पांच राज्यों के विधानसभा चुनावाें में महिला मतदान पुरुषों से ज्यादा रहा, लेकिन टिकट और जीत दोनों में महिलाएं पीछे रही गईं। पश्चिम बंगाल में महिला प्रतिनिधित्व बेहतर रहा, जबकि पुदुचेरी विधानसभा पूरी तरह पुरुषों के हाथों में चली गई।
पांच
राज्यों के चुनाव हो गए हैं। सभी राजनीतिक दल अपना नफा-नुकसान, हिसाब-किताब को अपने बही
खातों में दर्ज कर चुके हैं। नई नवेली सरकारों का गठन हो चुका है। इन
सबके बीच आधी आबादी का का सवाल ज्यों का त्यों खड़ा हुआ है। वजह है ऐन चुनावों के
बीच में परिसीमन और संविधान संशोधन (131वां संशोधन संबंधी) विधेयक लाने से राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को जिस तरह मुद्दा बनाया
गया, उसका चुनाव बाद क्या परिणाम निकला? यद्यपि संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी सीटों पर आरक्षण देने के लिए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन
अधिनियम), 2023’ कानून बन चुका है। यह लोकसभा और राज्य
विधानसभाओं की कुल सीटों में एक तिहाई यानी 33 फीसदी सीटें
महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान करता है। जिसे इन चुनावों के बीच में एक
बार फिर लाकर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित करने की कोशिश की गई।
इसका क्या परिणाम निकला, वह सब मीडिया हेडलाइन में दर्ज हो
चुका है।
इन चार राज्यों एवं एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनावों में कुल 824 सीटें थीं, जिनमें 1019 महिलाओं ने अपनी दावेदारी प्रस्तुत की। चुनाव परिणाम बाद पता चला कि 1019 महिलाओं में से सिर्फ 78 महिलाएं ही चुनाव जीत सकीं।
बहरहाल
मुद्दा यह है कि हाल ही में इन राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद आधी आबादी का क्या
हासिल हुआ जिससे कम से कम इतना तो पता चले कि तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय
पार्टियां महिला आरक्षण कानून बनाने से ज्यादा उसे जमीन में उतारने का इत्तेफाक
रखती हैं या नहीं भी। इन चार राज्यों एवं एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनावों में
कुल 824 सीटें थीं, जिनमें 1019 महिलाओं ने अपनी दावेदारी
प्रस्तुत की। चुनाव परिणाम बाद पता चला कि 1019 महिलाओं में
से सिर्फ 78 महिलाएं ही चुनाव जीत सकीं। अगर प्रतिशत की बात
करें तो यह केवल 05 फीसदी ही आता है। कई राज्यों में महिला
मतदाता पुरुषों से ज्यादा थीं, लेकिन टिकट और जीत दोनों
मामलों में महिलाएं पीछे रहीं। पश्चिम बंगाल में महिला प्रतिनिधित्व बेहतर रहा,
जबकि पुदुचेरी विधानसभा पूरी तरह पुरुषों के हाथों में चली गई।
केरल और
असम में महिला उम्मीदवारों की जीत का प्रतिशत 12 रहा। केरल में, 92 महिला
उम्मीदवार चुनाव मैदान में थीं, जिनमें से 11 महिलाएं अपनी-अपनी सीट जीत सकीं। यहां पिछले 2021
के चुनाव में महिला की जीत का प्रतिशत 11 से बढ़कर 2026 में 12 प्रतिशत हो गया। इसी तरह से असम में महिला
सीटों पर बढ़त पिछले साल के मुकाबले देखी गई। 2021 के चुनाव
में कुल उम्मीदवारों में से 08 फीसदी महिलाओं ने अपनी सीट
बरकरार रखी थी, जबकि इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 12 फीसदी हो गया। इन राज्यों में से पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा महिला
उम्मीदवार जीतीं, जिनकी संख्या 37 है।
लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि बंगाल में इन सभी राज्यों से सबसे ज्यादा 385 महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा गया था। यह दूसरी बात है कि
प्रतिशत में यह आंकड़ा असम और केरल से कम सिर्फ 10 प्रतिशत पर
है। यह 2021 के मुकाबले काफी बड़ी गिरावट थी, जब 240 महिला उम्मीदवारों में से 40 जीती थीं।
इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 12 फीसदी हो गया। इन राज्यों में से पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा महिला उम्मीदवार जीतीं, जिनकी संख्या 37 है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि बंगाल में इन सभी राज्यों से सबसे ज्यादा 385 महिला उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा गया था।
तमिलनाडु
ने 2026 में सबसे ज्यादा 442 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। लेकिन सिर्फ 23 महिलाएं ही जीत सकीं, प्रतिशत में यह आंकड़ा 05 फीसदी है जो इन सभी राज्यों के मुकाबले सबसे कम दिख रहा है। फिर भी यह 2021 के मुकाबले अच्छा रहा, जब 12
महिलाएं जीती थीं। चुनावों में सबसे ज्यादा बुरी स्थिति पुदुचेरी की रही। यहां कुल
सीटों के लिए चालीस महिलाओं ने चुनाव लड़ा, लेकिन उनमें से एक
भी महिला चुनाव नहीं जीत सकी। इस केंद्र शासित प्रदेश में पूरी तरह से पुरुषों
वाली विधानसभा बनी और सफलता दर शून्य रही। आज के बरक्स 2021
में पुदुुचेरी में एक महिला चुनकर विधानसभा पहुंची थी, लेकिन
इस बार वह भी संभव नहीं हो सका।
तमाम चुनावी विश्लेषणों में यह बखूबी दिखा कि महिला वोटर पहले की तरह ‘निर्णायक वोट बैंक’ बनकर उभरा। इसमें खास भूमिका तमाम राजनीतिक पार्टियों द्वारा धोषित कल्याणकारी योजनाओं, राशन, नगद सहायता और कई तरह की सामाजिक सुरक्षा के दिये जाने के वायदों ने निभाई।
यूं तो वोटों का गणित जिस तरह राजनीति में हावी रहता है, उसे देखते हुए महिला वोटर इस
चनाव में भी अपना खेला कर गईं। कई सालों से कई राज्यों में महिला वोटर संख्या
राजनीतिक दलों को चुनाव जितवाने में निर्णायक बन रही हैं। यह पिछले कई चुनावों में
बखूबी देखा जा रहा है। यही कारण हे कि महिलाओं को ध्यान में रखकर चुनाव रणनीति
बनाई जा रही है। इन चुनावों में यही सब कुछ दिखा भी। पश्चिम बंगाल में रिकार्ड
स्तर पर मतदान हुआ। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की भागीदारी ने अहम भूमिका निभाई।
असम, केरल और पुदुचेरी में
महिला वोटरों ने पुरुषों से अधिक मतदान किया। विशेषकर पुदुचेरी में मतदान केंद्रों
पर बड़ी संख्या में महिलाओं की भीड़ देखी गई। यह दूसरी बात है कि यहां से एक भी
महिला चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं जा सकी। इसी तरह तमिलनाडु में भी महिला वोटरों की
सक्रियता अच्छी रही। हालांकि मुकाबला बहुकोणीय होने के कारण जीत की भूमिका युवाओं
और पहली बार वोटर महिलाओं ने निभाई। तमाम चुनावी विश्लेषणों में यह बखूबी दिखा कि
महिला वोटर पहले की तरह ‘निर्णायक वोट बैंक’ बनकर उभरा। इसमें खास भूमिका तमाम राजनीतिक पार्टियों द्वारा धोषित कल्याणकारी
योजनाओं, राशन, नगद सहायता और कई तरह
की सामाजिक सुरक्षा के दिये जाने के वायदों ने निभाई।
पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना एक बड़ा हथियार रही है। यह योजना महिलाओं को मासिक नगद सहायता देती है। इसी योजना ने तृणमूल कांग्रेस टीएमसी का ग्रामीण महिला वोटर बैंक मजबूत रखा। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने सेंध लगाकर चुनाव परिणाम पलट दिये।
लगभग सभी
प्रमुख राजनीतिक दलों ने यह अच्छी तरह से समझ लिया है कि महिला वोटर भरोसेमंद और
प्रभावशाली है। इसलिए चुनावी रणनीति ‘महिला कल्याण’ की अलग से बनाई
जाती है। ध्यान दे तो पश्चिमी बंगाल में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना एक बड़ा हथियार रही है। यह
योजना महिलाओं को मासिक नगद सहायता देती है। इसी योजना ने तृणमूल कांग्रेस टीएमसी
का ग्रामीण महिला वोटर बैंक मजबूत रखा। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने सेंध
लगाकर चुनाव परिणाम पलट दिये। इसी तरह तमिलनाडु में डीएमके की स्टालिन सरकार की
कलाइग्नार मगलीर उरूमई थोगई योजना बहुत प्रभावशाली रही। यह योजना सीधे घरों की
अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई थी। चुनाव से पहले राज्य ने बड़े पैमाने पर महिला
केंद्रित भुगतान बढ़ाने वादे किए थे। इसी तरह असम में हिमंत विस्वा सरमा सरकार
ओरूनोदोई योजना को भाजपा की जीत का प्रमुख कारण माना जा रहा है। यह लाखों गरीब
महिलाओं तक सीधे पैसे पहुंचाती है। इस योजना ने भाजपा को एंटी इनकंबेंसी से बचाने
में बड़ी भूमिका निभाई।

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