शनिवार, 17 नवंबर 2018

चुटकी भर सिंदूर की कीमत

छठ त्यौहार
हिन्दू पौराणिक कथाओं में स्त्रियों के सौभाग्य का सूचक सिंदूर के बारे में ऐसी कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। जिनके माध्यम इस बात को स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि सौभाग्य यानी पति की लंबी आयु के लिए सिंदूर क्यों धारण किया जाता है। सिंदूर का संदर्भ केवल शादीशुदा महिलाओं से ही होता है, इसलिए गैर शादीशुदा स्त्री के लिए सिंदूर का कोई अर्थ नहीं होता है और विधवाओं के लिए सिंदूर का कोई अर्थ रह नहीं जाता। इसी बात से स्त्रीवादी महिलाओं को आपत्ति होती है। उनका शादीशुदा स्त्री के माथे पर सजा सिंदूर का अर्थ पुरुष की गुलामी, स्वामी भक्ति ही निकाला जाता है।

इसी आपत्ति के चलते साहित्यकार, हिन्दी अकादमी की उपाध्यक्ष, स्त्री मुद्दों पर खुलकर लिखने वाली प्रखर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने छठ त्यौहार के दौरान बिहार की महिलाओं द्वारा नाक से लेकर माथे तक लगाए जानेवाले सिंदूर पर सवाल उठा दिए। सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा कि छठ के त्यौहार में बिहार वासिनी स्त्रियां मांग माथे के अलावा नाक पर भी सिंदूर क्यों पोत लेती हैं? कोई खास वजह होती है क्या? उनका इतना पूछना ही था कि चारों तरफ से महिलाओं के सिंदूर धारण को लेकर प्रतिक्रियाएं आने लगी। यह प्रतिक्रियाएं इतनी तीखी थीं कि किसी अपमान-सम्मान की परवाह शेष नहीं बची रह गई थी। सिंदूरया सिंदूर जैसे दूसरे सुहाग चिन्हों को पहनने को लेकर औचित्य-अनौचित्य सिद्ध किए जाने लगे। मामले को तूल पकड़ते देखकर मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी टिप्पणी फेसबुक से हटा ली। हालांकि उन्होंने अपना पक्ष नहीं छोड़ा और लिखा कि सिंदूर की सुनहरी डिबिया संहाले रहीं यशोधरा और चले गए सिद्धार्थ। सीता ने सहेजा अशोक वाटिका तक सिंदूर, मिली अग्निपरीक्षा और फिर अपमानित निष्कासन। राज्य का सब कुछ लुट गया, बचा ली छोटी सी सिंदूरदानी तो भी नल-दमयंती को सोती हुई छोड़ गए तरू के नीचे…। कितनी सुहागिन स्त्रियों को बरबाद होने से बचा पाया है सिंदूर? मैंने नहीं किया विवाह सिंदूर की खातिर, नहीं सहेजी कभी सिंदूर की डिबिया, नहीं सजाई मांग सिंदूरी रंग से। उसको नहीं माना वर, सुहाग और पति परमेश्वर। वह मेरे सुख-दुख का साथी है, सहचर है। प्रेम मोहब्बत और विश्वास के साथ हम एक संग हैं।

यह विचार मैत्रेयी पुष्पा के अपने हैं, बहुत सी महिलाएं उनके इस तरह के विचारों से इत्तेफाक रखती होगीं। और जाहिर है कि वे अपने इन विचारों अपने ऊपर लागू भी करती होंगी, लेकिन सब लोग यही माने, यह तोजरूरी नहीं? व्यक्तिगत स्वतंत्रता तो यही कहती है। हम अपने लोक, संस्कृति या धर्म के विश्वास मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए धर्म आस्था में विश्वास रखने वाली महिलाओं ने मैत्रेयी पुष्पा की सिंदूर पर प्रश्न उठाती इन बातों से इत्तेफाक न रखते हुए अपनी आस्थाओं पर अपना विश्वास दिखाया। और वे दिखाती आ भी रही हैं। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि सुगाह चिन्हों को धारण करने से कोई ‘गुलाम या स्वामी भक्त’ हो जाता है। वे इसे पति के प्रति प्रेम ही मानती हैं। यह मानने के लिए वे स्वतंत्र भी हैं।

मैत्रेयी पुष्पा का सवाल आस्थाओं से जुड़ा सवाल था। आस्थाएं व्यक्तिगत होती हैं। आस्थाएं जन्म से जुड़ी भी होती हैं, जो इंसान के जन्म लेते उसके साथ हो लेती हैं। इसी तरह स्त्रियों के जन्म लेते ही कई तरह कीमान्यताएं उनसे स्वत: जुड़ जाती हैं, उसी तरह विवाह और विवाह से जुड़ी मान्यताएं और आस्थाएं हैं। अब यह कितनी भेदभाव वाली है भी, नहीं भी हैं, यह अलग-अलग मान्यताओं और आस्थाओं के चलते अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग हो सकती हैं। इसीलिए जब एक स्त्री के श्रृंगार को सुहाग और सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है, और इन पर आस्था न रखने वाली स्त्रियों को मानने के लिए बाध्य किया जाता है, तो प्रश्न उठते हैं। ये ‘मानना पड़ना’ ही सवाल उठाने को मजबूर करता है, फिर चाहे आप उन्हें कितनी ही वैज्ञानिक कारणों से जोड़कर बताइए-समझाइए। परंपरावादी यह कहकर इस प्रश्न से अलग नहीं हो सकते कि आप मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र है। आप चाहे तो शादी के बाद मंगलसूत्र या सिंदूर धारण न करें। पर क्या समाज के सिस्टम के अंदर रह रही एक स्त्री के लिए यह संभव हो सकता है? इसका जवाब हमें अपने आसपास तलाशना होगा।

महिलावादी स्त्रियों की अपनी आपत्तियां हैं। आज नेट पर जाने कितने लिंक इस बात के लिए मिल जाएंगे कि मांग में सिंदूर लगाने से कितने साइंसटिफिक लाभ एक स्त्री को हो सकते हैं। सवाल यह है कि जब इसके इतने अधिक लाभ हैं, तो समाज के हर व्यक्ति के लिए सिंदूर लगाना जरूरी होना चाहिए था? कुछ नहीं तो शादीशुदा पुरुष तो इसे लगा ही सकते हैं। उन्हें इसके लाभ से वंचित क्यों रखा गया? आज शरीर को अलंकृत करने वाले आभूषण तक पुरुष त्याग चुके हैं। कान में कुंडल और पैर के आभूषण कभी कोई भी पुरुष पहने हुए नहीं दिखता। बात सुविधा की है। इसलिए जो सुविधाजनक था, वह उन्होंने अपना लिया। पर यह छूट स्त्रियों को कहां हैं? बात साफ है कि चीजों को आस्था से जोड़ दीजिए, प्रश्न उठने की संभावना कम हो जाएगी। इन सब के बीच क्या इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है कि दूसरों की आस्थाओं का सम्मान न किया जाए?

…किया जाना चाहिए। आस्थाओं से ही परंपराएं पलती हैं और परंपराओं से संस्कृति बनती है। किसी की संस्कृति और आस्थाओं को ठेस पहुंचाने का हक किसी को नहीं होना चाहिए। मैत्रेयी पुष्पा प्रश्न करने का हक रखती हैं पर वे ‘सिंदूर पोतने’ जैसे शब्दों का प्रयोग करके कहीं अधिक ठेस पहुंचा जाती हैं। वे लेखिका हैं, संवेदनशील लेखिका हैं, शब्दों के चुनाव को बखूबी समझती हैं। साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा के सवाल पर दीप्ति गुप्ता नेकाफी अच्छे तरह से लिखा है कि आपकी तरह अन्य स्त्रियों को भी अपनी मान्यताओं, आस्थाओं और विश्वास को संजोने का हक है। आप किसी की आस्था पर प्रश्न चिन्ह मत लगाइए। याद रखिए कि आस्थाएं तर्कों से अधिक ताकतवर होती हैं और उनसे निकली प्रार्थनाएं अद्भुत परिणाम देती हैं। सो आस्थाओं को तोड़ना किसी के वश में नहीं है। उनकी नींव बड़ी गहरी होती है और उन पर टिका विश्वास सघन होता है।

सोशल मीडिया पर यह बहस अभी भी चल रही है और शायद अगले साल जब छठ पूजा फिर से मनाई जा रही हो, तब कोई फिर से सिंदूर या किसी और परंपरा पर सवाल उठा दे। लोग फिर इस बहस में शामिल होंगे, तर्क-वितर्क करेगें, दूसरे के विचारों को जानेगें-समझेगें और अपने-अपने काम में लग जाएंगे। जरूरी नहीं कि किसी बहस के बाद हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचें ही, लेकिन बहस के दौरान हम विचार-विमर्श तक जरूर पहुंच जाते हैं। विचार के लिए जरूरी तत्वों की खोज हो जाती है। रही बात किसी निष्कर्ष की, तो लोग अपनी-अपनी विचार ग्राह्य शक्ति से अपनी मंजिल तक पहुंच सकते हैं, इस बात की संभावना किसी भी बहस के अंत में पूरी होती है।

(पिछले वर्ष युगवार्ता सप्ताहिक में छठ पूजा के दौरान प्रकाशित एक लेख का अंश)

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

क्या महिलाओं का कोई धर्म नहीं?

sabarimala ayyappa temple
देश की सबसे बड़ी अदालत ने प्रतिबंधित उम्र ग्रुप की महिलाओं को असमानाता, महिलाओं की गरिमा के खिलाफ को आधार बनाकर सबरीमाला में दर्शन की अनुमति प्रदान कर दी, तो स्वयं महिलाएं ही आंदोलन में उतर आईं। सड़क पर उतरीं इन महिलाओं ने न केवल मंदिर में प्रवेश लेने को उत्सुक महिलाओं की समझाइस की, बल्कि येनकेन प्रकारेण उन्हें रोकने की कोशिश में सफल भी रहीं। वे ऐसा करती भी क्यों न, आखिर महिलाओं ने ही इस परंपरा को लिखित-अलिखित रूप से अपनी बेटियों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया हैं। और इनका इरादा भी इसे आगे ले जाने का है। बगैर इस बात को जाने-समझे कि देश के अनगिनत समुदायों में मासिक धर्म पूजने और उत्सव मनाने कारण है, अपवित्रता का नहीं।

सदियां बीतने के साथ महिलाओं की उर्वरक शक्ति अपवित्रता, छुआछूत में कब बदल जाती है, कि इसे लेकर महिलाओं के अंदर शर्म, झिझक, डर जैसे तत्व प्रवेश कर गए। इस बात को सबरीमाला में प्रवेश को लेकर महिलाओं का विरोध स्वयं बताता है। सबरीमाला जैसा पवित्र स्थान ही क्यों, इस अपवित्रता के चलते घर में स्थित पूजा घर, व्रत-त्योहारों में महिलाएं प्रतिबंधित या सीमित हो जाती हैं। कामोबेश अधिकतर धर्मां में इस अवस्था में पवित्र स्थानों पर जाने की मनाही होती है। ऐसा नहीं है कि यह अपवित्रता ही महिलाओं को तमाम धार्मिक कार्य करने से रोकती है। वास्तव में ऐसी अनगिनत परंपराएं हैं जिन्हें आधार बनाकर धर्म के अधिकांश कार्यों से उन्हें वंचित कर दिया जाता है।

कहते हैं कि सबरीमाला वाले भगवान अयप्पा ब्रम्हचारी हैं, इसलिए 10 से 50 वर्ष की उम्र वाली महिलाओं को उनसे दूर रहना चाहिए। केरल के ही पद्मनाथ स्वामी मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। विश्व के सबसे धनी इस मंदिर के बारे में यह माना जाता है कि महिलाओं के इस हिस्से में प्रवेश से मंदिर के खजाने को बुरी नजर लग जाएगी। अहमदाबाद स्थित शनि शिंगनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के प्रतिबंध के संबंध में कहा जाता था कि मूर्ति के सामने आने पर हानिकारक तरंगें निकलती हैं, अत: महिलाओं को यहां प्रवेश नहीं करना चाहिए। इसी तरह कोल्हापुर स्थित 1400 साल पुराने महालक्ष्मी मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी। जिसे आंदोलन के बाद समाप्त किया गया। यही समस्या नासिक के त्रंयबकेश्वर मंदिर में भी है। इस मंदिर में शिव लिंग की पूजा का अधिकार महिलाओं को नहीं है। इसकी वजह गर्भगृह में निकलने वाला विकिरण बताया जाता हैं, जो महिलाओं के लिए नुकसानदेह हैं। नासिक के कपालेश्वर मंदिर में निचली जाति की महिलाओं का गर्भगृह में प्रवेश पर प्रतिबंध था। देश के तमाम मंदिरों और पवित्र स्थलों में अलग-अलग कारणों से पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध महिलाओं पर लगा हुआ है। इस क्रम में पुणे के म्हस्कोबा मंदिर, असम का पटबौसी सत्र मंदिर, बीड का मारूती मंदिर, पुष्कर का कार्तिकेय मंदिर, रनकपुर के जैन मंदिर या देश की राजधानी दिल्ली में स्थिति निजामुद्दीन औलिया जैसी अन्य दरगाहों में महिलाओं का किसी न किसी रूप में प्रवेश निषिद्ध है।

सबरीमाला मंदिर विवादकिसी भी धर्म में पैगम्बर महिला नहीं हैं। गौतम बुद्ध ने बहुत विचार-विमर्श के बाद मठों में महिलाओं को प्रवेश दिया था। मंदिर में पुजारी महिला नहीं दिखती हैं। (अपवादस्वरूप किन्हीं देवस्थानों में हैं। जैसे मनकामेश्वर मंदिर, लखनऊ की महंत दिव्यागिरि हैं।) किसी भी मंदिर का समस्त कामकाज पुरुष पुजारियों के हवाले रहता है। चाहे वह देवीस्थान ही क्यों न हो। कई मस्जिदों में महिलाएं नमाज पढ़ने नहीं जा सकती। देश में निजामुद्दीन औलिया, अजमेर शरीफ और श्रीनगर के हजरतबल की दरगाह के मकबरों तक महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है। रोमन कैथोलिक महिलाएं पादरी नहीं बन सकतीं। पारसी महिलाएं गैर धर्म में विवाह के बाद अपने सभी धार्मिक अधिकारों से वंचित कर दी जाती हैं, जबकि पुरुषों अधिकार उसी तरह से जायज होते हैं। (पारसी समुदाय की गुलरुख के. गुप्ता ने इस संदर्भ में एक लंबी लड़ाई लड़कर हाल ही में जीती है।) पारसी पुरुष के शादी करने वाली महिला भी फायर टेम्पल में प्रवेश नहीं कर सकती है, जबकि पुरुष कर सकता है। इस बात को हाल ही में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने बयां किया, जिन्होंने एक पारसी समुदाय के व्यक्ति जुबिन ईरानी से विवाह किया है।

इन सब उदाहरणों से समझा जा सकता है कि इन सभी बड़े और चर्चित देवस्थानों पर प्रतिबंधों का अपना एक इतिहास है, जो बगैर किसी तर्कशास्त्र के बदस्तूर जारी है। जिसे कुछ मुट्ठीभर लोग आस्था के नाम पर संचालित कर रहे हैं। किसी भी पवित्र स्थान में लगे ये प्रतिबंध को किसी न किसी अनहोनी से जोड़कर लोगों को डराया जाता है। हाल ही केरल में जब बाढ़ ने तबाही मचाई, तब इसे भगवान अयप्पा के क्रोध से जोड़ दिया गया। प्रश्न है कि किसी न किसी बहाने से इन तमाम तरह के पवित्र स्थानों पर महिलाओं के प्रवेश को इतना प्रतिबंधित क्यों किया गया है? क्या महिलाएं कम धार्मिक हैं या वे धर्म के अनुष्ठानों और व्याख्यानों को समझने में असमर्थ हैं? क्या उनमें श्रद्धा कम है? या इन सबसे अलग कोई कारण है, जिससे आस्था में उनकी बेदखली जारी है। कहीं धर्म पुरुष सत्तात्मक तो नहीं है जो किसी न किसी बहाने आधी आबादी को इससे दूर रखना चाहता है, जिससे धर्म पर उसकी सत्ता कायम रहे।

सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

#मीटू : आखिरकार गुबार फूट ही पड़ा

central minister menka gandhi
तनुश्री और नाना के विवाद ने बहुत सी महिलाओं को यह हिम्मत दी कि यही सबसे ठीक समय है, जब वे अपनी घुटन से छुटकारा पा सकती हैं। तनुश्री से हिम्मत लेकर लेखिका और निर्देशिका विंता नंदा ने जब अभिनेता और संस्कारी बाबूजी के नाम से लोकप्रिय आलोकनाथ के बारे में विस्तार से लिखा, तो लोगों का आश्चर्यचकित हो जाना लाजिमी था। बीस साल पहले हुए विंता के यौन उत्पीड़न के बाद जिस तरह से एक के बाद एक मामले सामने आए, उससे आलोक नाथ की एक दूसरी छवि ही लोगों ने देख ली। इसी तरह तनुश्री के माध्यम से समाजसेवी नाना पाटेकर एक दूसरा स्वरूप लोगों के सामने आया। तनुश्री के समर्थन में कंगना ने जब विकास बहल पर अपनी बात रखी, तब ‘क्वीन’ जैसी वुमेन ओरिएंटेड फिल्म बनाने वाले व्यक्ति का एक और ही चेहरा सामने आया। इसी क्रम में पत्रकारिता के क्षेत्र से एक प्रमुख नाम एम.जे. अकबर का आया है। अब तक उन पर 15 महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। टेलीग्राफ, एशियन ऐज और इंडिया टुडे के शीर्ष पदों पर रहने के बाद आज वे केंद्र सरकार में विदेश राजमंत्री भी हैं।

गौर करने वाली बात है कि जिन पर भी आरोप लग रहे हैं, वे सब अपने-अपने क्षेत्रों में एक बड़ा नाम है। इन सभी पर जो आरोप लगे हैं, वे कई-कई साल पुराने हैं। जिसका अब खुलासा किया जा रहा है। इसी कारण कथित पीड़ितों से यह सवाल किया जा रहा है कि वे उस समय चुप क्यों रहीं? सवाल वाजिब भी है। फिर भी प्रश्न यह है कि हमने महिलाओं को कभी ऐसी सुविधा और माहौल दिया ही नहीं कि वे अपनी बात घर या समाज में सभी के सामने बेखौफ रख सकें। हमारे समाज में संभ्रात घरों की महिलाएं तो कुछ दशकों पहले ही काम पर निकली हैं। खेतों पर, कारखानों में महिलाओं का एक बड़ा वर्ग काम करता रहा है। वहां उनके साथ यौन उत्पीड़न से लेकर आर्थिक शोषण बड़ी आम बात रही है। बॉलीवुड में ‘मिर्च मसाला’ जैसी कुछ ही फिल्मों में इस बात को बखूबी चित्रण किया गया है। आज भी पुरुष सत्ता घर हो या बाहर, महिलाओं के श्रम और शरीर पर अपना ही नियंत्रण चाहता है। इसके लिए कई तरह के जाल बुने जाते रहे हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि फिल्म, राजनीति, खेल, अकादमी, कला, कॉरपोरेट जैसे तमाम क्षेत्रों में ख्याति अर्जित करने वाले मठाधीश बहुत कुछ कंट्रोल करने की हैसियत रखते हैं। वे किसी का कुछ बना भी सकते हैं और किसी का कुछ बिगाड़ भी सकते हैं। मीटू इंडिया आंदोलन पर केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने एक सवाल के जवाब पर कहा कि ताकतवर पदों पर बैठे पुरुष अक्सर ऐसा करते हैं। यह बात मीडिया, राजनीति और यहां तक कि कॉरपोरेट के वरिष्ठ अधिकारियों पर भी लागू होती है। यही बात हॉलीवुड के मीटू अभियान पर प्रसिद्ध अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने कही थी, वह भी गौर करने वाली है। उन्होंने कहा था कि ऐसी बहुत सी कहानियां हमारे सामने आने वाली हैं, क्योंकि यह सिर्फ सेक्सुअलिटी या सेक्स की बात नहीं है, यह पॉवर की बात है। इस पॉवर के तहत हमारी इंडस्ट्री में किसी भी औरत को काम के लिए कम्प्रोमाइज करने को कहा जाता है। अगर वह इसके लिए राजी नहीं होती है, तो उसे डराया जाता है। हॉलीवुड में #मीटू अभियान के बाद जब हार्वे वाइंस्टीन को गिरफ्तार कर लिया गया, तब इस मामले में अदालत में अभियोजन पक्ष ने स्पष्ट कहा कि वाइंस्टीन ने युवतियों को राजी करने के लिए अपनी हैसियत और ताकत का इस्तेमाल इस तरह से किया कि वह उनका यौन शोषण कर सकें।

दिल्ली के निर्भया कांड के बाद जिस मुखरता से देश में यौन हिंसा और उत्पीड़न के विरोध में अवाजें उठीं, उसके बाद कानूनी रूप से महिलाएं काफी मजबूत हुई हैं। बिशाखा गाइड लाइंस के बाद सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वीमन एट वर्कप्लेस एक्ट भी बना। पर इससे उन पर होने वाली यौन और दूसरी हिंसा कम हुई हो, ऐसा नहीं है। आंकड़े इसी बात की चुगली भी करते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार देश में 2010 में 22,000 बलात्कार के केस दर्ज हुए, वहीं 2014 में बढ़कर 36,000 हो गए यानी 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। एनसीआरबी ने ही 2016 में बताया कि बलात्कार के 95.5 केस में पीड़िता रेपिस्ट को जानती थी। ताजा आंकड़ों में 2016 में ही 4,437 बलात्कार के केस दर्ज हुए थे। इसी से समझा जा सकता है कि महिलाओं के प्रति यौन उत्पीड़न, शारीरिक हमले, विदेश में लड़कियां भेजना, पति और संबंधियों द्वारा हिंसा, अपहरण के बाद बलात्कार और हत्या के सभी प्रकार के मामले मिलाकर कितने होंगे?

भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान महज 27 (2012 में) फीसदी ही है। भारत विकास रपट मई-2017 में विश्व बैंक ने देश को सुझाव दिया कि अगर विकास दर सात फीसदी से अधिक चाहिए, तो महिलाओं की भागीदारी बढ़ाएं। विश्व बैंक का मानना है कि ऐसा करने पर देश की विकास दर पर एक फीसदी का इजाफा हो सकता है। पर हम हैं कि महिलाओं को काम करने का एक स्वच्छ माहौल ही नहीं दे सकें हैं। जून, 2016 को एसोचैम ने अपने एक अध्ययन में बताया कि पिछले एक दशक में संपूर्ण श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी 10 फीसदी घटकर निचले स्तर पर पहुंच गई है। दूसरी तरफ यूएन इकोनॉमिक एंड सोशल कमीशन फॉर एशिया एंड पैसेफिक का अध्ययन बताता है कि महिला श्रम बल भागीदारी दर में 10 फीसदी वृद्धि से ही जीडीपी में 0.3 फीसदी का उछाल मिल सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि देश में महिलाओं का श्रम बल अनुपात बढ़ाने के लिए नीतियां और कार्यक्रम लागू किए जाए। पर नहीं, हम महिला श्रम का शोषण करने में भी बहुत आगे हैं। देश में महिलाओं को मिलने वाला वेतन पुरुषों के मुकाबले औसतन 18.8 फीसदी कम हैं। यह कमी वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है। ये अध्ययन तो कॉरपोरेट जैसे संगठित क्षेत्र में किया गया, असंगठित क्षेत्रों में क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे में मीटू के जरिए अपनी कहानी बताने वाली महिलाओं से सवाल पूछना कहा तक उचित है कि पहले क्यों नहीं बताया?

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

तनुश्री से सवाल पूछने से पहले

#metoo campaign
नो एक शब्द ही नहीं, अपने आप में पूरा वाक्य है योरऑनर। इसे किसी तर्क, स्पष्टीकरण या व्याख्या की जरूरत नहीं है। ‘न’ का मतलब ‘न’ ही होता है योरऑनर। ’
‘न मैं नाना पाटेकर हूं और न तनुश्री, तो मैं आपके सवाल का जवाब कैसे दे सकता हूं।’

ऊपर लिखी यह दोनों लाइनें फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन ने बोली हैं। पहली लाइन फिल्म ‘पिंक’ में एक बलात्कार की शिकार लड़की का केस लड़ते हुए और दूसरी लाइन अभिनेत्री तनुश्री और नाना पाटेकर विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कही। मामला एक ही तरह का है, पर रील और रियल लाइफ का अंतर है। वास्तव में रील और रियल लाइफ में यही फर्क होता है। अगर तनुश्री और नाना पाटेकर विवाद रियल लाइफ में न होकर सिनेमा के लिए फिल्माया गया एक दृश्य जैसा होता तो? तो सदी के महानायक पुरजोर वकालत करके यह केस जीत लेते और फिल्म ‘हिट’ हो जाती। चूंकि मामला फिल्म का नहीं है, इसलिए वे बड़े ही ‘बेशर्म’ तरीके से इस सवाल से बच निकलते हैं। खैर, सदी के महानायक की छोड़िए, दरियादिल सलमान खान की बात कर लें। जब एक प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकार ने इस विवाद पर सलमान की प्रतिक्रिया जाननी चाही, तब ‘आप किस इवेंट में आई हैं मैडम।’ कहकर न केवल महिला पत्रकार का उपहास किया, बल्कि इस मामले को हल्का कर दिया।

हमारी हीरो और नायकों वाली इंडस्ट्री के ‘हीरो’ सिर्फ फिल्मों में ही गरीब, मजलूमों और महिलाओं के लिए लड़ते दिखते हैं, फिल्म से बाहर वे उतने ही साधारण व्यक्ति होते हैं, जितने हमारे आसपास का कोई सामान्य इंसान। इसलिए तनुश्री जैसी किसी भी अभिनेत्री को सदी के महानायक और दरियादिल सलमान खान से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। न ही उन लोगों से कोई उम्मीद होनी चाहिए, जो यह कहते नजर आ रहे हैं कि उसी समय क्यों नहीं बोलीं। या यह प्रसिद्धि पाने का एक आसान तरीका है। अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता है जब तेलुगू अभिनेत्री श्री रेड्डी को कास्टिंग काउच और अपने साथ हुए यौन शोषण के विरोध में सरेआम निर्वस्त्र होकर प्रोटेस्ट करना पड़ा। तब भी यही सवाल चारों तरफ तैरतें नजर आए। आखिरकार श्री रेड्डी के मामले के सामने आने के बाद कई और अभिनेत्रियों ने अपना मुंह खोला और सब कुछ ढका-छिपा क्रिस्टल की तरह साफ नजर आने लगा। यही हाल आज इस बॉलीवुड का है। सब कुछ ढका-छिपा है। अगर कोई अपना मुंह खोलता भी है, तो बजाए उसकी गंभीरता के समझने के, उल्टा उसी का ट्रायल शुरू हो जाता है। कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इस मामले में भी सवाल तनुश्री से ही किए जा रहे हैं, नाना से नहीं।

हमें तनुश्री की इस बात की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने अपने साथ हुए उस वाकये पर न उस समय चुप रहीं और न आज चुप हैं। आज वे जिस आत्मविश्वास के साथ मुखर होकर अपनी बात मीडिया में रख रही हैं, उस हिम्मत को पाने में उन बीते दस साल का योगदान भी है, जिसे उन्होंने इस दर्द के साथ जिया है। आज तनुश्री पर वैसे ही हमले हो रहे हैं, जैसा श्री रेड्डी पर हुए थे। पर इस समाज की महिलाओं के प्रति जड़ता और माइंडसेट को क्या कहा जाए, जो सारे सवाल तनुश्री से ही कर रहा है। तनुश्री से ही गवाह और सुबूत मांग रहा है। तनुश्री को ही सिद्ध करना पड़ रहा है कि ज्यादती उसके साथ हुई है। यह एक सभ्य समाज की निशानी कैसे हो सकती है जहां पीड़िता को ही सिद्ध करना पड़े कि उसके साथ कुछ गलत हुआ था। इस मामले पर केद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि ‘पहले क्यों नहीं कहा’ का सवाल लोगों ने तब भी पूछा था, जब हॉलीवुड निर्देशक हार्वे विंस्टीन के खिलाफ बोला गया था। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पीड़तिा कब सामने आती है। मैं जानती हूं कि जब आपके शरीर पर हमला होता है, तो यह आपको हमेशा याद रहता है।

बॉलीवुड महिला और महिला चरित्रों को लेकर स्टीरियो टाइप रहा है। हर इंडस्ट्री की तरह बॉलीवुड भी पुरुष प्रधान है। आज भी यहां महिलाओं को पेमेंट से लेकर रोल तक में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। आज भी इस इंडस्ट्री में महिला निर्देशक गिनती की हैं। उनका अनुभव बताता है कि कैसे उन्हें ‘जज’ किया जाता है। पहले भी और आज भी फिल्मों और मॉडलिंग के क्षेत्र को लड़कियों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। सवाल है कि ऐसा क्यों है? जब इस क्षेत्र में पढ़े-लिखे जहीन लोग काम कर रहे हैं, तो महिला के काम को खराब क्यों समझा जाता है? कहीं सामान्य लोगों की यही समझ बॉलीवुड में काम करने वालों की भी तो नहीं है। दुर्भाग्य है कि ऐसा ही है। तभी वह इस इंडस्ट्री में काम करने वाली महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाते हैं। वे उनके अस्तित्व को उसी तरह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं होता है, जिस तरह वे अपनी घर की महिलाओं के बारे में सोचते हैं। यहीं अंतर ही इस इंडस्ट्री में काम करने वाली महिलाओं को यौन उत्पीड़न और काटिंग काउच के रूप में भुगतना पड़ता है।

हमारा सिनेमा (बॉलीवुड) शताब्दी पार कर गया है। यहां महिलाओं (अभिनेत्रियों और दूसरे काम करने वाली महिलाएं) के शोषण का इतिहास भी इतना ही पुराना हो चुका है। भारतीय सिनेमा में महिलाओं के लिए द्वार खोलने वाली बांग्ला स्टार अभिनेत्री कानन देवी ने अपनी आत्मकथा में सेक्सुअल हैरेसमेंट और दुर्व्यहार के बारे में लिखा है। बाद में इन्होंने महिला कलाकारों की मदद के लिए एक संस्था महिला शिल्पी महल की स्थापना भी इसी वजह से की। लीजेंड गजल गायिका बेगम अख्तर की कहानी तो अत्यंत दर्दभरी है। बिहार के एक राजा ने किशोरावस्था में ही उनकी कला की प्रशंसा के बहाने उनका बलात्कार किया। जिसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव उन पर ताउम्र रहा। ये कुछ ऐसी सच्चाइयां हैं, जो लोगों के सामने आ पाई। वरना ऐसी बहुत सी कहानियां इस इंडस्ट्री में दफ्न पड़ी हैं। यह केवल तनुश्री की लड़ाई नहीं है, यह बॉलीवुड की बहुत सी तनुश्रीयों की लड़ाई है, जिसे उन्हें खुद ही लड़नी पड़ेगी। इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की बात ठीक लगती है कि भारत में भी हमें हैशटैग मीटू जैसा अभियान शुरु करने की जरूरत है।

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

यौन अपराधियों का तैयार होगा निजी रिकार्ड

metooमहिलाओं की सुरक्षा एक अहम मामला है। मामला अहम इसलिए भी है क्योंकि देश में महिलाओं, किशोरियों और बच्चियों के खिलाफ अपराधों में किसी भी स्तर पर कमी नहीं आई है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इसकी काफी समय से चर्चा भी चल रही थी। सरकार यौन अपराधियों का निजी रिकॉर्ड बनाकर एक डेटाबेस तैयार कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सेक्सुअल ऑफेंडर्स यानी एनआरएसओ को हरी झंडी दिखा दी है। अब यौन अपराधियों से जुड़ी निजी व बॉयोमेट्रिक जानकारियों का एक डेटाबेस तैयार किया जाएगा। इस डेटाबेस में यौन अपराधियों का नाम, उनकी फोटो, पता, उंगलियों की छाप, डीएनए के साक्ष्य और उनका आधार व पैन नंबर शामिल किया जाएगा। इन सारी जानकारियों से लैस इस डेटाबेस से किसी भी यौन अपराधी की सभी जानकारी पलक झपकते प्राप्त हो जाया करेंगी। इस डाटा को रजिस्टर करने का काम राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी कर रहा है। फिलहाल इसका उपयोग जांच एजेंसियां ही कर सकेंगी।

इस डेटाबेस को तैयार करने के लाभ क्या होंगे? इस आपराधिक रिकॉर्ड में फिलहाल बलात्कार, गैंगरेप, बच्चों के साथ यौन अपराध करने वाले और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने वाले लगभग 4,40,000 लोगों की जानकारी रखी जाएगी। जब इस डेटाबेस में शामिल कोई भी अपराधी फिर से अपराध में लिप्त पाया जाएगा, तो वह इसके माध्यम से तुरंत पहचान में आ जाएगा। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यौन अपराध में शामिल कई व्यक्ति जमानत पर छूटने या जेल से बाहर आने के बाद फिर से वही अपराध करते पकड़े गए हैं। देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में वृद्धि ही हो रही है। इसे एनसीआरबी की वार्षिक रिपोर्ट-2016 से समझा जा सकता है। एनसीआरबी की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि महिलाओं के खिलाफ 2015-16 में हुए अपराधों में 2.9 फीसदी की वृद्धि हुई। जहां 2015 में महिलाओं के खिलाफ 3,29,243 अपराध के मामले हुए, वहीं 2016 में 3,38,954 अपराध दर्ज किए गए। इस तरह के अपराधों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले हर किस्म के अपराध और हिंसा शामिल हैं। इसी तरह केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने जुलाई में राज्य सभा में बताया था कि देश में 2016 में 38,947 बलात्कार के मामले दर्ज हुए। वहीं 2015 में 34,651 केस और 2014 में 36,735 बलात्कार के केस दर्ज किए गए। कुल मिलाकर 2014-16 तक देश में 1,10,333 यौन हिंसा के केस दर्ज किए गए।

यौन अपराधियों का इस तरह का डेटाबेस तैयार करने वाला भारत दुनिया का नौवां देश बन गया है। अपने देश के अतिरिक्त दुनिया में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, कनाडा, आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और त्रिनिदाद टोबैगो में भी यौन अपराधियों का डेटाबेस रखा जाता है। देश में इस तरह की नेशनल रजिस्टर ऑफ सेक्सुअल ऑफेंडर्स बनाने के लिए चेंज डॉट ऑर्ग नामक वेबसाइट में एक याचिका लगाकर अभियान भी तीन साल पहले शुरू हुआ था। इस अभियान को शुरू करने वाली मडोना रुजेरियो जेनसन का मानना था कि यदि भारत में इस तरह के यौन अपराधियों के डाटा को एक जगह पर इकट्ठा कर लिया जाता है, तो पुलिस के लिए सीरियल अपराधियों को पकड़ना कहीं अधिक सरल हो जाएगा। इस याचिका को अब तक 90,671 लोगों का समर्थन मिला है। अब जब सरकार ने इस काम को आगे बढ़ा दिया है, तो इस तरह के छोटे-छोटे प्रयासों की अहमियत बढ़ जाती है।

इस अच्छे फैसले के खिलाफ कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। पहला तो यही कि इससे यौन अपराध में शामिल व्यक्तियों को सजा भुगतने के बाद जीवनयापन में कठिनाई आ सकती है या उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। दूसरा यह कि इस तरह के डेटाबेस तैयार करने के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कितनी कमी आ सकेगी? यह डेटाबेस तभी उपयोगी होगा, जब एक ही व्यक्ति पुन: अपराध करे। एनसीआरबी की वार्षिक रिपोर्ट-2016 बताती है कि फिर से अपराध करने वालों की संख्या 6.4 फीसदी है। यह आंकड़ा सभी प्रकार के अपराधों में से निकाला गया है। इसमें यौन अपराधियों का प्रतिशत कितना होगा, इसका अलग से विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए अपर्याप्त आंकड़ों के प्रकाश में इस तरह के डेटाबेस का महत्व बहुत अधिक नहीं दिख पा रहा है। एक पक्ष यह भी है कि महिलाओं के खिलाफ यौन या दूसरों अपराधों में उनके जान-पहचान और करीबी रिश्तेदार शामिल होते हैं जिनकी या तो रिपोर्ट दर्ज ही नहीं कराई जाती है या फिर दर्ज होती है, तो डेटाबेस में नाम रजिस्टर होने के डर से परिजनों पर दबाव और भी बढ़ सकता है। संभावना है कि इस तरह के मामले दर्ज होने में और भी कठिनाई न आ जाए। इन सब शंकाओं के बावजूद इसे महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जाना चाहिए।

शनिवार, 29 सितंबर 2018

#अपना मुंह बंद करो

#VaayaMoodalCampaign
#VaayaMoodalCampaign यानी #शट योर माउथ कंपेन यानी #अपना मुंह बंद करो। यह मुंह बंद कराने का अभियान केरल में चलाया गया, जिसका परिणाम भी तुरंत दिखा। #मी टू कंपेन में जहां महिलाओं से अपना मुंह खोलने की अपील की गई थी, इसके बरक्स #सट योर माउथ कंपेन में ऐसे व्यक्तियों को अपना मुंह बंद करने को कहा गया, जो महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियां कर रहे हैं। वैसे यह कंपेन जिसके कारण अस्तित्व में आया वे ‘महाशय’ और कोई नहीं, बल्कि केरल के निर्दलीय विधायक पीसी जॉर्ज हैं। मामला, जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर रेप और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली एक नन का है। यह इस समय मीडिया में छाया हुआ है। इस मामले को लेकर पीसी जॉर्ज ने कहा कि ‘नन वेश्या’ है। उसने पहली बार ही शिकायत क्यों नहीं की? (इसके अतिरिक्त जॉर्ज ने कई और आपत्तिजनक बातें कहीं।) उक्त नन के बिशप मुलक्कल पर यौन उत्पीड़न के आरोप के बाद बिशप पर कई और नन ने इसी तरह के आरोप लगाए। इन सभी ननों ने बिपश की गिरफ्तारी और मामले की जांच के लिए धरना और प्रदर्शन भी किया। इस बात पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पीसी जॉर्ज ने यह आपत्तिजनक बातें कही थीं, इसी की प्रतिक्रिया पर #सट योर माउथ कंपेन सामने आया।

जॉर्ज के इस बयान के दो दिन बाद 10 सितंबर को कलाकार, एक्टिविस्ट और पर्यावरणविद् आयशा महमूद ने फेसबुक पर #शट योर माउथ कंपेन छेड़ दिया। उन्होंने अपील की कि आप लोग जॉर्ज को सेलो टेप भेजकर उनका मुंह बंद करने में मदद करें। उनकी इस अपील का असर तुरंत दिखा। उनका साथ देने के लिए कई लोग सामने आए। केरल और केरल से बाहर की कई हस्तियों ने आयशा की इस मुहिम को आवाज दी। इसके बाद सोशल मीडिया पर पीसी जॉर्ज के मुंह पर टेप लगी कई तस्वीरें हैशटैग सट योर माउथ के साथ तैरने लगीं। इस प्रकरण पर आयशा का कहना है कि उन्हें (पीसी जॉर्ज) अपनी जीभ पर कंट्रोल रखने में समस्या आती है। इसलिए उन्हें हमारी सहायता की जरूरत है। ये बात आयशा व्यंग्य में जरूर कहती हैं, पर इसके अर्थ व्यापक है।

महिलाओं पर ऐसी टिप्पणी करने वाले क्या केवल पीसी जॉर्ज हैं? पीसी जॉर्ज जैसे कई बयानवीर हैं, जो महिलाओं को लेकर ऐसी टिप्पणियां या बयान आए दिन देते रहते हैं। क्या इन सभी के मुंह पर टेप नहीं लगना चाहिए? चाहे राजनीतिज्ञ हों, सेलीब्रिटीज हों, इस तरह के बयान देने से पहले वे क्यों नहीं सोचते? अगर मामला महिला से जुड़ा हो, तो वे उसे ‘वेश्या’ घोषित करने में समय नहीं गंवाते हैं। चारित्रिक प्रमाणपत्र बांटना वे अपना ‘धर्म’ समझते हैं। पीसी जॉर्ज को हाल ही में सीसीटीवी फुटेज में टोल कर्मियों से मारपीट करते हुए देखा गया। पर ऐसे कृत्यों के बावजूद उन्हें चारित्रिक प्रमाणपत्र देने की हिम्मत किसी में नहीं है। एक जिम्मेदारी वाले पद पर बैठे जॉर्ज जैसे व्यक्ति जब ऐसी बातें खुले आम करते हैं, तो इसका समाज में गलत संदेश जाता है। पीसी जॉर्ज पीड़ित नन को ‘वेश्या’ घोषित करने में दिक्क्त नहीं होती है, पर आरोपी बिशप मुलक्कल के लिए कुछ नहीं कहते। क्या पीसी जॉर्ज नहीं जानते कि वेश्याएं बनती कैसे हैं और उन्हें आबाद कौन करता है। ये ऐसे लोग हैं, जो सीधे महिलाओं का चरित्र हनन करना अपना ‘मौलिक कर्तव्य’ मानते हैँ।

जॉर्ज जैसे व्यक्तियों को अपनी गलती का अहसास तब और नहीं होता है, जब उनके इस तरह के बयानों का कोई विरोध नहीं होता। तब ऐसे लोगों की हिम्मत और बढ़ जाती है। और चूंकि हमारे समाज का माइंडसेट भी ऐसी ही कथनों के अनुकूल बना हुआ है, इसलिए हम जैसों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। और हमें फर्क नहीं पड़ता है, तो जॉर्ज जैसों को कोई फर्क नहीं पड़ता। अंतत: वे और बड़े बयानवीर बनकर उभरते हैँ, जैसा कि पीसी जॉर्ज के मामले में देखा जा सकता है। यह उनका आखिरी और पहला बयान नहीं था।

1996 में केरल के इदुक्की जिले के सूर्यनेल्ली में एक किशोरी के साथ सामूहिक बलात्कार कांड में जब 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केस दोबारा ओपन किया गया और पीड़िता ने पूर्व राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन को पुन: आरोपी बनाए जाने के संबंध में शिकायत की, तब यह राजनीतिक रूप से काफी गर्म हो गया। ऐसे में पीड़ित लड़की को कांग्रेस सांसद के. सुधाकरन ने ‘बाल वेश्या’ जैसा बताया। उन्होंने कहा कि वह पैसे लेती थी और गिफ्ट लेती थी। 1996 के इस मामले में किशोरी का अपहरण करके 40 दिनों तक राज्य के अलग-अलग जगहों पर ले जाकर बलात्कार किया गया। विशेष अदालत ने 2000 में इस मामले में 36 में से 35 लोगों को दोषी मानते हुए कड़ी सजा सुनाई, पर हाईकोर्ट ने सभी को बरी कर दिया। तब पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। किशोरी के इतने सालों के संघर्ष के बावजूद एक ‘जिम्मेदार नेता’ की ऐसी शर्मनाक सोच को क्या कहा जाए?

2013 में पश्चिम बंगाल में लघु-मझोले उद्योग मंत्री स्वप्न देबनाथ ने एक रैली में सीपीएम की महिला नेताओं को लेकर एक शर्मनाक टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा कि सीपीएम की कुछ महिला नेता इतनी गिरी हुई हैं कि वे खुद अपना ब्लाउज फाड़ लेती हैं और हम पर छेड़छाड़ का आरोप लगा देती हैं। जिस पार्टी की मुखिया और राज्य की नेत्री एक महिला (ममता बनर्जी) हों, तब उनकी ही सरकार के एक मंत्री के इस तरह के बयान को क्या समझा जाए। यह किस प्रकार असंवेदनशीलता है, या वहीं माइंडसेट? इसी तरह टीएमसी के नेता तापस पॉल ने विरोधी दल की महिला नेताओं को धमकी देते हुए ‘फर्माया’ था कि वे लड़के (यानी गुंडे) भेजकर रेप करवा देंगे।

ऐसा नहीं है कि यह व्यवहार केवल मजलूम सी महिलाओं के साथ होता है। वास्तविकता यह है कि यह सशक्त कही जाने वाली महिलाओं के साथ भी उसी तत्पर्यता होता है, जैसा उक्त नन और किशोरी के साथ हुआ। इसकी बानगी मशहूर गायक अभिजीत भट्टाचार्य के ट्वीटर अकाउंट के स्थगन से समझा जा सकता है। महिलाओं पर अपनी अभद्र टिप्पणियों को लेकर कुख्यात मशहूर सिंगर अभिजीत भट्टाचार्य ने अरुंधती राय, शेहला राशिद और स्वाति चतुर्वेदी (सभी जानीमानी महिलाएं) को लेकर सोशल मीडिया पर लिखा यानी चारित्रिक हनन करने की कोशिश की। इसके कारण उनका ट्वीटर अकांउट सस्पेंड कर दिया गया। फिर भी अभिजीत कहते रहे कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि पूरा देश उनके साथ है। (पूरा देश तो नहीं पता, पर हां, उनका यह आत्मविश्वास कि उनके जैसे लोग उनके साथ अवश्य है, तो यह गलत नहीं है। वास्तव में ऐसा है। उनके आत्मविश्वास का आधार हमारे समाज में ही मौजूद है।) माननीयों की इस तरह की और बानगी लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन में भी देखी जाती है। महिला आरक्षण की बहस में दिग्गज नेता शरद यादव का ‘परकटी औरतें’ और बाद में ‘गोरी चमड़ी’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया। जिस पर संसद में ठहाके लगे। यह ठहाके तब भी लगे जब प्रधानमंत्री ने शूर्पनखा की हंसी वाली बात कहीं। इसी तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का संघ की आलोचना के लिए महिलाओं को शॉर्ट्स में देखने वाली बात।

कमोबेश यह ट्रेल काफी लंबी है। इसके लिए #सट योर माउथ कंपेन मात्र एक छोटी, पर महत्वपूर्ण पहल हो सकती है। यह एक ऐसा रास्ता है, जो महिलाओं को अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए मजबूत आधार प्रदान करेगा। किसी भी आपत्तिजनक टिप्पणियों पर चुप न रहने की, बल्कि चुप कराने पर जोर देने का वक्त है।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

शादी की उम्र को लेकर अंतर क्यों?

Family Law
यह कैसा विरोधाभास है कि 18 साल की उम्र में सरकार चुन सकते हैं पर जीवनसाथी नहीं। इस मामले में शायद महिलाएं भाग्यशाली हैं कि वे 18 साल होने के बाद अपने लिए जीवनसाथी चुन सकती हैं, पर पुरुष नहीं। उन्हें महिला की तुलना में तीन साल और इंतजार करना पड़ता है। यही हमारे देश का कानून है- विभिन्न कानूनों के तहत शादी की न्यूनतम आयु महिलाओं के लिए 18 साल और पुरुषों के लिए 21 साल। शादी के लिए पुरुष और महिला की आयु का अंतर क्यों रखा जाता है? इस अंतर का क्या वैज्ञानिक या सामाजिक आधार है? क्या यह इस विचार को पोषित करता है कि पत्नी पति से उम्र में छोटी होनी चाहिए? इन प्रश्नों का कोई माकूल और तर्कशील उत्तर हमारे पास नहीं है। शायद इसीलिए विधि आयोग ने सुझाव दे दिया कि क्यों न पुरुषों की शादी की न्यूनतम आयु महिला के सामान 18 कर दी जाए।

बलवीर सिंह चौहान की अध्यक्षता वाली विधि आयोग ने हाल ही में ‘परिवार कानून में सुधार’ पर अपने परामर्श पत्र में पुरुषों की शादी की न्यूनतम उम्र महिला के बराबर 18 वर्ष करने का सुझाव दिया है। वैसे विधि आयोग इस सुझाव को उलट ढंग से भी कह सकता था। यानी महिला की शादी की न्यूनतम आयु पुरुषों के बराबर 21 वर्ष कर देनी चाहिए। लेकिन पुरुषों को महिला के बराबर शादी की न्यूनतम आयु निर्धारित करने का सुझाव देने से आशय लैंगिक असमानता की तरफ ध्यान खींचना से ज्यादा है। ‘पति और पत्नी के लिए उम्र में अंतर करने का कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि शादी कर रहे दोनों लोग हर तरह से बराबर हैं और उनकी साझेदारी बराबर वालों के बीच वाली होनी चाहिए।’ विधि आयोग का यह कथन समाज में व्याप्त उस नजरिए पर चोट करता है जिसमें शादी के लिए निर्धारित मापदंडों में लड़की को हर लिहाज से छोटा या कमतर होना ही चाहिए। कानूनी रूप से शादी के लिए निर्धारित उम्र में महिला और पुरुष का भेद नहीं होना चाहिए। इसीलिए विधि आयोग आगे जोड़ता है कि ‘अगर बालिग होने की सार्वभौमिक उम्र (18 वर्ष) को मान्यता है, जो सभी नागरिकों को अपनी सरकारें चुनने का अधिकार देती हैं, तो निश्चित रूप से, उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने में सक्षम समझा जाना चाहिए।’

विधि आयोग का यह सुझाव आज मौजू हो सकता है। जिस बात का कोई वैज्ञानिक आधार ही न हो, उसे कानूनी जामा क्यों पहनाया जाए? शादी के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएं चाहे कुछ भी हों, कम से कम कानूनी रूप से तो शादी के लिए महिला और पुरुष की आयु में अंतर नहीं करना चाहिए। सामाजिक रूप से हमारे अंदर लिंग भेद काम करता है, इसलिए हम बाल विवाह जैसा गैर कानूनी काम भी बड़े पैमाने पर करते हैं। यहीं कारण है कि देश में 33 प्रतिशत बाल बधुएं हैं, यानी हर तीसरी बालिका वधु हमारे ही देश की है। हमारा समाज और कानून एक लड़की को 18 की उम्र में ही शादी के लिए परिपक्व मान लेता है, जबकि लड़कों को नहीं। ऐसा कैसे हो सकता है? जबकि दोनों की परवरिश एक ही समय और समाज हो रही होती है। अगर थोड़ी सक्रीयता और सूक्ष्मता से इस बात की पड़ताल की जाए, तो अपने आसपास ही हम इस बात को बढ़ावा देते नजर आते हैं कि एक लड़की शादी के लिए जल्दी परिपक्व हो जाती है। एक बच्ची के पैदा होते ही हम उसकी तुलना उसी के हमउम्र बच्चे (लड़के) करते हुए यह जरूर कहते हैं कि बच्ची छह महीने में ही चलने लगती हैं, बच्ची काफी चंचल होती हैं, बच्ची बहुत जल्दी मुस्कुराने लगती हैं, इस तरह की तमाम तरह की दूसरी बातें भी। हमें जानकर हैरानी होती है कि इन सब बातों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है। ये सभी लोकमान्यताएं हैं। और इसी के प्रभाव में आकर हम बहुत सी गलत बातों को ठोस आधार प्रदान कर देते हैं।


Gender Bias
2014 में मद्रास हाईकोर्ट ने लड़कियों की मानसिक परिपक्वता के संबंध में कुछ जरूरी सवाल किए थे और उनकी शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाने के सुझाव दिया था। घर से गायब हुई एक लड़की के संबंध में दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका की सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि लड़कों के लिए शादी की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है, जबकि लड़कियों के लिए 18 है। 17 साल की उम्र तक दोनों एक जैसे ही वातावरण में बड़े होते हैं, तो फिर लड़कियों को 18 वर्ष की उम्र में लड़कों के मुकाबले अधिक परिपक्व कैसे माना जा सकता है? इसी क्रम में उन्होंने आगे कहा था कि 18 वर्ष की उम्र में लड़कियां स्कूटर चला सकती हैं या नौकरी पा सकती हैं, पर इसकी तुलना शादी के लिए आवश्यक मानसिक परिपक्वता से नहीं की जा सकती है। इसी तरह फरवरी, 2017 में राष्ट्रीय जनसंख्या स्थिरीकरण विधेयक में महिलाओं की शादी की उम्र 18 से बढ़ाकर 21 करने का प्रस्ताव किया गया था। यह एक निजी विधेयक था, जिसे तृणमूल कांग्रेस के विवेक गुप्ता ने राज्य सभा में पेश किया था। वहीं बिहार के तत्कालिक मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने विवाह की उम्र 25 वर्ष करने की पैरवी की थी। जनता की अदालत में पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा था कि मुझे लगता है कि सदियों पुरानी आश्रम प्रणाली परंपरा के अनुसार महिला और पुरुष दोनों की विवाह की आयु 25 वर्ष देनी चाहिए। (भारतीय परंपरा में 25 वर्ष के बाद गृहस्थ आश्रम में प्रवेश को उचित माना गया है।) इसके पीछे पूर्व मुख्यमंत्री का मानना था कि विवाह की उम्र को बढ़ाकर 25 वर्ष कर देने से समाज में महिलाओं और बच्चों में व्याप्त खराब स्वास्थ्य और कुपोषण जैसी समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है।

लड़कियों की शादी की उम्र कम रखे जाने से आधी आबादी का भारी नुकसान तो होता ही है, साथ ही समाज का स्वस्थ और विकसित निमार्ण में बाधा आती है। पिछले साल जारी एक्शन एड इंडिया संस्था की रिपोर्ट की माने तो देश में 18 साल से कम उम्र में होने वाली 10.3 करोड़ भारतीयों में से करीब 8.52 करोड़ की संख्या लड़कियों की है। इससे लड़कियों का स्वास्थ्य, शिक्षा तो खराब होता ही है, आने वाली हमारी भावी पीढ़ी पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। उनकी आने वाली संतानें न केवल कुपोषण का शिकार होती हैं, बल्कि वे अपना और अपने परिवार का जीवन स्तर उठाने में नाकामयाब रहती हैं। शिशु एवं मातृ मुत्यु दर में इजाफा के मूल में कम उम्र में विवाह एक बड़ा कारण है। इसी रिपोर्ट की माने तो बालिकाओं के बाल विवाह रोकने से तकरीबन 27 हजार नवजातों, 55 हजार शिशुओं की मौत और 1,60,000 बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है।

देश में लड़कियों  की शादी की उम्र 18 साल निर्धारित है, पर आज भी करीब 10.3 करोड़ भारतीयों की शादी अठारह साल से पहले हो जाती है। ऐसे में समझा जा सकता है कि समस्या की जड़ कहां है। अमूमन विश्व भर में लड़कियों और लड़कों की शादी की न्यूनतम आयु में अंतर रखा गया है। कुछ देशों में दोंनों की विवाह की उम्र बराबर है तो कुछ में पुरुषों की आयु महिला की तुलना में अधिक रखी गई है। देश जैसे भूटान, म्यांमार, आस्ट्रेलिया इजरायल, इराक, फ्रांस आदि में महिला और पुरुष की शादी की न्यूनतम आयु बराबर रखी गई है। चीन में महिला और पुरुष की शादी की न्यूनतम आयु क्रमश: 20 और 22 रखी गई है। इस तरह समझा जा सकता है कि शादी को लेकर यह भेदभाव विश्वव्यापी है। अब जब विधि आयोग ने इस तरह की सिफारिश की है, तो इस पर गंभीरता से सोचने और लैंगिक भेदभाव को दूर करने के साथ-साथ इसके कई अच्छे परिणामों पर विचार करने के अवसर के रूप में देखना आवश्यक है।