बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

एक महल में कलाभिव्यक्ति

रविंदर रेड्डी की कलाकृति माइग्रेंट
ऐतिहासिक इमारतें या किले अपने आप में कई कलाओं केंद्र होते हैं। ऐसी जगहों पर मशहूर कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित की जाए, तो ऐसे में यह कठिन हो जाता है कि ऐसी जगहों को क्या नाम दिया जाए? ऐसी जगहें कलाओं का समुच्चय हो जाती है। एक साथ गुथीं हुईं, एकदम अव्यक्त। ऐसी कृतियों को उन्हें निहारते हुए, जब आप उन्हें डिकोड कर रहे होते हैं, तब उस जगह की ऐतिहासिकता उसके अर्थ बदलने लगती हैं। कुछ ऐसी ही अनुभूति जयपुर में नाहरगढ़ किले में माधवेंद्र पैलेस के कला उद्यान में घूमते हुए मिलती है। यह अपने आप में एक अनोखा प्रयोग है। कला प्रेमियों के लिए कला के रसास्वादन यहां बिखेर दिए गए हैं। एक ऐतिहासिक इमारत में अपने-अपने क्षेत्रों की विशिष्ट कलाकारों की कलाकृतियों का प्रदर्शन चाहे जिस उद्देश्य से किया गया होपर यहां घूम रहे लोगों की प्रतिक्रियाएं इस तरह के अपने अनूठे पहल के दूसरे आयाम भी खोलते हैं। साथ ही लोगों की कई तरह की प्रतिक्रियाएं हमारी कलाओं के प्रति नासमझी और उपेक्षा की पोल भी खोल देती हैं। इसलिए यहां आप अकेले ही  घूमेबल्कि उस जनसमूह को साथ लेकर घूमेंतो आपके अनुभव बढ़ जाएंगे।   
हुमा भाभा की कलाकृति
स्टीफन कॉक्स
राजस्थान सरकार ने कला को बढ़ावा देने के लिए दिसंबर, 2017 में इस प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था। यह राजस्थान सरकार और साथ साथ आर्ट का संयुक्त आयोजन है। माधवेंद्र भवन को एक आर्ट गैलरी के रूप में परिवर्तित करने के लिए यहां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को आमंत्रित किया गया है। इस प्रदर्शनी को पीटर नैगीजो नेचर मोर्टे आर्ट लिके डॉयरेक्टर हैंने क्यूरेट की है। इसमें 15 भारतीय और 09 अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित हैं। इनमें कुछ प्रसिद्ध नाम अरमानहुमा भाभाजेम्स ब्राउनस्टीफन कॉक्सअनीता दुबेविभा गलहोत्राविक्रम गोयलसुबोध गुप्ताइवान हालवेमैथ्यू डेजैक्सनहंस जोसेफ्सनजितिश कल्लातरीना कल्लातमृणालिनी मुखर्जीमनीष नाईज्ञान पंचलप्रशांत पांडेरविंदर रेड्डीआरलेने सैचेटएलएन तल्लूर आदि हैं। इन सभी कलाकारों की 53 कलाकृतियों का प्रदर्शन इस भवन में किया गया है। माधवेंद्र भवन का निर्माण महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय ने करवाया था। यह दो मंजिला भवन हैजो दस भागों में बंटा हुआ है। प्रत्येक भवन में शयन कक्षभंडार गृहरसोईशौचालय है। भवन के बीच में एक चौक स्थित है। भवन में उत्कृष्ट आराइश पर भित्ति चित्रों का अनूठा अलंकरण है। इन्हीं भवनों में इन कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया है।

भारती खेर की कृति
जितिश कल्लात की कृति



सोमवार, 24 दिसंबर 2018

एकल महिलाओं का संघर्ष

single woman
वैसे तो हमारी सामाजिक और धार्मिक व्यवस्थाएं यही हैं कि किसी भी स्त्री को एकल जीवन न जीना पड़े। फिर भी कुछ महिलाएं आजीवन अविवाहित रह जाती हैं, कुछ शादी ही नहीं करती हैं। कुछ महिलाएं शादी के बाद छोड़ दी जाती हैं तलाकशुदा हो जाती हैं। कुछ महिलाओं के पति शहरों में दूसरी शादी करने के बाद पहली पत्नी को यूं ही छोड़ देते हैं। जबकि कुछ महिलाएं पतियों के साथ तालमेल न बैठने के कारण स्वेच्छा से अलग हो जाती हैं। कुछ महिलाओं के पतियों की मृत्यु हो जाने और दूसरी शादी न होने के कारण अकेली रह जाती हैं। ये तमाम तरह की महिलाएं जो किसी न किसी कारण से एक परिवार के बगैर अपना जीवन व्यतीत करती हैं, उनकी गिनती एकल महिलाओं के रूप में होती है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 71.4 मिलियन एकल महिलाएं हैं, जो कुल महिला जनसंख्या के मुकाबले 12 फीसदी बैठता है। यह आंकड़ा 2001 की जनगणना के आंकड़ों से (51.2 मिलियन) 39 फीसदी अधिक है। यानी एकल महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

महिलाओं की सामाजिक स्थिति दोयम होने के कारण उन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अगर महिलाएं परिवार से अलग हो जाती हैं, तो उन्हें और भी कई दूसरी समस्याओं का सामना करना पड़ जाता है। इसका पता इस तथ्य से चलता है कि जहां साथी की मृत्यु और तलाक होने के बाद पुरुषों को दूसरा जीवनसाथी आसानी से मिला जाता है, वहीं महिलाएं इस मामले में भेदभाव का शिकार हो जाती हैं। आंकड़े कहते हैं कि जहां इस प्रकार के पुरुषों की संख्या देश में 1 करोड़ 39 लाख है, वहीं इस तरह की महिलाओं की संख्या लगभग साढ़े चार करोड़ है। इस कारण ऐसी महिलाएं दूसरों के भरोसे अपना जीवन व्यतीत बिताने के लिए मजबूर होना पड़ता हैं।

वास्तव में पुरुष प्रधान समाज में एकल महिलाओं की स्थिति अधिक सोचनीय हो जाती है। अधिकांश एकल महिलाओं को शारीरिक हिंसा, शोषण, उपेक्षा, तिरस्कार, मुफ्त में कार्य करने के अतिरिक्त सबसे ज्यादा यौन शोषण का दंश झेलना पड़ता है। समाज में ऐसी महिलाओं पर लोगों की बुरी नजर होती है। कई बार ये महिलाएं अपवाह का भी शिकार हो जाती हैं। ऐसी महिलाओं के चरित्र पर न केवल उंगली उठाई जाती है, बल्कि उनकी इमेच एक चरित्रहीन स्त्री की भी बना दी जाती है। कहीं-कहीं ग्रामीण इलाकों में इन्हें डायन तक घोषित करके मौत के घाट उतार दिया जाता है। अगर शहरों की बात की जाए, तो उन्हें किराये पर मकान तक मिलना कठिन हो जाता है। कई जगह क्लब की सदस्यता तक नहीं दी जाती है। यात्रा के दौरान होटल और गेस्ट हाउस में ठहरने के लिए मुश्किल का सामना करना पड़ता है।
single woman
समाज में एकल महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिलती है। कई बार शादी न करने के कारण महिलाओं को अपने पिता की संपत्ति और घर में हिस्सा भी नहीं दिया जाता है। इसी तरह विधवा महिलाएं भी अपने ससुराल में पति की संपत्ति में अपने अधिकार के लिए बोल तक नहीं पाती हैं। ऐसे में प्रश्न है कि 71.4 मिलियन एकल महिलाओं का भविष्य कैसा होगा? उनकी समस्याओं का निदान क्या हो सकता है? क्या उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकारें क्या कुछ कर रही हैं? केंद्र और राज्य सरकारें जो योजनाएं चला रही हैं, वे किस हद तक उनके लिए लाभप्रद हो रही हैं। इस समय एकल महिलाओं के अधिकारों के लिए कई संगठन काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि विभिन्न तरह की सामाजिक सुरक्षा वाली योजनाओं से एकल महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित नहीं हो पा रही हैं। सामाजिक सुरक्षा के नाम पर दी जाने वाली पेंशन (कहीं-कहीं सिर्फ 300 रुपये प्रति महीने) भी काफी कम होती हैं और यह भी प्रत्येक महीने नहीं मिल पाती है, बल्कि कई-कई महीनों बाद एक साथ मिलती है। और दूसरी बात कि इस तरह की सहायता में व्याप्त विसंगतियां और भ्रष्टाचार इन महिलाओं की समस्याओं को और बढ़ा देता है।

ऐसे समय में देश में एकल महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों में से एक संगठन नेशनल फोरम फॉर सिंगल वूमन’स राइट्स (एनएफएसडब्ल्यूआर) ने मांगों की एक लिस्ट बनाई है जिससे आने वाले बजट में इस संदर्भ में अलग से आवंटन किया जा सके। उनकी मांगों में एकल महिलाओं के लिए पेंशन और उनके देखभालकर्ताओं को सहायता मिल सकें। एनएफएसडब्ल्यूआर का मानना है कि एकल महिलाओं में समस्या केवल ज्यादा उम्र की महिलाओं के साथ ही नहीं है, बल्कि कई तरह की समस्याएं सभी उम्र की विधवाओं, अविवाहित, तलाकशुदा, पतियों से विलग महिलाएं एवं परित्यक्त महिलाओं में भी है। इस संगठन ने न केवल केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकारों से लगभग तीन हजार रुपये तक की मासिक पेंशन सभी प्रकार की एकल महिलाओं के लिए निश्चित करने की मांग की है। देश भर में इस संगठन की 1.3 लाख महिला सदस्य हैं।