शनिवार, 15 दिसंबर 2018

देश का पहला महिला मॉल

केरल के कोझीकोड जिले के बीचोबीच स्थापित पांच मंजिला कुदुंबश्री महिला मॉल की विशेषता यह है कि यहां महिलाओं से संबंधित सभी प्रकार की वस्तुएं और सेवाएं उपलब्ध होंगी। और इनको उपलब्ध कराने वाली सभी महिला कर्मचारी ही होंगी। बताने वाली सबसे बड़ी खूबी यह भी है कि इतने बड़े उद्यम को खड़ा करने वाली भी सभी दस महिलाएं ही हैं। कुदुंबश्री महिला मॉल कोझीकोड कॉरपोरेशन कुदुंबश्री का प्रोजेक्ट था जिसे कोझीकोड डिस्ट्रिक कुदुंबश्री मिशन के सहयोग से पूरा किया गया है। कोझीकोड कॉरपोरेशन कुदुंबश्री के तहत उन दस महिलाओं के साहस को धन्यवाद देना चाहिए जिन्होंने इतनी बड़ी योजना के बारे न केवल सोचा, बल्कि उसे मूर्तरूप भी दिया। इस मॉल की परिकल्पना में 36 हजार स्क्वायर फीट की जगह पर 60 दुकानें हैं, जहां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कम से कम 300 महिलाओं को रोजगार मिलेगा। इस मॉल की देखभाल और प्रशासन महिलाओं के हाथों में ही रहेगा। मॉल का सारा स्टॉफ भी महिला होंगी। इस मॉल में सुपर मॉर्केट, फूडकोर्ट, ड्राई क्लीनिंग, कार वॉशिंग, हैंडीक्रॉफ्ट, बेबी केयर, विभिन्न घरेलू सामान और बुक स्टॉल होंगे। इन सबके अतिरिक्त यहां भविष्य में कांफ्रेंस रूम, ट्रेनिंग सेंटर और कार पार्किंग की सुविधाएं देने की योजना भी हैं।
देश की महिलाओं के लिए यह एक उत्साहवर्द्धक खबर है, इसलिए नहीं कि देश में एक ऐसा मॉल है जहां महिलाओं से संबंधित सभी तरह का सामान और सेवाएं उपलब्ध होंगी और देरसबेर ऐसा मॉल हमारे आसपास भी खुल जाएगा, जहां हम जा सकेंगी। वास्तव में महिलाओं के लिए यह खबर इसलिए उत्साहवर्द्धक है कि यह एक ऐसा मॉल या उद्यम है जिसे न केवल महिलाओं ने मिलजुल कर स्थापित किया है, बल्कि उसे चलाने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं। यही बात इस खबर में निहित है, जिसे महिलाओं को समझना होगा। देश में महिलाएं अपना खुद का बिजनेस खोलने और चलाने के लिए ज्यादा उत्सुक नहीं रहती हैं। इसके बहुत से सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं। अगर ग्रामीण स्तर पर बात की जाए तो कृषि और पशुपालन के जरिए अपनी घरेलू आमदनी बढ़ाने तक सीमित हो जाता है। शहरों में महिला उद्यमियों की बात की जाए तो वे अपने घरों में कुछ सेवाएं देने का काम शुरू कर देती हैं। वास्तव में हमारी सामाजिक संरचना के चलते महिलाएं भी अपना बिजनेस खड़ा करने से अधिक एक निश्चित घंटों के लिए जॉब पर जाना अधिक पसंद करती हैं।ऐसी परिस्थतियों में बिजनेस करना उनके लिए अधिक जोखिम वाला हो जाता है। एक बिजनेस उनका अधिक समय और समर्पण मांगता है। हमारी सामाजिक संरचना में जहां महिलाओं को घरेलू जिम्मेदारी के लिए भी फुल टाइम जिम्मेदार माना जाता है, वहां महिलाएं इस तरह का जोखिम उठाने के लिए खुद को असमर्थ पाती हैं।
केरल महिला साक्षरता और महिला उद्यमियों की दृष्टि से संवर्द्धक राज्य है। पर देश के बहुत से इलाकों में महिलाएं अपना उद्यम लगाने के बारे में सोचती तक नहीं हैं। हां, उन्हें अपने कॅरियर की दृष्टि और आर्थिक परेशानी होने पर वे कहीं नौकरी कर पैसे कमाने के बारे में ज्यादा उत्सुक रहती हैं। जिस तरह महिला अपने कॅरियर के बारे में सोचें और उस पर अमल भी करें, यह बात भारतीय परिवेश में जुदा बात होती है, उसी तरह महिलाएं अपना उद्यम खोले और चलाएं यह भी समाज के लिए अनोखी बात होती है। सवाल है कि महिला उद्यमशीलता पर इतना जोर क्यों दिया जाना चाहिए? विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संथानों का मानना है कि यदि देश की श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर हो जाए, तो देश की जीडीपी में ढाई प्रतिशत तक का उछाल देखा जा सकेगा। जीडीपी के अतिरिक्त महिलाओं की इस तरह भागीदारी सामाजिक चेतना का भी निर्माण करती है, जो देश को समग्र रूप से आगे ले जाने का काम करेगी। पिछले साल इन्हीं दिनों यानी नवंबर, 2017 को महिला उद्यमियों के बारे में देश में शीटवर्क डॉट कॉम ने एक शोध किया। इसके अनुसार महिलाएं उद्यमी हों, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके यहां महिला कितनी शिक्षित और जागरुक हैं। इसके अध्ययन से पता चलता है कि देश के दक्षिण के राज्य जैसे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल,पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में सबसे अधिक लघु और मध्यम तरह की महिला उद्यमियों को देखा गया है। इसका कारण यहां महिला शिक्षा की उच्च दर और महिला सशक्तिकरण बताया गया।
इसी तरह नार्थ-ईस्ट के राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड में भी अन्य राज्यों की तुलना में महिला उद्यमी कम, पर पुरुषों के मुकाबले यहां महिला उद्यमी अधिक पाई गईं। इसी तरह इस शोध से यह भी पता लगाया कि लगभग 80 फीसदी महिला उद्यमियों ने अपना बिजनेस अपने पैसों से खकेरल के कोझीकोड जिले के बीचोबीच स्थापित पांच मंजिला कुदुंबश्री महिला मॉल की विशेषता यह है कि यहां महिलाओं से संबंधित सभी प्रकार की वस्तुएं और सेवाएं उपलब्ध होंगी। और इनको उपलब्ध कराने वाली सभी महिला कर्मचारी ही होंगी। बताने वाली सबसे बड़ी खूबी यह भी है कि इतने बड़े उद्यम को खड़ा करने वाली भी सभी दस महिलाएं ही हैं। कुदुंबश्री महिला मॉल कोझीकोड कॉरपोरेशन कुदुंबश्री का प्रोजेक्ट था जिसे कोझीकोड डिस्ट्रिक कुदुंबश्री मिशन के सहयोग से पूरा किया गया है। कोझीकोड कॉरपोरेशन कुदुंबश्री के तहत उन दस महिलाओं के साहस को धन्यवाद देना चाहिए जिन्होंने इतनी बड़ी योजना के बारे न केवल सोचा, बल्कि उसे मूर्तरूप भी दिया। इस मॉल की परिकल्पना में 36 हजार स्क्वायर फीट की जगह पर 60 दुकानें हैं, जहां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कम से कम 300 महिलाओं को रोजगार मिलेगा। इस मॉल की देखभाल और प्रशासन महिलाओं के हाथों में ही रहेगा। मॉल का सारा स्टॉफ भी महिला होंगी। इस मॉल में सुपर मॉर्केट, फूडकोर्ट, ड्राई क्लीनिंग, कार वॉशिंग, हैंडीक्रॉफ्ट, बेबी केयर, विभिन्न घरेलू सामान और बुक स्टॉल होंगे। इन सबके अतिरिक्त यहां भविष्य में कांफ्रेंस रूम, ट्रेनिंग सेंटर और कार पार्किंग की सुविधाएं देने की योजना भी हैं।
देश की महिलाओं के लिए यह एक उत्साहवर्द्धक खबर है, इसलिए नहीं कि देश में एक ऐसा मॉल है जहां महिलाओं से संबंधित सभी तरह का सामान और सेवाएं उपलब्ध होंगी और देरसबेर ऐसा मॉल हमारे आसपास भी खुल जाएगा, जहां हम जा सकेंगी। वास्तव में महिलाओं के लिए यह खबर इसलिए उत्साहवर्द्धक है कि यह एक ऐसा मॉल या उद्यम है जिसे न केवल महिलाओं ने मिलजुल कर स्थापित किया है, बल्कि उसे चलाने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं। यही बात इस खबर में निहित है, जिसे महिलाओं को समझना होगा। देश में महिलाएं अपना खुद का बिजनेस खोलने और चलाने के लिए ज्यादा उत्सुक नहीं रहती हैं। इसके बहुत से सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं। अगर ग्रामीण स्तर पर बात की जाए तो कृषि और पशुपालन के जरिए अपनी घरेलू आमदनी बढ़ाने तक सीमित हो जाता है। शहरों में महिला उद्यमियों की बात की जाए तो वे अपने घरों में कुछ सेवाएं देने का काम शुरू कर देती हैं। वास्तव में हमारी सामाजिक संरचना के चलते महिलाएं भी अपना बिजनेस खड़ा करने से अधिक एक निश्चित घंटों के लिए जॉब पर जाना अधिक पसंद करती हैं।ऐसी परिस्थतियों में बिजनेस करना उनके लिए अधिक जोखिम वाला हो जाता है। एक बिजनेस उनका अधिक समय और समर्पण मांगता है। हमारी सामाजिक संरचना में जहां महिलाओं को घरेलू जिम्मेदारी के लिए भी फुल टाइम जिम्मेदार माना जाता है, वहां महिलाएं इस तरह का जोखिम उठाने के लिए खुद को असमर्थ पाती हैं।
केरल महिला साक्षरता और महिला उद्यमियों की दृष्टि से संवर्द्धक राज्य है। पर देश के बहुत से इलाकों में महिलाएं अपना उद्यम लगाने के बारे में सोचती तक नहीं हैं। हां, उन्हें अपने कॅरियर की दृष्टि और आर्थिक परेशानी होने पर वे कहीं नौकरी कर पैसे कमाने के बारे में ज्यादा उत्सुक रहती हैं। जिस तरह महिला अपने कॅरियर के बारे में सोचें और उस पर अमल भी करें, यह बात भारतीय परिवेश में जुदा बात होती है, उसी तरह महिलाएं अपना उद्यम खोले और चलाएं यह भी समाज के लिए अनोखी बात होती है। सवाल है कि महिला उद्यमशीलता पर इतना जोर क्यों दिया जाना चाहिए? विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संथानों का मानना है कि यदि देश की श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर हो जाए, तो देश की जीडीपी में ढाई प्रतिशत तक का उछाल देखा जा सकेगा। जीडीपी के अतिरिक्त महिलाओं की इस तरह भागीदारी सामाजिक चेतना का भी निर्माण करती है, जो देश को समग्र रूप से आगे ले जाने का काम करेगी। पिछले साल इन्हीं दिनों यानी नवंबर, 2017 को महिला उद्यमियों के बारे में देश में शीटवर्क डॉट कॉम ने एक शोध किया। इसके अनुसार महिलाएं उद्यमी हों, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके यहां महिला कितनी शिक्षित और जागरुक हैं। इसके अध्ययन से पता चलता है कि देश के दक्षिण के राज्य जैसे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल,पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में सबसे अधिक लघु और मध्यम तरह की महिला उद्यमियों को देखा गया है। इसका कारण यहां महिला शिक्षा की उच्च दर और महिला सशक्तिकरण बताया गया।
इसी तरह नार्थ-ईस्ट के राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड में भी अन्य राज्यों की तुलना में महिला उद्यमी कम, पर पुरुषों के मुकाबले यहां महिला उद्यमी अधिक पाई गईं। इसी तरह इस शोध से यह भी पता लगाया कि लगभग 80 फीसदी महिला उद्यमियों ने अपना बिजनेस अपने पैसों से खड़ा किया या बहुत कम स्तर पर सरकारी स्कीमों, जो महिला उद्यमियों को अपना बिजनेस खड़ा करने में मदद देती हैं, की मदद से खड़ा किया। इस कारण शायद इन योजनाओं के बारे में बहुत कम जानकारी होना था। साथ ही इसमें यह भी बताया गया कि देश में गोवा, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, राजस्थान और पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं, जहां सबसे अधिक योजनाएं इस संदर्भ में बनाई गई। जिसका परिणाम आज हमें दिख भी रहा है। इसलिए कहना न होगा कि देश में महिला उद्यमियों की अधिक संख्या हम देखना चाहते हैं तो शिक्षा जागरुकता के साथ-साथ महिला उद्यमियों को प्रेरित करने वाली नीतियों की जरुरत हैं। तभी देश के हर कोने में महिला मॉल जैसी योजनाएं मूर्तरूप में दिखेगीं।


मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

उड़ान भरने की बेकरारी

कोई भी वाहन चलाना वैसे ही महिलाओं के लिए जोखिम वाला काम माना जाता हैऐसे में हवा में कुलांचे भरने को क्या कहा जाए। इसे आश्चर्य ही कहा जाएगा कि देश में महिला पायलटों की संख्या विश्व में सबसे अधिक हो गई है। इस पर हमें गर्व होना चाहिए कि यह संख्या महिला पायलटों के वैश्विक औसत से भी अधिक है। अमेरिकाब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों में जहां हमारे देश की तुलना में उड्डयन अधिक विस्तृत हैवहां की तुलना में हमारी महिला पायलटों की अधिक संख्या होना एक दूसरी कहानी कहता है।

हाल ही में इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ विमिन एयरलाइन पायलट्स ने पायलटों के संदर्भ में अपने नवीन आंकड़ें जारी किए हैं। इससे पता चलता है कि देश में कुल 8,797 पायलट हैंइनमें से1,092 महिला पायलट हैं। इन महिला पायलटों में से 385 कैप्टन के पद पर हैं। विश्व में हमारी महिला पायलटों की हैसियत का अंदाजा आकड़ों के विश्लेषण से और अधिक चलता है। विश्व में कुल 1.5 लाख पायलट हैंजिनमें से 8,061 महिला पायलट हैं। पुरुषों की तुलना में महिला पायलटों की यह संख्या 12.4 फीसदी बैठती है जिसमें भारतीय महिला पायलटों का प्रतिशत 5.4 है। देश में महिला पायलटों की संख्या पिछले चार सालों में लगभग दोगुनी हो चुकी है। 2014 में घरेलू विमानन कंपनियों के 5,050 पायलटों में 586 महिला पायलट थीं। देश की एक बड़ी विमान कंपनी इंडिगो एयरलाइन में जहां 2013 में महिला पायलटों की संख्या सिर्फ 69 थीवह आज 300 पार कर गई है। कामोबेश आज स्पाइसजेटगो एयरवेज और जेट एयरवेज के महिला पायलटों की संख्या में कई गुना वृद्धि हो चुकी है। एयर इंडिया में भी पिछले चार-पांच वर्षों में 25 से 35 फीसदी के लगभग महिला पायलटों की संख्या में वृद्धि हुई है।
महिलाओं का किसी वाहन को चलाना देश-दुनिया में आश्चर्य का विषय रहा है। चाहे वह साइकिल होस्कूटर होबस होरेल होया फिर हवाई जहाज। आज मैट्रो सिटीज और छोटे शहरों में निजी वाहन चलाना आमतौर पर देखा जाता हैपर आज भी किसी सार्वजनिक वाहन चलाती एक स्त्री को देखना कइयों को सुखद आश्चर्य दे जाता है। समय के साथ महिलाओं का विभिन्न क्षेत्रों में जितना हस्ताक्षेप बढ़ा है, उसमें महिलाओं का किसी लड़ाकू विमान का उड़ाना भी आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए। फिर भी महिला चालकों को शक की निगाह से देखा जाता है। उन पर उतना भरोसा नहीं किया जाता है, जितना पुरुष चालकों पर किया जाता है। प्रीति कुमारी पश्चिम रेलवे की पहली महिला ड्राइवर हैं। जब उन्हें 2010 में मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली शहरी रेल सेवा में ट्रेनें दौड़ाने की जिम्मेदारी दी गईतब उन्होंने एक बात कही कि मुझे अन्य चालकों से अधिक मेहनत करनी होगी, ताकि कभी कोई यह न कह सके कि वे महिला थीं, इसलिए गड़बड़ी हो गई। इसी तरह मुंबई की 45 वर्षीय मुमताज एमकाजी जिन्हें एशिया की पहली महिला डीजल इंजन चालक होने का गौरव प्राप्त हो चुका हैउन्हें एक रेलवे ड्राइवर बनने के लिए खुद अपने पिता का विरोध झेलना पड़ा। जबकि उनके पिता स्वयं एक वरिष्ठ रेलवे कर्मचारी थे। तो मुद्दा महिलाओं पर विश्वास करने का है।
इन सबके बावजूद सेना में महिलाएं को लड़ाकू विमान उड़ाने की अनुमति मिल गई है। इंडियन एयरफोर्स में इस वक्त करीब एक सैकड़ा महिला पायलट मौजूद हैं। यहां महिलाओं को हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट उड़ाने की ही अनुमति है। इसी तरह नेवी में भी पुरुष वर्चस्व तोड़कर महिलाएं नौसेना में टोही विमानों में तैनात हो रही हैं। पर वे जंग में नहीं जा सकेंगी। धीरे-धीरे ही सही महिलाएं ऐसे क्षेत्रों में अपनी भूमिका मजबूत करने की ओर बढ़ रही हैंजहां कभी पुरुषों का वर्चस्व माना जाता था। यह क्या कम है कि आज महिलाएं ऐसे सपने देखने के लिए स्वतंत्र हैं, जहां जाने के लिए कभी वे सपने भी नहीं देख सकती थीं।

शनिवार, 17 नवंबर 2018

चुटकी भर सिंदूर की कीमत

छठ त्यौहार
हिन्दू पौराणिक कथाओं में स्त्रियों के सौभाग्य का सूचक सिंदूर के बारे में ऐसी कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। जिनके माध्यम इस बात को स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि सौभाग्य यानी पति की लंबी आयु के लिए सिंदूर क्यों धारण किया जाता है। सिंदूर का संदर्भ केवल शादीशुदा महिलाओं से ही होता है, इसलिए गैर शादीशुदा स्त्री के लिए सिंदूर का कोई अर्थ नहीं होता है और विधवाओं के लिए सिंदूर का कोई अर्थ रह नहीं जाता। इसी बात से स्त्रीवादी महिलाओं को आपत्ति होती है। उनका शादीशुदा स्त्री के माथे पर सजा सिंदूर का अर्थ पुरुष की गुलामी, स्वामी भक्ति ही निकाला जाता है।

इसी आपत्ति के चलते साहित्यकार, हिन्दी अकादमी की उपाध्यक्ष, स्त्री मुद्दों पर खुलकर लिखने वाली प्रखर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने छठ त्यौहार के दौरान बिहार की महिलाओं द्वारा नाक से लेकर माथे तक लगाए जानेवाले सिंदूर पर सवाल उठा दिए। सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा कि छठ के त्यौहार में बिहार वासिनी स्त्रियां मांग माथे के अलावा नाक पर भी सिंदूर क्यों पोत लेती हैं? कोई खास वजह होती है क्या? उनका इतना पूछना ही था कि चारों तरफ से महिलाओं के सिंदूर धारण को लेकर प्रतिक्रियाएं आने लगी। यह प्रतिक्रियाएं इतनी तीखी थीं कि किसी अपमान-सम्मान की परवाह शेष नहीं बची रह गई थी। सिंदूरया सिंदूर जैसे दूसरे सुहाग चिन्हों को पहनने को लेकर औचित्य-अनौचित्य सिद्ध किए जाने लगे। मामले को तूल पकड़ते देखकर मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी टिप्पणी फेसबुक से हटा ली। हालांकि उन्होंने अपना पक्ष नहीं छोड़ा और लिखा कि सिंदूर की सुनहरी डिबिया संहाले रहीं यशोधरा और चले गए सिद्धार्थ। सीता ने सहेजा अशोक वाटिका तक सिंदूर, मिली अग्निपरीक्षा और फिर अपमानित निष्कासन। राज्य का सब कुछ लुट गया, बचा ली छोटी सी सिंदूरदानी तो भी नल-दमयंती को सोती हुई छोड़ गए तरू के नीचे…। कितनी सुहागिन स्त्रियों को बरबाद होने से बचा पाया है सिंदूर? मैंने नहीं किया विवाह सिंदूर की खातिर, नहीं सहेजी कभी सिंदूर की डिबिया, नहीं सजाई मांग सिंदूरी रंग से। उसको नहीं माना वर, सुहाग और पति परमेश्वर। वह मेरे सुख-दुख का साथी है, सहचर है। प्रेम मोहब्बत और विश्वास के साथ हम एक संग हैं।

यह विचार मैत्रेयी पुष्पा के अपने हैं, बहुत सी महिलाएं उनके इस तरह के विचारों से इत्तेफाक रखती होगीं। और जाहिर है कि वे अपने इन विचारों अपने ऊपर लागू भी करती होंगी, लेकिन सब लोग यही माने, यह तोजरूरी नहीं? व्यक्तिगत स्वतंत्रता तो यही कहती है। हम अपने लोक, संस्कृति या धर्म के विश्वास मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए धर्म आस्था में विश्वास रखने वाली महिलाओं ने मैत्रेयी पुष्पा की सिंदूर पर प्रश्न उठाती इन बातों से इत्तेफाक न रखते हुए अपनी आस्थाओं पर अपना विश्वास दिखाया। और वे दिखाती आ भी रही हैं। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि सुगाह चिन्हों को धारण करने से कोई ‘गुलाम या स्वामी भक्त’ हो जाता है। वे इसे पति के प्रति प्रेम ही मानती हैं। यह मानने के लिए वे स्वतंत्र भी हैं।

मैत्रेयी पुष्पा का सवाल आस्थाओं से जुड़ा सवाल था। आस्थाएं व्यक्तिगत होती हैं। आस्थाएं जन्म से जुड़ी भी होती हैं, जो इंसान के जन्म लेते उसके साथ हो लेती हैं। इसी तरह स्त्रियों के जन्म लेते ही कई तरह कीमान्यताएं उनसे स्वत: जुड़ जाती हैं, उसी तरह विवाह और विवाह से जुड़ी मान्यताएं और आस्थाएं हैं। अब यह कितनी भेदभाव वाली है भी, नहीं भी हैं, यह अलग-अलग मान्यताओं और आस्थाओं के चलते अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग हो सकती हैं। इसीलिए जब एक स्त्री के श्रृंगार को सुहाग और सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है, और इन पर आस्था न रखने वाली स्त्रियों को मानने के लिए बाध्य किया जाता है, तो प्रश्न उठते हैं। ये ‘मानना पड़ना’ ही सवाल उठाने को मजबूर करता है, फिर चाहे आप उन्हें कितनी ही वैज्ञानिक कारणों से जोड़कर बताइए-समझाइए। परंपरावादी यह कहकर इस प्रश्न से अलग नहीं हो सकते कि आप मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र है। आप चाहे तो शादी के बाद मंगलसूत्र या सिंदूर धारण न करें। पर क्या समाज के सिस्टम के अंदर रह रही एक स्त्री के लिए यह संभव हो सकता है? इसका जवाब हमें अपने आसपास तलाशना होगा।

महिलावादी स्त्रियों की अपनी आपत्तियां हैं। आज नेट पर जाने कितने लिंक इस बात के लिए मिल जाएंगे कि मांग में सिंदूर लगाने से कितने साइंसटिफिक लाभ एक स्त्री को हो सकते हैं। सवाल यह है कि जब इसके इतने अधिक लाभ हैं, तो समाज के हर व्यक्ति के लिए सिंदूर लगाना जरूरी होना चाहिए था? कुछ नहीं तो शादीशुदा पुरुष तो इसे लगा ही सकते हैं। उन्हें इसके लाभ से वंचित क्यों रखा गया? आज शरीर को अलंकृत करने वाले आभूषण तक पुरुष त्याग चुके हैं। कान में कुंडल और पैर के आभूषण कभी कोई भी पुरुष पहने हुए नहीं दिखता। बात सुविधा की है। इसलिए जो सुविधाजनक था, वह उन्होंने अपना लिया। पर यह छूट स्त्रियों को कहां हैं? बात साफ है कि चीजों को आस्था से जोड़ दीजिए, प्रश्न उठने की संभावना कम हो जाएगी। इन सब के बीच क्या इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है कि दूसरों की आस्थाओं का सम्मान न किया जाए?

…किया जाना चाहिए। आस्थाओं से ही परंपराएं पलती हैं और परंपराओं से संस्कृति बनती है। किसी की संस्कृति और आस्थाओं को ठेस पहुंचाने का हक किसी को नहीं होना चाहिए। मैत्रेयी पुष्पा प्रश्न करने का हक रखती हैं पर वे ‘सिंदूर पोतने’ जैसे शब्दों का प्रयोग करके कहीं अधिक ठेस पहुंचा जाती हैं। वे लेखिका हैं, संवेदनशील लेखिका हैं, शब्दों के चुनाव को बखूबी समझती हैं। साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा के सवाल पर दीप्ति गुप्ता नेकाफी अच्छे तरह से लिखा है कि आपकी तरह अन्य स्त्रियों को भी अपनी मान्यताओं, आस्थाओं और विश्वास को संजोने का हक है। आप किसी की आस्था पर प्रश्न चिन्ह मत लगाइए। याद रखिए कि आस्थाएं तर्कों से अधिक ताकतवर होती हैं और उनसे निकली प्रार्थनाएं अद्भुत परिणाम देती हैं। सो आस्थाओं को तोड़ना किसी के वश में नहीं है। उनकी नींव बड़ी गहरी होती है और उन पर टिका विश्वास सघन होता है।

सोशल मीडिया पर यह बहस अभी भी चल रही है और शायद अगले साल जब छठ पूजा फिर से मनाई जा रही हो, तब कोई फिर से सिंदूर या किसी और परंपरा पर सवाल उठा दे। लोग फिर इस बहस में शामिल होंगे, तर्क-वितर्क करेगें, दूसरे के विचारों को जानेगें-समझेगें और अपने-अपने काम में लग जाएंगे। जरूरी नहीं कि किसी बहस के बाद हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचें ही, लेकिन बहस के दौरान हम विचार-विमर्श तक जरूर पहुंच जाते हैं। विचार के लिए जरूरी तत्वों की खोज हो जाती है। रही बात किसी निष्कर्ष की, तो लोग अपनी-अपनी विचार ग्राह्य शक्ति से अपनी मंजिल तक पहुंच सकते हैं, इस बात की संभावना किसी भी बहस के अंत में पूरी होती है।

(पिछले वर्ष युगवार्ता सप्ताहिक में छठ पूजा के दौरान प्रकाशित एक लेख का अंश)

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

क्या महिलाओं का कोई धर्म नहीं?

sabarimala ayyappa temple
देश की सबसे बड़ी अदालत ने प्रतिबंधित उम्र ग्रुप की महिलाओं को असमानाता, महिलाओं की गरिमा के खिलाफ को आधार बनाकर सबरीमाला में दर्शन की अनुमति प्रदान कर दी, तो स्वयं महिलाएं ही आंदोलन में उतर आईं। सड़क पर उतरीं इन महिलाओं ने न केवल मंदिर में प्रवेश लेने को उत्सुक महिलाओं की समझाइस की, बल्कि येनकेन प्रकारेण उन्हें रोकने की कोशिश में सफल भी रहीं। वे ऐसा करती भी क्यों न, आखिर महिलाओं ने ही इस परंपरा को लिखित-अलिखित रूप से अपनी बेटियों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया हैं। और इनका इरादा भी इसे आगे ले जाने का है। बगैर इस बात को जाने-समझे कि देश के अनगिनत समुदायों में मासिक धर्म पूजने और उत्सव मनाने कारण है, अपवित्रता का नहीं।

सदियां बीतने के साथ महिलाओं की उर्वरक शक्ति अपवित्रता, छुआछूत में कब बदल जाती है, कि इसे लेकर महिलाओं के अंदर शर्म, झिझक, डर जैसे तत्व प्रवेश कर गए। इस बात को सबरीमाला में प्रवेश को लेकर महिलाओं का विरोध स्वयं बताता है। सबरीमाला जैसा पवित्र स्थान ही क्यों, इस अपवित्रता के चलते घर में स्थित पूजा घर, व्रत-त्योहारों में महिलाएं प्रतिबंधित या सीमित हो जाती हैं। कामोबेश अधिकतर धर्मां में इस अवस्था में पवित्र स्थानों पर जाने की मनाही होती है। ऐसा नहीं है कि यह अपवित्रता ही महिलाओं को तमाम धार्मिक कार्य करने से रोकती है। वास्तव में ऐसी अनगिनत परंपराएं हैं जिन्हें आधार बनाकर धर्म के अधिकांश कार्यों से उन्हें वंचित कर दिया जाता है।

कहते हैं कि सबरीमाला वाले भगवान अयप्पा ब्रम्हचारी हैं, इसलिए 10 से 50 वर्ष की उम्र वाली महिलाओं को उनसे दूर रहना चाहिए। केरल के ही पद्मनाथ स्वामी मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। विश्व के सबसे धनी इस मंदिर के बारे में यह माना जाता है कि महिलाओं के इस हिस्से में प्रवेश से मंदिर के खजाने को बुरी नजर लग जाएगी। अहमदाबाद स्थित शनि शिंगनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के प्रतिबंध के संबंध में कहा जाता था कि मूर्ति के सामने आने पर हानिकारक तरंगें निकलती हैं, अत: महिलाओं को यहां प्रवेश नहीं करना चाहिए। इसी तरह कोल्हापुर स्थित 1400 साल पुराने महालक्ष्मी मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी। जिसे आंदोलन के बाद समाप्त किया गया। यही समस्या नासिक के त्रंयबकेश्वर मंदिर में भी है। इस मंदिर में शिव लिंग की पूजा का अधिकार महिलाओं को नहीं है। इसकी वजह गर्भगृह में निकलने वाला विकिरण बताया जाता हैं, जो महिलाओं के लिए नुकसानदेह हैं। नासिक के कपालेश्वर मंदिर में निचली जाति की महिलाओं का गर्भगृह में प्रवेश पर प्रतिबंध था। देश के तमाम मंदिरों और पवित्र स्थलों में अलग-अलग कारणों से पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध महिलाओं पर लगा हुआ है। इस क्रम में पुणे के म्हस्कोबा मंदिर, असम का पटबौसी सत्र मंदिर, बीड का मारूती मंदिर, पुष्कर का कार्तिकेय मंदिर, रनकपुर के जैन मंदिर या देश की राजधानी दिल्ली में स्थिति निजामुद्दीन औलिया जैसी अन्य दरगाहों में महिलाओं का किसी न किसी रूप में प्रवेश निषिद्ध है।

सबरीमाला मंदिर विवादकिसी भी धर्म में पैगम्बर महिला नहीं हैं। गौतम बुद्ध ने बहुत विचार-विमर्श के बाद मठों में महिलाओं को प्रवेश दिया था। मंदिर में पुजारी महिला नहीं दिखती हैं। (अपवादस्वरूप किन्हीं देवस्थानों में हैं। जैसे मनकामेश्वर मंदिर, लखनऊ की महंत दिव्यागिरि हैं।) किसी भी मंदिर का समस्त कामकाज पुरुष पुजारियों के हवाले रहता है। चाहे वह देवीस्थान ही क्यों न हो। कई मस्जिदों में महिलाएं नमाज पढ़ने नहीं जा सकती। देश में निजामुद्दीन औलिया, अजमेर शरीफ और श्रीनगर के हजरतबल की दरगाह के मकबरों तक महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है। रोमन कैथोलिक महिलाएं पादरी नहीं बन सकतीं। पारसी महिलाएं गैर धर्म में विवाह के बाद अपने सभी धार्मिक अधिकारों से वंचित कर दी जाती हैं, जबकि पुरुषों अधिकार उसी तरह से जायज होते हैं। (पारसी समुदाय की गुलरुख के. गुप्ता ने इस संदर्भ में एक लंबी लड़ाई लड़कर हाल ही में जीती है।) पारसी पुरुष के शादी करने वाली महिला भी फायर टेम्पल में प्रवेश नहीं कर सकती है, जबकि पुरुष कर सकता है। इस बात को हाल ही में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने बयां किया, जिन्होंने एक पारसी समुदाय के व्यक्ति जुबिन ईरानी से विवाह किया है।

इन सब उदाहरणों से समझा जा सकता है कि इन सभी बड़े और चर्चित देवस्थानों पर प्रतिबंधों का अपना एक इतिहास है, जो बगैर किसी तर्कशास्त्र के बदस्तूर जारी है। जिसे कुछ मुट्ठीभर लोग आस्था के नाम पर संचालित कर रहे हैं। किसी भी पवित्र स्थान में लगे ये प्रतिबंध को किसी न किसी अनहोनी से जोड़कर लोगों को डराया जाता है। हाल ही केरल में जब बाढ़ ने तबाही मचाई, तब इसे भगवान अयप्पा के क्रोध से जोड़ दिया गया। प्रश्न है कि किसी न किसी बहाने से इन तमाम तरह के पवित्र स्थानों पर महिलाओं के प्रवेश को इतना प्रतिबंधित क्यों किया गया है? क्या महिलाएं कम धार्मिक हैं या वे धर्म के अनुष्ठानों और व्याख्यानों को समझने में असमर्थ हैं? क्या उनमें श्रद्धा कम है? या इन सबसे अलग कोई कारण है, जिससे आस्था में उनकी बेदखली जारी है। कहीं धर्म पुरुष सत्तात्मक तो नहीं है जो किसी न किसी बहाने आधी आबादी को इससे दूर रखना चाहता है, जिससे धर्म पर उसकी सत्ता कायम रहे।

सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

#मीटू : आखिरकार गुबार फूट ही पड़ा

central minister menka gandhi
तनुश्री और नाना के विवाद ने बहुत सी महिलाओं को यह हिम्मत दी कि यही सबसे ठीक समय है, जब वे अपनी घुटन से छुटकारा पा सकती हैं। तनुश्री से हिम्मत लेकर लेखिका और निर्देशिका विंता नंदा ने जब अभिनेता और संस्कारी बाबूजी के नाम से लोकप्रिय आलोकनाथ के बारे में विस्तार से लिखा, तो लोगों का आश्चर्यचकित हो जाना लाजिमी था। बीस साल पहले हुए विंता के यौन उत्पीड़न के बाद जिस तरह से एक के बाद एक मामले सामने आए, उससे आलोक नाथ की एक दूसरी छवि ही लोगों ने देख ली। इसी तरह तनुश्री के माध्यम से समाजसेवी नाना पाटेकर एक दूसरा स्वरूप लोगों के सामने आया। तनुश्री के समर्थन में कंगना ने जब विकास बहल पर अपनी बात रखी, तब ‘क्वीन’ जैसी वुमेन ओरिएंटेड फिल्म बनाने वाले व्यक्ति का एक और ही चेहरा सामने आया। इसी क्रम में पत्रकारिता के क्षेत्र से एक प्रमुख नाम एम.जे. अकबर का आया है। अब तक उन पर 15 महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। टेलीग्राफ, एशियन ऐज और इंडिया टुडे के शीर्ष पदों पर रहने के बाद आज वे केंद्र सरकार में विदेश राजमंत्री भी हैं।

गौर करने वाली बात है कि जिन पर भी आरोप लग रहे हैं, वे सब अपने-अपने क्षेत्रों में एक बड़ा नाम है। इन सभी पर जो आरोप लगे हैं, वे कई-कई साल पुराने हैं। जिसका अब खुलासा किया जा रहा है। इसी कारण कथित पीड़ितों से यह सवाल किया जा रहा है कि वे उस समय चुप क्यों रहीं? सवाल वाजिब भी है। फिर भी प्रश्न यह है कि हमने महिलाओं को कभी ऐसी सुविधा और माहौल दिया ही नहीं कि वे अपनी बात घर या समाज में सभी के सामने बेखौफ रख सकें। हमारे समाज में संभ्रात घरों की महिलाएं तो कुछ दशकों पहले ही काम पर निकली हैं। खेतों पर, कारखानों में महिलाओं का एक बड़ा वर्ग काम करता रहा है। वहां उनके साथ यौन उत्पीड़न से लेकर आर्थिक शोषण बड़ी आम बात रही है। बॉलीवुड में ‘मिर्च मसाला’ जैसी कुछ ही फिल्मों में इस बात को बखूबी चित्रण किया गया है। आज भी पुरुष सत्ता घर हो या बाहर, महिलाओं के श्रम और शरीर पर अपना ही नियंत्रण चाहता है। इसके लिए कई तरह के जाल बुने जाते रहे हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि फिल्म, राजनीति, खेल, अकादमी, कला, कॉरपोरेट जैसे तमाम क्षेत्रों में ख्याति अर्जित करने वाले मठाधीश बहुत कुछ कंट्रोल करने की हैसियत रखते हैं। वे किसी का कुछ बना भी सकते हैं और किसी का कुछ बिगाड़ भी सकते हैं। मीटू इंडिया आंदोलन पर केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने एक सवाल के जवाब पर कहा कि ताकतवर पदों पर बैठे पुरुष अक्सर ऐसा करते हैं। यह बात मीडिया, राजनीति और यहां तक कि कॉरपोरेट के वरिष्ठ अधिकारियों पर भी लागू होती है। यही बात हॉलीवुड के मीटू अभियान पर प्रसिद्ध अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने कही थी, वह भी गौर करने वाली है। उन्होंने कहा था कि ऐसी बहुत सी कहानियां हमारे सामने आने वाली हैं, क्योंकि यह सिर्फ सेक्सुअलिटी या सेक्स की बात नहीं है, यह पॉवर की बात है। इस पॉवर के तहत हमारी इंडस्ट्री में किसी भी औरत को काम के लिए कम्प्रोमाइज करने को कहा जाता है। अगर वह इसके लिए राजी नहीं होती है, तो उसे डराया जाता है। हॉलीवुड में #मीटू अभियान के बाद जब हार्वे वाइंस्टीन को गिरफ्तार कर लिया गया, तब इस मामले में अदालत में अभियोजन पक्ष ने स्पष्ट कहा कि वाइंस्टीन ने युवतियों को राजी करने के लिए अपनी हैसियत और ताकत का इस्तेमाल इस तरह से किया कि वह उनका यौन शोषण कर सकें।

दिल्ली के निर्भया कांड के बाद जिस मुखरता से देश में यौन हिंसा और उत्पीड़न के विरोध में अवाजें उठीं, उसके बाद कानूनी रूप से महिलाएं काफी मजबूत हुई हैं। बिशाखा गाइड लाइंस के बाद सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वीमन एट वर्कप्लेस एक्ट भी बना। पर इससे उन पर होने वाली यौन और दूसरी हिंसा कम हुई हो, ऐसा नहीं है। आंकड़े इसी बात की चुगली भी करते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार देश में 2010 में 22,000 बलात्कार के केस दर्ज हुए, वहीं 2014 में बढ़कर 36,000 हो गए यानी 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। एनसीआरबी ने ही 2016 में बताया कि बलात्कार के 95.5 केस में पीड़िता रेपिस्ट को जानती थी। ताजा आंकड़ों में 2016 में ही 4,437 बलात्कार के केस दर्ज हुए थे। इसी से समझा जा सकता है कि महिलाओं के प्रति यौन उत्पीड़न, शारीरिक हमले, विदेश में लड़कियां भेजना, पति और संबंधियों द्वारा हिंसा, अपहरण के बाद बलात्कार और हत्या के सभी प्रकार के मामले मिलाकर कितने होंगे?

भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान महज 27 (2012 में) फीसदी ही है। भारत विकास रपट मई-2017 में विश्व बैंक ने देश को सुझाव दिया कि अगर विकास दर सात फीसदी से अधिक चाहिए, तो महिलाओं की भागीदारी बढ़ाएं। विश्व बैंक का मानना है कि ऐसा करने पर देश की विकास दर पर एक फीसदी का इजाफा हो सकता है। पर हम हैं कि महिलाओं को काम करने का एक स्वच्छ माहौल ही नहीं दे सकें हैं। जून, 2016 को एसोचैम ने अपने एक अध्ययन में बताया कि पिछले एक दशक में संपूर्ण श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी 10 फीसदी घटकर निचले स्तर पर पहुंच गई है। दूसरी तरफ यूएन इकोनॉमिक एंड सोशल कमीशन फॉर एशिया एंड पैसेफिक का अध्ययन बताता है कि महिला श्रम बल भागीदारी दर में 10 फीसदी वृद्धि से ही जीडीपी में 0.3 फीसदी का उछाल मिल सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि देश में महिलाओं का श्रम बल अनुपात बढ़ाने के लिए नीतियां और कार्यक्रम लागू किए जाए। पर नहीं, हम महिला श्रम का शोषण करने में भी बहुत आगे हैं। देश में महिलाओं को मिलने वाला वेतन पुरुषों के मुकाबले औसतन 18.8 फीसदी कम हैं। यह कमी वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है। ये अध्ययन तो कॉरपोरेट जैसे संगठित क्षेत्र में किया गया, असंगठित क्षेत्रों में क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे में मीटू के जरिए अपनी कहानी बताने वाली महिलाओं से सवाल पूछना कहा तक उचित है कि पहले क्यों नहीं बताया?

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

तनुश्री से सवाल पूछने से पहले

#metoo campaign
नो एक शब्द ही नहीं, अपने आप में पूरा वाक्य है योरऑनर। इसे किसी तर्क, स्पष्टीकरण या व्याख्या की जरूरत नहीं है। ‘न’ का मतलब ‘न’ ही होता है योरऑनर। ’
‘न मैं नाना पाटेकर हूं और न तनुश्री, तो मैं आपके सवाल का जवाब कैसे दे सकता हूं।’

ऊपर लिखी यह दोनों लाइनें फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन ने बोली हैं। पहली लाइन फिल्म ‘पिंक’ में एक बलात्कार की शिकार लड़की का केस लड़ते हुए और दूसरी लाइन अभिनेत्री तनुश्री और नाना पाटेकर विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कही। मामला एक ही तरह का है, पर रील और रियल लाइफ का अंतर है। वास्तव में रील और रियल लाइफ में यही फर्क होता है। अगर तनुश्री और नाना पाटेकर विवाद रियल लाइफ में न होकर सिनेमा के लिए फिल्माया गया एक दृश्य जैसा होता तो? तो सदी के महानायक पुरजोर वकालत करके यह केस जीत लेते और फिल्म ‘हिट’ हो जाती। चूंकि मामला फिल्म का नहीं है, इसलिए वे बड़े ही ‘बेशर्म’ तरीके से इस सवाल से बच निकलते हैं। खैर, सदी के महानायक की छोड़िए, दरियादिल सलमान खान की बात कर लें। जब एक प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकार ने इस विवाद पर सलमान की प्रतिक्रिया जाननी चाही, तब ‘आप किस इवेंट में आई हैं मैडम।’ कहकर न केवल महिला पत्रकार का उपहास किया, बल्कि इस मामले को हल्का कर दिया।

हमारी हीरो और नायकों वाली इंडस्ट्री के ‘हीरो’ सिर्फ फिल्मों में ही गरीब, मजलूमों और महिलाओं के लिए लड़ते दिखते हैं, फिल्म से बाहर वे उतने ही साधारण व्यक्ति होते हैं, जितने हमारे आसपास का कोई सामान्य इंसान। इसलिए तनुश्री जैसी किसी भी अभिनेत्री को सदी के महानायक और दरियादिल सलमान खान से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। न ही उन लोगों से कोई उम्मीद होनी चाहिए, जो यह कहते नजर आ रहे हैं कि उसी समय क्यों नहीं बोलीं। या यह प्रसिद्धि पाने का एक आसान तरीका है। अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता है जब तेलुगू अभिनेत्री श्री रेड्डी को कास्टिंग काउच और अपने साथ हुए यौन शोषण के विरोध में सरेआम निर्वस्त्र होकर प्रोटेस्ट करना पड़ा। तब भी यही सवाल चारों तरफ तैरतें नजर आए। आखिरकार श्री रेड्डी के मामले के सामने आने के बाद कई और अभिनेत्रियों ने अपना मुंह खोला और सब कुछ ढका-छिपा क्रिस्टल की तरह साफ नजर आने लगा। यही हाल आज इस बॉलीवुड का है। सब कुछ ढका-छिपा है। अगर कोई अपना मुंह खोलता भी है, तो बजाए उसकी गंभीरता के समझने के, उल्टा उसी का ट्रायल शुरू हो जाता है। कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इस मामले में भी सवाल तनुश्री से ही किए जा रहे हैं, नाना से नहीं।

हमें तनुश्री की इस बात की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने अपने साथ हुए उस वाकये पर न उस समय चुप रहीं और न आज चुप हैं। आज वे जिस आत्मविश्वास के साथ मुखर होकर अपनी बात मीडिया में रख रही हैं, उस हिम्मत को पाने में उन बीते दस साल का योगदान भी है, जिसे उन्होंने इस दर्द के साथ जिया है। आज तनुश्री पर वैसे ही हमले हो रहे हैं, जैसा श्री रेड्डी पर हुए थे। पर इस समाज की महिलाओं के प्रति जड़ता और माइंडसेट को क्या कहा जाए, जो सारे सवाल तनुश्री से ही कर रहा है। तनुश्री से ही गवाह और सुबूत मांग रहा है। तनुश्री को ही सिद्ध करना पड़ रहा है कि ज्यादती उसके साथ हुई है। यह एक सभ्य समाज की निशानी कैसे हो सकती है जहां पीड़िता को ही सिद्ध करना पड़े कि उसके साथ कुछ गलत हुआ था। इस मामले पर केद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि ‘पहले क्यों नहीं कहा’ का सवाल लोगों ने तब भी पूछा था, जब हॉलीवुड निर्देशक हार्वे विंस्टीन के खिलाफ बोला गया था। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पीड़तिा कब सामने आती है। मैं जानती हूं कि जब आपके शरीर पर हमला होता है, तो यह आपको हमेशा याद रहता है।

बॉलीवुड महिला और महिला चरित्रों को लेकर स्टीरियो टाइप रहा है। हर इंडस्ट्री की तरह बॉलीवुड भी पुरुष प्रधान है। आज भी यहां महिलाओं को पेमेंट से लेकर रोल तक में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। आज भी इस इंडस्ट्री में महिला निर्देशक गिनती की हैं। उनका अनुभव बताता है कि कैसे उन्हें ‘जज’ किया जाता है। पहले भी और आज भी फिल्मों और मॉडलिंग के क्षेत्र को लड़कियों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। सवाल है कि ऐसा क्यों है? जब इस क्षेत्र में पढ़े-लिखे जहीन लोग काम कर रहे हैं, तो महिला के काम को खराब क्यों समझा जाता है? कहीं सामान्य लोगों की यही समझ बॉलीवुड में काम करने वालों की भी तो नहीं है। दुर्भाग्य है कि ऐसा ही है। तभी वह इस इंडस्ट्री में काम करने वाली महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाते हैं। वे उनके अस्तित्व को उसी तरह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं होता है, जिस तरह वे अपनी घर की महिलाओं के बारे में सोचते हैं। यहीं अंतर ही इस इंडस्ट्री में काम करने वाली महिलाओं को यौन उत्पीड़न और काटिंग काउच के रूप में भुगतना पड़ता है।

हमारा सिनेमा (बॉलीवुड) शताब्दी पार कर गया है। यहां महिलाओं (अभिनेत्रियों और दूसरे काम करने वाली महिलाएं) के शोषण का इतिहास भी इतना ही पुराना हो चुका है। भारतीय सिनेमा में महिलाओं के लिए द्वार खोलने वाली बांग्ला स्टार अभिनेत्री कानन देवी ने अपनी आत्मकथा में सेक्सुअल हैरेसमेंट और दुर्व्यहार के बारे में लिखा है। बाद में इन्होंने महिला कलाकारों की मदद के लिए एक संस्था महिला शिल्पी महल की स्थापना भी इसी वजह से की। लीजेंड गजल गायिका बेगम अख्तर की कहानी तो अत्यंत दर्दभरी है। बिहार के एक राजा ने किशोरावस्था में ही उनकी कला की प्रशंसा के बहाने उनका बलात्कार किया। जिसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव उन पर ताउम्र रहा। ये कुछ ऐसी सच्चाइयां हैं, जो लोगों के सामने आ पाई। वरना ऐसी बहुत सी कहानियां इस इंडस्ट्री में दफ्न पड़ी हैं। यह केवल तनुश्री की लड़ाई नहीं है, यह बॉलीवुड की बहुत सी तनुश्रीयों की लड़ाई है, जिसे उन्हें खुद ही लड़नी पड़ेगी। इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की बात ठीक लगती है कि भारत में भी हमें हैशटैग मीटू जैसा अभियान शुरु करने की जरूरत है।

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

यौन अपराधियों का तैयार होगा निजी रिकार्ड

metooमहिलाओं की सुरक्षा एक अहम मामला है। मामला अहम इसलिए भी है क्योंकि देश में महिलाओं, किशोरियों और बच्चियों के खिलाफ अपराधों में किसी भी स्तर पर कमी नहीं आई है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इसकी काफी समय से चर्चा भी चल रही थी। सरकार यौन अपराधियों का निजी रिकॉर्ड बनाकर एक डेटाबेस तैयार कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सेक्सुअल ऑफेंडर्स यानी एनआरएसओ को हरी झंडी दिखा दी है। अब यौन अपराधियों से जुड़ी निजी व बॉयोमेट्रिक जानकारियों का एक डेटाबेस तैयार किया जाएगा। इस डेटाबेस में यौन अपराधियों का नाम, उनकी फोटो, पता, उंगलियों की छाप, डीएनए के साक्ष्य और उनका आधार व पैन नंबर शामिल किया जाएगा। इन सारी जानकारियों से लैस इस डेटाबेस से किसी भी यौन अपराधी की सभी जानकारी पलक झपकते प्राप्त हो जाया करेंगी। इस डाटा को रजिस्टर करने का काम राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी कर रहा है। फिलहाल इसका उपयोग जांच एजेंसियां ही कर सकेंगी।

इस डेटाबेस को तैयार करने के लाभ क्या होंगे? इस आपराधिक रिकॉर्ड में फिलहाल बलात्कार, गैंगरेप, बच्चों के साथ यौन अपराध करने वाले और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने वाले लगभग 4,40,000 लोगों की जानकारी रखी जाएगी। जब इस डेटाबेस में शामिल कोई भी अपराधी फिर से अपराध में लिप्त पाया जाएगा, तो वह इसके माध्यम से तुरंत पहचान में आ जाएगा। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यौन अपराध में शामिल कई व्यक्ति जमानत पर छूटने या जेल से बाहर आने के बाद फिर से वही अपराध करते पकड़े गए हैं। देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में वृद्धि ही हो रही है। इसे एनसीआरबी की वार्षिक रिपोर्ट-2016 से समझा जा सकता है। एनसीआरबी की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि महिलाओं के खिलाफ 2015-16 में हुए अपराधों में 2.9 फीसदी की वृद्धि हुई। जहां 2015 में महिलाओं के खिलाफ 3,29,243 अपराध के मामले हुए, वहीं 2016 में 3,38,954 अपराध दर्ज किए गए। इस तरह के अपराधों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले हर किस्म के अपराध और हिंसा शामिल हैं। इसी तरह केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने जुलाई में राज्य सभा में बताया था कि देश में 2016 में 38,947 बलात्कार के मामले दर्ज हुए। वहीं 2015 में 34,651 केस और 2014 में 36,735 बलात्कार के केस दर्ज किए गए। कुल मिलाकर 2014-16 तक देश में 1,10,333 यौन हिंसा के केस दर्ज किए गए।

यौन अपराधियों का इस तरह का डेटाबेस तैयार करने वाला भारत दुनिया का नौवां देश बन गया है। अपने देश के अतिरिक्त दुनिया में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, कनाडा, आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और त्रिनिदाद टोबैगो में भी यौन अपराधियों का डेटाबेस रखा जाता है। देश में इस तरह की नेशनल रजिस्टर ऑफ सेक्सुअल ऑफेंडर्स बनाने के लिए चेंज डॉट ऑर्ग नामक वेबसाइट में एक याचिका लगाकर अभियान भी तीन साल पहले शुरू हुआ था। इस अभियान को शुरू करने वाली मडोना रुजेरियो जेनसन का मानना था कि यदि भारत में इस तरह के यौन अपराधियों के डाटा को एक जगह पर इकट्ठा कर लिया जाता है, तो पुलिस के लिए सीरियल अपराधियों को पकड़ना कहीं अधिक सरल हो जाएगा। इस याचिका को अब तक 90,671 लोगों का समर्थन मिला है। अब जब सरकार ने इस काम को आगे बढ़ा दिया है, तो इस तरह के छोटे-छोटे प्रयासों की अहमियत बढ़ जाती है।

इस अच्छे फैसले के खिलाफ कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। पहला तो यही कि इससे यौन अपराध में शामिल व्यक्तियों को सजा भुगतने के बाद जीवनयापन में कठिनाई आ सकती है या उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। दूसरा यह कि इस तरह के डेटाबेस तैयार करने के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कितनी कमी आ सकेगी? यह डेटाबेस तभी उपयोगी होगा, जब एक ही व्यक्ति पुन: अपराध करे। एनसीआरबी की वार्षिक रिपोर्ट-2016 बताती है कि फिर से अपराध करने वालों की संख्या 6.4 फीसदी है। यह आंकड़ा सभी प्रकार के अपराधों में से निकाला गया है। इसमें यौन अपराधियों का प्रतिशत कितना होगा, इसका अलग से विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए अपर्याप्त आंकड़ों के प्रकाश में इस तरह के डेटाबेस का महत्व बहुत अधिक नहीं दिख पा रहा है। एक पक्ष यह भी है कि महिलाओं के खिलाफ यौन या दूसरों अपराधों में उनके जान-पहचान और करीबी रिश्तेदार शामिल होते हैं जिनकी या तो रिपोर्ट दर्ज ही नहीं कराई जाती है या फिर दर्ज होती है, तो डेटाबेस में नाम रजिस्टर होने के डर से परिजनों पर दबाव और भी बढ़ सकता है। संभावना है कि इस तरह के मामले दर्ज होने में और भी कठिनाई न आ जाए। इन सब शंकाओं के बावजूद इसे महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जाना चाहिए।