरस्कृत विद्वानों को पुरस्कार दिये गये। इस समारोह के मुख्य अतिथि प्रख्यात अंग्रेजी नाटककार महेश दत्तानी थे। इसकी अध्यक्षता अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने की। साथ ही समापन वक्तव्य उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा ने प्रस्तुत किया। इस समारोह में 22 साहित्यकारों को पुरस्कृत किया गया। इस बार हिंदी के लिये प्रसिद्ध कवयित्री गगन गिल को उनकी पुस्तक ‘मैं जब तक आई बाहर’ के लिये यह सम्मान दिया गया है। संस्कृत के लिये दीपक कुमार शर्मा एवं अंग्रेजी के लिये इस्तेरीन कीरे को दिया गया है। कन्नड भाषा के लिए पुरस्कृत रचनाकार नहीं आ सके थे। बांग्ला भाषा का पुरस्कार घोषित नहीं किया गया था। डोगरी का पुरस्कार उनकी बेटी ने लिया और अंग्रेजी का पुरस्कार उनके प्रतिनिधि ने ग्रहण किया। पुरस्कार अर्पण समारोह के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत प्रख्यात बांसुरी वादक हरिप्रसाद चैरसिया के भतीजे राकेश चैरसिया का बांसुरी वादन प्रस्तुत किया गया।

09 मार्च को साहित्योत्सव के तीसरे दिन 22 सत्रों में आयोजित कई कार्यक्रमों में सबसे अधिक आकर्षित करने वाला सत्र पुरस्कृत रचनाकारों का ‘लेखक सम्मिलन’ था। लेखक सम्मिलन में रचनाकारों ने अपनी सृजन की रचना प्रक्रिया को पाठकों के साथ साझा किया। अपने हिंदी  कविता संग्रह के लिए पुरस्कृत गगन गिल ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि कवि को न कविता लिखना आसान है न कवि बने रहना। कविता भले बरसों से लिख रहे हो, कवि बनने में जीवन भर लग जाता है। उन्होंने कविता को गूंगे कंठ की हरकत बताते हुए कहा कि अपने चारों तरफ अन्याय और विमूढ़ कर देने वाली असहायता में कई बार कवि को उन शब्दों को ढूंढ़ कर भी लाना मुश्किल होता है जिससे वह उसका प्रतिकार कर सके। 

इसके अतिरिक्त भारतीय ऐतिहासिक कथा साहित्य की सार्वभौमिकता और साझा मानव अनुभव, क्या जनसंचार माध्यम साहित्यिक कृतियों के प्रचार प्रसार का एकमात्र साधन है?, वैश्विक साहित्यिक परिदृश्य में भारतीय साहित्य, ओमचेरी एन.एन. पिल्लै जन्म शतवार्षिकी संगोष्ठी, आधुनिक भारतीय साहित्य में तीर्थाटन आदि विषयों पर चर्चा हुयी। साथ ही युवा साहिती तथा बहुभाषी कविता और कहानी पाठ के कई सत्र हुए। प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक उपमन्यु चटर्जी ने संवत्सर व्याख्यान प्रस्तुत किया जिसका विषय था ‘ध्यान देने योग्य कुछ बातें।’

साहित्योत्सव के चैथे दिन, 10 मार्च को 22 से अधिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें 140 से अधिक लेखकों ने भाग लिया। इस दिन 05 बहुभाषी कवि सम्मेलन और 04 कथा सम्मेलन आयोजित हुये। इसके अतिरिक्त स्वतंत्रता-पूर्व भारतीय साहित्य में ‘राष्ट्र’ की अवधारणा, क्या कॉमिक्स साहित्य है, रंगमंचः भारतीय समाज में परिवर्तन के प्रतिबिंब के रूप में, सांस्कृतिक रूप से भिन्न भाषाओं में साहित्यिक कृतियों के अनुवाद में चुनौतियां, प्रवासी लेखन में मातृभूमि आदि महत्वपूर्ण विषयों पर परिचर्चाएं हुईं। इस दिन की महत्वपूर्ण परिचर्चा ‘साहित्य और समाजिक न्याय’ की अध्यक्षता पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने की। इस परिचर्चा में ए.पी. महेश्वरी, मुकुल कुमार एवं अश्विनी कुमार ने भाग लिया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा कि साहित्य और कानून का आपस में गहरा संबंध है। साहित्य का सामाजिक न्याय के साथ सुखद गरिमापूर्ण और प्रभावशाली संबंध है।

‘भारतीय साहित्यिक परंपराएंः विरासत और विकास’ शीर्षक से राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी शुभारंभ हुआ, जिसका उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात बांग्ला विद्वान एवं अनुवादक सुकांत चैधरी ने दिया तथा बीज वक्तव्य प्रख्यात अंग्रेजी लेखक मकरंद परांपजे ने दिया। इस संगोष्ठी के अन्य सत्रों में भारतीय नाटकः उत्कृष्टता की परिभाषा एवं प्राचीन भारतीय साहित्य और भारत में अनुवाद विषयों पर व्यापक पर चर्चाएं हुईं। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत फौजिया दास्तानगो और रीतेश यादव द्वारा दास्तान-ए-महाभारत पेश की गई।

पांचवें दिन, 11 मार्च को ‘भारत की अवधारणा’ पर विचार-विमर्श के साथ ही प्रख्यात लेखक मोहन राकेश एवं कवि गोपालदास नीरज को उनकी जन्मशताब्दियों के अवसर पर याद किया गया। मोहन राकेश जन्मशती संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने की और बीज वक्तव्य प्रख्यात हिंदी नाट्य समालोचक जयदेव तनेजा ने दिया। साथ प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज की जन्मशती पर ‘कवि नीरजः अप्रतिम रोमांटिक दार्शनिक’ शीर्षक से हुई परिचर्चा की अध्यक्षता गीतकार बालस्वरूप राही ने की और मिलन प्रभात गुंजन के साथ ही अलका सरावगी, निरुपमा कोतरू और रत्नोत्तमा सेनगुप्ता ने हिस्सा लिया। ‘कथासंधि’ के अंतर्गत कथाकार जितेंद्र भाटिया का कथा-पाठ भी हुआ। अंत में सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत नलिनी जोशी ने हिंदुस्तानी गायन प्रस्तुत किया।

साहित्योत्सव के अंतिम दिन 15 सत्रों में दिव्यांग लेखक एवं साहित्य में रूचि रखने वाले बच्चे भी इसका हिस्सा बने। 10 भाषाओं के दिव्यांग लेखकों ने विनोद आसुदानी एवं अरविंद पी. भाटीकर की अध्यक्षता में काव्य-पाठ एवं कहानी पाठ प्रस्तुत किया। आठ विचार-सत्रों में भविष्य के उपन्यास, भारत की सांस्कृति परंपरा पर वैश्वीकरण का प्रभाव, अनूदित कृतियों को पढ़ने का महत्व, एकता और सामाजिक एकजुटता, कृत्रिम बुद्धिमता और साहित्यिक रचनाएं आदि विषयों पर विचार विमर्श हुआ। ‘भारतीय साहित्यिक परंपराएंः विरासत और विकास’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन भारतीय कविता, दलित साहित्य एवं आध्यात्मिक साहित्य पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। इन सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ एवं विष्णु दत्त राकेश ने की। 

बच्चों के लिए चित्रकला, रेखांकन प्रतियोगिता एवं भाषण प्रतियोगिताएं आयोजित की गई जिनमें 15 स्कूलों के 300 से ज्यादा बच्चों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में 12 बच्चों को पुरस्कृत किया गया। एक अन्य कार्यक्रम ‘लेखक से भेंट’ प्रख्यात बांग्ला लेखक सुबोध सरकार के साथ किया गया। इस अवसर पर उनकी पुरस्कृत बाङ्ला कविता-संग्रह के हिंदी अनुवाद ‘द्वैपायन सरोवर के किनारे’ का लोकार्पण विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के कर कमलों से हुआ। इस अवसर पर पुस्तक की अनुवादिका अमृता बेरा और साहित्य अकादेमी के सचिव भी उपस्थित थे।

                                                                                                                (इस रिपोर्ट का सम्पादित भाग नवोत्थान पत्रिका में प्रकाशित.)


शनिवार, 22 मार्च 2025

पंचायत पति, मुखिया पति, सरपंच पति हैं, तो फिर कौन है असली प्रधान

एक ओटीटी वेब सीरीज ‘पंचायत’ लोगों द्वारा काफी पसंद की जा रही है। इसके कई संस्करण भी आ चुके हैं। इसमें मंजू देवी गांव फुलेरा की प्रधान चुनी जाती हैं, लेकिन नाममात्र की प्रधान। उनके प्रतिनिधि के तौर पर उनके पति ही सारा कामकाज देखते हैं और गांववालों की नजर में वे ही ‘असली’ प्रधान (मुखिया सरपंच) होते हैं। इस सीरीज में बहुत ही चुटीले ढंग से गांव फुलेरा, उसकी समस्याओं और असली प्रधान मंजू देवी और उनके प्रतिनिधि यानी प्राॅक्सी प्रधान, प्रशासन और गांवदारी पर बड़ी रोचकता के साथ चित्रण किया गया है। इसी ‘पंचायत’ सीरीज के कलाकारों को लेकर पंचायती राज मंत्रालय ने द वायरल फीवर के सहयोग से 15 से 20 मिनट की फिल्म बनाई गई है जिसमें प्रधान मंजू देवी अपने पति ‘प्रधानपति’ की अनुपस्थिति में अपने कामकाज को निपटाती हैं, बल्कि बड़ी ही कुशलता से निपटाती हैं। और गांववालों का दिल जीत लेती हैं। इस प्रोडक्शन का शीर्षक दिया गया है- असली प्रधान कौन?

चार मार्च को इस प्रोडक्शन का प्रीमियम विज्ञान भवन, दिल्ली में देश भर से आई 1200 ग्राम महिला प्रतिनिधियों के सामने किया गया। इस प्रोडक्शन में नीना गुप्ता, चंदन रॉय और फैसल मलिक जैसे प्रसिद्ध कलाकार हैं। यह फिल्म सरपंच पति संस्कृति को संबोधित करती है। आज भी हमारे महिला ग्राम प्रतिनिधियों की यह प्रमुख समस्या है कि उनके प्रतिनिधियों के तौर पर उनके पति, पिता, भाई, ससुर या देवर जैसे रिश्तों के पुरूष प्रतिनिधि ही उनके प्रतिनिधि के तौर पर काम करते हैं। इसके बहुत से कारण है जिनको दूर करना अभी बाकी है। इसी क्रम में पंचायती राज मंत्रालय ने ‘सशक्त पंचायत नेत्री अभियान’ चलाया है। असली प्रधान कौन फिल्म दर्शाती है कि एक महिला ग्राम प्रधान जन कल्याण के लिए अपनी शक्तियों का कितने प्रभावी ढंग से उपयोग करती है। यह फिल्म प्राॅक्सी प्रतिनिधित्व के मुद्दे को उठाती है, जहां परिवार के पुरुष सदस्य अनौपचारिक रूप से निर्वाचित महिला नेताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह एक ऐसी प्रथा है, जो पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के संवैधानिक जनादेश को कमजोर करती है। इस फिल्म के बारे में मंजू देवी का किरदार निभाने वाली प्रसिद्ध अभिनेत्री नीना गुप्ता कहती हैं कि असली प्रधान कौन? सिर्फ एक और प्रोडक्शन नहीं है, यह ग्रामीण भारत में महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली वास्तविक जीवन की चुनौतियां हैं।

पिछले दिनों पंचायती राज मंत्रालय द्वारा पूर्व खान सचिव सुशील कुमार के नेतृत्व में गठित समिति ने एक रिपोर्ट मंत्रालय को पेश की है। इस समिति का गठन सितंबर, 2023 में किया गया था। ‘पंचायती राज प्रणालियों और संस्थाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व और भूमिकाओं को बदलनाः प्रॉक्सी भागीदारी के प्रयासों को खत्म करना’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट ने मंत्रालय और कई संबंद्ध संस्थाओं का व्यापक ध्यान आकर्षित किया है। स्थानीय शासन में वास्तविक महिला नेतृत्व को मजबूत करने के मंत्रालय के लगातार प्रयासों के पक्ष में यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली है। इसकी वजह है कि इस रिपोर्ट ने न केवल वास्तविक समस्या को एड्रेस किया, बल्कि समस्या का समाधान भी प्रस्तावित किया है। इस कड़ी में मंत्रालय द्वारा साल भर चलने वाला ‘सशक्त पंचायत नेत्री अभियान’ है जिसे देश भर में पंचायती राज संस्थाओं की महिला प्रतिनिधियों की क्षमता और प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए बनाया गया है। यह पंचायती राज पदों पर निर्वाचित महिलाओं के कौशल और आत्मविश्वास के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करेगा। साथ ही यह सुनिश्चित करेगा कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों और जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहीं हैं कि नहीं।

73वां संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत प्रदेशों में पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम बनाये गये। इस तीन स्तरीय स्थानीय शासन व्यवस्था में महिलाओं को एक तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। समय के साथ इस आरक्षण को बढ़ाकर कई राज्यों में 50 फीसदी तक कर दिया गया। अब तक 21 राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेशों में महिलाओं की सीटें 50 फीसदी आरक्षित हैं। साल 2005 में, पंचायती राज संस्थाओं में कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या 27.82 लाख थी, जिनमें 10.42 लाख यानी 37.46 फीसदी महिला प्रतिनिधि थीं। 2020 तक यह संख्या बढ़कर 31 लाख से अधिक हो गई, जिसमें 14.50 लाख से ज्यादा यानी 46 फीसदी महिलाएं निर्वाचित प्रतिनिधि थीं। यह दर्शाता है कि इतने वर्षों में महिला नेतृत्व की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन सबके बावजूद रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान में प्राॅक्सी प्रतिनिधित्व की संख्या अन्य राज्यों की तुलता में कहीं ज्यादा है।

‘पंचायती राज प्रणालियों और संस्थाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व और भूमिकाओं को बदलनाः प्रॉक्सी भागीदारी के प्रयासों को खत्म करना’ रिपोर्ट में इस समस्या से निपटने के लिये कुछ सुधारात्मे दंड की सिफारिशें की गई हैं। मंत्रालय का भी कहना है वह अपनी सिफारिशों को लागू करने के लिये कदम उठाएगा, जिसमें नीतिगत हस्तक्षेप, संरचनात्मक सुधार और अनुकरणीय दंड शामिल है, ताकि प्रधान पति, सरपंच पति या मुखिया पति की प्रथा पर रोक लगाई जा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि गांवों में महिलाओं की पारंपरिक और सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक मानसिकता और कठोर सामाजिक-सांस्कृतिक मानदंडों को मनवाने से भी महिला प्रतिनिधित्व पीछे चला जाता है। इसमें एक है कई तरह की पर्दा प्रथाओं का पालन करना। रिपोर्ट में एक कारण राजनीतिक दबाव को भी बताया गया है, जिसमें राजनीतिक विरोधियों द्वारा मिलने वाली धमकी और दबाव भी होता है जिसे न मानने पर उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है। इस किस्म की हिंसा में उनका अनुसूचित जाति और जनजाति, अल्पसंख्यक और विकलांग श्रेणियों का होने से उनके उपर दबाव और अधिक पड़ने लगता है। इसके अतिरिक्त महिलाओं की घरेलू जिम्मेदारियों के कारण उन्हें सार्वजनिक कामों से खुद को अलग करने का दबाव भी पड़ता है। घर और बाहर दोनों जिम्मेदारियों के दबाव में वे अक्सर घर की जिम्मेदारियों को चुन लेती हैं। इसके अतिरिक्त बहुत बड़ा करण उनका अशिक्षित रह जाना भी है। बहुत सी सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों से महिलाओं को शिक्षा और सार्वजनिक कामों के अनुभव न हो पाने के कारण वे निर्वाचित होने के बावजूद अपनी भूमिका को सीमित कर लेती हैं। सबसे ज्यादा उन्हें वित्तीय निर्णय संबंधी कामों में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है जिसकी वजह से वे संबंधी पुरूष साथियों की मदद लेने को मजबूर हो जाती हैं।

प्राॅक्सी प्रतिनिधित्व के कारणों में समिति की बातों को गौर किया जाये तो वे सभी वही कारण हैं जिनकी वजह से महिलाओं को घर के बाहर सार्वजनिक भूमिका को स्वीकारा नहीं जाता है। स्वीकारने से पहले उनकी सार्वजनिक भूमिका को ही नाकारने की प्रवृत्ति रहती है, जो उनकी राह में कई तरह की बाधाओं के रूप में सामने आती है। पंचायती शासन प्रणाली को लागू हुये 31 वर्ष हो चुके हैं। महिला प्रतिनिधियों को किसी न किसी बहाने उन्हें उनकी पारंपरिक भूमिका में सीमित करने की मानसिकता में ऐसे ही किन्हीं सरकारी प्रयासों से कुछ संभव हो सकता है। असली प्रधान कौन से यह शुरूआत कितनी प्रभावी होगी, आने वाले समय में ही पता चल सकेगा।

मंगलवार, 4 मार्च 2025

क्या कहती है पढ़ी-लिखी मांओं की बढ़ती संख्या

 किसी भी देश के विकास में महिला और पुरुषों की भूमिका समान होता है, अगर इनमें से कोई भी किसी भी दृष्टि से कमजोर होगा, तो समाज और देश के विकास में बाधा उत्पन्न होगी। उचित और संपूर्ण शिक्षा वह फैक्टर है जो महिला और पुरुष दोनों को समान रूप से प्रभावित करते हैं, लेकिन महिलाओं का अशिक्षित रह जाना पूरे समाज को प्रभावित करता है। इसलिये यदि मांएं अधिक शिक्षित हो रही हैं, तो यह उत्साहित करने वाली बात है।


  • एक पढ़ी-लिखी मां सिर्फ अपने परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का भविष्य संवारती है।
  • शिक्षित मां का हाथ थामकर बच्चे न केवल अक्षर पहचानते हैं, बल्कि जीवन के मूल्यों को भी समझते हैं।
  • अगर मां शिक्षित होगी, तो एक नहीं, बल्कि दो पीढ़ियां शिक्षित होंगी।
  • पढ़ी-लिखी मां अपने बच्चों के जीवन की पहली और सबसे प्रभावी गुरु होती है।
  • एक शिक्षित मां अपने बच्चों को केवल सपने देखना नहीं सिखाती, बल्कि उन्हें पूरा करने का हौसला भी देती है।
  • अगर हर मां शिक्षित हो जाए, तो पूरा देश तरक्की की राह पर दौड़ने लगेगा।


इंटरनेट पर तैरते इन ढेर सारे उपर्युक्त कथनों को यहां देने का अर्थ केवल इतना है कि एक पढ़ी लिखी मां के महत्व समझा और समझाया जा सके। और यही बात वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट-2024 ने अपने हालिया प्रकाशित सर्वे में आज साबित कर दिया है। खबर है कि 2016 से 2024 के दौरान ग्रामीण मातृ शिक्षा के स्तर में महत्वपूर्ण सकारात्मक परिवर्तन हुआ है, जो देश की आधी आबादी के लिये तो उत्साहवर्धक है ही, पर उससे कहीं अधिक हमारे समाज के लिये महत्वपूर्ण है। कभी स्कूल न जाने वाली मांओं (5-16 आयु वर्ग के बच्चों की) का अनुपात 2016 में 46.6 से घटकर 2024 में 29.4 फीसदी हो गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि अब किशोर उम्र के बच्चों की मांएं अधिक संख्या में पढ़ी-लिखी हो चुकी हैं। यह संभव हुआ है साक्षर भारत मिशन, सर्व शिक्षा अभियान (अब समग्र शिक्षा), बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, और साथ ही मिड डे मील के संयुक्त प्रयास से। इन्होंने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसका परिणाम आज दिख रहा है।

एएसईआर एक राष्ट्रव्यापी ग्रामीण घरेलू सर्वेक्षण है जिसे एनजीओ प्रथम ने देश के 605 ग्रामीण जिलों में 6,49,491 बच्चों के पढ़ने के स्तर और अंकगणित पर परीक्षण करके किया है। यह सर्वेक्षण बच्चों के नामांकन और सीखने के स्तर को देखने के अलावा, प्रत्येक बच्चे के माता-पिता के स्कूल के वर्षों की संख्या के बारे में जानकारी एकत्र करता है। एएसईआर-2024 की यह रिपोर्ट मातृ शिक्षा के बढ़ते आंकड़ों पर ही नहीं है, इसके समग्र अध्ययन से यह भी पता चलता है कि महिलाएं उच्च शिक्षित भी हो रही हैं। कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई करने वाली महिलाओं की संख्या में इस दौरान वृद्धि देखी जा रही है। 2016 में जहां 9.2 फीसदी मांओं ने कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई प्राप्त की थी, वहीं आठ वर्ष बाद यह 10 फीसदी बढ़कर 2024 में 19.5 फीसदी बढ़ गईं।

एएसईआर-2024 की यह रिपोर्ट मातृ शिक्षा के बढ़ते आंकड़ों पर ही नहीं है, इसके समग्र अध्ययन से यह भी पता चलता है कि महिलाएं उच्च शिक्षित भी हो रही हैं। कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई करने वाली महिलाओं की संख्या में इस दौरान वृद्धि देखी जा रही है।

अगर राज्यवार आंकड़ों की बात की जाये, तो केरल ने न केवल इस दौरान सबसे अधिक वृद्धि देखी गई हैै। मांओं के स्कूली शिक्षा के स्तर की बात करें तो यह सबसे अच्छा प्रदर्शन भी रहा है। 2016 में 40 फीसदी मांओं ने कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई की, जो 2024 में बढ़कर 69.6 फीसदी हो गई यानी पूरे 29 फीसदी की वृद्धि देखी गई। सभी राज्यों में 2016 और 2024 दोनों वर्षों में केरल ही ऐसा राज्य था, जहां मांएं कक्षा 10 से आगे की शिक्षा प्राप्त करने के मामले में सबसे अधिक रहीं। केरल के बाद हिमाचल प्रदेश का स्थान आता है, जहां पिछले आठ वर्षों में इस तरह के आंकड़े में लगभग 22 फीसदी की वृद्धि देखी गई है यानी 2016 में 30.7 फीसदी मांओं ने कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई की थी, वहीं 2024 में यह 52.4 फीसदी हो गईं।

तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल सभी में कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई करने वाली मांओं के प्रतिशत में 10 फीसदी से अधिक की वृद्धि ही हो सकी। इस मोर्चे पर सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य मध्य प्रदेश था, जहां 2016 में 3.6 फीसदी से 2024 में 9.7 फीसदी मांएं ही कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई कर सकीं थी। अगर इस दौरान किशोर ग्रुप बच्चों के पिताओं की बात की जाए, तो महिलाओं से कमतर प्रदर्शन करते नजर आये हैं। पिछले आठ वर्षों में कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई करने वाली माताओं और पिताओं के प्रतिशत के बीच का अंतर कम हुआ है। 2016 में कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई करने वाले पिताओं का प्रतिशत माताओं की तुलना में 08 फीसदी था। यह 2024 में घटकर लगभग 05 फीसदी रह गया।

इस मोर्चे पर सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य मध्य प्रदेश था, जहां 2016 में 3.6 फीसदी से 2024 में 9.7 फीसदी मांएं ही कक्षा 10 से आगे की पढ़ाई कर सकीं थी। अगर इस दौरान किशोर ग्रुप बच्चों के पिताओं की बात की जाए, तो महिलाओं से कमतर प्रदर्शन करते नजर आये हैं।

सरकार द्वारा चलाए गए साक्षर भारत मिशन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, सर्व शिक्षा अभियान और मिड-डे मील जैसी योजनाओं ने महिलाओं को शिक्षा के प्रति प्रेरित किया है, इस तथ्य से तो इंकार नहीं किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कई राज्यों में महिला साक्षरता केंद्र और रात्रि पाठशालाएं भी चलाई जाती थी, जिससे घरेलू महिलाओं को पढ़ने-लिखने की सुविधा हो जाती थी। इसके अतिरिक्त यदि हाल के दशक पर नजर डाली जाये, तो स्मार्टफोन और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच ने महिलाओं को घर बैठे ऑनलाइन शिक्षा उपलब्ध कराने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पहले जहां ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की शिक्षा को अनदेखा किया जाता था, वहीं सरकारी अभियानों के प्रभाव और नजदीक ही उपलब्ध शिक्षा केंद्रों ने बेटियों को विद्यालय की चैखट तक पहुंचाने में मदद की। इसी का परिणाम है कि नई पीढ़ी की मांएं अधिक शिक्षित हो रही हैं। महिला स्वयं सहायता समूहों और विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने महिलाओं को शिक्षा के प्रति जागरूक किया है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं ने शिक्षा के महत्व को समझा और उसे अपनाया। ग्रामीण भारत में महिलाओं की शिक्षा में यह सुधार समाज के लिए एक सकारात्मक संकेत है। इससे न केवल अगली पीढ़ी को लाभ मिलेगा, बल्कि पूरे देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति को भी गति मिलेगी। यदि यह प्रवृत्ति इसी तरह जारी रही, तो आने वाले वर्षों में ग्रामीण भारत पूर्ण साक्षरता की ओर अग्रसर हो सकेगा, जो 2047 के विकसित भारत के लिये एक बढ़ते कदम का द्योतक हो सकता है।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2025

वोट तो दिए, पर नहीं मिलीं सीटें ?


दिल्ली विधानसभा में महिला प्रतिनिधित्व में गिरावट चिंतन का विषय है। दिल्ली में शीला दीक्षितसुषमा स्वराज और आतिशी जैसी तीन महिला मुख्यमंत्री देने वाली दिल्ली की विधानसभा में महिला विधायकों की घटती संख्या आगामी नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिये कोई अच्छा संकेत तो नहीं

दिल्ली विधानसभा चुनाव-2025 के परिणाम जहां भारतीय जनता पार्टी के लिये काफी सुखद रहा, वहीं आम आदमी पार्टी के अस्तित्व का सवाल बन गया है। लेकिन इन सबके बीच महिला प्रतिनिधित्व का सवाल मुंह बांये खड़ा हो गया है। कारण, महिलाओं के निराशाजनक प्रदर्शन ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। सत्ता की बागडोर हाथ में लेने वाली भारतीय जनता पार्टी के पाले में चार महिला उम्मीदवारों की सीटें हाथ में आईं हैं, वहीं सत्ता खो चुकी आम आदमी पार्टी के हाथ में पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी के रूप में एक महिला विधायक की सीट आई है। विधानसभा चुनाव में इन दोनों प्रमुख दलों ने क्रमशः 09-09 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। कांग्रेस पार्टी ने 07 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिसमें अलका लांबा जैसी दिग्गज भी थीं, यह दूसरी बात है कि कांग्रेस का इस चुनाव में खाता भी नहीं खुला।

दिल्ली विधानसभा चुनाव-2025 महिला उम्मीदवारों की सफलता का प्रतिशत पिछली विधानसभा चुनाव से कम रहा है। आंकड़ों की माने तो कुल 699 उम्मीदवारों में से 96 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं, जिनमें से केवल 5 ही जीत दर्ज कर सकीं। 2020 में 08 महिलाएं विधानसभा में पहुंच सकी थीं। ग्रेटर कैलाश से विजय हुईं भाजपा की शिखा राय ने आप के दिग्गज सौरभ भारद्वाज को हराया है। नजफगढ़ सीट से विजय हुईं नीलम पहलवान ने आप के तरूण कुमार को हराया है। शालीमार बाग से जीतीं भाजपा की रेखा गुप्ता ने आप की वंदना कुमारी को हरा कर विधानसभा पहुंची हैं। वहीं वजीरपुर से जीतीं भाजपा की पूनम शर्मा ने राजेश गुप्ता को हराया है। अगर आम आदमी पार्टी की एकमात्र विजयी महिला उम्मीदवार आतिशी की बात करें तो उन्होंने कालकाजी सीट से भाजपा के रमेश विधूड़ी को एक कड़े मुकाबले में हराया है। इसी सीट से कांग्रेस की दिग्गज अलका लांबा भी खड़ी थीं। कालकाजी सीट काफी चर्चा बटोरने लगी थी, जब बड़बोले रमेश विधूड़ी ने पूर्व मुख्यमंत्री के लिये अशोभनीय टिप्पणी कर दी थी।

पिछले चुनावों की तुलना में इस बार महिला विधायकों की संख्या में कमी आई है। ऐसा नहीं है चुनाव मैदान में मजबूत महिला उम्मीदवार नहीं थी, आम आदमी पार्टी के कमजोर प्रदर्शन ने महिला उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। 2020 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो राखी बिड़लान मंगोलपुरी, वंदना कुमारी शालीमार बाग, धनवंती चंदेला राजौरी गार्डन, राजकुमारी ढिल्लो हरिनगर, प्रीति तोमर त्रिनगर, भावना गौड़ पालम और आतिशी कालकाजी सीटों से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंची थीं। अगर इस बार की बात करें तो राखी बिड़लान मादीपुर से, वंदना कुमारी शालीमार बाग से, प्रीति तोमर त्रिनगर से और धनवंती चंदेला राजौरी गार्डन से चुनाव हार गई हैं। ये सभी महिलाएं आप की मजबूत उम्मीदवार थी। लेकिन जनता ने इनकी जगह दूसरे उम्मीदवारों को तरजीह दे दी।

मैदान में रहे तीन प्रमुख दलों ने कुल 25 महिलाओं को टिकट दिये थे। जो पिछली बार से एक अधिक था। इस बार 60.92 फीसदी महिलाओं ने वोट दिये, वहीं 60.21 फीसदी पुरुष वोट पड़े। कई विधानसभाओं में महिलाएं वोट देने के मामलों में पुरु
षों से आगे रहीं। इन चुनावों में महिलाओं को आकर्षित करने की काफी जद्दोजहद देखी गई। इसी का परिणाम है कि महिलाएं वोट देने में आगे रहीं। महिला वोटरों को आकर्षित करने के लिये लगभग सभी प्रमुख दलों ने एक से बढ़कर कैश ट्रांसफर
, फ्रीबीज का सहारा लिया, पर यहां एंटीकंबेंसी काम कर गई। आप की योजनाओं से एक ओर गरीब तबके की महिलाओं को काफी सुविधाएं हासिल हुई थीं, लेकिन मिडिल क्लास की महिलाओं को कुछ खास हाथ नहीं लगा। कम हो रही आमदनी और महंगाई के बीच संघर्ष ने उन्हें आप के अतिरिक्त सोचने पर मजबूर कर दिया। महिला उम्मीदवारों के हारने का चाहे जो करण हो, पर दिल्ली विधानसभा के अब तक के कुल कार्यकाल में तीन महिला मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, सुषमा स्वराज और आतिशी के रहते विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या का घटना चिंता का विषय तो है ही।

शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

चुनाव प्रचार में महिलाएं, लेकिन चुनाव मैदान से बाहर


नई दिल्ली विधानसभा चुनाव अपने चरम पर पहुंच चुके हैं। चुनावों में महिला वोटरों को आकर्षित करने के लिये सभी राजनीतिक दलों में खूब खींचतान मची हुई है। हो भी क्यों न, क्योंकि इस बार लगभग 72 लाख महिलाएं वोट करने के लिये तैयार हैं। इन वोटरों को आकर्षिक करने के लिये आम आदमी पार्टी ने महिला सम्मान राशि योजना,कांग्रेस ने प्यारी दीदी योजना और भारतीय जनता पार्टी ने महिला समृद्धि योजना के जरिये महिला वोट अपने तरफ खींचने का प्रयास कर रही हैं। कहने का अर्थ है कि इस चुनाव में एक वोट बैंक के रूप में महिलाएं केंद्र में बनी हुयी हैं। लेकिन जब बात चुनाव में महिलाओं को टिकट देने और राजनीतिक भागीदारी की आती है, तो सभी राजनीतिक दल एक सा चेहरा-मोहरा लिये दिखते हैं।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के बाद राजनीति को अपने कार्यक्षेत्र के रूप में देख रही महिलाओं को यह आशा बनती है कि राजनीतिक दल महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारेगे। अधिक संख्या में उनके नाम को पुरुष कैंडीडेट के बरक्स कंसीडर करेंगे। लेकिन सारी आशाएं धूमिल हो जाती हैं, जब 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा चुनावों में महिलाओं को टिकट देने की संख्या का पता चलता है। चुनाव मैदान में तीन मुख्य राजनीति दलों के कुल 210 प्रत्याशियों में 25 महिलाएं चुनाव मैदान में हैं। आम आदमी पार्टी ने 09 महिलाओं को, भारतीय जनता पार्टी ने भी 09 महिलाओं और कांग्रेस ने 07 महिलाओं को टिकट दिये हैं। यद्यपि यह संख्या पिछले चुनाव 2020 से अधिक है।

इन चुनावों पर पूरे देश की नजर है, कारण, दिल्ली देश की राजधानी है, सत्ता का केंद्र है। लेकिन सत्ता केंद्र में महिला भागीदारी संतोषजनक नहीं दिख रही है। आप ने अपने सात महिला प्रत्याशियों को फिर से टिकट दिये हैं, जिन्हें 2020 में दिये थे। इसमें मुख्यमंत्री आतिशी सहित राखी, प्रमिला टोकास, धनवंती चंदेला, बंदना कुमारी, और सरिता सिंह हैं। बाकि में अंजना पार्च एक नया चेहरा है, जबकि पूजा बाल्यान एमएलए नरेश बाल्यान की पत्नी हैं जिन्हें हाल ही में एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। इसके बरक्स भारतीय जनता पार्टी ने रेखा गुप्ता, पूनम शर्मा, दीप्ती इंदौरा, उर्मिला कैलाश, स्वेता सैनी, नीलम पहलवान, शिखा राय, प्रियंका गौतम एवं कुमारी रिंकू को चुनाव मैदान में उतारा है। वहीं कांग्रेस भी जानीमानी राजनीतिक शख्सियत अलका लाम्बा के अलावा रागिनी नायक, अरिबा खान, अरुणा कुमारी, हरबनी कौर, सुषमा यादव, पुष्पा सिंह के साथ चुनाव मैदान में है।

2020 में हुये दिल्ली विधानसभा चुनाव में इन तीनों राजनीतिक दलों ने कुल मिलाकर 24 महिलाओं को टिकट दिये थे। इनमें से कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 10 महिलाओं को टिकट दिये थे। वहीं 2015 के चुनावों में कुल 19 महिलाएं चुनाव मैदान में थीं, इनमें से सबसे ज्यादा भाजपा ने 08 महिलाओं को अपना प्रत्याशी बनाया था। चुनाव आयोग के अनुसार दिल्ली में वोटरों की संख्या 1.55 करोड़ है जिनमें से 83.89 लाख पुरुष वोटर एवं 71.74 लाख महिला वोटर हैं। पिछली विधानसभा चुनाव 2020 में 62.5 फीसदी महिलाओं ने वोट किया था। महिला वोटरों की संख्या देखते हुये ही चुनाव के केंद्र में महिलाएं आ गई हैं, लेकिन चुनाव के मैदान में महिलाओं को उतारने में बड़े राजनीतिक दलों में जो हिचकिचाहट है, वह महिलाओं को राजनीति के क्षेत्र में आने से कहीं न कहीं रोक रही है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव, 2020 में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीती थीं। 2015 के मुकाबले महिला सीटों में इजाफा हुआ था। 62 विधायकों में आठ महिला विधायक चुनावी जंग जीत कर आई थीं। आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल की इस धमाकेदार जीत के पीछे महिलाओं के समर्थन को एक बड़ी वजह बताया गया था। चुनाव के बाद हुए सीएसडीएस के सर्वे के अनुसार आम आदमी पार्टी को 60 फीसदी महिलाओं ने वोट दिये थे। यह 2015 के मुकाबले 07 फीसदी ज्यादा थे। महिला वोटरों ने आम आदमी पार्टी को कई कारणों से वोट किया था। इसमें सबसे बड़ा कारण महिलाओं के लिए उनकी कल्याणकारी योजनाएं थीं। शायद पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल इस बात को अच्छे से समझते हैं कि महिलाएं एक वोटबैंक के रूप में कितना सशक्त हो चुकी हैं। शायद यही वह कारण भी बना जब अदालती फैसले के बाद मुख्यमंत्री के रूप में काम करने के अयोग्य घोषित होते ही नया मुख्यमंत्री चुनने की बारी आयी तो उन्हें एक योग्य उम्मीदवार के रूप में आतिशी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौप दीं। इस निर्णय के पीछे कहीं न कहीं महिलाओं को अपनी पार्टी के प्रति आकर्षित करना ही था। लेकिन जब बात सत्ता में भागीदारी की आती है, तब वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।

और यह सब तब है जब सितंबर, 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का कमोबेश सभी राजनीतिक दलों ने समर्थन किया था। इस बिल के पास होते ही अभी तो नहीं भविष्य के लिए महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित कर दी जायेगीं। तब से 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों से कई राज्यों के विधानसभा चुनावों तक सार्वजनिक क्षेत्रों में काम कर रहीं महिलाओं ने जिस बात की उम्मीद लगा रखी है, उसको पूरा होते नहीं देख रही हैं। खासतौर पर राजनीति में अपना भविष्य देख रही महिलाओं ने तो ऐसा बिलकुल नहीं सोचा होगा कि एक तिहाई सीटों के आरक्षण का समर्थन करने वाली पार्टियां चुनावों में महिलाओं को उतारने में इतना संकोच कर रही हैं। 27 साल की जद्दोजहेद के बाद महिला आरक्षण बिल पास होने के बाद महिलाओं को ऐसा लग रहा है कि यह कोरा आश्वासन ही बनकर रह गया है।

सवाल उठता है कि राजनीतिक दल स्वतःस्फूर्ति महिलाओं को टिकट देने और राजनीतिक भागीदारी देने में इतना ना-नुकुर क्योंकर करते हैं। कहीं राजनीति में पुरुष वर्चस्व इसका कारण तो नहीं है। 2019 लोकसभा चुनाव के समय सीएसडीएस-लोकनीति-क्विंट ने संयुक्त रूप से एक दिलचस्प सर्वे किया था। इस सर्वे में महिला और पुरुषों की इस प्रवृत्ति पर अध्ययन किया गया कि वे वोट करते समय किन चीजों का ध्यान रखते हैं। इस सर्वे में 68 प्रतिशत युवा महिलाओं ने माना कि महिलाओं को पुरुषों की तरह राजनीति में भाग लेना चाहिए। इसी सर्वे में पांच में से तीन महिलाओं ने कहा कि वे अपने परिवार या पति से प्रभावित हुए बगैर लोकसभा 2019 चुनाव के लिए वोट करेंगी। 65 प्रतिशत पहली बार वोट करने जा रही युवतियों ने नहीं माना कि महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अच्छी नेता नहीं होती हैं। साथ ही दो तिहाई युवतियों ने राजनीति में अपनी रुचि भी जाहिर की। अतः कह सकते हैं कि धीरे-धीरे ही सही, राजनीति के प्रति महिलाओं की रुचि-समझ बढ़ रही है। लेकिन राजनीतिक दल इस बात को स्वीकार करने में आना-कानी करते रहते हैं। देखना यह है कि यह आना-कानी कब तक जारी रख सकते हैं, देर-सबेर तो उन्हें उनका हक देना ही होगा।