शनिवार, 22 मई 2021

‘गुरु को ईर्ष्या नहीं, असुरक्षा फील होती है’


फिल्म आवर्तनगुरु-शिष्य परंपरा बनी है जिसमें गुरु-शिष्य के बीच कई पीढ़ियों से चले आ रहे संबंधों को लेकर बनाया गया है। फिल्म की कहानी और निर्देशन दुर्बा सहाय का है। फिल्म में मुख्य भूमिका मशहूर कथक नृत्यांगना शोवना नारायण ने की है। हाल ही में फिल्म आवर्तनआईएफएफआई एवं आईएफएफटी दिखाई गई है। दुर्बा सहाय कहानी लेखन, पटकथा लेखक और थिएटर में एक जाना-पहचाना नाम है। उन्होंने फिल्म निर्देशन की शुरूआत दपेनसे की थी। इसके बाद कई शाॅर्ट फिल्में बनाई जिनमें से ऐन अननोन गेस्ट, द मैकेनिक, पेटल्स, पतंग जैसी फिल्मों ने लोगों का ध्यान खींचा। आवर्तनउनकी पहली फीचर फिल्म है। फिल्म को लेकर दुर्बा सहाय के अनुभव और रचना प्रक्रिया के बारे में बात की प्रतिभा कुशवाहा ने।

 

इस फिल्म को बनाने का ख्याल कैसे आया। क्या किसी प्रकार की कोई प्रेरणा काम कर रही थी।

हां, प्रेरणा तो थी ही। क्या होता है कि आइडियाज अचानक से आते हैं और चले भी जाते है। तुम इस पर कुछ लिखो या बनाओ। चूंकि मैं फिल्म मेकिंग से बहुत समय से जुड़ी हुई हूं, तो मुझे लगा कि गुरु-शिष्य परंपरा पर भी एक शाॅर्ट फिल्म बनाते हैं। तो जब लिखने लगी तो लिखते-लिखते लगा कि इस पर शाॅर्ट फिल्म नहीं बन सकती। यह फीचर फिल्म बनेगी क्योंकि कहानी चारों तरफ से अपने फंख फैला रही थी।

लीड रोल के लिए शोवना नारायण का ही चुनाव आपने क्यों किया। उनके साथ काम का कैसा अनुभव रहा आपका

गुरु-शिष्य परंपरा के लिए मैंने एक डांसर को ही चुना वैसे मैं किसी पेंटर, किसी सिंगर के गुरु को भी चुन सकती थी, पर मुझे डांस से बहुत अधिक लगाव है खासकर कथक से बहुत ज्यादा। तो जब मैं लिख रही थी तभी मुझे लगा कि शोवना जी से अच्छा कौन नृत्यांगना हो सकती हैं। शोवना जी मेरी मित्र भी है इसलिए कहानी देखते ही उन्होंने हां कर दिया। पर उनकी हां के बाद मुझे तो दस दिन तक नींद ही नहीं आई कि मैं उनसे एक्टिंग कैसे कराउंगी। फिर मैंने साहस बटोरा कि चलो, जिनको-जिनको लिया है,

उनसे रिहर्सल के द्वारा हम अपना लक्ष्य पा लेंगे। तो हम रोज ही रिहर्सल करते थे एक-एक डाॅयलाॅग पर काम करते थे कि कैसे करना है। फिर उसमें डांस कितना होगा। एक लेखक होने के नाते मेरा डर था कि फिल्म में डांस हाॅवी न हो जाए। कहानी कहीं छुप न जाए। तो इसे बैलेंस रखने के लिए मुझे बहुत काम करना पड़ा। तीन महीने हमने इन्हीं सब बातों में काम किया। फिर फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। सुषमा सेठ ने फिल्म में शोवना जी के गुरु का रोल किया है। फिल्म में दो-चार पीढ़ी की गुरु शिष्य परंपरा को दिखाया गया है। सितारा देवी, गौहर जान सभी के फुटेज शामिल किये गये है। फिल्म की शुरूआत सितारा देवी को दिखाते हुए ही शुरू होती है।

यह फिल्म गुरु-शिष्य रिश्ते के चक्र को दर्शाती है। एक गुरु अपने शिष्य के संरक्षक के रूप में काम करता है यही कारण है कि शिष्य अपने गुरु पर आगाध विश्वास करते हैं। क्या यह संभव है कि एक गुरु के मन में अपने शिष्य की सफलता को लेकर ईर्ष्या हो जाए।

नहीं, ईर्ष्या नहीं होती है असुरक्षा फील होती है। इसे मानवीय स्वभाव कह सकते हैं, पर ऐसा नहीं है कि यह हमेशा के लिए हो। थोडे वक्त के बाद उतर जाता है। एक बार हंस संपादक राजेंद्र यादव जी से मैंने पूछा था कि आप जिन लोगों से इतना पीछे पड़कर लिखवाते हैं, जब वे आपसे अच्छा लिख लेते हैं तब आपको जलन नहीं होती है। वे बहुत देर के बाद सोचकर बोले कि ईर्ष्या तो नहीं होती है, हां असुरक्षा महसूस होती है। फिर भी हम उससे कहते है कि इससे भी अच्छा लिखो और अपने फंख फैलाकर उड़ जाओ। तो राजेंद्र जी की यह बात भी कहीं न कहीं मेरे दिमाग में बनी रही।

यह फिल्म अब तक कहां-कहां प्रदर्शित हो चुकी है।

यह फिल्म इंडियन पैनोरमा फीचर फिल्म सेक्शन के तहत 51वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव गोवा में और अभी हाल ही में 16वें थ्रिसुर (आईएफएफटी) गई थी। आगे यह कोलंबो में प्रदर्शित होगी। यह फेस्टिवल केवल महिला फिल्म निर्देशकों की फिल्मों पर होता है। साथ ही नेशनल अवार्ड के लिए भी भेज रखा है। 

आपने अभी तक काफी शार्ट मूवी बनाई है, यह आपकी पहली फीचर फिल्म है। इन दोनों माध्यमों को लेकर आपकी राय क्या है।

एक छोटी फिल्म बनाने में भी उतनी मेहनत है जितनी एक बड़ी फिल्म बनाने में। बल्कि छोटे स्पेस में अपनी बात कहना ज्यादा मुश्किल होता है। लांग स्टोरी और शार्ट स्टोरी में जो अंतर होता है, वही फिल्म निर्माण में होता है।

इस फील्ड में महिला-पुरुष निर्देशक के फिल्मांकन की संवेदनशीलता में कोई अंतर पाती हैं।

नहीं ऐसा नहीं है। पुरुष निर्देशक भी पूरी संवेदनशीलता से अपना काम करते हैं। 

आगे आप किन चीजों पर काम करने जा रही है।

-विचार तो कई चल रहे है। सोच रही हूं कि पहले कहानी लिखूं, बहुत दिन हो गए हैं कहानी लिखे। फिल्मों के बारे में फिर देखते हैं।

शनिवार, 8 मई 2021

‘मेरे पास मेरा अपना स्त्रीवाद है’

पांच दशकों से अपने लेखन से पाठकों का दिल जीतने वाली कथाकार-उपन्यासकार-व्यंग्यकार वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यबाला को हाल ही में भारत भारती सम्मान से नवाजा गया है। भारत भारती उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का सबसे बड़ा पुरस्कार है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जन्मीं सूर्यबाला को साहित्य जगत में पहचान मेरे संधि-पत्रसे मिली। उनकी कहानियों में एक मध्यमर्गीय स्वतंत्रचेता स्त्रियों का चित्रण बखूबी मिलता है। उनकी कहानियों की स्त्री स्वाभिमान और विवेक से लबरेज है। वह समाज से विद्रोह करती है, पर खुद के लिए नहीं, दूसरों के लिए। मुखर स्त्री विमर्श के इस दौर में सूर्यबाला का स्त्री विमर्श स्त्रीभाव से जुड़ा हुआ है। कथा लेखन के साथ-साथ उनकी कलम व्यंग्य लेखन में भी खूब चली है। कौन देस को वासी, वेणु के डायरीके बाद इस समय वे अपने संस्मरणात्मक लेखों पर काम कर रही हैं। पिछले दिनों उनके साहित्यिक अवदान पर उनसे बात की प्रतिभा कुशवाहा ने। प्रस्तुत है इसके महत्वपूर्ण अंश।


अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे में कुछ बताएं। कैसे शुरू हुई आपकी लेखकीय यात्रा।

बहुत बचपन से ही मुझे लगने लगा था कि मेरे अंदर कुछ कविता सी बन रही है। घर लोगों को छंद-चैपाई कहते हुए सुनती थी तो लगा कि मैं भी कविता कह सकती हूं। बाद में स्कूल की पत्रिका में छपी मैं। उत्तर प्रदेश का एक पत्र था आज। उसमें मेरी किशोरवय की कविताएं और कहानियां प्रकाशित हुईं।

आपको पहचान दिलाने वाली रचना कौन सी थी।

शादी के बाद लिखना छूट गया और मैं अपनी गृहस्थी में डूब गई थी पर मेरा पढ़ना जारी था। मैं ढेर सारी पत्र-पत्रिकाएं मगाया करती थी। उनमें सारिका में एक कहानी पढ़ने के बाद मैंने प्रतिक्रिया लिखी और सारिका के संपादक कमलेश्वर जी को भेज दी। एक महीने बाद कमलेश्वर जी का लिखा पत्र आया। पत्र में लिखा था कि सूर्यबाला जी, आपकी रचना ;पत्रद्ध मिली और रचना में निहित व्यंग्य को पढ़कर लगा कि अगर आप लिखे तो हिन्दी को बहुत अच्छी रचनाएं मिल सकती हैं। इस पत्र ने मेरे लेखकीय जीवन के लिए एक लाइटहाउस का काम किया। मेरी जो अब तक आधी-अधूरी रचनाएं पड़ी हुई थीं, मैंने उन्हें बटोरा, और उनमें से एक को पूरा करके कमलेश्वर जी को भेज दिया। उन्होंने मेरी कहानी जीजीआगामी महिला कथाकार अंक के लिए स्वीकृत कर ली। यह 1972 की बात है। इसके तीन महीने बाद एक व्यंग्य धर्मयुग के होली अंक में प्रकाशित हुआ। इस तरह सिलसिला चल निकला।

 

आपकी कहानियों में आत्मचेतस और चेतना सम्पन्न स्त्रियों के कई रूप दिखते हैं, पर बहुत आधुनिक किस्म की महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम है जबकि आप मुबंई जैसी मायानगरी में काफी समय से रह रही हैं।

मैं विचारों की आधुनिकता पर विश्वास करती हूं, खानपान, कपड़े, फैशन की आधुनिकता पर नहीं। अगर आप इस कसौटी पर मेरी कहानियों की स्त्रियों को कसेगीं, तो आपको निराश ही होना पड़ेगा। मेरी स्त्रियां बहुत स्वाभिमानी हैं। वे न कभी गलत चीज को स्वीकारती हैं, न गलत कदम उठाती हैं, न गलत समझौता करती हैं। वे सर्पण करती हैं, समझौता करती हैं, विद्रोह में खड़ी भी होती हैं, लेकिन अपने लिए नहीं दूसरों के लिए। वे लेने में नहीं देने में विश्वास करती हैं। मेरा मानना है कि हम देने का सुख भूल गए है। हमारे अंदर जो आनंद का स्रोत है वह देने में है। आज की दुनिया में प्राप्ति और लूट की होड़ मची है। आप जरा किसी के लिए कुछ करके देखिये। बहुत छोटी-छोटी चीजें, छोटी सी मदद, छोटी सी सहानुभूति फिर देखिए कि आपको कितना अच्छा लगता है। हमने वह खुशी गंवा दी है इस छंद्म आधुनिकता के लिए। मेरी कहानियों की स्त्रियों के बारे में लोग पूछते हैं कि ये आदमकद महिलाएं आपको कहां मिलीं। मुझे अपने जीवन में मिली हैं ऐसी महिलाएं। अभी भी मेरे पास ऐसी स्त्रियां है कि जिनके बारे में मैं लिखूंगी तो लोग उन्हें विश्वसनीय नहीं मानेगें। धर्मयुग में प्रकाशित मेरा पहला उपन्यास संधिपत्र था, जिसके कारण मैं घर-घर जानी गई। तो उसकी नायिका शिवा के बारे में समीक्षकों का कहना था कि क्या स्त्री है एकदम दयनीय है, समझौते पर समझौता करती जा रही है। विद्रोह करना आता नहीं। तो यह वह बहुत ही बचकानी बात है। समझदार लोग कहते हैं कि शिवा का चरित्र बहुत ही सशक्त और समृद्ध है, वह स्वयं अपने निर्णय लेती है।

तो फिर आपके अनुसार एक स्त्री की स्वतंत्रता क्या है।

स्वतंत्रता बहुत सारे दायित्वों और कर्तव्यों से बंधी होती है। स्वतंत्रता की भावना बहुत ही मूल्यवान है। इसलिए उतनी ही सावधानी से रखनी होती है। इस स्वतंत्रता की रक्षा हमें खुद ही करनी है। हमें बहुत विवके और सावधानी से ख्याल रखना होगा कि कहीं हमारी स्वतंत्रता किसी दूसरे की स्वतंत्रता में बाधा न बन जाए। यही असली स्वतंत्रता है।

एक लेखिका होने के नाते क्या आप खुद को महिलावादी मानती हैं।

मैं तो नहीं मानती हूं पर लोग मानते हैं। इससे मुझे कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि मेरे पास मेरा अपना स्त्रीवाद है। यह स्त्रीवाद स्त्री भाव से जुड़ा हुआ है। यह स्त्री की अस्मिता, गरिमा, विवेक स्त्री की वास्तविक शक्ति है। आज स्त्री अपनी इस वास्तविक शक्ति को भूला बैठी है। स्त्री बाहरी शक्ति की भूल-भुलैया में अपनी शक्ति और सामथ्र्य तलाश रही है वह अपनी आंतरिक शक्ति की राह से भटक गई है।

क्या दलित विमर्श की तरह स्त्री विमर्श जरूरी है?

बिलकुल जरूरी है। विमर्श से तमाम विचार आते है और इन विचारों से विमर्श आगे बढ़ता है। इससे हम परस्पर लाभान्वित होते हैं। एक सैधांतकीय भी बनती है पर समस्या तब आती है, जब हम एक विचार को बाजार दे देते हैं। जब हम विचार को ही बेचने लगते हैं, वहां परेशानी आती है।

क्या आपको लगता है कि आज स्त्रीविमर्श बाजारवाद के प्रभाव के चलते देह विमर्श तक सीमित होकर रह गया है?

बिलकुल। पर सब नहीं। क्या होता है कि गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है। स्त्री लेखन तो बंग महिला के समय से हो ही रहा है। पर कोई चीज जब बहुत अधिक लोकप्रिय होने लगती है, तो उसकी डिमाण्ड बढ़ने लगती है, सप्लाई भी बढ़ती है। जब सप्लाई बहुत अधिक बढ़ने लगती है वह चीज प्रदूषित हो जाती है। तो यह विमर्श अपने रास्ते से भटक गया। इसलिए मैं डंके की चोट पर कहती हूं कि स्त्री विमर्श ने स्त्री लेखन को सीमित किया है। एक फ्रेम में जकड़ दिया है। स्त्री इतनी गहरी और जटिल है कि वहां तक पहुंचने की कोशिश होती तो ठीक होता। इसके कारण वह एक बने-बनाए घेरे में कैद होकर रह गया है। विमर्शो के आधार पर कहानियां लिखी जाने लगीं। सबसे ज्यादा घातक यह हुआ कि कहानियों पर विमर्श होने से ज्यादा विमर्शों पर कहानियां होने लगीं। एक बने-बनाए पैटर्न पर कहानियां लिखी जाने लगीं।

क्या आप स्त्री लेखन और पुरूष लेखन दृष्टि में कोई अंतर पाती हैं?

दो स्त्रियां लिखेगी, तो भी अंतर होगा। सामान्यतः रचनाकार रचनाकार होता है, स्त्री-पुरूष नहीं होता है। कोंकणी में दामोदर मौजो है जिन्होंने प्रसव वेदना पर लिखा है। मैं मानती हूं कि एक रचनाकार जब दूसरों के दुखों और सुखों की बावड़ी डूबता है तब लिखता है। हां, यहां आपका मतलब मूलतः स्त्री प्रकृत चीजों को कैसे पकड़ते हैं, तो उतना अंतर हो सकता है।

 

व्यंग्य लेखन के मामले में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम दिखता है।

नहीं, अब नहीं है ऐसा। अगर इसे बड़बोलापन न माना जाए तो मैं कहना चाहूंगी कि मेरे समय में मैं और एक अलका पाठक ही व्यंग्य लिख रही थीं।

क्या महिलाओं का रूझान कम है या क्या व्यंग्य लेखिका को पाठक समाज गंभीरता से नहीं लेता है।

आज पहले की तुलना में बहुत ज्यादा महिलाएं व्यंग्य लेखन कर रही हैं। फिर भी उनकी संख्या पुरूषों की तुलना में कम है। वे व्यंग्य लेखन में अपने पैर जमाने की कोशिश भी कर रही हैं लेकिन कर कितना पाती हैं यह भविष्य बताएगा।

अगर स्त्रियां व्यंग्य लेखन में उतरे तो क्या व्यंग्य लेखन में दूसरे आयाम सामने आएंगे। क्या महिला व्यंग्य लेखन की दृष्टि पुरूषों से अलग होगी।

हमारे समय में हुआ करता था पर अब जो लड़कियां लिख रही हैं उनको देखकर लगता है कि वे पुरूषों से अलग नहीं लिख रही है। हो सकता है कि मैं उतना पढ़ भी न पा रही हूं। पर व्यंग्य लेखन में स्त्री-पुरूष में थोड़ा अंतर तो होगा ही क्योंकि हम लोगों का कार्यक्षेत्र अलग है। वैसे बहुत ज्यादा अंतर नहीं हो सकता।

आप लगभग पांच दशक से लेखन कार्य कर रही हैं। तो आप आज की पीढ़ी की लेखिकाओं के लेखन को कैसे देखती हैं तुलनात्मक रूप से।

आज वे बहुत अच्छा लिख रही हैं। मैं कई बेविनार अटैण्ड करती हूं तो वहां मैं देखती हूं। उनका आत्मविश्वास और उनके कहानी कहने का ढंग अच्छा है। ये लेखिकाएं आज की समस्याओं, जटिलताओं से रूबरू है उनके बीच से होकर गुजर रही हैं। पर इनमें एकदम डूबकर और जुटकर लिखने वाली की जरूरत है। इसका कारण मैं समय को मानती हूं। ये जो समय चल रहा है उसे पकड़ने के लिए हमें भागना पड़ रहा है। लेखक भी जल्दबाजी में है और पाठक भी। इसके बावजूद बहुत अच्छी कहानियां वे लिख रही हैं।

अलविदा अन्ना और वेणु की डायरी दोनों ही प्रवासी भारतीयों पर है, अपनी सभ्यता संस्कृति से दूर होने के बाद कोई भी व्यक्ति खुद से ही खोने और पाने के अंतरद्वंद्व से ही संघर्ष करता रहता है। बहुत कुछ नास्टेल्जिया में ही फंसा रह जाता है। यहां आपने बहुत ही बारीक चित्रण किया है।

यह हर विस्थापित के साथ होता है। लेकिन यह विदेश में जाने वालों के साथ अधिक होता है। लेकिन यह उसके साथ होगा, जो संवेदनशील होगा। मैंने अपने उपन्यास में लिखा है कि वहां एक वर्ग ऐसा है जो बिलकुल वहां की चीजों से बहुत प्रभावित रहते हैं। जो संवेदनशील होते हैं वे संघर्ष करते हैं। और एक उम्र पर पहुंचकर यह अहसास और गहराने लगता है।

इस समय क्या नया लिख-पढ रही हैं। आपकी आगे की योजनाएं क्या हैं।

अरे, ऐसा कुछ नहीं। मैं तो खुद को बहुत ही बेपढ़ी-लिखी लेखिका समझती हूं। इस समय मैं ममता कालिया, चित्रा मुद्गल की नई किताबें पढ़ रही हूं। अलका सरावगी का एक उपन्यास कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिएपढ़ा है। मेरी बहुत ही पसंदीदा कथाकार हैं। मैंने अपने कुछ आत्म संस्मरण लिखे हुए है, जो करीब-करीब पूरा हो गया है। ये आत्मकथा नहीं है मेरे पाठकों का कहना था कि मैं अपनी एक आत्मकथा लिखूं। पर मैं तो कहती हूं कि मेरी आत्मकथा में कुछ होगा नहीं, जो उसे वेस्ट सेलर बना दे।

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

‘बुद्धत्व तो स्त्रियों में होता ही है’

सुमधुर भाषिणी, स्त्री चेता कवयित्री अनामिका को उनकी रचना टोकरी में दिगंतः थेरी गाथा 2014 को हिंदी का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है। साहित्कार अनामिका का हिंदी जगत में अपना एक मुकाम है। थेरी गाथाएं स्त्री अभिव्यक्ति का प्रारंभिक रूप है। उनके मन की वृत्तियां और शंकाओं को आधुनिक थेरियों के रूप इस रचना में अभिव्यक्त किया गया है। यहां उनकी कविताओं में स्त्रियां अपने पूरे स्त्रित्व के साथ उपस्थित हैं। यही उनका स्त्री विमर्श है। वे स्त्री-पुरूष को अलग-अलग मानते हुए उन्हें एक दूसरे से भिन्न नहीं मानती हैं। इस पुरस्कृत रचना के माध्यम से उन्होंने हर समाज और वर्ग की स्त्रियों को टटोलने की कोशिश की है। उनके रचना संसार पर हाल ही में अनामिका से बातचीत की प्रतिभा कुशवाहा ने। प्रस्तुत है इसके प्रमुख अंश-

 

कविता के लिए किसी महिला को पहली बार साहित्य अकादमी मिला है, क्या काफी देर हुई।

क्या कहूं! सबसे पहले हम स्त्रियां आपस में बैठकर बातचीत करतीं, उसके बाद बहुत सोच-समझकर उसे सार्वजनिक जीवन में लाते। हमें क्या छोड़ना है, क्या नहीं छोड़ना है, इस पर विचार करते हैं। जो लोग दबे-कुचले हैं वे लोग बहुत सहमकर सोच-समझकर बोलते हैं, फटाफट नहीं बोल पाते हैं। उन्हें लगता है कि हम जो बोले, वे सच्चाई के निकट हो। तो हो सकता है कि हमें अपनी बात कहने में थोड़ा वक्त लगा हो। पूर्वाग्रह जो होता है वह पत्थर से ज्यादा कठोर होता है। उसकी इको-सर्जरी बहुत धीरे-धीरे चलती है। तो हमने बहुत धीरे-धीरे यह सब किया है। हमने ममता से भरके विद्रोह किया है। हमने नफरत से भरके विद्रोह नहीं किया है। हमें जिनके माइंड सेट पर काम करना था, वह हमारे ही जाए हुए थे। ये वही लोग थे जिन्हें हम प्यार करते थे। जैसे हम अपनी संतान को समझाना पड़ता है जैसे उसके धीरे से उनके बाल झाड़ने होते हैं, हम बड़ी धीरज से जैसे धूल झाड़ते हैं। उसी धीरज से हम सबने मिलकर अपनी बात कही है। तो साथ जुड़ते-जुड़ते, सभी को साथ लेते-लेते, इकट्ठा होते-होते समय लग गया। लेकिन कोई बात नहीं, देर आयद, दुरूस्त आयद।

 

थेरी कथाओं को आपने आज की महिलाओं की व्यथा कथा कहने के लिए चुना, क्या कोई खास वजह थी।

इसकी एक खास वजह थी। पहली बार यह हुआ था कि समाज की सभी श्रेणियों से स्त्रियां बाहर आईं। कोई राजकुमारी की बेटी थी, कोई सेनापति की विधवा थी, कोई गणिका की पुत्री थी, कोई छाता बनाने वाली की पत्नी थी, दलित स्त्रियां भी थीं, तो वे कहां अपना निर्वाण ढूढतीं। पहले तो बुद्ध ने न ही कहा था। उन्होंने बुद्ध को अपने तर्को से आश्वस्त किया। चूंकि मैं वैशाली क्षेत्र से ही हूं, तो मेरे अंदर यह बात बहुत समय से धंसी थी। जब मैं दिल्ली यूनीवर्सिटी के हाॅस्टल में आई, तो यहां विस्थापित लड़कियों को देखकर लगा कि ये सभी थेरियां ही तो हैं। ये सभी अलग-अलग जगहों से आकर यहां बसी हैं। अपना-अपना अलग-अलग काम करती हुई, मुक्ति की राह ढूंढ रही हैं, तो मुझे यह सभी थेरी कथाएं ही लगीं। उनको अपना कोई बुद्ध नहीं मिल रहा है। उनके अंदर जो कल्पना का बुद्ध है, उससे वे सवाल रखती हैं। वे उससे दार्शनिक निदान भी पाती और व्यवहारिक निदान भी। तो मैंने कल्पना की, ये अलग-अलग तरह की मार्डन, आपकी तरह और मेरी तरह, कुछ कलाकार भी, मजदूर-कामगार स्त्रियों के भीसंवाद हैं। साथ ही दंगों और युद्ध क्षेत्र की पीड़ित स्त्रियां भी हैं। इन सभी स्त्रियों के मन में जो प्रश्न थे, वे बुद्ध से एक मित्र की तरह अपने प्रश्नों का निदान चाहती हैं। यह जनतंत्र है, सभी एक दोस्त की तरह गपशप करते हुए बात करती हैं। अपनी कल्पना में अपनी आसपास की स्त्रियों के बारे में मैं जितना सोच सकती, मैंने लिखा। तो इस तरह यह रचना बन गई।

 

क्या इसके माध्यम से आप सबाल्टर्न भाव बोध तलाश रही थी कि स्त्रियों का इतिहास फिर से लिखा जाना चाहिए।

बेसिकली सबाल्टर्न ही है, या टाइम ट्रवलिंग भी है। कुछ वही है और कुछ नया भी जुड़ गया है। हम स्त्रियों के कल्पना का साथी कोई बुद्ध जैसा व्यक्ति ही होता है, जो हमें अपने आसपास नहीं दिखता है। क्योंकि हमें हाइपर मैस्क्युलिंग आदमी नहीं चाहिए, क्योंकि हमें हाइपर फेमिनिन नहीं बनना है हमें बैलेंस चाहिए है। बुद्ध की जो सम्यक दृष्टि है, जो डाॅयलाग के लायक हो, प्यार करने के लायक हो, ऐसे लोगों का समाज चाहिए हमें।

 

क्या आपकी यह रचना स्त्रियों में बुद्धत्व की तलाश है।

वास्तव में बुद्धत्व तो स्त्रियों में होता ही है। वे मूल्यतः अहिंसक होती हैं। स्त्री आंदोलन एक ऐसा आंदोलन है जिसमें एक बूंद खून नहीं बहाया। और ममता से प्रतिरोध किया है। न्याय का करूणा से जो रिश्ता बनता है, वही हमारे स्त्री विमर्श का रिश्ता बनता है। इसलिए हमने डाॅयलाॅग का माध्यम अपनाया। हम नहीं सोचते कि उनमें बुद्धत्व के बीज नहीं हैं, हम उन बीजों को चटकाना चाहते है। कम से कम नई पीढी के पुरूषों से ऐसी उम्मीद रखते हैं। जो पुरूष हमें गढ़ने हैं वे स्त्रीवाद के गर्भ से ही जन्मतें हैं। मैं हमेशा बाॅयलाॅजिकल मदरहुड से आगे जाना चाहती हूं। वही नहीं होता जो हम गर्भ में धारण करते हैं, हमारी मानस संततियां हमारे आगे आने वाले पुरुष हैं, पीछे का तो हम कुछ सुधार नहीं सकते हैं न। हमें तो हमेशा आगे सोचना है।

 

क्या थेरी गाथाएं भारत में स्त्री प्रतिरोध की पहली आवाज थीं?

मान सकते हैं। हालांकि उल्लेख है कि कुछ ऋषिकाएं प्रश्न करती हैं। मैत्रेयी भी प्रश्न करती हैं। वे पितृसत्ता पर सवाल उठाती हैं। इस तरह का फुटकर उल्लेख मिलता है, लेकिन थेरी गाथाओं जैसा जहां बहुत सारी स्त्रियां सभी वर्णों और समाज की है, मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।

 

आपने इस किताब की भूमिका में कही लिखा है कि बुद्ध को अविश्वास स्त्रियों पर नहीं, पुरूषों के निग्रह पर था, यानी स्त्रियों को नाकाबिल नहीं, बल्कि स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों को प्रशिक्षित करना अधिक जरूरी समझते थे।

कोमलता के प्रति पुरुषों का आग्रह कुछ ज्यादा एग्रेसिव हो जाता है। वे कब्जा करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि वे उनकी प्रशंसा करके उनको छोड़ दें। अगर उन्हें कोई सुंदर खिला हुआ फूल मिल जाए, तो वे उसे तोड़कर अपने कोट की बटन में लगाना चाहेंगे। यह पजैसिव वाला स्वभाव है न, वह एक जिंदा आदमी पर नहीं चल पाता। हम कोई वस्तु नहीं है न। तो असल में सुधरना तो उन्हीं को ही है, हमें थोडी ही।

 

क्या आज के परिप्रेक्ष में इसे स्त्री के प्रति हिंसा, बलात्कार, योनि हिंसा के रूप में देख सकते हैं, जबकि प्रशिक्षण देने की जरूरत पुरुषों को है ना कि स्त्रियों को। जिन पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए जाते है कि ऐसा करो, ऐसा न करो।

ये ब्लेमिंग गेम होता है कि तुमने ऐसा किया और ऐसा हो गया। अरे, पहले तुम तो सुधर जाओ। मीरा भी कहती थी कि ‘अपने सर पे पर्दा कर ले, मैं अबला बौरानी।’

 

क्या वैश्विक शांति में महिलाओं की कोई प्रभावी भूमिका हो सकती है? जबकि आज के इस वैश्विक समाज में चारों तरफ हिंसा, वर्चस्व, सत्ताओं का बोलबाला है।

हम लोग प्रतिस्पर्धा-प्रतियोगिता में नहीं, सहयोग और सहभागिता में विश्वास करते हैं। हम स्त्रियों को यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि हर व्यक्ति किसी न किसी तरह से विशिष्ट है। एक फोटोग्राफर कहता है कि एक चेहरा किसी न किसी कोण से सुंदर होता ही है। एक चरित्र कहीं न कहीं से कोमल-वैशिष्ठ होता ही है। हमें इस वैशिष्ठ को उभारने की जरूरत है और एक मां ही उस वैशिष्ठ को उभारने का काम कर सकती है। अपने बच्चे के बारे में मां से अधिक उसका वैशिष्ठ कोई नहीं जानता, एक मां इसे उभारने का काम जरूर करती है।

 

स्त्री चेतना को आप कैसे देखती है या किन चीजों में तलाशती हैं?

न्याय से ऊपर है करुणा। हम अपने साथ हुए अन्याय को माफ कर सकते हैं, बातचीत कर सकते हैं। पर कहीं जब किसी के साथ अन्याय होता देखते हैं, तो हम तुरंत आवाज उठाएंगे। तब हम यहां करुणा की तरफ नहीं देखेगें। अगर करुणा करेंगे तो उस आदमी पर कि कहीं वह पशु न बन जाए। हम अपने बच्चों को कैसे अनुशासित करते हैं। हमें भेड और भेड़ियों का समाज नहीं बनाना है न।

 

पुरुष-स्त्री बराबरी आपके लिए क्या है, क्या यह संभव है?

साधन हम सभी को बराबरी के ही चाहिए। जो साधन हमें पढ़ाई-लिखाई, नौकरी-पेशा के लिए चाहिए, वह मिलना ही चाहिए। मैं नहीं चाहती कि स्त्रियां पुरुष बन जाए। हमारे गुण जो सहिष्णुता और करुणा वाले हैं, उनका भी सम्यक बंटवारा होना चाहिए। वे हमारे ही हिस्से में नहीं होने चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि धीरज जैसे गुणों को हमें छोड़ देना चाहिए। हमारी कोशिश तो यह होनी चाहिए कि पुरुष इसे अपनाएं। हम एक देश के नागरिक है, गणतंत्र में हम एक-दूसरे से कमतर नहीं रह सकते।

 

स्त्री-पुरुष के बीच के प्रेम को कैसे परिभाषित करेगीं।

यह तो नैसर्गिक आकर्षण है ही, पर इसका मूल है आदर। उसकी (प्रेम) उपस्थिति में हमें अपनापन लगे, कोई तनाव न होना चाहिए।

 

अभिव्यक्ति के लिए कविता आपका सहज माध्यम है?

-कविता मुझे बहुत अच्छी लगती है और इससे मुझे बहुत ताकत मिलती है, पर जब मेरे पास बहुत से माध्यमों से ढेर सारे सवाल इकट्ठे हो जाते हैं, तो मैं गद्य में लिखती हूं।

 

आपके अंदर कविता का अंकुर कब फूटा था?

पिताजी के साथ अंतराक्षरी खेलते हुए। बस ऐसे ही कुछ लाइनें तत्काल रचकर बोलती थी मैं।

 

आप बहुतों की प्रिय कवयित्री हैं, आप किनकी कविताओं को पसंद करती हैं?

बहुत से कवि है जिनकी बहुत सी कविताएं मैं काफी पसंद करती हूं। मेरे पिता जी की कविताएं भी मुझे काफी प्रिय हैं।

 

आप अपनी साहित्यिक यात्रा से संतुष्ठ हैं?

अभी तो लगता है, शुरूआत हुई है। बहुत कुछ करना है, अभी तक तो बच्चों को बड़ा करने और नौकरी में व्यस्त रही। लगता है कि जंगल में जाकर एकांत में बैठकर कुछ रचा जाए। देखिए, कब होता है।

मंगलवार, 23 मार्च 2021

संकटकाल में महिलायें कैसे करती हैं नेतृत्व


नेतृत्वकर्ता के रूप में महिलाओं देखा जाना आज भी संदेह के दायरे में ज्यादा आता है, उन्हें शंका की निगाह से देखा जाता है, नापा-तौला जाता है, कही कहीं नकारा भी जाता है। फिर भी आज बहुत से क्षेत्रों में महिलाएं अपने कुशल नेतृत्व से टिकी हुईं है और दूसरी महिलाओं और लड़कियों को प्रेरित कर रही हैं। सबसे अच्छी बात यह रही कि इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को नेतृत्व में महिलाएंके रूप में मनाए जाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्रसंघ ने कर दी है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वुमिन इन लीडरशिपः अचीविंग एन इक्वल फ्यूचर इन ए कोविड-19 वल्र्ड का नाम दिया है। प्रश्न है कि आखिर संयुक्त राष्ट्र संघ इस महामारी के बीच महिला नेतृत्व को सम्मानित करना या याद करना क्यों चाह रहा है। क्या अब समय आ गया है कि महिलाओं के नेतृत्व को एक पहचान और विश्वास मिलना चाहिए। या फिर इस पहचान और विश्वास से विश्व और विश्व समाज को क्या हासिल होने वाला है। और सबसे बड़ा सवाल कि महिला नेतृत्व किस मायने में पुरूष नेतृत्व से भिन्न और प्रभावशाली है, जिसके कारण यह और भी अपरिहार्य हो जाता है।

2020 कोरोना जैसी बीमारी के नाम हो चुका है और इसका कुछ अंश इस वर्ष भी हम झेलने के लिए मजबूर होंगे। इस पूरी महामारी के दौरान हम कोरोना योद्धाओं की सेवाओं के आगे नतमस्तक रहे। उनकी मानवीयता को आने वाला समय हमेशा याद रखेगा। इन अग्रिम पंक्ति के कोरोना योद्धाओं में बड़ी संख्या में महिलाओं ने अपना योगदान दिया। चाहे वह एक डाॅक्टर के रूप में हो, या फिर नर्स के रूप में, या फिर एक सफाईकर्मी के रूप में, यह सब हम लोगों ने काफी नजदीक से देखा। जिस कुशलता से इन महिलाओं ने अपने फर्ज का निर्वाह किया, उसी को संयुक्त राष्ट्र संघ याद कर रहा है। लेकिन कोरोना महामारी में फ्रंटलाइन योद्धाओं के अतिरिक्त देश केा नेतृत्व प्रदान कर रहीं विश्व की दूसरी नेतृत्वकर्ता महिलाओं ने खूब सुर्खियां बटोरी। और बटोरती भी क्यों नहीं, जिस कुशलता से इन महिलाओं ने अपने देश के नागरिकों को कोरोना की मार से बचाया, वह उनके कुशल नेतृत्व के कारण ही था। हर पूर्वाग्रह को धता बताते हुए इन नेतृत्वकर्ता महिलाओं ने बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। अपने देश में केरल राज्य की स्वास्थ्य मंत्री केके सैलजा की तारीफ कौन नहीं करना चाहेगा। इंटरपार्लियामेंट्रीय यूनियन की माने तो दुनिया में 70 फीसदी महिलाएं स्वास्थ्य क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रही हैं।

इस समय 22 देशों को महिला नेतृत्व मिला हुआ है, यानी राजनीतिक प्रमुख के तौर पर इन 22 देशों को महिलाएं चला रही हैं। यह आंकड़ा विश्व में पुरूष नेतृत्व के मुकाबले सिर्फ सात फीसदी बैठता है, पर कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई में उनका रिकाॅर्ड बेहतर रहा। अब सवाल उठता है कि महिलाओं के नेतृत्व में ऐसी क्या बात है कि कोरोना महामारी के विरूद्ध लड़ाई में उन्हें ज्यादा कामयाबी मिली। न्यूजीलैंड से लेकर जर्मनी तक, ताइवान से लेकर नार्वे तक दुनिया के ऐसे देश हैं, जहां देश की कमान महिलाओं के हाथों में थी, जब कोरोना अपने क्रूर रूप में था। आंकड़े बताते है कि इन देशों में कोरोना से होने वाली मृत्यु दर दूसरे देशों की अपेक्षा काफी कम रही। इसी बात के लिए इनकी तारीफ हो रही है। जब बड़े-बड़े देशों के प्रमुख कोरोना को साधारण फ्लू या जुकामबताकर मजाक बना रहे थे, तब ये महिलाएं गंभीरता से कोरोना से लड़ने के लिए अपनी तैयारी में मशगूल थीं, जिसका परिणाम हम सभी ने देखा भी। इस संबंध में कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं। आइसलैंड की प्रधानमंत्री कैटरीन जैकब्स्डोटिर ने बहुत जल्द ही कोरोना टेस्ट कराने का फैसला किया और तमाम जरूरी कदम उठाए। ताइवान की राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन ने समय रहते महामारी नियंत्रण केंद्र की स्थापना की और वायरस संक्रमण रोकने के लिए ट्रैंकिंग और ट्रेसिंग की रणनीति पर काम किया। इसी तरह न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने खासा सख्त रूख अख्तियार करके संक्रमण के मामलों को लगभग स्थिर कर दिया। न्यूजीलैंड ने तभी लाॅकडाॅउन लगा दिया था जब उनके यहां कोरोना मरीजों की संख्या केवल छह थी।

आलोचक यह भी कह सकते हैं कि यह विकसित और काफी कम जनसंख्या वाले देश हैं और यहां की स्वास्थ्य सेवाएं दूसरे देशों की अपेक्षा चाक-चैबंद हैं, तो संभालना कोई मुश्किल बात नहीं हैं। इस संबंध में सुप्रिया गरिकीपति और उमा कंभांपति ने एक स्टडी पेपर तैयार किया है जिसमें 194 देशों में उपलब्ध कोरोनाकाल के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है, जिनमें से 19 देशों को महिला नेतृत्व मिला हुआ है। सुप्रिया और उमा ने पुरूष और महिला नेतृत्व के लिए एक समान पृष्ठभूमि वाले पड़ोसी देशों की आर्थिक दशाओं और सोसियो-डेमोग्राफिक फैक्टर का तुलनात्मक अध्ययन करके कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं। जैसे उन्होंने जर्मनी, न्यूजीलैंड और बांग्लादेश की तुलना पुरूष नेतृत्व वाले निकटतम पड़ोसी देश ब्रिटेन, आयरलैंड और पाकिस्तान से की है। रिपोर्ट में पिछले साल 20 अगस्त तक के आंकड़ों के माध्यम से बताया गया है कि जर्मनी में 9,000 कोरोना के कारण मृत्यु हुई थी जबकि ब्रिटेन में उस समय तक 41,000 लोगों की मृत्यु कोरोना से हो चुकी थी। इसी तरह न्यूजीलैंड में 22, जबकि उसके निकटतम पड़ोसी आयरलैंड में 1,700 लोगों की मृत्यु हो गई थी। इसी तरह से विकासशील देश बांग्लादेश में इस समय तक 3,500 जबकि पाकिस्तान में 6,000 लोग कोरोना के कारण कालकल्पित हो चुके थे। इन दोनों ने अपने रिसर्च पेपर में काफी गहनता से इस बात का अध्ययन किया है कि कैसे महिलाएं संकटकाल में काम करती हैं। रिसर्च पेपर इस बात का उत्तर सजगता और नीतियों के प्रति उनकी सामंजस्ताकाम करती है। ये दोनों महिलाएं यूनीवर्सिटी आॅफ लीवरपूल और यूनीवर्सिटी आॅफ रीडिंग से संबद्ध हैं। सुप्रिया अपनी रिसर्च में कहती हैं कि हमारे निष्कर्ष इस बात की ओर इशारा करती है कि महिला नेता संभावित विपत्तियों का सामना कहीं अधिक जल्दी और दृढ़ता से करती हैं। अधिकांश मामलों में महिला नेतृत्वकर्ताओं ने पुरूष नेतृत्वकर्ताओं की अपेक्षा पहले ही लाॅकडाॅउन लगाकर जरूरी इंतजाम कर लिए थे। यद्यपि लाॅकडाउन से आर्थिक गतिविधियों के रूक जाने से आर्थिक संकट आने और भविष्य में राजनीतिक तौर पर अलोकप्रिय होने की पूरी संभावना थी, फिर भी उन्होंने जोखिम उठाया।

आंकड़ों की माने तो विश्व में सार्वजनिक रूप से महिलाओं की सहभागिता बढ़ रही है। फिर भी समानता अभी दूर की कौड़ी ही है। वैश्विक रूप से महिलाएं 21 फीसदी मंत्री पदों पर सुशोभित हैं, केवल तीन देशों में 50 फीसदी या उससे अधिक महिलाएं संसद में है, केवल 22 देशों को हेड महिलाएं कर रही हैं। 2018 में 153 निर्वाचित राष्ट्राध्यक्षों के चुनाव में केवल 10 महिलाएं ही अपने देशों के नेतृत्वकर्ता के तौर पर चुनी गईं। जिस दर से निर्णयात्मक मामलों में महिला सहभागिता की रफ्तार है, उसमें हमें 130 वर्ष लग जाएंगे समानता के स्तर पर पहुंचने पर। संभवता यूएन इसीलिए चिंतित है। सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की प्रभावी सहभागिता और निर्णयात्मक क्षमता के विकास के द्वारा ही उनके जीवन से हिंसा हटाने, लिंगात्मक समानता बढ़ाने और वुमन इमपावरमेंट की ओर बढ़ सकते है। यूएन का मानना है कि जिस भी टेबल पर बैठकर निर्णय लिए जा रहे हैं, हमें उस हर टेबल पर महिलाओं की जरूरत है ताकि सभी को समान अधिकार और अवसर मिल सके। संयुक्त राष्ट्र की इस मुहिम को इस बात से और भी अच्छे से समझा जा सकता है। कोरोना के संदर्भ में महिला नेतृत्व को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की उपमहासचिव अमीना जे. मोहम्मद की अध्यक्षता में विभिन्न क्षेत्रों की नेतृत्वकर्ता महिलाओं के साथ एक बैठक हुई। इसमें मोजाम्बीक की पूर्व मंत्री ग्रासा मशेल ने कहा कि इस संकट से ऐसा सच सामने आया है जिसे नकारा नहीं जा सकता है। कहीं अधिक कारगार ढंग से दुनिया को सृजित करने में महिलाओं का नेतृत्व बेहद अहम है...जो कहीं अधिक मानवाधिकारिक, ज्यादा बराबरी वाला होता है, जिससे सामाजिक न्याय सुनिश्चित होता है।

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

तो तुम लेखक बनना चाहते हो








तो तुम लेखक बनना चाहते हो

- चार्ल्स बुकोवस्की




अगर फूट के ना निकले
बिना किसी वजह के
मत लिखो.
अगर बिना पूछे-बताये ना बरस पड़े
तुम्हारे दिल और दिमाग़
और जुबां और पेट से
मत लिखो.
अगर घंटों बैठना पड़े
अपने कम्प्यूटर को ताकते
या टाइपराइटर पर बोझ बने हुए
खोजते कमीने शब्दों को
मत लिखो.
अगर पैसे के लिए
या शोहरत के लिए लिख रहे हो
मत लिखो.
अगर लिख रहे हो
कि ये रास्ता है
किसी औरत को बिस्तर तक लाने का
तो मत लिखो.
अगर बैठ के तुम्हें
बार-बार करने पड़ते हैं सुधार
जाने दो.
अगर लिखने का सोच के ही
होने लगता है तनाव
छोड़ दो.
अगर किसी और की तरह
लिखने की फ़िराक़ में हो
तो भूल ही जाओ

अगर वक़्त लगता है
कि चिंघाड़े तुम्हारी अपनी आवाज़
तो उसे वक़्त दो
पर ना चिंघाड़े ग़र फिर भी
तो सामान बाँध लो.
अगर पहले पढ़ के सुनाना पड़ता है
अपनी बीवी या प्रेमिका या प्रेमी
या माँ-बाप या अजनबी आलोचक को
तो तुम कच्चे हो अभी.
अनगिनत लेखकों से मत बनो
उन हज़ारों की तरह
जो कहते हैं खुद को ‘लेखक’
उदास, खोखले और नक्शेबाज़
स्व-मैथुन के मारे हुए.
दुनिया भर की लाइब्रेरियां
त्रस्त हो चुकी हैं
तुम्हारी क़ौम से
मत बढ़ाओ इसे.
दुहाई है, मत बढ़ाओ.
जब तक तुम्हारी आत्मा की ज़मीन से
लम्बी-दूरी के मारक रॉकेट जैसे
नहीं निकलते लफ़्ज़
जब तक चुप रहना
तुम्हें पूरे चाँद की रात के भेड़िये-सा
नहीं कर देता पागल या हत्यारा
जब तक कि तुम्हारी नाभी का सूरज
तुम्हारे कमरे में आग नहीं लगा देता
मत मत मत लिखो.




क्यूंकि जब वक़्त आएगा
और तुम्हें मिला होगा वो वरदान

तुम लिखोगे और लिखते रहोगे

जब तक भस्म नहीं हो जाते
तुम या यह हवस.
कोई और तरीक़ा नहीं है
कोई और तरीक़ा नहीं था कभी
कोई और तरीक़ा हो भी नहीं सकता.


चार्ल्स बुकोवस्की जर्मनी मूल के लेखक और कवि है. उनकी उक्त कविता अंतर्जाल पर टहलते हुए मिली. अद्भुत लगी, इसलिए आप सभी पाठकों से साझा करने का दिल किया. चार्ल्स बुकोवस्की की  कविताएँ बिलकुल सहज जीवन के यथार्थ से रूबरू या   कहे दो दो हाथ करती दिखती है.

सोमवार, 16 मार्च 2020

वोट चाहिए, पर भागीदार नहीं!

महिलाओं के दम पर दिल्ली में सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी ने उस समय तमाम महिला वोटरों का निराश कर दिया, जब नवगठित कैबिनेट में एक भी महिला को जगह नहीं दी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने तीसरे कार्यकाल में अपनी पुरानी कैबिनेट को दोहरा दिया। इसे लेकर आम लोगों में जबरदस्त प्रतिक्रियाएं आईं। ये कैसा विरोधाभास है कि चुनाव से पहले महिलाओं के हित और कल्याण के लिए जिन्होंने कई प्रकार की फौरी राहते बांटी, उन्हीं ने ही अपनी पार्टी में काम करने वाली और चुनाव बाद जीतीं महिला विधायकों की उपेक्षा कर दी? ऐसा तो नहीं हो सकता कि आम आदमी पार्टी से जीतीं 08 महिला विधायकों में से कोई भी कैबिनेट में शामिल होने लायक नहीं था? दिल्ली में शिक्षा व्यवस्था में तमाम सुधारों के पीछे काम करने वाली आतिशी मार्लेना को उन्होंने कैसे नजरअंदाज कर दिया? जबकि इन चुनावों में शिक्षा के क्षेत्र में हुए सुधार को एक बड़ा मुद्दा बनाया गया था। सरकार में महिलाओं को जगह न दिए जाने के संबंध में ऐसे कई सवाल सीधे मुख्यमंत्री से मुखातिब हुए। पर मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार के नाम पर किसी का जवाब नहीं मिला। इसका अर्थ क्या यह लगाया जाए कि आम आदमी पार्टी योग्य महिलाओं के होते हुए भी सिर्फ पुरुषों की पार्टी बनकर रहना चाहती है?

दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीती हैं। यद्यपि 2015 के मुकाबले सीटें कम आई हैं, पर महिला सीटों में इजाफा हुआ है। इस बार 62 विधायकों में आठ महिला विधायक चुनावी जंग जीत कर आई हैं। जबकि 2015 में 06 महिला विधायक थीं। अरविंद केजरीवाल की इस धमाकेदार जीत के पीछे महिलाओं के समर्थन को एक बड़ी वजह बताया जा रहा है। चुनाव के बाद हुए सीएसडीएस के सर्वे के अनुसार आम आदमी पार्टी को 60 फीसदी महिलाओं ने वोट किया, जबकि 49 फीसदी पुरुषों ने। यह 2015 के मुकाबले 07 फीसदी की बढोत्तरी दिखाता है। महिला वोटरों ने आम आदमी पार्टी को कई कारणों से वोट किया। इसमें सबसे बड़ा कारण महिलाओं के लिए उनकी कल्याणकारी योजनाएं और सीएए-एनआरसी के प्रति उनका रुख बना। लोकसभा चुनावों से पहले इस संदर्भ में चेंज डॉट ओआरजी का एक आॅनलाइन सर्वे भी देखा जा सकता है। जो बताता है कि महिलाएं किन मुद्दों पर वोट देना पसंद करती है। शायद मुख्यमंत्री केजरीवाल इस बात को अच्छे से समझ गए थे।

कारण चाहे जो भी हो, लेकिन आधी आबादी के प्रति अरविंद केजरीवाल और पार्टी की जो सद्इच्छा थी, वह उनकी सत्ता भागीदारी में नहीं दिखी। वे अन्य राजनीतिज्ञों की तरह महिलाओं की उपेक्षा सत्ता समीकरण के लिए आसानी से कर गए। अगर कैबिनेट में महिलाओं को मंत्री पद दिया जाता तो संबंधित विभागों में (रिसर्च बताती हैं कि) महिलाओं और बच्चों के प्रति अधिक संवेदनशीलता से काम होने की पूरी संभावना होती। यह दिल्ली का दुर्भाग्य रहा है कि 1993 से केवल चार महिलाएं कैबिनेट में स्थान पा सकी हैं। आम आदमी पार्टी की 49 दिन की सरकार में राखी बिड़लान को महिला और बाल, समाज कल्याण और भाषा मंत्री बनाया था। 1998 में भाजपा से पूर्णिमा सेठी, कृष्णा तीरथ (1998-2001) एवं किरण वालिया (2008-2013) कांग्रेस से दिल्ली कैबिनेट में रही हैं।

देखा गया है कि राजधानी दिल्ली की विधानसभा चुनावों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व राज्य के कैबिनेट में ही नहीं रहा है, बल्कि विधानसभा में भी काफी कम रहा है। 1993 के पहले चुनाव से लेकर हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव तक केवल 39 महिलाएं ही विधानसभा पहुंच सकी हैं। देश और अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी महिलाओं की राजनीति की डगर आसान नहीं रही है, चाहे जिस भी राजनीतिक दलों की सरकार रही हो। फिर भी राज्य के मुख्यमंत्री महिलाओं के प्रति जिस तरह की संवेदनशीलता का प्रदर्शन करते हैं, उनसे इस तरह की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। फिर अभी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के पास पूरे पांच साल हैं, वे अपनी गलती सुधार भी सकते हैं।     

सोमवार, 13 जनवरी 2020

माननीयों के घड़ियाली आंसू


निर्भया जैसे भीभत्स कांड के बाद, और सख्त कानून बनने, कई तरह की गाइड लाइन जारी होने के बावजूद कई जघन्य अपराध हो चुके हैं और भी होने की पूरी संभावना है। प्रश्न है कि देश के नियंता माननीय अब तक महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों के प्रति जरा भी संवेदनशील क्यों नहीं हुए हैं? क्या यह देश की एक भयावह समस्या नहीं है, जहां प्रत्येक बच्ची, किशोरी, महिलाएं एक असुरक्षा की भावना के साथ जी रही हैं। क्या देश का कोई भी सांसद इस बात का दम भर सकता है कि उसके क्षेत्र में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में जरा भी कमी आई है। क्या यह कोई बड़ी बात है कि प्रत्येक सांसद या विधायक अपने-अपने क्षेत्रों की महिलाओं को यह अश्वासन नहीं दे सकता है कि हमारे क्षेत्र की मां-बेटी-बहन सुरक्षित होगी। क्या यह इतना मुश्किल है? या फिर इच्छा शक्ति का अभाव है? अगर यह जरा भी सच है, तब तो आपका गुस्सा भी बनावटी है।
और हो भी क्यों न। राजनीति में महिलाओं के लिए कोई खास स्पेस नहीं रखा गया है। भारतीय राजनीति अन्य क्षेत्रों की तरह अभी भी महिला विरोधी ही है। संसद में महिला आरक्षण की बात हो, या राजनीतिक दलों में महिला भागीदारी, सभी का स्तर काफी निम्न स्तर का है।इसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि आजादी के सात दशक बात भी इस नई लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या कुल जमा सर्वाधिक 78 सांसद ही है, जो कि कुल सासंदों का 17 फीसदी बैठता है। आजादी के सात दशकों बाद राजनीति में महिला भागीदारी यह चेहरा यह बताने के लिए काफी है कि महिलाएं अपनी सुरक्षा के लिए माननीयों से ज्यादा अपेक्षाएं क्यों रखे। नेशनल इलेक्शन वॉच ने हैदराबाद की घटना के बाद देश की संसद का महिला विरोधी हाल बयान किया है। वैसे देश की राजनीति का अपराधीकरण और ऐसे लोगों का सांसद और विधायक बनना भी इसी समस्या से जोड़कर देखा जा सकता है।   
हाल ही में नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफोर्म्स ने 4,896 में से 4,822 सांसदों और विधायकों के शपथपत्रों का विश्लेषण किया है। इससे पता चलता है कि 2009 से 2019 तक लोक सभा चुनाव में महिलाओं के ऊपर अत्याचार से संबंधित मामले घोषित करने वाले उम्मीदवारों की संख्या में 231 फीसदी की वृद्धि हुई है। वहीं इसी दौरान लोकसभा चुनाव में महिलाओं पर अत्याचार से संबंधित मामले घोषित करने वाले सांसदों की संख्या में 850 फीसदी की वृद्धि हुई है। नेशनल इलेक्शन वॉच की इस रिपोर्ट की माने तो कहा जा सकता है कि महिलाओं के मामले में आरोपित माननीयों से महिलाओं के प्रति संवेदनशील होने की अपेक्षा हम कैसे कर सकते हैं। हां, दूसरी बात है कि इस तरह के आरोपों को सभी सांसद और विधायकआरोपही मानकर चलते हैं।
यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले पांच सालों में महिलाओं के ऊपर अत्याचार से संबंधित मामले घोषित करने वाले कुल 572 उम्मीदवारों ने लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा चुनाव लड़ा था, इनमें से किसी भी उम्मीदवार पर आरोप दोषसिद्ध नहीं हुआ है। इन्हीं वर्षों में ऐसे मामले घोषित करने वाले 162 निर्दलीय उम्मीदवारों ने लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा के लिए चुनाव लड़ा था। इस विश्लेषण से यह भी पता चलता है कि राजनीतिक दल महिलाओं पर अत्याचार के मुद्दों पर ज्यादा चिंतित दिखाई नहीं देते हैं। यहां तक महिला नेतृत्व वाले राजनीतिक दल जैसे कांग्रेस, बीएसपी और एआईटीसी भी ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दे रहे हैं। राज्यों में पश्चिम बंगाल से सबसे अधिक 16 सांसद और विधायक, ओडीशा और महाराष्ट्र दोनों से 12-12 सांसद और विधायक हैं, जिन्होंने महिलाओं से संबंधित अपराध घोषित किए हैं। पिछले पांच वर्षों में राज्यों में महाराष्ट्र से सबसे अधिक 84 उम्मीदवार, दूसरे नंबर पर बिहार से 75 और तीसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल से 69 उम्मीदवारों (निर्दलीय उम्मीदवारों सहित) को राजनीतिक दलों ने टिकट दिया, जबकि उन्होंने अपने शपथपत्र में महिलाओं के ऊपर अत्याचार से संबंधित मामले घोषित किए थे।
कारण सिर्फ इतना ही नहीं है कि राजनीति का अपराधीकरण हुआ और सांसद-विधायक कई-कई मामलों में आरोपित हैं, वास्तव में महिला विहीन राजनीति अधिक मात्रा में पुरुष सत्ता का पोषण कर रही है। इसलिए देखा गया है कि न केवल पुरुष सांसद बल्कि महिला सांसद भी महिला मुद्दों के प्रति इतनी संवेदनशील नहीं रहती है, जितना उन्हें होना चाहिए। उनकी प्राथमिकता महिला मुद्दों से कही ज्यादा अपने दलों के प्रति रहती है। इसलिए वे समय-समय पर महिला मुद्दों के प्रतिसिलेक्टिवरवैया भी अख्तियार कर लेती हैं। इसकी वजह राजनीति का वही मेल डॉमिनेशन होता है। इसके लिए जरूरी है कि पहले न केवल राजनीति में बल्कि राजनीतिक दलों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, ताकि महिलाएं अधिक से अधिक संख्या में संसद, विधानसभा पहुंच सके। परिणामस्वरूप राजनीति महिला मुखी होगी और माननीय कहीं अधिक महिलाओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझेगे, और महिला मुद्दों पर केवल घड़ियाली आंसू नहीं बहायेंगे।